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Thursday, 18 December 2014

हमसाया...

तेरी नजरों में अपने ख्वाब समा मैं यूँ खुश हूँ
बर्फ के सीने में फ़ना हो ज्यूँ ओस चमकती है. 

अब बस तू है, तेरी नजर है, तेरा ही नजरिया 
मैं चांदनी हूँ जो चाँद की बाँहों में दमकती है.   

तेरी सांसों से जो आती है वह खुशबू है मेरी 
रात की रानी तो तिमिर के संग ही महकती है. 

बेशक फूलों से भरे हों बाग़ बगीचे हर तरफ 
दूब फिर भी घास के साये में ही पनपती है. 

तू ही है मेरी चाल -ढाल में, हंसी में, करार में 
नट की अँगुली पर ही तो कठपुतली मटकती है. 

हो आग कहीं लगी या फैला हो उजाला कहीं 
साये में दीप के ही मगर "शिखा" दहकती है. 



15 comments:

  1. Ye mausam aur ye mood bahut khoob

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  2. हो आग कहीं लगी या फैला हो उजाला कहीं
    बहुत खूब ... हर शेर लाजवाब .... नया सा खयाल लिए ....

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (19-12-2014) को "नई तामीर है मेरी ग़ज़ल" (चर्चा-1832) पर भी होगी।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  5. क्या खूब कहा...
    हो आग कहीं लगी या फैला हो उजाला कहीं
    साये में दीप के ही मगर "शिखा" दहकती है.

    बहुत खूब, बधाई.

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  6. बढिया है शिखा. लेकिन बहुत बढिया नहीं कहूंगी. गज़ल को अभी और मांजो.

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  8. अरे वाह ,
    आनंद आ गया, पता ही नहीं था कि शिखा कवियत्री भी हैं !
    मंगलकामनाएं !!

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  9. यूँ तो उँगलियों पर नाचने वाली कठपुतली तो नहीं हो लेकिन बहुत समर्पण भाव से अभिव्यक्त किया है :)

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