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Wednesday, 2 January 2013

कितना जरुरी है डर...

 हम बचपन से सुनते आये हैं " डर के आगे जीत है " , जो डर गया समझो मर गया " वगैरह वगैरह। परन्तु सचाई एक यह भी है कि कुछ भी हो, व्यवस्था और सुकून बनाये रखने के लिए डर बेहद जरूरी है। घर हो या समाज जब तक डर नहीं होता कोई भी व्यवस्था सुचारू रूप से नहीं चल सकती। घर में बच्चे को माता - पिता  का डर न हो तो वह होश संभालते ही चोर बन जाए, स्कूल में अध्यापकों का डर न हो तो अनपढ़ - गंवार रह जाए, धर्म - समाज का डर न हो तो न परिवार बचें, न ही सभ्यता। और अगर कानून का डर न हो, तो जो होता है , वह आजकल हम देख ही रहे हैं। यानि इतनी अव्यवस्था और अपराध हो जाएँ की जीना मुश्किल हो जाए। 
पता नहीं हमारे समाज में कानून या सजा का कभी डर था या नहीं परन्तु पिछले कुछ समय की घटनाओं को देखकर तो लगने लगा है कि हमाँरे भारतीय समाज में न तो कानून रह गया है न ही कानून के रखवालों का कोई भय . यही कारण है कि घिनोने से घिनोने अपराध बढ़ते जा रहे हैं और उनका कोई भी समाधान सामने दिखाई नहीं पड़ता। पिछले दिनों बर्बरता की परकाष्ठा पर हुए दामिनी केस ने सबके दिलों को हिला कर रख दिया। अरसे बाद जनता जागी, उसे एहसास हुआ कि अब व्यवस्था पर भरोसा रखकर बैठे रहने से कुछ नहीं होगा और शुरू हुआ आन्दोलन, परन्तु जैसे समाज दो भागों में बट चूका है एक वो, जो इंसान हैं, जिनके दिलों में धड़कन है , संवेदना है , जो परेशान हैं व्यवस्था से , उसके कार्यकलापों से और उसे बदलना चाहते, पर मजबूर हैं ,कुछ नहीं कर पाते। दुसरे वह, जो हैं तो व्यवस्था के संरक्षक पर जैसे साथ अपराधियों के हैं। उनपर किसी भी बात का कोई असर नहीं होता, इतने हो- हल्ले के बाद भी लगातार ऐसे ही घिनोने , हैवानियत भरे  और गंभीर अपराधों की ख़बरें आती रहती हैं। जैसे अपराधी एलान कर देना चाहते हैं कि " लो कर लो , क्या कर लोगे ". समाज से कानून और सजा का डर बिलकुल ख़तम हो चूका है, अपराधी खुले सांडों की तरह मूंह खोले घुमते रहते हैं और निर्मम अपराध अपने चरम पर हैं।

आखिर इस अव्यवस्था की वजह क्या है ? जबाब बहुत से हो सकते हैं। तर्क , कुतर्क भी अनगिनत किये जा रहे हैं। परन्तु मूल में जो बात है वह यही कि हममें से हर कोई सिर्फ अपने काम को छोड़कर बाकि हर एक के काम में टांग अड़ाता नजर आता है। एक केस को लेकर जागृति  होती है तो आवाजें आने लगती हैं कि  ..इसपर हल्ला क्यों ? उसपर क्यों नहीं किया था ..गोया कि अगर पिछले अपराधों पर गलती की गई तो आगे भी नहीं सुधारी जानी चाहिए। उसको छोड़ा तो इसे भी छोडो। 

हम खुद अपने गिरेवान में झाँकने की बजाय बाकी सब पर बड़े आराम से उंगली उठा देते हैं।  कितना सुगम होता यदि हर कोई सिर्फ अपना काम ईमानदारी से करता और दुसरे को उसका करने देता फिर चाहे वो कोई लेखक हो, पुलिसवाला हो , वकील हो , जज हो,मीडिया हो या फिर सरकार .
कहने को हमारे समाज में हर बुराई और अपराध का ठीकरा संस्कृति पर फोड़ दिया जाता है, उसे पश्चिमी समाज का दुष्प्रभाव कह दिया जाता है। चलिए मान लिया कि पश्च्मि समाज में संस्कृति नहीं। पर यह बात फिर मेरी मान लीजिये की व्यवस्था तो है। कम से कम हर इंसान अपना काम तो करता है। 
यहाँ अपराध किसी भी स्तर का हो, माफ़ नहीं किया जाता, बेशक सजा उसकी कुछ भी हो पर होती अवश्य है। बात नो पार्किंग में कार पार्क करने की हो, बिना लाइसेंस के गाडी चलाने जैसी साधारण अपराधों की हो या नागरिक अधिकार के हनन वाली पत्रकारिता जैसे गंभीर और बड़े अपराधों की, न तो आम आदमी को बख्शा जाता है न ही ख़ास को। और सजा भी ऐसी प्रभावी और तुरंत दी जाती है कि सजा याफ्ता वह गुनाह दुबारा करने की सोचे भी नहीं , और दूसरा भी जो उसे सुने उसकी वह जुर्म करने की कभी हिम्मत न हो।

अभी फिलहाल का ही एक उदाहरण याद आ रहा है - एक रात करीब डेढ़ बजे दरवाजे की घंटियाँ जोर जोर से बजीं। देखा तो 2-3 पुलिस की गाड़ियां बाहर खड़ीं थीं और 6-7 जवान दनदनाते घर में घुसे की हमें आपके बागीचे में जाना है। हमने बगीचे का गेट खोला उन्होंने जल्दी जल्दी सब तरफ देखा और हमें "थैंक्स , सॉरी तो डिस्टर्ब यू" कहते चलते बने। हमने बाहर जाकर पूछा तो सिर्फ इतना बताया गया कि किसी अपराधी का पीछा कर रहे हैं जो लोगों के घरों में बागीचे के रास्ते भागता , छिपता घूम रहा है। करीब 10 मिनट बाद फिर एक पुलिस अफसर आया यह कहने कि आपका नाम और फ़ोन नंबर दे दीजिये। पीछा करने में आपके गेरेज का दरवाजा हमसे टूट गया है उसकी जिम्मेदारी हमारी है और हम इतनी रात को आपको डिस्टर्ब करने के लिए माफी चाहते हैं।पता चला कि कुछ लोगों के आपस के किसी झगड़े के तहत कोई साधारण गुंडा था जिसे उन्होंने पकड़ लिया था,और उसी के लिए इतना सब था, और अगर जरूरत पड़ती तो हेलीकाप्टर भी बुलाया जाता पर उसे छोड़ा नहीं जाता।
उसके बाद का काम कानून का है कि क्या सजा उसे हो , फिर कोर्ट का, कि सजा सुनाये, बेशक सजा कुछ भी हो परन्तु होगी जरूर और शायद यही व्यवस्था का मुख्य कारण है।

थोड़ी ही देर में इलाका शांत हो गया पर रह गया मेरे ज़हन में एक सवाल, कि अगर यही भारत में होता तो क्या होता ? वह गुंडा पकड़ा जाता या नहीं वह तो अलग बात थी, परन्तु जिन घरों के बागीचों से होकर वह भागा या छिपा, उन घरवालों का पुलिस क्या हाल करती। मतलब कि यह पुलिस का डर अपराधी के लिए नहीं, बल्कि बेचारे उन निर्दोष घरवालों के लिए होता।
यानि  हमारे समाज में भी डर तो है पर शायद गलत जगह, और सही लोगों के लिए है।

हालाँकि ऐसा नहीं है कि इन बाहरी देशों में कोई अपराध ही नहीं होते। होते हैं और गंभीरतम भी होते हैं। परन्तु  यह हर नागरिक जानता है कि कानून के खिलाफ कुछ भी किया तो उसे बख्शा किसी कीमत पर नहीं जाएगा और यही डर अपराधी मनोवृति को काफी कुछ काबू में रखता है, आम नागरिकों को कानून पर और उसके रखवालों पर विश्वास बना रहता है और उसे अपनी सुरक्षा के मूल अधिकार लेने के लिए अपने काम छोड़कर घड़ी घड़ी सड़कों पर आन्दोलन के लिए नहीं उतरना पड़ता।

41 comments:

  1. हमारे समाज की सबसे बड़ी समस्या है "अपनी अपनी ढपली अपना अपना राग " . हम समस्या के मूल में जाकर उसे ख़तम करने की नहीं सोचते बस हवाई किले बनाते रहते है और टांग खिचाई में सारी उर्जा खर्च कर डालते है .कानून का डर समाज में समरसता का कारक भी होता है . कार्यपालिका और न्यायपालिका के बारे में क्या कहे. सर्व विदित है . आपने नब्ज पर हाथ रखा है.

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  2. सही है, भय बिनु होहिं न प्रीति!

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  3. sahi kaha aapne yadi pulis ka sahyog ho to apradhon par niyantran paya ja sakta hai

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  4. सटीक बात कही शिखा....
    हमारे देश का कानून तो सुधरों को डराने के लिए है....और जिन्हें डरना चाहिए वे ही तो व्यवस्था सम्हाले हुए हैं....सैंयां भये कोतवाल तो डर काहे का...

    अनु

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  5. बहुत सच कहा है..जब तक क़ानून, व्यवस्था का डर नहीं होगा, कुछ नहीं होगा..

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  6. जरूरी पोस्ट..हम पाश्चात्य संस्कृति की निंदा करते नहीं अघाते लेकिन वहाँ की व्यवस्था से कुछ सबक नहीं सीखना चाहते। व्यवस्था के चौराहे पर हम न पुर्विया हुए न पछुए बस त्रिंशकु की तरह भकुआए खड़े हैं।

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  7. ये हेलिकोप्टर वाला तो मैंने लाइव देखा है!!! पकड़ के ही माने थे पुलिस वाले !!!

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    1. लास्ट इयर की ही बात है, ये फिनिक्स में देखा था | आधी रात के आसपास अचानक से हेलोकोप्टर की आवाज़ आने लगी, बाहर जाकर देखा तो पुलिस सर्चलाईट डाल रही थी और सरेंडर करने के लिए अनाउन्स्मेंट कर रही थी | आखिर में पकड़ कर ही माने थे |

      सड़कों पर भी कार चलाते हुए डर बना रहता था कि कहीं कोप छुप के ना बैठा हो पकड़ने के लिए , अगर ओवरस्पीडिंग की तो | एक बार एक लाईट पर एक कार ने बहुत जोर से ओवरटेक किया था , दो लाईट बाद ही पुलिस वालों ने कार को रोक रखा था | ट्रैफिक अपने आप कंट्रोल में रहता है |

      पकड़े जाने का डर भी है और जो फाइन लगता है वो लोगो कि कमर तोड़ देता है | दिल्ली कांड जिस बस में हुआ वो कुछ महीने पहले ही अवैध लाइसेंस के लिए पकड़ी गयी थी, और मात्र २२०० रुपये के हर्जाने पर छूट गयी थी |

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    2. फाइन कमर तोड़ देता है इसलिए अक्ल ठिकाने रहती है :)
      शुक्रिया अपने अनुभव बांटने का देवांशु.

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  8. देश और विदेश का अंतर हमेशा ही रहेगा .....

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  9.  सुधार होगा मानसिकता को बदलने से , कानून सिर्फ सही व्यक्ति को डराता है , जो गलत है वो तो वर्तमान व्यवस्था के अन्दर कानून की धज्जी उड़ा देता है । बात सही है .... पाश्चात संस्कृति को अपना सब रहे हैं पर उसके अच्छे रूप को नहीं , अपनी कमियों को ढँकने के लिए उसकी हर प्रकार से निन्दा करना नहीं भूलते हम ।

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    1. डर का होना ज़रूरी है और मेरा भी वही कहना है जो यहाँ नीता आंटी ने कहा है।

      सादर

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  10. सच है, पश्चिमी देशों की प्रगति में एक बड़ा हाथ वहाँ के सुशासन का है।

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  11. दिन-रात देखते हैं हम - अपराधियों के साथ बड़ी मानवीयता का व्यवहार ,उनके सुरक्षित हैं सारे अधिकार.
    पीड़ित हर तरह से लाचार और वंचित, निरपराध है तो उन्हें पालने को टैक्स भरने को रहे तैयार !

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  12. आपसे सहमत हूँ शिखा की दूसरों की संस्कृति के बारे में हम बहुत बात कर लेते हैं , मगर अपनी और से आँखें मूंदें है कि हमने अपने देश का क्या हाल कर दिया !!

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  13. मैं जब अमेरिका गयी थी, तब वहां से लौटने के बाद यही कहा था और आज तक कहती हूं कि वहाँ प्रशासन का डर मन में बसा है और हमारे यहाँ डर ही नहीं है। वहां राष्‍ट्र निर्माण में जनता की भागीदारी है, वे अपना टेक्‍स देते हैं और इसके बाद अपनी सुरक्षा की गारण्‍टी चाहते हैं। भारत में हम टेक्‍स देना नहीं चाहते इसलिए सुरक्षा की बात भी जोर देकर नहीं कह पाते। अब नयी पीढ़ी निकलकर बाहर आ रही है, यह शुभ संकेत है।

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  14. डराया न जाए तो वे लोग भी अपराध करने लगेंगे जो ऐसा करने से केवल इसलिए बचते हैं कि उन्हें डाँट का भय हो। सचमुच हमें अपना दंड विधान सख्त करने की जरूरत है लेकिन उससे भी अधिक यह कि हम न्यायपालिका की गतिविधियों को तेज करें, इतना सुस्त अगर काम होगा तो कैसे अपराध नहीं पनपेंगे।

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  15. कानून का भय होना ही चाहिए मगर गुंडों को न कि पीड़ितों को ....हमारे देश में में पुलिस को ट्रेनिंग की आवश्यकता अधिक है !
    मंगल कामनाएं आपके लिए !

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  16. कानून अपने देश मे इतनी बुरी दशा मे इस लिए है क्योंकि अपने देश मे कानून बनाने वाले ही सब से पहले कानून तोड़ते हैं।

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  17. पाश्चात्य संस्कृति का दुष्प्रभाव तो हो सकता है पर उसके अच्छे प्रभाव को बुरा कहना या हर बात उसी पे डाल के अपनी पीठ झाड़ लेना उचित नहीं ... वो व्यवस्था वेदेशी देशों ने अपनाई है हम उसके कुछ भी करीब नहीं ... क़ानून व्यवस्था, न्याय ओर जो उनकी संस्कृति है उसके अनुसार वो चलते हैं ओर इम्नान्दारी से चलने की कोशिश करते हैं ...

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  18. viksit aur vikassheel desh me antar to rahega... aur fir desh ki jansakhya w jo soch andar jam chuki hai.. usko badalna bhi bahut dikkat hai...
    par fir bhi din dur nahi hai...
    ek aur bethareen post..
    happy new year!!

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  19. मनुष्य एक ही डर से डरता है , मौत के डर से। और यह डर मुजरिमों को कानून ही दे सकता है। विदेशों में कानून का पालन सख्ताई से किया जाता है जबकि यहाँ कानून का मजाक उड़ाया जाता है।
    लेकिन आपने सही कहा, यहाँ सिर्फ शरीफ ही कानून से डरते हैं।

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  20. विचारणीय पोस्ट
    क़ानून का खौफ बहुत मायने रखता है -यहाँ तो हौसला बुलंद अपराधी क़ानून की धज्जियां उड़ा देते हैं -
    कारण कि कम ही क़ानून को सख्ती से लागू किया जाता है !

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  21. अनुशासन के लिये प्रशासन और प्रशासन के लिये विवेकसम्मत दण्डविधान ....समाज की सुव्यवस्था के लिये आवश्यक है यह। थोड़ा विषयांतर करना चाहूँगा आर्यपुत्री! भारत का ब्रिटिशकालीन इतिहास उनकी अन्यायमूलक न्यायव्यवस्था और दमन की घटनाओं से परिपूर्ण है। उनके उत्तरवर्ती शासकों(मैं शासक ही कहूँगा, लोकतंत्र कहकर लोकतंत्र का परिहास करने की धूर्तता नहीं करूँगा)ने ब्रिटिशर्स से उनकी सारी बुराइयाँ लेकर बड़े गर्व से ग्रहण कीं। और न केवल ग्रहण कीं अपितु उन बुराइयों को ही चरम तक पहुँचाने का सफल प्रयास किया। समझने की बात यह है कि वे विदेशी थे हुकूमत के लिये आये थे ...व्यापार और लूट के लिये आये थे। उन्होंने लूटधर्म का पालन किया। भारतीय हुक्मरान तो व्यवस्था बनाने और स्वशासन देने के लिये आये थे, क्या दिया? एक शर्मनाक अव्यवस्था की परम्परा.... जिसकी जड़ें इतनी मज़बूत हो गयी हैं कि अब कोई बड़ी क्रांति ही इनका उन्मूलन कर सकेगी। यह क्रांति भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की क्रांति से भी बड़ी और दुष्कर होगी। आज़ादी के बाद लोग बदले व्यवस्था और तरीके नहीं। पुलिस का तौर-तरीका वही रहा ...दमनात्मक। अधिकारी स्वयं को किसी हुक्मरान से कम नहीं समझते, हर व्यक्ति के अंतर्मन में एक स्वछन्द राजा बैठा हुआ है जो अपनी पूरी क्षमता और शक्ति से समाज में दमनचक्र चला रहा है। निहत्थों पर लाठीचार्ज ...यहाँ तक कि गोलीकाण्ड तक स्वतंत्र भारत में किया जाना व्यवस्था का स्वीकृत भाग बन चुका है। हम हर बार क्रांति की आशा करते हैं किंतु चुनाव के परिणाम हमें निराश करते हैं। वे ही चेहरे हर बार नया मेक अप करके आ जाते हैं। आम आदमी के अन्दर अभी तक आग नहीं लग पायी है। कोऊ नृप होहि हमैं का हानी ...को अपनी बुज़ादिली की ढाल बना लिया है लोगों ने।

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  22. अन्तर बस यही है, हम बड़े बड़े काण्डों को नजर अन्दाज कर देते हैं, वे छोटी छोटी बातों को सहेज कर रखते हैं।

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  23. " मेरा मकसद अपने देश की बुराई करने का बिलकुल नहीं था परन्तु हमारी पुलिस से डर आम आदमियों को ही लगता है , अपराधियों को नहीं ......

    http://amit-nivedit.blogspot.in/2013/01/blog-post_3.html

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  24. भय बिन होत न प्रीत

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  25. अनुशासन और सशक्त प्रशासन के पीछे शिक्षा का एक बड़ा योगदान है.. लोकतंत्र वैसे भी शिक्षित राष्ट्र में ही प्रभावी है.. वरना अशिक्षा कभी जाति के नाम पर या कभी धर्म के नाम पर अपना रहनुमा चुनती है न कि उनके विकास कार्यक्रमों के आधार पर..
    अब तो न्यायाधीशों की नियुक्ति भी समीकरण के आधार पर की जाने लगी है.. ऐसे में अपनी हर जायज़ माँग के लिए बस गुहार लगानी पडती है!!

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  26. क़ानून सख्त,एवं त्वरित हो,देश में क़ानून प्रक्रिया इतनी धीमी है जिसके कारण अपराधी
    गवाह को तोड़ कर बच निकलते है,,,

    recent post: किस्मत हिन्दुस्तान की,

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  27. एक आदमी को पकड़ने के लिये इत्ते पुलिस वाले। लगता है वहां पुलिस से चोर बिल्कुल डरते नहीं। भारत में पुलिस तो इंसपेक्टर मातादीन के फ़ार्मूले पर काम करती है।

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  28. तुम्हारी बातसे पूरी तरह सहमत हूँ...जब तक क़ानून कड़ा रुख नहीं अपनाएगा ....इस देश में जुर्म का अंत नहीं होगा......कनाडा में शराब पीकर गाडी चलने की इतनी सख्त सज़ा है ...की लोग कैब करके जाना पसंद करते हैं पर पीकर गाडी चलने से रूह कांपती हैं उनकी ....लेकिन यहाँ .....'व्हेर इज द कैट ' वाली तर्ज़ पर लोग जीते हैं...और कानून को धता बताते हैं .......

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  29. yaha police hi apradhi aur unke aaka se darti hai...incredible india.

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  30. मानवीय सुखाकारी के लिए
    मानव-केन्द्रित क़ानून।

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  31. ब्रिटिश सत्ता से मुक्ति में लगे,200 साल.ब्रिटिश पोलिश और उनके द्वारा स्थापित न्यायप्रणाली से मुक्ति अभी बाकी है.आजादी अभी अधूरी है.

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  32. आर्थिक नीतियों में तो अमेरिका की ही नकल हो रही है यहां....यहां का अजीब सामाजिक मिजाज जाने बिना और गरीबी,कुशासन,भ्रष्‍टाचार के मामले में हम औरों के लिए सीख बन रहे हैं।

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  33. कानून तो बना दिये जाते हैं लेकिन उनका पालन सख्ती से नहीं होता ... और हो भी कैसे जब कितने ही अपराधी संसद में बैठे हों .... पुलिस स्वतंत्र नहीं है ... सरकार का दबाव बना रहता है , जो पकड़े भी जाते हैं वो छूट जाते हैं ... यदि मन में सज़ा का डर हो तभी शायद कुछ सुधार हो .... सार्थक लेख ।

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  34. निरकुंश सत्‍ता इसकी वजह हैं

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