Enter your keyword

Monday, 18 August 2014

पीले पन्नों वाली डायरी...



अब उन पीले पड़े पन्नो से 
उस गुलाब की खुशबू नहीं आती
जिसे किसी खास दो पन्नो के बीच 
दबा  दिया करते थे 
जो छोड़ जाता था
अपनी छाप शब्दों पर
और खुद सूख कर 
और भी निखर जाता था  ।
अब एहसास भी नहीं उपजते 
उन सीले पन्नो से 
जो अकड़ जाते थे 
खारे पानी को पीकर
और गुपचुप अपनी बात 
कह दिया करते थे।
भीग कर लुप्त हुए शब्द भी, 
अब कहाँ कहते हैं अपनी कहानी 
फैली स्याही के धब्बे 
अब दिखाई भी नहीं देते 
जिल्द पर भी नहीं बनते 
अब बेल बूटे
जो रंगे जाते थे बार बार 
गुलाबी रंग से.     
कलम अब उँगलियों में नहीं बलखाती, 
हाँ अब डायरी लिखी जो नहीं जाती ।

25 comments:

  1. आपकी लिखी रचना बुधवार 20 अगस्त 2014 को लिंक की जाएगी........
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

    ReplyDelete
  2. हाँ,हाँ अब डायरी लिखी नहीं जाती !

    ReplyDelete
  3. वो डायरी नहीं होती थी, वो जिए हुए पल होते थे...| अब ज़िंदगी जी ही कहाँ जाती है, अब तो बस कटती है ज़िंदगी...|

    ReplyDelete
  4. लोग अब इलेक्‍ट्रानि‍क्‍स की तरफ मुड़ गए हैं ना

    ReplyDelete
  5. बिलकुल सत्य। अब डायरी कौन लिखता है ?

    ReplyDelete
  6. आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा. अंतरजाल पर हिंदी समृधि के लिए किया जा रहा आपका प्रयास सराहनीय है. कृपया अपने ब्लॉग को “ब्लॉगप्रहरी:एग्रीगेटर व हिंदी सोशल नेटवर्क” से जोड़ कर अधिक से अधिक पाठकों तक पहुचाएं. ब्लॉगप्रहरी भारत का सबसे आधुनिक और सम्पूर्ण ब्लॉग मंच है. ब्लॉगप्रहरी ब्लॉग डायरेक्टरी, माइक्रो ब्लॉग, सोशल नेटवर्क, ब्लॉग रैंकिंग, एग्रीगेटर और ब्लॉग से आमदनी की सुविधाओं के साथ एक सम्पूर्ण मंच प्रदान करता है.
    अपने ब्लॉग को ब्लॉगप्रहरी से जोड़ने के लिए, यहाँ क्लिक करें http://www.blogprahari.com/add-your-blog अथवा पंजीयन करें http://www.blogprahari.com/signup .
    अतार्जाल पर हिंदी को समृद्ध और सशक्त बनाने की हमारी प्रतिबद्धता आपके सहयोग के बिना पूरी नहीं हो सकती.
    मोडरेटर
    ब्लॉगप्रहरी नेटवर्क

    ReplyDelete
  7. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति आज बुधवारीय चर्चा मंच पर ।। आइये जरूर-

    ReplyDelete
  8. अक्सर बहुत कुछ बयां वाले अल्फाज़ ऐसे ही अपना अर्थ खो देते हैं...सुंदर रचना।।।

    ReplyDelete
  9. बहुत अच्छी है ये पीले पन्नों वाली डायरी...निकालती रहना समय-समय पर.

    ReplyDelete
  10. "खुद सूख कर
    और भी निखर जाता था"
    "अब डायरी लिखी जो नहीं जाती"
    काक्रोच को हटाकर बांच लिया :-)
    अच्छी लगी.

    ReplyDelete
  11. बनावटीपन जो भरने लगा है जगह जगह ..असर सब पर है ...
    बहुत बढ़िया

    ReplyDelete
  12. बढ़िया शब्दों में पिरोए भाव मन को छू गए |

    ReplyDelete
  13. बहुत कोमल से अहसास..सचमुच समय बदल गया है

    ReplyDelete
  14. बहुत बढ़िया अहसास

    ReplyDelete
  15. डायरी के पन्नों और कलम दोनों से रिश्ता टूट गया अब तो..... सधी हुयी अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  16. सचमुच.....पुरानी यादें ...आवर समय का बदलाव ...आती सुंदर |

    ReplyDelete
  17. सुन्दर एहसासात की दुनिया पिरो दी हवा हुए वो दिन ये गैजेट्स का दौर है।

    पीले पन्नों वाली डायरी...


    अब उन पीले पड़े पन्नो से
    उस गुलाब की खुशबू नहीं आती
    जिसे किसी खास दो पन्नो के बीच
    दबा दिया करते थे
    जो छोड़ जाता था
    अपनी छाप शब्दों पर
    और खुद सूख कर
    और भी निखर जाता था ।
    अब एहसास भी नहीं उपजते
    उन सीले पन्नो से
    जो अकड़ जाते थे
    खारे पानी को पीकर
    और गुपचुप अपनी बात
    कह दिया करते थे।
    भीग कर लुप्त हुए शब्द भी,
    अब कहाँ कहते हैं अपनी कहानी
    फैली स्याही के धब्बे
    अब दिखाई भी नहीं देते
    जिल्द पर भी नहीं बनते
    अब बेल बूटे
    जो रंगे जाते थे बार बार
    गुलाबी रंग से.
    कलम अब उँगलियों में नहीं बलखाती,
    हाँ अब डायरी लिखी जो नहीं जाती ।

    ReplyDelete
  18. ब्लॉग बुलेटिन की गुरुवार २१ अगस्त २०१४ की बुलेटिन -- बच्चों के साथ बच्चा बनकर तो देखें – ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ...
    एक निवेदन--- यदि आप फेसबुक पर हैं तो कृपया ब्लॉग बुलेटिन ग्रुप से जुड़कर अपनी पोस्ट की जानकारी सबके साथ साझा करें.
    सादर आभार!

    ReplyDelete
  19. बहुत बढ़िया

    ReplyDelete
  20. बहुत उम्दा....

    ReplyDelete
  21. अब कलम उँगलियों में नहीं बल खाती
    उँगलियाँ ही खटखटाती हैं की बोर्ड
    खारे पानी से नहीं अकड़ते पन्ने
    जज़्ब हो जाता है शायद सूखी आँखों में
    गुलाब नहीं सूखता पन्नों के बीच
    दिख जाता है उसका चित्र स्माइली में
    बदल गया है वक़्त और हम भी बदल गए हैं
    फिर भी पुरानी डायरी देती है सुकून ।

    बदलते वक़्त की सही तस्वीर खूबसूरती से बयाँ की है ।

    ReplyDelete
  22. बहुत ख़ूब... एक मशहूर ग़ज़ल ज़ुबाँ पर आ गई..

    अबके हम बिछड़ें तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें,
    जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें!

    और अब कहाँ वो सब...!!

    ReplyDelete
  23. अभी तो याद भी है की गुलाब होता है डायरी में कैद ... कुछ समय बाद शायद इस विषय पर कविताएं ही न बनें ... गहरा एहसास छुपाये शब्द ...

    ReplyDelete

पसंदीदा पोस्ट्स

ईमेल से जुड़ें

संपर्क

Name

Email *

Message *