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Tuesday, 17 September 2013

कच्ची मिट्टी... (समापन)

 http://shikhakriti.blogspot.co.uk/2013/09/blog-post_15.html  यहाँ से आगे। 


अब तक यह तो विजया की समझ में आने लगा था कि घर की तीसरी मंजिल पर रहने वाले निखिल के सगे भैया, भाभी क्यों अजनबियों की तरह रहते हैं, क्यों उन्होंने घर में आने जाने का रास्ता भी बाहर से बना लिया है, और क्यों त्योहारों पर भी वह एक दूसरे को विश तक नहीं करते। हालाँकि बात उलटी भी हो सकती है, हो सकता है भैया, भाभी का यह रवैया ही मम्मी जी के ऐसे व्यव्हार का कारण हो, हो सकता है इसीलिए वो इस घर पर सिर्फ अपना अधिकार चाहती हों, हो सकता है इसीलिए निखिल के लिए वह इतना असुरक्षित महसूस करती हों। यह ख़याल आते ही उसे मम्मी जी से सहानुभूति होने लगी। बेचारी अकेली हैं। एक बेटे ने तो भुला ही दिया है, माँ है आखिर क्या बीतती होगी उनपर। पर जो भी हो ऐसे कब तक चलेगा। उसे माँ- बेटे के प्रेम से कतई कोई आपत्ति नहीं पर कुछ हिस्सा उसका भी तो होना चाहिए, आखिर वह किसके सहारे जिए। आज वह निखिल से बात करके ही रहेगी आखिर पता तो चले कि माजरा क्या है। रात को नीचे ही टीवी देखकर जब निखिल साढ़े बारह बजे ऊपर आया तो छेड़ ही दिया विजया ने। अब पता नहीं वह नींद में था या ऑफिस की कुछ परेशानी , भड़क गया एकदम - देखो विजया ! मुझे इन सब में मत धकेलो, मैं मम्मी के खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुनना चाहता , गलत हो या सही बस वह करो जो मम्मी कहती हैं ..बात ख़त्म। 

ठगी सी खड़ी रह गई विजया और निखिल कपडे बदल कर सो गया। उस रात सोई नहीं वो और न जाने कितनी ही रातें ऐसे ही गुजर गईं। आखिरकार एक दिन मम्मी जी ने कह दिया , विजया के हाथ का खाना हमें नहीं अच्छा लगता, कोई काम ढंग से नहीं करती,उससे कह दो अपना खाना अलग बनाये, हम अपना अपने आप बना लेंगे। इस बार बिल्कुल आश्चर्य नहीं हुआ विजया को। उसने सबकुछ वैसे ही करने की ठान ली थी जैसे मम्मी जी कहती थीं। वह अपना और निखिल का खाना अलग बनाने लगी। पर तब भी निखिल नीचे ही खाकर आधी रात को ऊपर आता और आकर सो जाता। विजया कभी कुढ़ कर तो कभी रो कर सो जाती। एकदम असंवेदनशील होती जा रही थी वो। अपनी तरफ से वह घर में शांति रखने की और मम्मी जी को खुश रखने की हर संभव कोशिश करती थी। पर जैसे उन्होंने तो उसे ज़लील  करके इस घर से, बेटे की जिन्दगी से निकालने की ठान ली थी। एक दिन तो उसने एक बैगन भूना, भरता बनाने के लिए। उसमें से आधा उसने मम्मी जी के लिए रख दिया और आधे का भरता अपने लिए बना लिया. शाम को निखिल के आने पर उसे आवाज आई - बैगन के बीज बीज मेरे लिए छोड़ गई और गूदा सारा खुद ले गई, मेरे दांत अब कमजोर हो गये हैं बीज अटक जाते हैं उसमें। दूसरे दिन विजया ने सब्जी वाले से दो बैगन लिए और एक मम्मी जी को दे दिया - अब इसके बीज भी आपके और गूदा भी आपका। उसे अब किसी भी बात से रोना नहीं आता था। पर मन के एक कोने में हमेशा एक टीस सी होती रहती थी। ऐसे ही समय में लन्दन जाने की बात हुई थी तो अचानक जैसे रेगिस्तान में बारिश आ गई। उसके मन का सूखा हुआ सोता फिर से आबाद होने लगा , उम्मीद की एक किरण उसे दिखाई देने लगी थी। 

लन्दन आकर उसकी उम्मीदों में पंख लग गए थे। उसने सोचा था अब वह अपनी डिग्री का भी इस्तेमाल कर पाएगी। कुछ काम कर लेगी. एक पार्टी में एक पढ़ी लिखी स्मार्ट सी एक लड़की मिली थी उसे , उसने बड़ी आशा से उसे पूछ लिया था ..आप कोई जॉब क्यों नहीं करतीं. उसने हंस कर जबाब दिया इस कम्पनी में पति हो तो अपना कैरियर भूल जाओ। बड़ी अजीब लगी वो औरत उसे, अजीब है काम नहीं करना तो यह बहाना सही। हिंदुस्तानी लड़की, कहीं भी चली जाए अपना पति राग नहीं छोड़ सकती। खुद को हमेशा सबसे पीछे ही रखती है। पहले शादी हो गई, फिर पति, फिर बच्चे, खुद का तो कुछ है ही नहीं। पता नहीं क्यों पढ़ती लिखतीं हैं फिर। वह तो नहीं रह सकती ऐसे निष्क्रीय सी। वो कल ही जाकर जॉब सेंटर में खुद को रजिस्टर करवा कर आएगी। अब तो निखिल के स्वभाव में भी सुधार है। लगता है पटरी पर आ जाएगी जिन्दगी अब उसकी।

परन्तु जल्दी ही उसे एहसास हो गया था की वह लड़की इतनी भी अजीब नहीं थी। कहीं न कहीं उसका अनुभव था जो उसकी हंसी में बोल रहा था। बहुत कोशिशों के बाद भी विजया को कोई काम नहीं मिल रहा था। यह पश्चिमी देशों में मंदी का दौर था। हालाँकि खाली बैठने के बजाय वह किसी सुपर स्टोर तक में नौकरी करने को तैयार थी। हाँ अब क्लीनर का काम तो नहीं होता उससे , वह तो शायद उसे मिलेगा भी नहीं उसके लिए वो "ओवर क्वालिफाइड" जो ठहरी। नहीं तो हो सकता था कि वह, यह काम भी करने को आखिर तैयार हो ही जाती। आखिर यहाँ अपने घर में भी तो यही सब करती ही है। यह भी अजीब फंडा है लन्दन में, काम मिलेगा तो आपकी योग्यता अनुसार ही। न ज़रा सा ऊपर न ज़रा सा नीचे। इतने आवेदन भेजे उसने, तो कुछ के जबाब में लिखा आया "सॉरी यू आर ओवर क्वालिफाइड फॉर दिस जॉब" . खैर जो भी हो ..लन्दन में सुकून तो था। रोज की चिक चिक नहीं थी, कुछ अच्छे दोस्त भी बन गए थे। अपना घर था जिसे वो अपने हिसाब से रख सकती थी। पर कुछ था जो अब भी ठीक नहीं था। निखिल के स्वभाव में कुछ नरमी जरूर आई थी ,परन्तु उसकी परवाह जैसे उसे अभी भी नहीं थी।
वह आता, खाना खाता और सो जाता। कभी यह तक नहीं पूछता था कि उसने भी खाना खाया है या नहीं। बल्कि वह जब कभी प्यार जताने की कोशिश करती या कोई बात करने की,झिड़क देता - तुम्हें यही सब फालतू काम सूझता है हमेशा, कोई और काम नहीं है क्या .  
अंतरंगत पलों में करीब आने के बजाय वह अब भी उससे दूर भागने के बहाने तलाशा करता था। कभी ऑफिस का काम लेकर बैठ जाता , कभी कोई फिल्म देखने, नहीं तो सो ही जाता। शादी के तीन सालों में मुश्किल से तीन बार वह एक दूसरे के समीप आये थे वह भी विजया के ही पहल करने पर। उस पर भी वह इनकार के सारे हथकंडे अपना लेता था। उसका यह बर्ताव विजया की समझ से बाहर था आखिर ये कैसा आदमी है? क्या इसका कभी भी मन नहीं करता? या निखिल को वह पसंद ही नहीं? उसकी पहली तीनो गर्लफ्रेंड की तस्वीर देखीं हैं उसने। तीनो एक दम सिंगल हड्डी थीं तो क्या निखिल को एकदम पतली लडकियां पसंद हैं, क्या उसका कद- काठी में ठीक- ठाक होना उसके इस बर्ताव की वजह है ? आखिर कोई तो वजह होगी ही , वरना कभी तो और कुछ न सही कुछ रोमांस ही करने का मन तो करता उसका। सोचते सोचते अपने दिमाग में ही जाला सा बनता लगने लगता, और विजया उसी जाले में उलझती चली जाती . कोई सिरा ही नहीं मिलता उसे। इसी उहापोह में एक दिन उसने अपने मन की यह गिरह साक्षी के सामने खोल के रख दी थी। उसे जाने क्यों बड़ी अपनी सी लगा करती थी साक्षी। और फिर यहाँ और उसका था भी कौन। यह बातें वह अपने घर वालों से तो कह नहीं सकती थी। और ससुराल में ले दे कर एक ननद थी जिससे कुछ बात उसकी हुआ करती थी। पर अपने मन की यह दुविधा वह उससे भी कैसे  कहती। 

साक्षी ने उससे कहा था। तू उसे थोड़ा समय दे विजया। हो सकता है तेरी इस हबड़ तबड़ और घर की परेशानियों की वजह से वो और चिढ जाता हो। तू शांत रह कुछ समय, देख शायद उसे खुद ही एहसास हो। वह साक्षी से नहीं कह सकी कि - नहीं साक्षी उसे कभी एहसास नहीं होगा छ: छ: महीने गुजर जायेंगे फिर भी। पर फिर भी उसने एक बार साक्षी की ही बात मान लेने का मन बना लिया। एकदम अकेला छोड़ दिया निखिल को, कोई भी शिकायत ही करनी बंद कर दी। अब पता नहीं यह उसका असर था या उस दिन उसकी किस्मत अच्छी थी कि एक शाम को एक फिल्म देखते ही देखते सोफे पर ही वह दोनों कडल अप हो गए थे। कितनी खुश थी उसदिन विजया सुबह निखिल के जाते ही उसने साक्षी को फ़ोन करके थैंक्स कहा था। फ़ोन में उसकी ख़ुशी छलक छलक पड़ रही थी। पर शायद उस दिन भगवान् को ही उसपर दया आ गई थी , उसके बाद निखिल का फिर वही रवैया शुरू हो गया था। उसे आश्चर्य होता। अजीब अजीब बहाने बनाता था वो, एक दिन तो उसने यहाँ तक कह दिया कि तुमसे बदबू आती है। सर से पैर तक कांप गई विजया। उसी दिन बाजार जाकर जाने क्या -क्या खरीद लाइ थी। गज़ब का बाजारवाद है यहाँ। न जाने कैसी- कैसी क्रीम और साबुन आते हैं। हंसी आई उसे खुद पर। जो समस्या थी ही नहीं उसका इलाज करने निकली थी वो। उफ़ ये क्या हो गया है उसे। वह किसी भी तरह बस निखिल का प्यार पाना चाहती थी। और फिर कुछ समय बाद इंडिया से मम्मी जी के सन्देश आने लगे थे कि अब वापस आ जाओ , वो अकेली हैं , बीमार हैं। और निखिल ने जाने का फैसला कर लिया था। 

अरे अभी तक पेकिंग नहीं हुई तुम्हारी ? हर काम कछुए की चाल से करती हो। निखिल के इस ताने से वह वर्तमान में आई। अब सोचने से फायदा क्या . चलो ठीक है। निखिल ने कह ही दिया है कि एक ही घर में रहेंगे पर अलग अलग घर की तरह। और वह भी इंडिया जाते ही कोई काम शुरू कर देगी। अपने काम में मन लगा लेगी। शादी के ४ साल बाद भी निखिल बच्चा नहीं चाहता था। तो ठीक है न। अपने ही काम पर ध्यान देगी वो .
पर उसका यह इरादा भी धूल में जा पड़ा था। इंडिया जाकर फिर से दिन भर की चकल्लस शुरू हो गई थी। इतने गेप के बाद न तो उसे कोई नौकरी देने तो तैयार था , न ही अपना कोई काम शुरू करना इतना आसान था । उसने फिर भी कोशिश की। खुद ही यहाँ वहां हाथ पैर मार कर प्रदर्शनियों में अपना काम लगाया, परन्तु एक नए खिलाड़ी का बिना पैसों के कहीं भी जमना कहाँ आसान था। सारे दिन अपने एक कमरे में पड़ी विजया बोर हो जाती। निखिल से कभी शिकायत करती तो वो कहता अपना काम करो न तुम्हें क्या मतलब है किसी और चीज से। विजया को समझ में नहीं आता था कौन सा अपना काम करे वो , और कहाँ ? इस घर में कुछ भी करने की उसे इजाजत नहीं थी। निखिल के भी सारे काम मम्मी जी करती थीं . वह तो सिर्फ सोने ऊपर आया करता था। और कभी कभी तो वो भी नहीं, वहीँ सोफे पर ही सो जाता था टीवी देखते हुए। क्या अपना काम करे वो, उसका काम है क्या।। 
उसपर अब नाते रिश्तेदारों ने बच्चे के लिए भी कहना शुरू कर दिया था। निखिल की बहन तो एक बार सिर्फ यही कहने के लिए आई थी। उसे समझ में नहीं आता था कि कैसे समझाए उन्हें ? कहाँ से आयेगा बच्चा ? क्या यह वह युग है कि बच्चे की इच्छा की , सूर्य या समुन्दर को देखा और बच्चा हाजिर। अरे बच्चे के लिए एक स्त्री के साथ एक पुरुष भी चाहिए होता है। जो उसके पास है तो, पर उसके साथ नहीं होता।  कहाँ से टपका कर दे दे वो बच्चा ..खीज जाती विजया। नंदरानी कहती हैं किसी डॉक्टर से क्यों नहीं राय लेती तुम, जाकर चेकअप तो कराओ, उसका मन हुआ कह दे , हाँ चलो आप साथ, मैं तो तैयार हूँ पर वहां डॉक्टर के सवालों के जबाब आप देना , कह देना मेरा भाई तो देवता है अपनी दिव्य दृष्टि से ही इसे प्रेग्नेंट कर सकता है। कमी तो इसमें ही है। फिर भी उसने कोशिश करके निखिल से बात की थी। कुछ विशेषज्ञों से राय लेने को भी कहा था। पर निखिल को तो कुछ भी गलत लगता ही नहीं था . उसके हिसाब से तो विजया ही ओवर रियेक्ट करती है, हर बात का इशू वही बनाती थी। परेशान हो गई थी विजिया . उसने निखिल के दोस्तों को , बहन को सबको कहा की उसे समझाएं पर निखिल उससे और ज्यादा चिढ गया, बेतहाशा चिल्लाया एक दिन कि वह अपनी कमजोरी और गलती उसपर लादना चाहती है, उसे बदनाम करना चाहती है। वह एकदम ठीक है। जिस किसी भी डॉक्टर को दिखाना है विजया खुद को दिखाये. वह किसी की कोई बात सुनने को तैयार ही नहीं था। हे भगवान् ये कैसा पढा लिखा अनपढ़ इंसान पल्ले पड़ा है उसके। टूट गई थी विजिया। उसके पापा ने बड़ी आशा से उसका नाम विजया रखा था। पर अब हारने लगी थी वो। कहीं कुछ भी ठीक होता हुआ उसे नहीं लग रहा था। तो एक दोस्त की सलाह पर कुछ दिन के लिए अपने शहर अपने मम्मी पापा के पास चली गई . 

और वह आ गई थी अपने शहर। फिर से अपनी जिन्दगी के बारे में नए सिरे से सोचने। कुछ दिन तक निखिल के कभी कभी फ़ोन आते रहे थे औपचारिकता वश। पर किसी में भी विजया को अपने लिए जरा सा भी एहसास नहीं महसूस होता था। निखिल वहां अपनी दुनिया में मस्त था, दोस्तों के साथ घूम रहा था, नए -नए दोस्त बना रहा था। अब उसे माँ की कोई परवाह नहीं थी। बस विजया को दुखी करने के लिए ही उसका मातृप्रेम उफनता था. सच ही है निखिल जैसे लोग कभी किसी के भी नहीं होते।एक दिन तो निखिल की "ऍफ़ बी वाल" पर उसने एक औरत का आपत्तिजनक कमेंट भी देखा और उसपर निखिल का उससे मिलने का समय मांगना भी, शायद गलती से इनबॉक्स की जगह वाल पर ही सन्देश भेज रहे थे वो दोनों, और दूसरे ही दिन वह कमेंट डिलीट भी हो गए थे। वह फिर भी निखिल के ही साथ एक बार और कोशिश करना चाहती थी। उससे यह बात हजम ही नहीं होती थी की आखिर ८ सालों के इस रिश्ते में क्या निखिल ने कभी भी उसे नहीं चाहा, क्या उसके दिल में जरा सी भी जगह अपनी पत्नी के लिए नहीं। आखिर प्यार है क्या, वह मानती है कि यूँ अचानक किसी से प्यार नहीं हो जाता, प्यार भी जिम्मेदारी, परवाह और विश्वास के धरातल पर ही पनपता है। और उसके लिए आठ साल बहुत होते हैं। प्यार न सही एक जिम्मेदारी के तहत तो निखिल के मन में उसके लिए कुछ एहसास होने ही चाहिए। धीरे -धीरे निखिल के फ़ोन आने भी बंद हो गए थे। 

उसने भी सोचना छोड़ कर उसी शहर में कोई नौकरी तलाशना शुरू कर दिया था। कि कोई काम होगा तो तनाव से दूर रह सकेगी वो। फिर एक दिन महीनों बाद निखिल का फ़ोन आया। वह हैदराबाद में था वहां उसका एक्सीडेंट हो गया था। पैर की हड्डी टूट गई थी। जाहिर था उसे विजया की जरुरत थी। विजया भी बिना एक पल गंवाए पहुँच गई वहां।  पैर में स्केट से बाँध लिए विजया ने , उसका एक कमरे का घर संवारा,उसकी नर्स, ड्राइवर, नौकरानी सब बन गई, पत्नी तो थी ही, जिसका हक निखिल ने उसे कभी नहीं दिया था। फिर १०  दिन बाद उसे मुंबई वापस लौटना था और वह विजया को दूसरे दिन का उसके शहर का टिकट थमा कर चला गया।

जड़वत अपने शहर वापस आ गई विजया, खाली हाथ, ठगी हुई , इन १०  दिनों में बात करने की कोशिश की उसने निखिल से, पर हमेशा टाल दिया उसने। विजया के दोस्त उसे सलाह देते अपनी नई जिन्दगी शुरू करने के लिए। पर इतनी हिम्मत विजया जुटा नहीं पाती थी। कैसे वह उस बंधन को तोड़ दे, निखिल ने न सही, पर उसने तो अपनी जिन्दगी के महत्वपूर्ण पल दिए हैं निखिल को। वह तो उससे बंधा महसूस करती है अब भी। हमारे देश में लडकियां पैदा भी कच्ची मिट्टी सी होती हैं और ताउम्र वैसी ही रहती हैं। जो जैसा चाहे , जब चाहे अपने हिसाब से ढाल ले, वो ढलती ही जाएँगी, बार बार , लगातार, नए - नए आकार लेती जाएँगी। 

निखिल ने उसके बाद कभी फ़ोन नहीं किया।
वह खुद ही कभी फ़ोन करती तो वह उसे ही दोषी ठहराना शुरू कर देता . उसकी माँ और उसके ख़याल से विजया शादी के रिश्ते के लायक ही नहीं थी। उसे परिवार में रहना ही नहीं आता था। और अब निखिल उसके साथ रहना भी चाहता तो शर्तों पर - की वह माँ को जबाब नहीं देगी, उससे किसी तरह की मांग नहीं करेगी, उसके घरवालों की सब बात मानेगी। निखिल के अनुसार विजया एक दिखावटी इंसान थी, उसके एहसास, प्यार , आंसू सब दिखावा ही था, निखिल के लिए , उसके घरवालों के लिए, उसकी माँ के लिए, बहन, बहनोई, भांजों के लिए किसी के लिए कभी, कुछ भी नहीं किया था विजया ने। स्तब्ध थी विजया। आखिर इन आठ सालों में कितना समझा उसने निखिल को। वह अब चाहता ही क्यों था उसे अपने घर में वापस, जबकि उसकी जिन्दगी में तो विजया के लिए शायद जगह ही नहीं थी। ग्लानी होने लगी विजया को खुद पर। क्या इसीलिए उसके पापा ने उसे इतना पढ़ाया -लिखाया, आत्मनिर्भर बनाया था कि एक दिन वह अपने ही पति के हाथों जानवर की तरह बोली लगाके बिक जाए। उस पूरी रात रोती रही विजया। पर सुबह उठी तो उसकी आँखें एकदम साफ़ थीं . उसे सब कुछ साफ़ साफ़ दिखाई दे रहा था। जल्दी जल्दी उठकर , तैयार होकर वह निकल गई थी। एक कंपनी से कल ही एक इंटरव्यू कॉल आया था। नौकरी छोटी थी पर ठीक है। आज उसे अपनी जिन्दगी जीने से कोई नहीं रोक सकता था। वह कोई अनपढ़, मजबूर औरत नहीं है , जिसे जो चाहे जैसे चाहे अपने घर में बाँध ले। अब अपनी जिन्दगी वह अपने हिसाब से जीयेगी। यहीं रहकर अपने बूढ़े हो रहे माता- पिता का सहारा बनेगी। और अपनी जिन्दगी अब एक नए सिरे से फिर शुरू करेगी। जिसमें न निखिल होगा, न निखिल के साथ उसकी की गई गलतियां।
वह तेज़ कदमों से सड़क पर चली जा रही थी। सर के ऊपर सूर्य अपनी पूरी उष्मा के साथ मौजूद था। पर विजया के चेहरे पर बहता पसीना आज चमक रहा था। विजया के अपने होने का पसीना, उसके वजूद का पसीना, विजया की विजय का पसीना। अब जिन्दगी को फ़ास्ट ट्रेक पर ले जाने का वक़्त आ गया था। कच्ची मिट्टी फिर एक नया आकार लेने वाली थी।

समाप्त। 


22 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  2. शिखा जी ,आपने कहानी को काफी भावप्रवणता से लिखा है लेकिन निखिल के व्यवहार का कारण स्पष्ट नही हुआ । एक निश्छल व संवेदनशील महिला को ऐसी दशा में पलायन ही सूझता है । और कोई उपाय भी तो नही ।

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    1. आपकी प्रतिक्रया का बहुत बहुत शुक्रिया गिरिजा जी !पॉइंट नोटेड:).
      कई बार किसी के व्यवहार का कोई कारण ही तो समझ में नहीं आता.बस कयास ही लगाते रह जाते हैं हम.

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  3. पति - पत्नी के रिश्ते के इस आयाम को आपने कुशलतापूर्वक उकेरा है . जटिल मनोवृत्ति कई बार इस खूबसूरत रिश्ते को नरक बना जाती है और इसको निभाना दुरूह होता जाता है . इस कहानी का नायक किसी दुविधा या अक्षमता का प्रतीक है , जिसने इससे बाहर निकलने की कोशिश भी नहीं की और अपने लिजलिजे व्यवहार से पत्नी की नजरों गिर गया . आपने कहानी के साथ पूर्ण न्याय किया है , प्रवाह और कथ्य भी अनुपम है . साधुवाद .

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  4. badhiya kahani.....aise hi likhti rahe

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  5. nice story
    badhai aapko
    rachana

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  6. ऐसे प्रसंग सुनने में आते हैं । काफी सच के करीब है यह कहानी । ऐसे किस्सों का बहाव और अंत ऐसे ही होता है । काश ! यह कच्ची मिटटी अब पक कर मजबूत हो जाए ।

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  7. इतने जटिल रिश्तों का ताना-बाना वो भी पति-पत्नी (मियां-बीबी) के सम्बन्धों में भारत जैसे देश में तो सदैव ही ऐसे संबंधों का एक आदर्श स्थान है, और शादी के पूर्व की प्रेमिकाओं का वर्णन भूल के भी जिक्र या याद करना कोई पसंद नहीं करता . ऐसा संभव भी नहीं के कोई व्यक्ति अपनी पत्नी से इतना दूर रहे . मेरे ख्याल से हिंदुस्तान में सामान्य जीवन में संभव नहीं यहाँ जो प्रसिद्ध हस्तियाँ हैं, उनके लिए भी फिकरे उछलने चालू हो जाते हैं , क्यों क्या हुवा ? क्या चक्कर है . विजया को उसके भाई-भाभी से इतने से न मिलना और नन्दों से भी जिक्र ना करना भी सामाजिक असहिष्णुता का परिचायक है . लेकिन सार्थक अन्तिम उसका निर्णय विवेकपूर्ण एवं उसके नाम विजया को सार्थक करता है के फिरसे अपने जीवन को पटरी पे लाने के लिए तैयार करने की शुरुवात काम ढूँढने से करना .
    ::::::-कुछ भी हो रिश्तों के मर्म को छूने की एक सार्थक पहल तो है ही -::::::

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  8. निखिल के असामान्य व्यवहार का कारण समझ तो नहीं आया , मगर अंदाज़ा लगाया जा सकता है. विजया ने देर से मगर सही फैसला लिया। सबसे ज्यादा बुरा तो तब लगा जब उसने भरपूर सेवा लेने के बाद जाने का टिकट थम दिया। वह तो खैर पति था , मगर जाने अनजाने या जानबूझ कर रिश्तेदार भी ऐसा करते हैं ! कुछ लोग ऐसे चिकने घड़े जैसे ही होते हैं !!
    अच्छी लगी कहानी !

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  9. पुरानी पोस्‍ट देखने से रह गयी इसलिए पहले वो पढ़ते हैं।

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  10. भावना प्रधान कहानी ... विजय ने ठीक किया पर समय रहते समझ जाती तो अच्छा था ... वैसे नारी मन ऐसा ही होता है ... पर निखिल के ऐसे व्यवहार का कारण समझ नहीं आया ... अंत आशा भरा है ये अच्छी बात है ...

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  11. निखिल के व्यवहार से यही कयास लगाया जा सकता है कि घर के अन्य सदस्यों के व्यवहार के कारण शायद केवल अपने स्वार्थ को ही तजरीह देता हो ... या फिर उसका विवाह केवल परिवार की थोपी हुई इच्छा हो .... जो भी हो कहानी का कथानक काफी कसा हुआ है .... नायिका को उसकी सेवा के बदले मायके लौट जाने का टिकिट थमा देना निम्न मानसिकता का द्योतक है ऐसी घटनाएँ भी यथार्थ में होती हैं यह सोच कर बहुत अजीब सा लगता है । विजया का निर्णय प्रेरक है .... कब तक आत्मसम्मान पर कुठराघात कोई सहता रहे .....

    सराहनीय प्रयास रहा कहानी लिखने .... अगली कहानी कब आ रही है ? :)

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  12. उद्देश्‍यपरक।

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  13. खाँचे जब टूटे हों तो ढलने का कष्ट क्यों सहा जाये..विश्व बुलाता..
    बहुत सुन्दर कहानी लिखी है आपने।

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  14. bahut hi sundar kahani .............ye kahani bahut kuch mere bhai ki jindagi se milati hai lekin maine bhabhi ka saath dekar use bahut kuch sudhar diya hai .

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    1. काश हर भाभी को आप जैसी ननद मिलती ...

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  15. बहुत ही सुन्दर कहानी ...आगे क्या हुआ ये उत्सुकता भी कहानी में बरक़रार रही .विजया का निर्णय भी सही था ...किन्तु आठ वर्ष का लम्बा समय कुछ व्यावहारिक सा नहीं लगता .ये निर्णय कुछ जल्दी होना था पर कहानी बहुत अछि है ...सच्चाई के बहुत करीब

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  16. बहुत बढ़िया कहानी, रिश्तों के ताने बने यूँ उलझते सुलझते हैं ....

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  17. वाह ! पहली कहानी की बहुत बहुत बधाई ...
    प्रकाशन की भी ....
    अब तो सिलसिला शुरू हो गया है .....:))

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  18. नई उड़ान के लिए बधाई

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  19. सुन्दर कहानी. बधाई.

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  20. पहली कोशिश है, अच्छी है. भाषा सधी हुई है, और प्रवाह भी है. हां कथावस्तु से मुझे थोड़ी शिकायत है. निखिल की बेरुखी समझ में नहीं आई, न ही अन्त तक स्पष्ट की गयी. पति-पत्नी के रिश्ते में कितनी ही कड़वाहट क्यों न हो, शरीर की जरूरतें पूरी की ही जाती हैं. निखिल का उदासीन होना स्पष्ट किया जाना चाहिये था. कहानी की विश्वसनीयता कायम रखने के लिये तमाम कारणों को भी स्पष्ट करने की जरूरत होती है. कहानी की लम्बाई कथावस्तु के हिसाब से अधिक है. इस कथानक को संक्षिप्त किया जा सकता था.
    उम्मीद है, मेरी इस कड़वी समीक्षा का बुरा नहीं मानोगी. अपनों को मैं ऐसी ही बेवाक टिप्पणी देना पसंद करती हूं.

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