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Tuesday, 28 March 2017

वह जीने लगी है...

अब नहीं होती उसकी आँखे नम जब मिलते हैं अपने
अब नहीं भीगतीं उसकी पलके देखकर टूटते सपने।

अब नहीं छूटती उसकी रुलाई किसी के उल्हानो से
अब नहीं मरती उसकी भूख किसी के भी तानो से।

अब किसी की चढ़ी तौयोरियों से नहीं घुटता मन उसका
अब किसी की उपेक्षाओं से नहीं घुलता तन उसका ।

अब नम होने से पहले वह आँखों पर रख लेती है खीरे की फांकें
लेती है कॉफी के साथ केक, सुनती है सेवेंटीज के रोमांटिक गाने।

मन भारी होता है तो वह अब रोती नहीं रहती है
पहनती है हील्स और सालसा क्लास चल देती है।

आखिरकार अपनी जिंदगी अब वह जीने लगी है
क्योंकि पचास के आसपास की अब वह होने लगी है।

14 comments:

  1. सही कहा, पचास क्या उसके कुछ पहले ही , कब तक दुसरो के लिए जिए जीवन अपना है हम भी तो जिए :)

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  2. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" बुधवार 29 मार्च 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. चालीस के बाद स्त्रियों की जिंदगी में बदलाव आने लगता है....थोड़ी ढ़ीठ थोड़ी लापरवाह थोड़ी दृढ़ता मिलकर एक आत्मविश्वासी व्यक्तित्व गढ़ देते हैं..।।
    सटीक आकलन...अच्छी कविता...
    वेबसाईट का लुक भी अच्छा लगा.

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  4. बहुत सुंदर रचना आपकी👌

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  5. वाह , खूब जीये वो ।

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  6. परिवर्तन संसार का नियम है बहुत ख़ूब !सुंदर रचना

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  7. जीवन अनुभव कैसे जिया जाय, यह सिखा ही देता है
    बहुत सुन्दर

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  8. बहुत सुंदर , आखिर कब तक ? खूब जिए और शान से ।

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  9. जीने ने के लिए जीने से तो अच्छा हैं , हम खुशी से जीना जीए .........
    सुन्दर शब्द रचना

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  10. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (30-03-2017) को

    "स्वागत नवसम्वत्सर" (चर्चा अंक-2611)

    पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  11. शिखा जी, ऐसा लगा कि हर नारी के मन की वेदनाओं को शब्दों मे पिरोया है आपने। शादी के बाद शुरवात के कुछ साल दुसरों की अपेक्षाओं पर खरे उतरने की कोशीश करते करते ही बीत जाते है। पचास के आस-पास ही नारी कुछ अपने लिए सोचने लगती है। सुंदर प्रस्तुति।

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  12. बढ़िया प्रस्तुति

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  13. वाह ! शिखा जी आपने कितना सही लिखा है..आखिर कब तक कोई दुनिया की परवाह करता रहेगा एक न एक दिन तो खुद पर प्यार आएगा ही..खुद से रिश्ता बनता ही तभी है जब दूसरों से कोई अपेक्षा नहीं रहती..

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