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Tuesday, 21 April 2015

कंकाल...


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सिंधु घाटी से मेसोपोटामिया तक
मोहन जोदड़ो से हड़प्पा तक 
कहाँ कहाँ से न गुजरी औरत, 
एक कब्र से दूसरी गुफा तक.
अपनी सहूलियत से 
करते उदघृत
देख कंकालों को 
कर दिया परिभाषित। 
इस काल में देवी 
उस में भोग्या  
इसमें पूज्य 
तो उसमें त्याज्या 
बदलती रही रूप 
सभ्यता दर सभ्यता। 
जिसने जैसा चाहा उसे रच दिया 
अपने अपने सांचे में फिर मढ लिया 
वस्तु एक खोज की भी वह बन गई है
बस बनने से एक इंसान ही रह गई है
सुना है अब फिर कोई हुई है खुदाई
फिर एक औरत आज गढ़ी गई है. 


10 comments:

  1. रूह से जिस्म तक बिकने का सामान किया..............

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  2. मैं तो सोच रहा था कि आज सिंधु सभ्यता पर कुछ पढ़ने मिलेगा शिखा की नजर से। :)

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  3. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
    http://madan-saxena.blogspot.in/
    http://madanmohansaxena.blogspot.in/

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  4. ईवोलूशन ऑफ़ मेन में स्त्री और पुरुष दोनों शामिल हैं ! :)

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  5. नारी को पुरुष ने गढ़ा है अपने अपने अंदाज से ... पर नारी हमेशा एक ही रही है ... उसी हाड मॉस से जिससे पुरुष ...
    बहुत ही प्रभावी रचना है ...

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  6. Nice Article sir, Keep Going on... I am really impressed by read this. Thanks for sharing with us.. Happy Independence Day 2015, Latest Government Jobs. Top 10 Website

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  7. सुन्दर रचना

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  8. बस बनने से एक इंसान ही रह गई है.

    औरत की त्रासदी युगों से असी तरह चलती जा रही है.

    सुंदर प्रस्तुति.

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  9. नारी को खोजा गया हर जगएच बस इंसान में नहीं!!
    अच्छा लिखा!

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