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Monday, 4 April 2016

हवा का दबाव...

हम जैसे जैसे ऊपर उठते हैं
घटता जाता है हवा का दबाव.
भारी हो जाता है,
आसपास का माहौल. 
और हो जाता है,
सांस लेना मुश्किल.
ऐसे में जरुरी है कि,
मुँह में रख ली जाए,
कोई मीठी रसीली गोली,
अपनों के प्रेम की.
जिससे हो जाता है
सांस लेना आसान
और कट जाता है सफ़र
आराम से।

4 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " कंजूस की मेहमान नवाज़ी - ब्लॉग बुलेटिन " , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (06-04-2016) को "गुज़र रही है ज़िन्दगी" (चर्चा अंक-2304) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सच है ... प्रेम की ऐसी गोलियों की तो आज बहुत जरूरत है ...
    काश हर कोई ऐसी गोली बाँट सके ...

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  4. वाह, बहुत खूब

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