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Friday, 10 April 2015

समय...

कुछ कहते हैं शब्दों के पाँव होते हैं 
वे चल कर पहुँच सकते हैं कहीं भी 
दिल तकदिमाग तक,जंग के मैदान तक. 
कुछ ने कहा शब्दों के दांत होते हैं 
काटते हैंदे सकते हैं घावपहुंचा सकते हैं पीड़ा। 
मेरे ख़याल से तो शब्द रखते हैं सिर्फ 
अपने रूढ़ अर्थ 
कबकहाँकैसे,कहेलिखेसुने  गए  
यह कहने सुनने वाले की नियत पर है निर्भर
कोई भी शब्द अच्छा या बुरा नहीं होता
भली- बुरी तो नियत होती है. 
*** 
सदियों से बंद पड़े दरवाजों की कुण्डियों पर 
लग जाती है जंग।
फिर उन्हें खोलने में लगती है
भरपूर शक्ति,
होता है किरकिरा शोर और
खुद पर पड़ जाती है धूल ।

 ***
मुझे नहीं करतीं परेशान
बाहर से आतीं  ट्रैफिक की 
तेज़ आवाजें
न बच्चों की चिल्ल पों ही
मुझे  सता  पाती  है. 
पक्षियों का कलरव भी  
नहीं डालता बाधा 
मेरे  कामों  में
पर मुझे विचलित करती है 
पडोसी के घर से आती 
संगीत की वह ध्वनि 
जो न तो सुनाई देती है साफ़ 
और न ही 

नज़र अंदाज़  की  जाती है 

7 comments:

  1. |अब लग रहा है मैं बहुत भाग्यशाली हूँ ...मेरे पडोसी मेरे रियाज़ को भी बहुत शौक से सुनते हैं !!पहली क्षणिका से पूर्णतः सहमत हूँ !!तीसरी मन उदास कर रही है ...!!

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  2. आपका रियाज तो नेमत है. पर जिसकी मैं बात कर रही हूँ वह कान फोड़ देता है और सिर दर्द कर देता है :)

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  3. हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल शनिवार (11-04-2015) को "जब पहुँचे मझधार में टूट गयी पतवार" {चर्चा - 1944} पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. सदियों से बंद पड़े दरवाजों की कुण्डियों पर
    लग जाती है जंग।
    फिर उन्हें खोलने में लगती है
    भरपूर शक्ति,
    होता है किरकिरा शोर और
    खुद पर पड़ जाती है धूल ।

    सुंदर क्षणिकाएं।

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  5. Lovely....teeno behtreeen! :)

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  6. पर फिर भी खोली जारी हैं बंद दरवाजों की कुण्डियाँ ... जरूरी होता हा धुप दिखाना उन्हें भी ...

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