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Tuesday, 2 June 2015

कुछ भी तो नहीं...

वो खाली होती है हमेशा।
जब भी सवाल हो,क्या कर रही हो ?
जबाब आता है
कुछ भी तो नहीं
हाँ कुछ भी तो नहीं करती वो
बस तड़के उठती है दूध लाने को
फिर बनाती है चाय
जब सुड़कते हैं बैठके बाकी सब
तब वो बुहारती है घर का मंदिर
फिर आ जाती है कमला बाई
फिर वो कुछ नहीं करती
हाँ बस काटती रहती है चक्कर उसके पीछे
लग लग के साथ उसके
निबटाती है काम दिन के
बनाकर खिलाती है नाश्ता
और रम जाती है उस नन्हें बच्चे में
जो कूदता है उसकी पीठ पर, कन्धों पर
करता है मनमानी, उठाकर कर फेंकता है सामान 
पर वो कुछ नहीं करती 
बस समेटती रहती है सब कुछ
कुछ नहीं कहती
वो तो खेलती है उसके संग
सो गया बालक
चलो अब चाय का समय है
साथ साथ कटती है तरकारी
बीच में आता है प्रेस वाला
और भी न जाने कौन कौन वाला
भाग भाग कर देखेगी सबको
फिर बनाएगी खाना रात का
बस परोसेगी, खिलाएगी जतन से
फिर खुद भी खाकर
बैठ जायेगी टीवी के सामने
देखने कोई भी सीरियल ,
जो भी चल रहा हो उसपर
और बैठे बैठे ही मुंद जाएँगी उसकी बोझिल आँखें
आखिर किया ही क्या उसने
करती ही क्या है वो सारा दिन
कुछ भी तो नहीं .

14 comments:

  1. Kaash ye baat unlogo ko samajh aaye
    Jo yeh kahte hain ki 'kya karti ho ..bas khaana banana khana aur sona '
    Aiso ko khuda nazar aur akkal dono de

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  2. कह कर क्या फायदा
    आखिर में अवार्ड यही मिलेगा सारा दिन करती क्या हो

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    Replies
    1. कह कह कर एक दिन आएगा, जब यह अवार्ड सम्मान सहित लौटाया जायेगा ;)

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बृहस्पतिवार (04-06-2015) को "हम भारतीयों का डी एन ए - दिल का अजीब रिश्ता" (चर्चा अंक-1996) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  4. जब कुछ सहज हो जाता है कि कुछ होते हुये नहीं लगता है। कटाक्ष के रूप में नहीं पर बहुधा मैं भी यही कहता हूँ अपने बारे में।

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  5. वाकई .... मैं भी कुछ नहीं करती... बस जो तुमने लिखा है बस उतना ही तो .....

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  6. कितनी रूटीन लाइफ एक ग्रहणी की ! लेकिन सब के लिए कुछ न कुछ करने वाली !

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  7. हमें पाल-पोष के बड़ा किया,
    पढ़ाया, लिखाया, इंसान बनाया...घर संभाला...बेपरवाह इंसान को ज़िम्मेदार बनाया...और क्या करना बाकि रह गया...पूरी जिंदगी तो परोपकार को कर्तव्य मानाने में लगा दी।

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  8. कुछ न करते हुए भी बहुत कुछ कर जाती हैं, बहुत सुंदर और सार्थक अभिव्यक्ति

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  9. हाँ ...क्योंकि उसे मालूम है इतना कुछ करने के बाद भी कुछ न करने का ही तमगा मिलने वाला है ..

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  10. कड़वी सच्चाई

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  11. कुछ न करते हुए भी इतना कुछ कर जाती है ... सार्थक अभिव्यक्ति ...

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  12. छोटे छोटे लफ्जों में बड़ी बात कहना कोई आपसे सीखे।
    ............
    लज़ीज़ खाना: जी ललचाए, रहा न जाए!!

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  13. बस क्या कहूँ बेबस कर दिया हम भी कुछ नहीं करते

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