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Thursday, 24 April 2014

बार्बी डॉल मैं असली ...

सृष्टि की शुरुआत से ही दो तरह के मनुष्यों का उदय हुआ , एक नर और एक नारी। जो शारीरिक रूप से एक दूसरे से भिन्न थे. अत: उन्हें मानसिक और भावात्मक रूप से भी एक दूसरे से भिन्न मान लिया गया. जॉन ग्रे ने तो अपनी प्रसिद्द पुस्तक में यहाँ तक कह डाला कि स्त्री और पुरुष अलग अलग गृह के निवासी हैं और पूरी तरह एक दूसरे से भिन्न हैं. जहाँ स्त्री शुक्र गृह से आई है जहाँ के निवासियों का सम्बन्ध सुंदरता से है, वहीँ पुरुष मंगल गृह का निवासी है जहाँ के लोग सख्त और व्यावहारिक  हैं.यहाँ तक तो कोई समस्या नहीं थी कि चलो ठीक है दो तरह के हैं परन्तु हैं तो मनुष्य ही, कार्य अलग अलग हैं दोनों के, परन्तु महत्व तो दोनों का ही है.. समस्या तब उत्पन्न हुई जब समाज पुरुष प्रधान बना, पितृसत्तात्मक समाज ने घोषणा कर दी कि पुरुष मानसिक व् शारीरिक रूप से स्त्री से ज्यादा मजबूत है. और स्त्री का काम सिर्फ स्वयं को तथा घर को संवारना है, कोई भी बुद्धि वाला काम वह नहीं कर सकती। "दिस इज मेंस वर्ल्ड" और यहाँ स्त्रियां सिर्फ सजावटी वस्तु और पुरुष के मनोरंजन का साधन मात्र हैं।  

समान मिट्टी में जन्म लेने वाली दुनिया की आधी आबादी के लिए यह विभाजन असह्य  था, अत: उसने इस अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठानी आरम्भ की. स्वयं को मानसिक रूप से पुरुष के समकक्ष, समान या बेहतर साबित करने की उसने जी जान से कोशिश की, और काफी हद तक सफल भी हुई. हर क्षेत्र में हर स्थान पर उसने पुरुष के सामने अपनी काबिलियत सिद्ध की और तब से अब तक उसका यह संघर्ष लगातार जारी है.

परन्तु नारी वादियों की इस पुरजोर कोशिश के बाद भी अभी ऐसा बहुत कुछ है जो उनकी सारी मेहनत और सारे संघर्ष को धता बता कर जॉन ग्रे की थिओरी को सच बताने पर तुला हुआ है. इस आधी आबादी की कुछ आबादी ऐसी है जो यह साबित करने पर तुली हुई है कि स्त्रियों का काम सिर्फ संजना संवारना और सुन्दर दिखना है और यही करना उन्हें भाता भी है.

इस विचार धारा के साक्षात उदाहरण आजकल काफी तादात में देखने में आने लगे हैं. 
जहाँ लडकियां खुद को एक गुड़िया की तरह पेश करना चाहती हैं और इस जीती जागती गुड़िया बनने के लिए किसी भी हद  तक गुजर जाती हैं. 

इस तरह के उदाहरण पहले जापान में ही अधिकतर देखे जाते थे परन्तु अब ये यूरोप और अमेरिका के भी देशों में तेजी से फैलते जा रहे हैं.

हाल में ही कैर्लिफोनिया की ३८ वर्षीय बलोदी बेन्नेट ने खुद को बार्बी डॉल जैसा बनाने के लिए अपने शरीर पर ना जाने कितनी सर्जरी कराईं हैं, हजारों पौंड्स खर्च किये हैं. और तो और खुद को इस नकली रूप में ढालने के लिए वह नियमित रूप से  Hypnotherapy के सेशन लेती हैं जो उन्हें इस गुड़िया की तरह ही बिना दिमाग का और कंफ्यूज बनाने में मदद करता है. उनके हिसाब से वह अपने इस प्रयास में सफल भी हो रही हैं. धीरे धीरे वह कंफ्यूज हो रही हैं. उनका दिमाग कम हो रहा है. अब वह एअरपोर्ट पर किसी को लेने जाती हैं तो भूल जाती हैं कि आगमन पर जाना है या प्रस्थान पर. अपनी माँ के घर जाने में रास्ता बार बार भूल जाने से उन्हें ३ घंटे लगते हैं जहाँ वह अपनी पूरी जिंदगी रही हैं. बेन्नेट की जिंदगी का मकसद अब सिर्फ यही है कि लोग उन्हें एक प्लास्टिक की सेक्स डॉल के रूप में देखें जिसे सुन्दर दिखने और खरीदारी करने के अलावा और कोई काम नहीं आता. और अपने इस कार्य से वे बेहद खुश हैं.


ऐसा ही एक और उदारहण ब्रैडफोर्ड (यु के) की २१ वर्षीय ब्लोंड लहराई हैं जो दिन के ४ घंटे अपने आप को बार्बी डॉल बनाने में ही लगाती हैं, नकली पलकों से लेकर कुंतल भर मेकअप की पुताई करके वह जीती जागती बार्बी का खिताब पा गई हैं. 

वहीँ यूक्रेन की मॉडल वलेरिया लुक्यानोवा तो इंसानी बार्बी के तौर पर पूरी दुनिया में प्रसिद्द है. उनके मुताबिक पूरी तरह बार्बी डॉल बनने के लिए उन्होंने खाना पीना तक त्याग दिया है और सिर्फ हवा एवं रौशनी पर ज़िंदा रहती हैं. 

दक्षिणी लंदन की १५ वर्षीय वीनस को यह भूत सवार है और इससे उसकी माँ को भी कोई एतराज़ नहीं। वीनस इस पर अपना ऑनलाइन टूटोरियल चलाती है और आखिरी गणना के अनुसार इसमें उसके ३०,००० दर्शक थे और उसकी सोशल साईट पर २०, ००० फोलोवेर्स हैं. यानि मोहतरमा बहुत प्रसिद्द हैं और अपनी इस अवस्था से बेहद खुश हैं. जाहिर है यह सामान्य लड़कियों की तरह स्कूल नहीं जा सकतीं, इसीलिए इन्हें घर में ही पढ़ा लिया जाता है.

ऐसे ही ना जाने और कितने ही उदाहरण हैं और इनकी संख्या भी लगातार बढ़ रही है.खुद इनके मुताबिक लोग इनका यह रूप बहुत पसंद करते हैं और लडकियां इनकी तरह ही बनना चाहती हैं.सजना और सुन्दर लगना इनका आखिरी ध्येय है इसके अलावा वे कुछ नहीं करना चाहतीं और बस अपनी इन्हीं तस्वीरों को बेच कर उन्हें आमदनी  होती है.

आखिर ऐसा क्या जूनून है जो इतनी तकलीफें, खर्चे और सर्जरी के बाद भी ये स्त्रियां एक बे दिमाग, और प्लास्टिक की सजावटी  गुड़िया बनने पर उतारू हो जाती हैं. शायद बचपन में खेला गया गुड़ियाओं का खेल और उन गुड़ियाओं की सुंदरता इन्हें इन गुड़ियाओं जैसा ही बनने के सपने दिखाती है. 

खुद को प्लास्टिक की खूबसूरत गुड़िया बनाकर ये मुँह चिढ़ाती हैं उन सभी नारी वादी संघर्षों को जो नारी को एक सजावटी और बनावटी वस्तु नहीं, एक तेज़ दिमाग और कामकाजी मनुष्य सिद्ध करने की कोशिश में लगातार जूझ रही हैं. पार्लियामेंट और बड़े कॉपरेट हाउस के उच्च पदों पर स्त्री की कम संख्याओं को लेकर संघर्ष कर रही हैं. अपने आप को काफी हद तक पुरुषों के समान काबिल साबित करने के बाद भी जिनका संघर्ष अभी थमा नहीं है, अभी भी जिन्हें पूर्णत: न्याय नहीं मिला है. और ये प्लास्टिक की इंसानी गुड़ियाएं हैं कि जैसे तुली हुईं हैं, यह साबित करने पर कि हम तो एक ऐसे गृह के निवासी हैं जिन्हें सुन्दर लगने और सजावटी वस्तु बनने के अलावा न कुछ आता है, न किसी और काम के काबिल हैं और न ही कुछ और करना चाहती हैं. 

30 comments:

  1. एक गहन अनुसंधान से ओत-प्रोत आपका ये आर्टिकल, कॉफ़ी कुछ सीखाता हुआ आज कि स्त्रिओ को! अगर अपने पुरुष सहभागी के बराबर आना है तो बार्बी डॉल बनकर नही अपनी योगयता के बल पर आन होगा और खूबसूरत दिखने कि अति मैहत्वकांषा से बचना होगा!

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  4. sar ke bal chalnewalo pe tawajjo na de,......

    antardristi nahi rakhte hain pas me.
    wahi nikalte hain bahar talash me.

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  5. शिखाजी, आपने नारियों का एक भावी भयावह रूप प्रस्‍तुत किया है। आभार तो क्‍या कहूं पर इस ओर वहां की सरकार क्‍या कदम उठा रही है। इससे संबंधित जानकारी का लेख आपसे अपेक्षित है। सच में महिलाओं को दिग्‍भ्रमित करने में प्रसंशा करनेवालों का बहुत बड़ा हाथ है।

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  6. सजने ,संवरने ,सुन्दर दिखने का या सुन्दर दिखने के लिये किए जा रहे सारे प्रयास का सीधा सम्बन्ध व्यक्ति के आत्मविश्वास से सम्बन्धित है | अगर ऐसा करने से उसका आत्मविश्वास बढता है तब अवश्य किया जाना चाहिये | हाँ , अब उसकी आड़ में कोई व्यवसायिक रूप से शोषण करता है तब अवश्य सावधानी बरतनी चाहिये |

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  7. वाकई shikha.......अजीब सा जूनून है ये....
    its annoying !!

    चौबीसों घंटे डाइटिंग करना/ gym जाना सूख कर काँटा होना...हद्द चिढ़ होती है.
    जबकी कितना आसान है सुन्दर दिखना....:-)

    बेहतरीन आलेख !!!
    अनु

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  8. अफ़सोसजनक स्थिति है

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  9. .....पागलपन की हद तक का जुनून ....उफ़्फ़

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  10. aapka ye lekh padh kar laga ki sunderta ke aage kya kuchh aur nahi hai .
    aapne bahut shodh kar ke ye lekha likha hai
    badhai
    rachana

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  11. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज शुक्रवार (25-04-2014) को I"चल रास्ते बदल लें " (चर्चा मंच-1593) में अद्यतन लिंक पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  12. "साहब, बीवी और ग़ुलाम" में जब छोटी बहु अपने पति से कहती है कि वो अपने पति का प्यार पाना चाहती है और सिर्फ हवेली की गुड़िया बनकर रहना नहीं चाहती, तो ज़मींदार साहब कहते हैं कि तुम भी वही करो जो हमारे यहाँ की और बहुएँ करती हैं. गहने तुड़वाओ, गहने बनवाओ!
    ये सारी कवायद जो आपने दिखाई अपने पोस्ट में इसी गहने तुड़वाने और बनवाने की कवायद है. जिसे हमारे ब्लॉग जगत में "खाये-अघाये" लोगों का शगल कह सकती हैं. या फिर अलग दिखने की चाह ताकि उनकी, उनके प्रति स्वयम की हीन भावना समाप्त हो!!

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  13. आपने इस चिरन्तन वैश्विक सत्य को काफी असरदार शब्दों में कहा है । इस पौरुषी मान्यता में स्वयं स्त्री का भी हाथ है । अफसोस होता है जब आम के विज्ञापन को भी अभिनेत्री बडे भद्दे तरीके से प्रस्तुत करती है । या नाम और दाम के लिये लियोन जैसी तमाम स्त्रियाँ कुछ भी कर दिखाने तैयार होजातीं हैं । पुरुष तो इसका लाभ उठाएगा ही न । स्त्री या तो सज सँवर कर पुरुष को लुभाना या बरगलाना चाहती है या दमन की शिकार होकर आँसू बहाना जानती है । इससे अलग न तो वह बनना चाहती है न ही यह पुरुष को स्वीकार है । अपवादों की बात नही है यहाँ । नारीवादी आन्दोलन सिर्फ एक आडम्बर है । नारी वादी लेखक लेखिकाएं सिर्फ दैहिक-स्वेच्छाचार को ही नारी की मुक्ति मानते हैं इससे बडा शोषण और क्या होगा नारी का ।

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  14. किसी भी तरह अपने महत्त्व को दिखाना चाहती हैं शायद ऐसी सोच की स्त्रियाँ ।गिरिजा जी की टिप्पणी एक नए मुद्दे को पेश कर रही है। इस तरह सौन्दर्य के पीछे भागना नारी मुक्ति तो कतई नहीं है । शोध पूर्ण सार्थक लेख

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  15. और कमाल की बात यह है कि ये सब नारीवादी के नाम पर भी हो रहा है। सुन्दर दिखना नैसर्गिक गुण है मगर अप्राकृतिक दिखना नहीं। .... आश्चर्य होता है इनकी सोच पर कि इसके सिवा वे कुछ और नहीं होना चाहती !

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  16. नारी स्वतंत्रता है जी ! सब को अधिकार है अपनी मर्ज़ी से जीने का ! अब तो सरकारें भी ये आज़ादी दे रही हैं कि सारे बंधन तोड़ दो , ( सामाजिक ) नियम पे चलना छोड़ दो ! :)

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  17. क्या कहें ... इस दुनिया मे हर तरह के (पागल)लोग है ... कुछ इन जैसे भी सही |

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  18. आपकि बहुत अच्छी सोच है, और बहुत हि अच्छी जानकारी।
    जरुर पधारे HCT- Hindi Computer Tips

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  19. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन कितने बदल गए हम - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  20. सच में समझना ही मुश्किल है इनके पागलपन को....

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  21. नारी मुक्ति के इस जमाने में यह सोच कितनी हास्यास्पद है, पर है ऐसी सोचवाली नारियां भी हैं।

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  22. जाने कैसा जुनून सवार हो जाता है जो सारी बुद्धि दूषित कर देता है .ये खिलौना बनी महिलाएँ (मैं सोचती हूँ ) पुरानी हो जाने पर क्या इनकी नियति भी बेकार खिलौनोंवाली होगी .विकृत -मुझे स्वाभाविक नहीं लगता -शरीर के साथ वैसी ही गति-मति ,परिपक्व अवस्था में क्या रह जाएगा इनके पास और तब कैसी बीतेगी इन पर !
    यह नारी मुक्ति नहीं प्रदर्शन के लिए खुद को हर तरह से का्ँट-छाँट कर अमानवीय बना डालना है .

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  23. सुन्दर रचना

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  24. Areyyy...ye to paagalpan hai...aisa bhi hota hai? iski jaankari nahi thi...behad afsosjanak !

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  25. बॉबी डार्ली को इस नज़र से कभी नहीं देखा।।।

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  26. ये पागलपन है ... खुद को श्रेष्ठ साबित करने कि होड ... या अधिक पैसे हैं तो खर्च करने का अजीब सा शौंक भी कह सकते हैं इसे ... पर ऐसे जूनून देखने को मिलते हैं जिसकी वजह समझ नहीं आती ... सारगर्भित और विस्तृत है आपका लेख .. कई पहलुओं को छूता है ...

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  27. अपनी इसी मानसिकता के कारण ही अभी भी ये जतलाना पड़ता है कि हम आधी आबादी पूरी आबादी को संचालित करने में सक्षम् हैं ...

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  28. जो खुदा को भूल कर जीता है वह खुद को भी भूल जाता है और खुद के होने का सही मक़सद भी. आधुनिक सभ्यता की यही त्रासदी है. इसी का अंजाम है यह सब.

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  29. विदुषी गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी का यह कथन सत्य है कि
    'नारीवादी आन्दोलन सिर्फ एक आडम्बर है । नारी वादी लेखक लेखिकाएं सिर्फ दैहिक-स्वेच्छाचार को ही नारी की मुक्ति मानते हैं इससे बडा शोषण और क्या होगा नारी का ?'

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  30. सुन्दर दिखना सबको भाता है, पर हर किसी को नहीं आता है।

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