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Tuesday, 3 December 2013

गरज बरस..



कहते हैं, 
गरजने वाले बादल बरसते नहीं 
पर यहाँ तो गर्जन भी है और बौछार भी 
जैसे रो रहे हों बुक्का फाड़ कर. 
चीर कर आसमान का सीना 
धरती पर टपक पड़ने को तैयार. 
बताने को अपनी पीड़ा. 
कि भर गया है उनका घर 
उस गहरे काले धुएं से 
जो निकलता है 
धरती वालों की फैक्ट्रियों से. 
दम घुटता है अब बादलों का 
अपने ही आकाश में 
फट पड़ता है उनका गुबार 
और बरस पड़ता है जमीन पर 
भयंकर चीत्कार के साथ.

31 comments:

  1. बहुत सही ... सरल सच्चे शब्द

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  2. अब बरसेंगे ही। कब तक गरजते ही रह जायेंगे , एक हद तो सबकी है !
    अच्छा लिखा !

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  3. ये काला गुबार देखते हैं धरती वाले पर रोकते नहीं उसे ... सुनते हुए भी नहीं सुनते ये चीत्कार ...

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  4. सीमायें तो सबकी हैं .... पर चीत्कार कोई सुने तो ..

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  5. बादलों का गुस्सा...उनका फट पड़ना जायज़ है......
    हमने धरती तो धरती, आसमान ,बादलों को भी नहीं बख्शा.........

    अनु

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  6. किसी तरह तो धरती वालों को अपनी करनी का एहसास हो

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  7. गरज बरस के साथ आ गया,
    भावों में ऊर्जा पूरी है।

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  8. जो उपर जाता है , वह नीचे भी आता है !

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  9. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति बुधवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  10. और बरस पड़ता है जमीन पर
    भयंकर चीत्कार के साथ.
    सही दिशा में सोच है शिखा आपकी । …… काश हैम भी कुछ इस प्रकार सोच पाते।

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  11. और इस तरह बादल अपने आसमान के आँचल को दागदार होने से बचा लेते हैं शायद ।

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  12. हर किसी के सब्र की एक सीमा होती है |

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  13. bahut sunder badal ke gussa bhi jayaj hai .kya kahen hamari karni ka bhog vo bechara bhog raha hai
    sunder bimb me saje bhav
    racahan

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  14. इसका तो यह अर्थ हुआ कि जहाँ जितना प्रदूषण वहाँ उतनी वर्षा। लेकिन देखने में तो ऐसा नहीं है। लेकिन आपकी कविता का भाव अच्‍छा है।

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  15. प्रकृति करती गुस्से का इजहार ,गरजकर बरसती उनपर
    नई पोस्ट वो दूल्हा....
    लेटेस्ट हाइगा नॉ. २

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  16. पर्यावरण के मुद्दे पर सशक्त रचना

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  17. धरती वालों की फैक्ट्रियों से.
    दम घुटता है अब बादलों का
    अपने ही आकाश में
    फट पड़ता है उनका गुबार
    और बरस पड़ता है जमीन पर
    भयंकर चीत्कार के साथ.

    बहुत ही यथार्थपरक एवं भावपूर्ण रचना.....

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  18. कोई कब तक सहे, आख़िर हर चीज़ की एक सीमा होती है बादलों की भी है। सार्थक भाव अभिव्यक्ति।

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  19. कवितांक प्रकृति की पीड़ा अच्‍छे से समझ रहा है।

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  20. बादलों का आक्रोश छलक रहा है , बहुत सुन्दर .

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  21. बादलों के साथ उपजी मन की पीड़ा काफी गहरी टीस को बयां कर रही है...

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  22. ati sunder. harday ka antarman sa upjaihui abhivyakti

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  23. कहाँ कहाँ पहुँच जाती हो आप .... सुन्दर

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  24. बादलों की वेदना बहुत खूबसूरती से अभिव्यक्त हुई हैं.

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  25. इंसान कि करनी को कब तक प्रकृति चुपचाप सहेगी .... वैसे अब तो बादल ही नहीं लोग भी गरजते भी हैं और बरसते भी हैं :)

    सही संदेश देती अच्छी रचना

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  26. गरज गरज का बरसे ...
    पर बुंदों के बदले शब्द :)

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