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Tuesday, 10 June 2014

все те же (सब एक ही.) ... एक रूसी कविता







все те же
Я тоже была наивной,
В воды Волги опустив ноги
В воды, смешанные с моими слезами
Все равно вспоминала о Ганге.
Горы видела - горы Урала,
Только думала о Гималаях.
И не знала я о том раньше:
Да, зовут их, порой, непохоже,
Только вода все та же
Только земля все та же.
(шиха варшней) 

सब एक ही.

कैसी पागल थी मैं भी 
पाँव डाल कर वोल्गा में 
उस पानी में मिलाकर आंसूं  
याद करती थी गंगा को 
देखा करती थी यूराल और 
सोचती थी हिमालय को 
कैसे नहीं जानती थी मैं 
इनके नाम अलग हो सकते हैं 
लेकिन पानी तो यही है 
धरती तो वही है.

(शिखा वार्ष्णेय) 


18 comments:

  1. बहुत प्यारी कविता......
    its always a proud feeling ...that you are fluent in Russian too

    अनु

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन नाख़ून और रिश्ते - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. वाकई ..बहोत प्यारी रचना ...सीधे दिलसे जो निकली है ....

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  4. वही पानी , धरती वही ! याद वतन मगर आता होगा बहुत :)

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  5. अनुभूति से उत्पन्न उदगार ऐसे ही उत्कृष्ट होते हैं ।

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  6. Aa gaye naye pate par :) Thank you kaho ..ha ha

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  7. पानी रे पानी तेरा रंग कैसा - जिसमें मिला दो लगे उस जैसा!!

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  8. कम शब्दों में कितना भाव! वाह!

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  9. ईश्वर ने तो धरती पानी सब एक ही बनाया । नाम अलग हैं बस । ईश्वर के नाम भी अलग अलग रख दिए ।।सुन्दर भावानुवाद

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  10. बहुत सुंदर भाव...

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  11. वही पानी ,वही धरती पर मन के जुड़ाव को क्या कहा जाय -कोरी बेवकूफ़ी नहीं वह भी !

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  12. बहुत सार्थक रचना

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