Enter your keyword

Monday, 10 June 2013

ठौर कहाँ ...

उसे इंडिया वापस जाना है.

क्योंकि यहाँ उसे घर साफ़ करना पड़ता है , 
बर्तन भी धोने होते हैं , 
खाना बनाना पड़ता है. 
बच्चे को खिलाने के लिए आया यहाँ नहीं आती. 
जब उसे जुखाम हो जाए तो उसकी माँ नहीं आ सकती .
 फिल्मो में होली,दिवाली के दृश्य देखकर उसे हूक उठती है. कि उसका बच्चा वह मस्ती नहीं कर पाता. 
उसे शिकायत है कि उसका बच्चा हिंदी नहीं बोलता. 
यहाँ से जब वह फ़ोन पर बात करता है तो उसकी अंग्रेजी का भी अनुवाद करके उसे अपनी माँ को बताना पड़ता है. 
कोई रिश्तेदार यहाँ नहीं हैं. 
छुट्टी में जाओ तो समय कितना कम होता है. कितनी खूबसूरत जगह हैं इंडिया में , देखने का समय ही नहीं मिलता. 
वहां उसके भाई के यहाँ दो - दो काम वालियां आती हैं, और कुक अलग. 
भाभी ठाठ से रहती है. 
उसके बेटे को खाना खिलाते वक़्त आसपास ४ लोग इकठ्ठा हो जाते हैं.
यहाँ दो कमरों के फ़्लैट में उसकी जिन्दगी सिकुड़ कर रह गई है .

वहां जाकर वो कहेगी... 

उफ़ कितनी गर्मी है यहाँ , 
बिजली नहीं आती, 
काम वाली ने नाक में दम कर दिया है, 
बच्चा है कि कितने भी अच्छे स्कूल में डाल दो 
अंग्रेजी ढंग से नहीं बोलता,
बेकार के त्योहारों में पैसा, समय बर्बाद करते हैं, 
 रिश्तेदारों ने जीना हराम कर दिया है , 
कितना सुकून है तुम्हें वहां , न कोई किट किट न पिट पिट.
अपनी मर्जी के मालिक. 
पूरा यूरोप, अमेरिका घूमो, यहाँ तो मुल्ला की दौड़ नैनीताल, मसूरी तक. उसके लिए भी कितना सोचना पड़ता है .
जिन्दगी जंजाल है.

और मुझे ख़याल आ रहा था हाल में देखी एक फिल्म का संवाद - कितना भी, सब पाने के लिए यहाँ वहां भागो कुछ न कुछ तो छूट ही जायेगा. बेहतर है, जहाँ जिस वक़्त हो वहां खुश रहो.

42 comments:

  1. सौ बात की एक बात है , जो है उसमे खुश रहो !

    ReplyDelete
  2. अब मैं क्या बोलूँ :) :) :)

    ReplyDelete
  3. संतोष धन जिसके पास वही धनी..वही सुखी....
    वैसे शिखा कितना सुकून है तुम्हें वहां , न कोई किट किट न पिट पिट.
    अपनी मर्जी के मालिक.
    पूरा यूरोप, अमेरिका घुमो :-)

    अनु

    ReplyDelete
  4. बिलकुल सही बात लिखी है ...जो है उसी मे प्रसन्न रहना चाहिए ....!!

    ReplyDelete
  5. "ठौर कहाँ ..."


    न यहाँ न वहाँ !!

    ReplyDelete
  6. राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट
    अंतकाल पछताएगा जब प्राण जाएँगे छूट

    ReplyDelete
  7. सच यही है! बहता पानी रमता जोगी केवल जोगियों के बस का है !

    ReplyDelete
  8. photo mein bechare ka expression mast hai....main samajh leta hun ki aapka bhi expression aisa hi ho gaya hoga antim line likhte hue :)

    ReplyDelete
  9. सुख दुःख / हर्ष विषाद /सुकून संकट /अपने पराये /यहाँ वहां ....सब सापेक्ष है ,निरपेक्ष कुछ भी नहीं । यह तो मन है ..पल में तोला पल में माशा ....हां एक बात और ..लखनऊ आ जाइये ..मलीहाबादी दशहरी आम आ गया है । अरे खाइये पीजिये ..ठौर ठार की चिंता छोडिये ।

    ReplyDelete
    Replies
    1. यह चिंता मेरी नहीं , किसी और की है :).अपना तो मस्त ही हैं :):).

      Delete
  10. इंसानी फितरत है कभी संतुष्ट न होना . संतुष्ट हो गए तो सरे धन धूर सामान नहीं हो जायेंगे ?

    ReplyDelete
  11. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  12. शिखा जी ,
    उसे इण्डिया वापस जाना है ,अच्छी लगी ,फिर ,वहां जाकर वो कहेगी ,भी अच्छी लगी
    कभी रु -ब- रु भी सुनेंगे आपको , .
    नित्यानंद `तुषार`

    ReplyDelete
  13. क्या सही नक्शा खींचा है आपने लोगों की सोच का बहुत बढ़िया...
    वैसे सही है "जाही विधि रखे राम,ताही विधि रहिए"... :)

    ReplyDelete
  14. न यों चैन ,न वों चैन -कुछ ऐसे लोग भी होते हैं !

    ReplyDelete
  15. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार (11-06-2013) के "चलता जब मैं थक जाता हुँ" (चर्चा मंच-अंकः1272) पर भी होगी!
    सादर...!
    शायद बहन राजेश कुमारी जी व्यस्त होंगी इसलिए मंगलवार की चर्चा मैंने ही लगाई है।
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  16. Aaj kal insan ko chain kaise bhi nahi he.. Man hamesha bhatkta rahta hain. Yadi insan satosi ho jaye to usse sukhi koi nahi duniya me. SUNDAR RACHNA.Abhar

    ReplyDelete
  17. kash ye bat sab ki samajh me aa jaye

    ReplyDelete
  18. आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार ११ /६ /१ ३ के विशेष चर्चा मंच में शाम को राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी वहां आपका स्वागत है

    ReplyDelete
  19. जो मिलता है उसमें संतुष्टि नहीं होती ...... इसी लिए मन दुखी रहता है .... कहीं चैन नहीं .... बढ़िया तुलनात्मक विवरण ।

    ReplyDelete
  20. हर पल में आनन्‍द ढूंढो। परायी थाली में हमेशा घी ज्‍यादा ही लगता है।

    ReplyDelete

  21. संतोष है तो कहीं भी रहो शांति है अन्यथा अशांति आपके पीछे खड़ी मिलेगी
    latest post: प्रेम- पहेली
    LATEST POST जन्म ,मृत्यु और मोक्ष !

    ReplyDelete
  22. एकदम सच्ची बात... जहां रहो, खुश रहो, संतुष्ट रहो...खूब मज़ा आया पोस्ट पढ के :)

    ReplyDelete
  23. बिलकुल सही बात लिखी है ...जो है उसी मे प्रसन्न रहना चाहिए .

    ReplyDelete
  24. :-) man ki kahi aur ankahi bhi kahi

    ReplyDelete
  25. बहुत ही सुन्दर और सार्थक प्रस्तुती,आभार.

    ReplyDelete
  26. santosh param sukh .. par santosh ji milte kahan ... na thour na thikana :) nice

    ReplyDelete
  27. देश छोड़ के आए लगभग हर व्यक्ति की यही दशा रहती है ... और कई बार तो वो जीवन यूं ही बिता देते हैं लटकते हुए ... इस्किये मूल मन्त्र तो यही है ... जहां रहो खुश रहो ...

    ReplyDelete
  28. अब चित भी मेरी, पट्ट भी मेरी तो नहीं हो सकती।
    कुछ मिलता है तो कुछ खोना भी पड़ता है।
    सही कहा , जो है उसी का आनंद लिया जाये।

    ReplyDelete
  29. किसी को जमीं तो किसी को आसमां नहीं मिलता

    ReplyDelete
  30. सही कहा .....जो जैसा है स्वीकार करने में ही भलाई है

    ReplyDelete
  31. कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता।

    ReplyDelete
  32. जहाँ भी रहें, रहना सीख लें बस

    ReplyDelete
  33. बहुत सुन्दर ! ग़ालिब बाबा पहले ही कह गए - " हजारों खाव्हिशें ऎसी "

    ReplyDelete
  34. सात साल पहले की इसी विषय पर मानसी चटर्जी की एक पोस्ट पर अनूप भार्गव की टिप्पणी मौजूं है:
    ज़िन्दगी में अधिकांश चीज़ें A La Carte नहीं 'पैकेज़ डील' की तरह मिलती हैं । विदेश में रहने का निर्णय भी कुछ इसी तरह की बात है । इस 'पैकेज़ डील' में कई बातें साथ साथ आती हैं , कुछ अच्छी - कुछ बुरी । अब क्यों कि उन बातों का मूल्य हम सब अलग-अलग, अपनें आप लगाते हैं इसलिये हम सब का 'सच' भी अलग होता है । जो मेरे लिये बेह्तर विकल्प है , वो ज़रूरी नहीं कि आप के लिये भी बेहतर हो ।

    ReplyDelete
  35. जीवन जैसा चल रहा है इसे ही सार्थक बनाना चाहिये
    मन को खुश करके
    सुंदर अनुभूति

    आग्रह है- पापा ---------

    ReplyDelete
  36. bahut hi sarthak aur bhavpurn abhivyakti.

    ReplyDelete
  37. Kal hi ye samvaad suna aur aksharsha sahi hai....bahut kareene se joda hai dono ko...

    ReplyDelete
  38. dono pahluon ko apne ujagar kiya hai .....ak sundar pryas . pr na jane kyon mera mn kahata hai ki ap . india ke bare me nyay parak drishti nahi dal sakin hain .....pashchaty jagat me rahane se soch me bhi pashchaty ki jhalak aa hi jati hai. India to vh desh hai jahan mai sau bar janam lena apna saubhagy samjhuga......
    Pashchaty jagat me riston ke kya mayne rh gye hain ? aaye din shadiya toot rhi hain ....Sambandhon ke tootne ka dard kya hota hai uska mooly kya hai yah bharteey samaj se behatr aur kaun samjhega .?.....marne ke bad koi kandha dene wala bhi vhan nahi hota ...sarkari karmchari lason ko utha ke le jate hain .......aadhunikta ke daur me manushyta kho chuki hai pr bharat to bharat hai .....swarg se sundar hai ......prktriti ki gond aur janglon me rahne wala insan bhi videshiyon ki apeksha jyada sanskarwan manushy hai Shikha ji .

    ReplyDelete
  39. वहां खुश रहें जहां हैं।

    ReplyDelete

पसंदीदा पोस्ट्स

ईमेल से जुड़ें

संपर्क

Name

Email *

Message *