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Sunday, 5 October 2014

नवयुवाओं में बढ़ता तनाव ??



पिछले दिनों बाजार गई तो १६ वर्षीय एक बच्ची को ढेर सारी अलग अलग तरह की खुशबू  वाली मोमबत्तियां खरीदते हुए देखा। बच्ची मेरी जानकार थी सो मैंने पूछ लिया, अरे अभी तो क्रिसमस में बहुत समय है, क्या करोगी इतनी मोमबत्तियों का?. उसने जबाब दिया कि यह मोमबत्तियां वह अपने स्ट्रेस पर काबू पाने के लिए खरीद रही है. कुछ अलग अलग तरह की खास खुश्बू वाली मोमबत्ती जलाने से स्ट्रेस यानि तनाव कम होता है, उसके इम्तिहान आने वाले हैं जाहिर है उसे तनाव होगा, उसकी टीचर ने यह उपाय सुझाया है, इसीलिए वह इन मोमबत्तियों को खरीद रही है. 

गज़ब है भाई, भगवान की दया से पढ़ेलिखे तो हम भी हैं, इम्तिहान हमारे भी होते थे, जाहिर है तनाव भी होता था. पर हमें तो कभी हमारी टीचर ने यह तरीका नहीं सुझाया, बल्कि कभी जब पढाई के बोझ से हम झुंझला जाते या कह देते भूख नहीं है , खाना नहीं खाना, तो हमारी मम्मी तो और उलटा हमें डाँट देती कि चिंता हो रही है तो बैठ कर पढ़ो ये टेंशन- टेंशन का गीत गाने से क्या होगा। तब ऐसा ही समय था. "चिंता, चिता से बदत्तर है" यह कहावत बहुत पुरानी है तो यह तो पक्का है कि यह स्ट्रेस यानि तनाव की बीमारी भी कोई आज की नई बीमारी तो नहीं है. परन्तु पहले इस तनाव का दायरा शायद कम था. या यह कहना ज्यादा ठीक होगा कि लोग इसे व्यक्त नहीं किया करते थे, यानि पुरुष को कमाई का तनाव हो, स्त्री को घर चलाने का, या फिर बच्चों को पढाई का, हर कोई अपने तक रखता था और अपने हिसाब उससे निबटने की कोशिश करता रहता था. 
तब न इस तनाव से निबटने के लिए बाजार था, न डॉक्टर्स, न ही उसे कहने की आवश्यकता थी. बस परिवार और मित्र थे जिनके सहयोग और प्रेम से अनजाने ही तनाव कम हो जाया करता था. 
परन्तु अब समय बदल गया है. परिवार छोटे हो गए हैं, हर कोई व्यस्त है और किसी के पास किसी की बात सुनने का समय नहीं है. 

हाल ही में कहीं पढ़ा था कि आज के हाईस्कूल के एक एवरेज बच्चे का स्ट्रेस लेवल सन 1950 के एक पागल व्यक्ति से ज्यादा है. यानि यदि आज के किसी दंसवीं में पढ़ने वाले बच्चे को टाइम मशीन से सन  1950 में पहुंचा दिया जाए तो उसे पागल करार देकर पागल खाने में भर्ती करा दिया जाएगा। 

हालाँकि इसी के साथ एक सत्य यह भी है कि तब के सामाजिक ढाँचे, मनुष्य के एवरेज दिमागी स्तर (आई क्यू ) में और आज की परिस्थियों में काफी फ़र्क है और शायद यही वजह है कि जैसे जैसे पीढ़ी दर पीढ़ी मनुष्य का मष्तिष्क विकसित हुआ, उसका एवरेज आई क्यू बढ़ा, वैसे वैसे ही तनाव का स्तर और कारण भी बढ़ते गए. 

एक सर्वे के अनुसार वर्तमान में पिछले वर्षों के अनुपात में युवाओं में स्ट्रेस लेवल लगातार बढ़ रहा है, जिससे वह मुकाबला करने में असमर्थ हो रहे हैं और इसकी वजह से उन्हें 
संभावित शारीरिक और भावनात्मक स्वास्थ्य चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, विशेषज्ञों मुताबिक लगातार उच्च तनाव के परिणाम स्वरुप  चिंता, अनिद्रा, मांसपेशियों में दर्द, उच्च रक्तचाप और एक कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली सहित कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है . शोध बताते हैं कि  तनाव, हृदय रोग, अवसाद और मोटापे जैसी प्रमुख बीमारियों को बढ़ाने में भी योगदान देता है. और इसके मुख्य कारणों में पैसे के अलावा, काम काज रिश्तों में तनाव एवं वित्तीय परेशानियां व संघर्ष हैं. 

देखा जाए तो ये वजह कोई नई नहीं हैं परन्तु १६ से २५ साल के आयुवर्ग के बीच इन वजहों से तनाव का बढ़ना एक समस्या बन चुका है जिसे वे स्वयं संभालने में असमर्थ होते हैं. 

ऐसे में हर छोटी मोटी समस्या का कारण यह तनाव बन जाता है. १५ वर्ष के बालक के मुँह में छाले हो गए तो डॉक्टर्स ने सलाह दी, इसे स्ट्रेस मत दो, १६ साल की बच्ची के चेहरे पर मुँहासे हो गए - कारण स्ट्रेस है, १४  साल का लड़का चिड़चिड़ा हो रहा है, बात बात पर रोआंसा हो जाता है -  स्ट्रेस की वजह से है, २५ साल युवा परेशान है कि उसके पास अपना घर नहीं है, अच्छी नौकरी नहीं है, नवयुवती स्ट्रेस में है कि उसका कोई बॉय फ्रेंड नहीं है, एक्जाम में २ नंबर कम आ गए स्ट्रेस है, पड़ोसी ने नई कार खरीद ली स्ट्रेस है. यानि जिसे देखो वह अपने भविष्य को लेकर चिंतित है असुरक्षित है. देखा जाए तो तनाव तो जो है सो है पर तनाव का विज्ञापन अधिक है. हर कोई यही जुमला सुबह शाम बोलता नजर आता - "व्हाट अ स्ट्रेस फूल लाइफ नाउ अ डेज" और उन्हें इस तनाव के राक्षस से बचाने में परिवार, डॉक्टर्स सब असफल हो रहे हैं. 

ऐसे में बाजारवाद ने फायदा उठाया, अपने हाथ पैर फैलाये और आज बाजार में इस स्ट्रेस से निबटने के ढेरों साधन उपलब्ध हैं. स्ट्रेस रिलीवर क्रीम, शेम्पू, साबुन हैं. कमरे में जलाने के लिए महँगी खुश्बूदार मोमबत्तियां और अगरबत्तियां हैं, अपनी मेज और तकिये के नीचे रखने के लिए महंगे पत्थर हैं, तगड़ी फीस वाले मनोवैज्ञानिक हैं, आधुनिक योगा से लेकर आर्ट ऑफ़ लिविंग तक की दुनियाभर की थेरेपियां हैं.

कहने का मतलब यह कि तनाव अब बीमारी से ज्यादा फैशन और स्टेटस सिम्बल बन गया है. आप अपनी जेब और औकात के अनुसार जाइए और अपने स्ट्रेस का इलाज खरीद लाइए।  आपका स्ट्रेस कम हो न हो, आपने इससे निबटने के लिए नए फैशन के हिसाब से कोशिश की यह सुकून आपको अवश्य मिल जायेगा और आप अपने नए स्ट्रेस से लड़ने के लिए, फिर से कोई नई तकनीक या उत्पाद का प्रयोग करने के लिए तैयार हो जायेंगे। 



12 comments:

  1. bahut sahi baat ki aapne ....jitne suvisdha ke sadhn badhe hain utna hi tanav ...kuchh gala-kaat prtiyogita bhi ....

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (06-10-2014) को "स्वछता अभियान और जन भागीदारी का प्रश्न" (चर्चा मंच:1758) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. सुविधा जितनी बढ़ेगी तनाव के रास्ते उतने ही लम्बे होते जाएँगे -- सार्थक और प्रभावी विचार
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर

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  4. अच्छा विचारणीय विषय ....

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  5. अजीब लगता है छोटे बच्चों को स्ट्रेस , डिप्रेशन आदि की बात करते ! तनाव तो हमें भी होता ही था हमारे समय में , मगर तब हम बाजार के घायल नहीं थे !

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  6. क्या फड़कता हुआ विषय चुना है.......मेरे दो दो जवाब बेटे हैं.....'अपने ' स्ट्रेस को बयान नहीं कर सकती...उनका स्ट्रेस देख देख कर पगला गयी हूँ....
    हम तो खैर आज भी बोलते हैं..चिंता हो रही है तो बैठ कर पढ़ो ये टेंशन- टेंशन का गीत गाने से क्या होगा। मगर कोई फायदा नहीं...

    यानि यदि आज के किसी दंसवीं में पढ़ने वाले बच्चे को टाइम मशीन से सन 1950 में पहुंचा दिया जाए तो उसे पागल करार देकर पागल खाने में भर्ती करा दिया जाएगा। ये बात एकदम सटीक है......(बेटे को पढ़वा दी..स्ट्रेस कम हुआ ज़रा :-))

    वाकई मरने पर उतारु है बच्चे आजकल, ज़रा में आत्महत्या कर डालते हैं !!....मुझे तो स्ट्रेस कामचोरों का excuse लगता है....

    अनु

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  7. बेचारे बच्चे ,एक तो उन पर इतना बोझ लाद दिया गया है(पढाई के साथ माता-पिता महत्वाकांक्षाओं का भी),कि दम नहीं ले पाते ,ऊपर से सोने-जागने ,खाने -खेलने में कोई नियमितता नहीं .फिर दिन-रात फ़ोनबाज़ी जैसे ज़रूरी काम .प्रतियोगिता की तो बात ही मत पूछिए !

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  8. विचारणीय प्रस्तुति ...

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  9. सही है शिखा. बहुत बढावा दिया जा रहा इस शब्द को :) पहले के बच्चों के मुकाबले पढाई का ज्यादा बोझ है बच्चों पर. कुछ बनने का और प्रतियोगी परीक्षाओं का भी, लेकिन इसका मतलब ये एकदम नहीं कि स्ट्रेस खत्म करने के तमाम तरीके ढूंढे जायें. बहुत शानदार आलेख.

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  10. http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/10/2014-6.html

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  11. व्यवहार में जटिलता ... आज के युवा होते बच्चों की आदत बन गयी है ... माता पिता से अक्सर ज्यादा आता है उन्हें ... आज कल ऐसा ही होता है, आप कुछ नहीं जानते ... अक्सर ऐसी बातें बहुत तेज़ी से फैली हैं समाज में और बच्चे ख़ास कर टीन में ... सादा सरल व्यवहार न होने से ये समस्याएं और इनके अलग अलग निदान ढूँढ़ते रहते हैं ...

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