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Tuesday, 14 October 2014

रंगीन दुशाला...


आह... ऑटम ऑटम ऑटम... आ ही गया आखिर। इस बार थोड़ा देर से आया। सितम्बर से नवम्बर तक होने वाला ऑटम अब अक्टूबर में ठीक से आना शुरू हुआ है. सब छुट्टी के मूड में थे तो उसने भी ले लीं कुछ ज्यादा। अब आया है तो बादल, बरसात को भी ले आया है और तींनो मिलकर  छुट्टियों की भरपाई ओवर टाइम करके कर रहे हैं। वैसे उनका यूँ आना भी मुझे सुहाता ही है। धरती को पत्तों की शाल मिल जाती है। 
                                                                                                          अमेरिकी पतझड़ 

लन्दन में तो बारिश की मोनोपोली रहती है परन्तु अमरीका के कुछ क्षेत्रों में फॉल का अंदाज बेहद ही खूबसूरत हुआ करता है। लाल, नारंगी पीले हरे पत्तों का रंग बिरंगा दुशाला ओढ कर धरती और पर्वत खुद को आने वाली सर्दी से बचाने का उपाय कर लेते हैं। 

पेड़ों को फिर से अपनी भूमि और बाहें नए पत्तों के स्वागत के लिए तैयार करने में थोड़ा वक़्त लगेगा तब तक बारिश उन्हें नहलाएगी, धुलाएगी। बिना फूल, फल, पत्तों के उन्हें अकेलापन ना खले इसलिए वक़्त वक़्त पर बर्फ मेहमान बन कर जम जाएगी, खेलेगी, बतियाएगी, और  कभी कभी धूप आकर सहलाएगी।यानि पतझड़ भी आता है तो पूरे शबाब के   साथ और सबको अपने रंग में रंग लेता है. 


धरती पर बिछी ये खूबसूरत पत्तों की चादर मैं भी उठा कर तान लेना चाहती हूँ और उसमें ढांप  लेना चाहती हूँ जिंदगी के सारे पतझड़ी पलों को. और फिर से हो जाना चाहती हूँ तैयार नई खिलती कोपलों के लिए, फिर से नए परिवर्तन के लिए.  

काश सब कुछ चलता रहता यूँ ही और मैं भी हो जाती प्रकृति, जो अपनी इस व्यवस्थित व्यवस्था पर इठलाई फिरती है।


मास्को में पतझड़ की एक मित्र द्वारा भेजीं गईं कुछ ताज़ा तस्वीरें 


मेरी गली का पतझड़ (लंदन)
















17 comments:

  1. बहुत खूब ... प्राकृति के इन नजारों को देख कर लिखने समझने वाली आँख है आपमें ...
    बदलते रंग को बाखूबी बाँधा है ....

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  2. नजारे खूबसूरत हैं, नजर भी भी लाजवाब।

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  3. प्रकृति जैसी प्रकृति का होना सरल नहीं । सब कुछ नपा तुला / तय क्रम में सब कुछ निश्चित और व्यवस्थित ।

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  4. प्रकृति ने अपने अनुसार बनाने की कोशिश की थी ,पर इंसान का सोच-विचार और तर्क-शक्ति वाला दिमाग़ अपने हिसाब से चलाने लगा. बस फिर तो अलग से सुर निकलने लगा !

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  5. bahut khoobsurti s man ke bhavo ko abhivyakt kiya aapne..

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  6. पतझड़ी पलों को ढांप व्यवस्थित होना कहाँ सहज है लेकिन ये मन में विचार आना भी कितना सुकुन देता है । प्रकृति तो अपना संतुलन स्वयं कर लेती है इंसान अभी तक इतने हादसे झेलने के बाद भी नहीं समझ रहा ।

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  7. क्या खूब सैर करा दी शिखा

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  8. बेहद खूबसूरत..... धन्यवाद शिखा जी....!!!

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  9. बहुत सुन्दर चित्रण लगा ..

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  10. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बृहस्पतिवार (16-10-2014) को "जब दीप झिलमिलाते हैं" (चर्चा मंच 1768) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  11. कल 17/अक्तूबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  12. वाह... क्या खूबसूरत नज़ारा है...

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  13. Bahut sunder prastuti ...chitr baahur sunder dikhe !!!

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  14. Bahut sunder prastuti ...chitr baahut sunder dikhe !!!

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  15. बहुत खूबसूरत दृश्य

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