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Friday, 30 June 2017

नहीं मिलती...

जाने किसने छिड़क दिया है तेज़ाब बादलों पर
कि बूंदों से अब तन को ठंडक नहीं मिलती. 

बरसने को तो बरसती है बरसात अब भी यूँही
पर मिट्टी को अब उससे तरुणाई नहीं मिलती.

खो गई है माहौल से सावन की वो नफासत,  
अब सीने में किसी के वो हिलोर नहीं मिलती.

अब न चाँद महकता हैन रात संवरती है
है कैसी यह सुबह जहाँ रौशनी नहीं मिलती. 

आशिक के दिल में भी अब कहाँ जज़्बात बसते हैं
सनम के आगोश में भी अब राहत नहीं मिलती. 

चलने लगी हैं जब से कीबोर्ड पर ये ऊँगलियाँ
शब्दों में भी अब वो सलाहियत नहीं मिलती.

खो गई है अदब से "शिखामोहब्बत इस कदर,
कि कागज़ पर भी अब वो स्याही नहीं मिलती.   
#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

24 comments:

  1. गज़ब जी...उम्दा रचना...

    अंतरराष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉग दिवस पर आपका योगदान सराहनीय है. हम आपका अभिनन्दन करते हैं. हिन्दी ब्लॉग जगत आबाद रहे. अन्नत शुभकामनायें. नियमित लिखें. साधुवाद
    #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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  2. आप लिखते रहिए ... पाठक सब कुछ खोज लेंगे ...

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  3. फिर दिल दो #हिन्दी_ब्लॉगिंग को..

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  4. बहुत ख़ूब .... बेहतरीन पंक्तियाँ रचीं |

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  5. वाह, बस कीबोर्ड को स्याही नहीं चाहिये #हिन्दी_ब्लॉगिंग

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  6. सभी का एक ही जवाब है दुसरो से उम्मीदे बहुत ज्यादा है |

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  7. न जाने कैसा चलन चल रहा है इस ज़िन्दगी में
    सुकूं की चाहत ही ज़िन्दगी को राहत नहीं देती ...

    खूबसूरत ग़ज़ल .

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  8. बहुत कुछ पा लिया तो बहुत कुछ खो भी गया हमसे :)

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  9. वाह....क्या बात है !
    दाद हाज़िर है !!वैसे खोजो तो ख़ुदा भी मिलता है....ठंडक,हिलोर,रोशनी,स्याही,सलाहियत,राहत क्या चीज़ है !!

    ~अनुलता~

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  10. kyaa baat kyaa baat kyaa baat,
    mere fev mausam kaa geet

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  11. जाने किसने छिड़क दिया है तेज़ाब बादलों पर,
    कि बूंदों से अब तन को ठंडक नहीं मिलती.
    कमाल शिखा कमाल

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  12. सच है कि बहुत कुछ खो गया है पर चाँद और आशिक सुधरते नहीं या कहूँ बदलते नहीं ....

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  13. चलने लगी हैं जब से कीबोर्ड पर ये ऊँगलियाँ,
    शब्दों में भी अब वो सलाहियत नहीं मिलती.
    शानदार गजल.

    #हिंदी_ब्लागिँग में नया जोश भरने के लिये आपका सादर आभार
    रामराम
    ०४१

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  14. क्या हुआ है जो बदला है इस तरह समां
    मौसम तो नहीं कह दिया दिवाने को....
    बहुत अच्छा लिखा ....

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  15. बहुत सुन्दर......विरह पीर
    प्रणाम स्वीकार करें

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  16. बहुत बढ़िया

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  17. मस्त वाली पोस्ट है, लिखते रहिये और हम पढ़ते रहेंगे...

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  18. gazabb gazab gazabb!!
    अब न चाँद महकता है, न रात संवरती है,
    है कैसी यह सुबह जहाँ रौशनी नहीं मिलती.
    Totally awesome!! :)

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  19. बहुत बढ़िया!

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  20. हिम्मते मर्दां मददे खुदा :)

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  21. गहन भाव हृदय की टीस उकेरते हुए ....हर पल एक जैसा तो नहीं होता ....किन्तु धूप और छाँव अपने अपने समय पर आते ज़रूर हैं !! बहुत अच्छा लिखा शिखा !!

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  22. न जाने कैसा चलन चल रहा है इस ज़िन्दगी में
    सुकूं की चाहत ही ज़िन्दगी को राहत नहीं देती ...

    खूबसूरत ग़ज़ल

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  23. आँखें ऐसी चौंधियाई हुई हैं कि दिशा का भान नहीं रहता ,अस्लियत नहीं दिखती .

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