Enter your keyword

Wednesday, 23 April 2014

बाती..


तुमने मांगी थी वह बाती, 
जो जलती रहती अनवरत 
करती रहती रोशन 
तुम्हारा अँधेरा कोना. 
पर भूल गए तुम कि 
उसे भी निरंतर जलने के लिए 
चाहिए होता है 
साथ एक दीये का 
डालना होता है 
समय समय पर तेल.
वरना सूख कर
बुझ जाती है वह स्वयं
और छोड़ जाती है
दीये की सतह पर भी
एक काली लकीर...

12 comments:

  1. सच कहा है ... निरंतर जलने के लिए तेल और समय समय पर रखरखाव जरूरी है नहीं तो शश्वत तो कुछ भी नहीं होता ... भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...

    ReplyDelete
  2. सच है.... पोषित किये बिना कुछ भी जीवंत नहीं रहता ......

    ReplyDelete
  3. प्रकाश चाहिए बस ..........दीये के नीचे का अंधेरा कौन देखता है !!

    ReplyDelete
  4. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24-04-2014 को चर्चा मंच पर दिया गया है
    आभार

    ReplyDelete
  5. pane me maja nahi ,ek aas rahne de.
    samunder le ke ja magar pyas rahne de.
    www.skyfansclub.blogspot.com

    ReplyDelete
  6. बहुत सुंदर ! इंसान सिर्फ उजाले का आकांक्षी है ! उजाला पाने के लिये कुछ अर्पण भी करना होता है यह उसे गवारा कहाँ ! सार्थक प्रस्तुति !

    ReplyDelete
  7. बहुत गहरे भाव...

    ReplyDelete
  8. बहुत बारीकी से आपने देखा है और दिखाया है उन भावनाओं को जिन्हें हम सहेज नहीं पाते!!

    ReplyDelete
  9. जब तक नहीं संभालेगा दिया अपनी बाती को नहीं भिगोयेगा जज्बात के तेल में तब तक वह बाती कहाँ मात्र रुई का फाहा है जो ज़रा सी तपिश से भस्म हो जाता है । खूबसूरती से भावनाओं को उकेरा है

    ReplyDelete
  10. बहुत खूबसूरती से अपनी बात कह दी आपने - अपेक्षाएं बहुत हैं ,पर सृष्टि के अलिखित नियमों मेउन्हें पूरा करने की कुछ शर्तें भी हैं .बिना दीप के भौतिक आधार और सींचने को स्नेह बिना बाती से जलते रहने की आशा,दुराशा ही सिद्ध होगी .व्यंजना सटीक और सार्थक है .

    ReplyDelete
  11. सच है, प्रेम को पोषित करना होता है।

    ReplyDelete

पसंदीदा पोस्ट्स

ईमेल से जुड़ें

संपर्क

Name

Email *

Message *