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Tuesday, 9 April 2013

सुकून के वास्ते, ये गाँव के रास्ते...(कोट्स वोल्ड)



मेरे ख़याल से घुमक्कड़ी शौक या आदत नहीं बल्कि एक रोग है। एक ऐसा रोग जो लग गया तो लग गया फिर इससे छुटकारा नामुमकिन सा है। वक़्त के साथ इसकी गंभीरता कम बेशक हो जाये , या हो सकता है बाहर से यह रोग नजर न आये परन्तु अन्दर ही अन्दर सालता जरूर रहता है। अब इसे अपना सौभाग्य कहूँ या अपने - अपनों का दुर्भाग्य कि यह रोग मुझे बचपन से लगा हुआ है और इन तानो के वावजूद कि " घूमने का नाम लो तो यह चिता से भी उठ खड़ी हो "  इस रोग के निदान के लिए हर दूसरे - तीसरे महीने तो मुझे अपने शहर से दूर किसी जगह की डोज लेनी आवश्यक हो जाती है। 


अब ब्रिटेन में मौसम पर इतने चुटकुले ऐसे ही नहीं सुनाये जाते। "मौसम " यहाँ का राष्ट्रीय मजाक है। और इस बार इंग्लैण्ड में मौसम का मजाक कुछ ज्यादा ही हो जाने के कारण कहीं दूर जाने की योजना तो बन नहीं पाई अंत में तय हुआ कि सप्ताहांत में कहीं आसपास ही टहल आया जाये। 

लन्दन की चलती पुर्जे सी जिन्दगी से दूर कहीं सुकून में कुछ घंटे बिताने के उद्देश्य से सोचा गया कि " "कोट्स वोल्ड"  की सैर कर आया जाये।"कोट्स वोल्ड" ,  - लन्दन से करीब दो घंटे की ड्राइव पर, दक्षिण पश्चिमी और मध्य इंग्लैण्ड में स्थित, प्राकृतिक सुन्दरता से परिपूर्ण एक पहाड़ी इलाका है . करीब पच्चीस माइल में फैला हुआ और करीब नब्बे माइल लंबा यह पूरा क्षेत्र, ऑक्सफोर्ड शायर एवं ग्लुस्टर शायर समेत सात काउंटी से घिरा हुआ है। और इसमें छोटे छोटे कई एतिहासिक और पुरातन गाँव हैं, गाँवों के बीच से बहती हुई नदियाँ हैं, छोटे छोटे टीले से पहाड़ हैं जिन्हें काफी हद तक उसी रूप में संरक्षित करके रखा गया है।इनमें से  "ब्रौटन ऑन द वाटर"  और स्टरडफोर्ड  अपोन एवोन की सैर मैं आपको करवा चुकी हूँ अत: अब बाकी बचे गांवों में - बिबरी, चेल्तेंनहम, बरफोर्ड और उनके बीच रास्ते में जो भी मिले, उन गाँवों में घूम आने का प्लान बनाया गया। 

योजना तो हमने बना ली,मगर अभी एक बाधा बाकी थी। गाँव के नाम से बच्चों की ना - नुकर शुरू हो गई थी। माथे पर हाथ रखकर वो बुदबुदाने लगे थे कि पूरा एक दिन हम वहां करने क्या जा रहे हैं। आखिर कितनी देर प्राकृतिक सुन्दरता निहारेंगे। उनकी आँखें तो अभी ठीक हैं, ज्यादा बिटामिन "G" (ग्रीनरी) की उन्हें जरूरत नहीं है। अब उनके सड़े हुए बूथों के साथ जाना तो संभव नहीं था अत: समझौता किया गया कि पहले एक दिन वे हमारे साथ गाँव घूमेंगे और दुसरे दिन हम उनके साथ उनके पसंद की जगह। तब जाकर बात बनी। अब बच्चों की पसंद की जगह क्या थी वह सब बाद में, पहले बात गाँव की।

हालाँकि इन गाँवों में ऐसा कुछ भी नहीं जो भारतीय दृष्टि से गाँव की परिभाषा पर ठीक बैठता हो। (यह भी मैं सुनी सुनाई बातों और टी वी फिल्मो में देखे गाँवों के आधार पर कह रही हूँ, क्योंकि आजतक मैंने  कोई भी भारतीय गाँव नहीं देखा है, और इसी को मैं अपने गाँव के प्रति अपार आकर्षण का कारण मान लेती हूँ ) न गोबर से लिपे पुते घर, न बुनियादी सुविधाओं की कमी और न ही सडकों पर घूमती या घरों में पाली गईं गाय, भैंसे। परन्तु फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जो लन्दन जैसे शहर से इन्हें अलग करता है। मकानों की पुरातन वास्तुकला, खाने पीने के लिए मैकडोनल्स या के ऍफ़ सी जैसी चेन्स के बदले पुराने तरह के कैफे और उनमें परोसे जाने वाले परंपरागत फिश एंड चिप्स जैसे अंग्रेजी पकवान. शांत, सुन्दर , छोटी छोटी सड़कें, सभ्य सरल मित्रवत नागरिक और सबसे बड़ी बात शहरों से इतर वाहन पार्किंग की कोई समस्या नहीं, कोई यमराज रुपी पार्किंग हवलदार यहाँ वहां घूमता / घूरता नजर नहीं आता और आप, इस खौफ से बेखबर कि जाने कब कहाँ जुर्माना लग जाए मुक्त हवा से बिचरते रहते हैं.
कुल मिलाकर छोटे छोटे से ये गाँव एक विकसित देश का हिस्सा होने के साथ साथ इस बात का भी एहसास कराते रहते हैं कि बेशक मानव चाँद पर पहुँच जाए और क्यूँ न वह हो जाए पूरी तरह मशीनों पर आश्रित। परन्तु प्रकृति की महत्ता और उसका सुकून आज भी उसके लिए संजीवनी की तरह है जो उसे संरक्षण ही नहीं देती बल्कि उसकी चलती साँसों का शुद्धिकरण भी कर देती है।

इन गाँवों में आज भी दिखती है वो अंग्रेजी संस्कृति जो शहरों में पूरी तरह नदारद है। "बिबरी " की संकरी सडकों पर चलती पुरानी मॉडल की महंगी कारें, उनमें सजे धजे बैठे वृद्ध जोड़े और यहाँ तक कि पालतू कुत्तों को घुमाने के लिए भी सूट , बूट और टाई लगाकर बेहद कायदे से निकले वहां के नागरिक, जो कुत्तों द्वारा त्याग किया गया मल साथ लाये प्लास्टिक के थेली में उठा रहे थे और जिसे बाद में वह निर्धारित जगह पर फेंकेंगे, इस बात का संकेत दे रहे थे कि दुनिया में कहीं अगर डिप्लोमेसी और सफैस्टीकेशन की परिभाषा पूछी जाए तो अंग्रेजों का आज भी कोई सानी नहीं। यह और बात है कि अब इनकी भी यह संस्कृति सिर्फ इन गाँवों में ही देखने को मिलती है, शहर तथाकथित रूप से मॉडर्न या कहूँ कि गंदे हो चले हैं। 

खैर जो भी हो एक दिन में सारी प्रकृति आँखों में भरकर हम चल पड़े। कंट्री साईट में यूरोप का कोई मुकाबला नहीं। अब तक के रास्तों में ही शहरी थकावट उतर चुकी थी, मन और दिमाग ताज़ा हो चुका था और हम तैयार थे अपनी दूसरी मंजिल के लिए - जो था लॉन्ग लीट . इसकी बातें अगली पोस्ट में ...अगर लिख गईं तो :). 
तब तक आप निहारिये इन तस्वीरों को. 

















40 comments:

  1. सही है खूब घूमना हो गया ... आपका भी और हमारा भी ... ;)


    आज की ब्लॉग बुलेटिन दिल दा मामला है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. हम तो भारतीय गाँव घूम के आये , ठीक वैसे जैसे आपने बताया : "गोबर से लिपे पुते घर, बुनियादी सुविधाओं की कमी और सडकों पर घूमती या घरों में पाली गईं गाय, भैंसे।"

    और जिस गाँव की बात आप कर रही हैं वो भारत के शहरों से अच्छा लग रहा है :) :) :)

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  3. चलिए आपके साथ हमने इंगलैंड के गांव की सैर कर ली .. भारत के गांवों से कोई तुलना नहीं की जा सकती इनकी .. साफ सफाई तो हमारे यहां की परंपरा में भी थे .. गांव में लोग प्रतिदिन जगते साथ अपने शरीर , अपने घर द्वार और सारे बरतनों की सफाई करते थे .. उसके बाद ही खाने पीने की शुरूआत होती थी .. यह बात और है कि बरतन की सफाई के लिए उनके पास राख और घर की सफाई के लिए गोबर ही सबसे सुरक्षित साधन था .. जैसा देश वैसा भेष .. पर गांव के लोगों के परस्‍पर मेल मिलाप और एक दूसरे के प्रति सहयोग की आदत भी बहुत अच्‍छी थी .. पर आज बहुत कुछ बदल गया है गांव में भी .. ताज्‍जुब तो इस बात का है कि हम विदेशों की अच्‍छी बातें नहीं सीखते .. स्‍वार्थ की बातें तुरंत सीखते हैं .. अच्‍छी जानकारी मिली आपकी पोस्‍ट से ..

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  4. निहार लिये। अगले का इंतजार है!

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  5. शिखा,

    पढ़ कर जलन हुई और गाना याद आ गया...दिल ढूंढता है, फुरसत के वो रात-दिन..

    लेकिन फिर भी मैंने सड़ा हुआ बूथा नहीं बनाया...

    जय हिंद...

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  6. सुंदर स्थल का सुंदर वर्णन
    चित्रों का शानदार संयोजन
    उत्कृष्ट प्रस्तुति----

    आग्रह है मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
    आभार

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  7. घुमक्कड़ी सही अर्थों में अच्छा शौक है. क्यूँकि घुमक्कड़ों ने इसी शौक के कारण नए-नए भूक्षेत्रों की खोज के साथ ही साथ ज्ञान-विज्ञान के संसार को बहुत कुछ दिया है. राहुल सांकृत्यायन के अनुसार तो यह सर्वश्रेष्ठ शौक है. इसी शौक से उपजे इस सुन्दर लेख के माध्यम से लन्दन के पड़ोसी 'कोट्स वोल्ड' गाँव से यह परिचय मधुर अनुभूति भरा है. यथेष्ट विवरण के सँग सुन्दर फ़ोटोज़ वहाँ के प्राकृतिक सौन्दर्य का दर्शन करा रहे हैं. अँधाधुंध शहरीकरण के बावजूद गाँव आज भी प्राकृतिक-सामजिक-सांस्कृतिक स्तरों पर समृद्ध हैं तथा नगरों और महानगरीय ढकोसलों से काफ़ी हद तक मुक्त भी. बहुत अच्छा लगा आपके इस अनुभव से जुड़ना, " हालाँकि इन गाँवों में ऐसा कुछ भी नहीं जो भारतीय दृष्टि से गाँव की परिभाषा पर ठीक बैठता हो।... न गोबर से लिपे-पुते घर, न बुनियादी सुविधाओं की कमी और न ही सड़कों पर घूमती या घरों में पाली गईं गाय-भैंसें। परन्तु फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जो लन्दन जैसे शहर से इन्हें अलग करता है। मकानों की पुरातन वास्तुकला, खाने-पीने के लिए मैकडोनल्स या केऍफ़सी जैसी चेन्स के बदले पुराने तरह के कैफ़े और उनमें परोसे जाने वाले परंपरागत फ़िश एंड चिप्स जैसे अँग्रेज़ी पकवान. शांत, सुन्दर, छोटी-छोटी सड़कें, सभ्य, सरल, मित्रवत नागरिक और सबसे बड़ी बात शहरों से इतर वाहन पार्किंग की कोई समस्या नहीं...
    कुल मिलाकर छोटे-छोटे से ये गाँव एक विकसित देश का हिस्सा होने के साथ-साथ इस बात का भी एहसास कराते रहते हैं कि बेशक मानव चाँद पर पहुँच जाए और क्यूँ न वह हो जाए पूरी तरह मशीनों पर आश्रित, परन्तु प्रकृति की महत्ता और उसका सुकून आज भी उसके लिए संजीवनी की तरह है जो उसे संरक्षण ही नहीं देती बल्कि उसकी चलती साँसों का शुद्धीकरण भी कर देती है।
    इन गाँवों में आज भी दिखती है वो अंग्रेजी संस्कृति जो शहरों में पूरी तरह नदारद है। "बिबरी " की सँकरी सड़कों पर चलती पुरानी मॉडल की महँगी कारें, उनमें सजे-धजे बैठे वृद्ध जोड़े...इस बात का संकेत दे रहे थे कि दुनिया में कहीं अगर डिप्लोमेसी और सफैस्टीकेशन की परिभाषा पूछी जाए तो अँग्रेज़ों का आज भी कोई सानी नहीं। यह और बात है कि अब इनकी भी यह संस्कृति सिर्फ इन गाँवों में ही देखने को मिलती है, शहर तथाकथित रूप से मॉडर्न या कहूँ कि गंदे हो चले हैं।
    खैर जो भी हो एक दिन में सारी प्रकृति आँखों में भरकर हम चल पड़े। कंट्री साईट में यूरोप का कोई मुकाबला नहीं।"...सुगम, सुरुचिपूर्ण प्रस्तुति !

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  8. घुमक्कड़ी का शौक होता ही है ऐसा , बस चक्कर तरह घुमते जाओ , और यदि साफ़ सुथरी जगह हो तो बात और भी क्या !
    भारत के शहरों से खूबसूरत वहां के गाँव दिख रहे है !
    खूबसूरत चित्र !

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  9. आपकी घुम्म्कड़ी यूँ ही परवान चढ़ती रहे . कितना कुछ जानने को मिल जाता है . ये तो सच है की आज भी गांव देहात में जाकर प्रकृति की गोंद में होने का एहसास होता है. महानगर की चिल्ल पों से दूर कुछ समय गुजरना अपने को रिचार्ज करने जैसा होता है .

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  10. यह यात्रा सुखद रही ...
    आभार आपका !

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  11. बहुत अच्‍छा वर्णन और बहुत अच्‍छे चित्र। आपको कभी भारतीय गाँव देखने हों तो हमारे यहाँ आइए। वनांचल में स्थित वनवासी गाँव देखने का अनुभव अनूठा है। पहाड़ी पर झोपड़ा और वहीं खेती।

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  12. शिखा जी आप रहती ब्रिटेन में है पर आपके दिलों-दीमाग में भारतीय गांव रचा-बसा है। आप लिख रही है वहां के गांव के दृष्यों के बारे में पर आपकी यादों से होते धीरे-धीरे भारतीय गांव भी कागजों पर उतरता है।
    आपके सफर के बारे में लिखूं तो लाजवाब और वर्णन में वास्तवादिता, चित्रदर्शिता। लगता है हम अपनी आंखों से उन दृशों को देख रहे हो।
    drvtshinde.blogspot.com

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  13. विदेशी ग्रामों की मनोरम दृष्यावली में विचरना अच्छा लगा.

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  14. तुम्हारी यायावरी .... हमें मिलती है बहुत सी नयी जानकारी .... यात्रा का सुंदर विवरण

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  15. oh ho .. to britani gaon ham bhi aapke karan ghum aaye...:)

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  16. यात्रा का बहुत ही सुंदर विवरण दिया है आपने वैसे आशीष जी की बात से पूर्णतः सहमत हूँ मैं, क्यूंकि जो कुछ भी मैं कहना चाह रही थी वह सब उन्होंने ही कह दिया :)

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  17. लंबी सड़क .. मकानों की पंक्तियाँ .. खूबसूरत नज़ारे ...
    बहुत कुछ है विदेश के गाँवों ओर शहर ... दोनों में देखने के लिए ...
    आपका चिरपरिचित लिखने का अंदाज़ उसे रोचक बना देता है ..

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  18. Breath taking beautiful picturesque places.....और गाँव की वर्जिन ब्यूटी साझा करने के लिए बहुत बहुत आभार शिखा ....बहुत सुन्दर शांत लगा यह कंट्री साइड ......वाकई तारो ताज़ा हो गयी होगी ..हम तो भई तसवीरें देखकर और तुम्हारा विवरण पढ़कर हो गए ...वाकई खूबसूरत

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  19. गांव और गांव के प्रकृति दृश्‍य अत्‍यंत मनोहारी हैं। शांतिपूर्ण वातावरण भी आकर्षिक कर रहा है। सब कुछ सुन्‍दर।

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    1. इंग्‍लैण्‍ड के गांव भी बहुत सुन्‍दर हैं। आप से निवेदन कि समय निकाल कर जाया करें नियमित रुप से इन स्‍थानों पर। शहरी-नगरी मूढ़ता से छुटकारा मिलेगा। प्रकृति ही हमारी सबसे बड़ी अध्‍यापिका है बहुत कुछ सीखने के लिए। आपके प्रत्‍युत्‍तरों हेतु धन्‍यवाद प्रेषित है।

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  20. शिखा जी !
    आपने तो ब्रिटेन के ख़ूबसूरत गांवों की सैर करा दी...
    आपकी यह पोस्ट भी वाक़ई बहुत प्यारी लगी...

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  21. अच्‍छी जानकारी मिली आपकी पोस्‍ट से ..

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  22. यह गाँव भी हमारे गांव जैसा है, फ़र्क इतना है कि यहाँ के लोग नेक टाई लगा कर कुत्ते को घुमाने निकलते है और हमारे यहाँ बुधराम काका बैक टाई लगा कर :)

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  23. आपकी यह प्रस्तुति कल के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें

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  24. आबो हवा में सभी गाँव एक जैसे होते हैं। हालाँकि , मौसम का फर्क तो होता है। महीने में दो दिन के लिए शहर से दूर जाना काफी तारो ताजगी प्रदान करता है। बढ़िया रही ये सैर।

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  25. आपके यात्रा वृत्तान्त तो वैसे भी जीवंत होते हैं.. यह तो प्रकृति के सान्निध्य में रही.. बहुत ही सुन्दर!!

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  26. जीवंत यात्रा विवरण...

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  27. सुंदर दृश्यावली ... घरों की कतार तो भारत के गांवों जैसी ही लगी।

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  28. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    नवसम्वत्सर-२०७० की हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकार करें!

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  29. असली संस्कृति और प्रकृति की झलक गाँवों में ही मिलती है ,शहर तो सब एक जैसे. -साथ की फ़ोटोग्राफ़ी सारा-कुछ सामने ला देती है.देश-दशान्तरों का आभास आपकी कलम से बहुत भाता है. आभार!

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  30. नगर व्यस्तता में पिरे हुये हैं, जीवन की असली झाँकी गाँवों में ही है।

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  31. मेरी बड़ी इच्छा रही है कि यूरोप के गाँवों में कुछ दिन बिता़ सकूँ. लगता है आज वह् कसक जाती रही. बहुत सुंदर यात्रा व्रितांत. "परन्तु प्रकृति की महत्ता और उसका सुकून आज भी संजीवनी की तरह है जो संरक्षण ही नहीं देती बल्कि चलती साँसों का शुद्धिकरण भी कर देती है।" शत् प्रतिशत सहमत.
    बहुत दिनों से ब्लागोन पर नहीं जां पा रहा था. चेन्नई (यहाँ पिछले दो माह हो गए) में blogspot.in/com मिल ही नहीं रहा है. आज कुछ इनायत हो गयी है. "परन्तु प्रकृति की महत्ता और उसका सुकून आज भी उसके लिए संजीवनी की तरह है जो उसे संरक्षण ही नहीं देती बल्कि उसकी चलती साँसों का शुद्धिकरण भी कर देती है।" नव वर्ष मंगलमय हो.

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  32. इन गाँवों में आज भी दिखती है वो अंग्रेजी संस्कृति जो शहरों में पूरी तरह नदारद है। "बिबरी " की संकरी सडकों पर चलती पुरानी मॉडल की महंगी कारें, उनमें सजे धजे बैठे वृद्ध जोड़े और यहाँ तक कि पालतू कुत्तों को घुमाने के लिए भी सूट , बूट और टाई लगाकर बेहद कायदे से निकले वहां के नागरिक, जो कुत्तों द्वारा त्याग किया गया मल साथ लाये प्लास्टिक के थेली में उठा रहे थे और जिसे बाद में वह निर्धारित जगह पर फेंकेंगे, इस बात का संकेत दे रहे थे कि दुनिया में कहीं अगर डिप्लोमेसी और सफैस्टीकेशन की परिभाषा पूछी जाए तो अंग्रेजों का आज भी कोई सानी नहीं। यह और बात है कि अब इनकी भी यह संस्कृति सिर्फ इन गाँवों में ही देखने को मिलती है, शहर तथाकथित रूप से मॉडर्न या कहूँ कि गंदे हो चले हैं।

    विदेश में भी अच्छे लोग सभ्यता और संस्कृति की मिशाल बन जीते हैं जो मील के पत्थर हैं चाहे वो शहर में हों या सुदूर गावों में तो गन्दगी भी कहीं न कहीं दिखलाई देती है

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  33. रोमांचक रही यात्रा

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  34. हमारे गाँव कब इतने स्वच्छ और समृद्ध होंगे?

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  35. शिखा जी सच्चे सुख तो गाँव में ही मिलते हैं...

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  36. शहरी व्यस्तता से हटकर लन्दन के गांव की सुकून भरी सैर मन को कितना आनंदित करती होगी इसमें संशय नहीं हो सकता. चित्र बहुत सुंदर और वहाँ की झलक पेश करते हैं.

    नवसंवत्सर की शुभकामनाएँ.

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  37. अच्छा वर्णन किया है आपने गाँव का

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  38. Very well written.You can relax only in village.
    Recently I have written a about http://kent darshaniya kent.
    Please visit Unwarat.com read enjoy & give your comments.
    vinnie

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