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Saturday, 10 November 2012

ये आंसू मेरे दिल की जुबान हैं...




आँखों में ये खारा पानी कहाँ से आता है किस कैमिकल लोचे से यह होता है,सबसे पहले किसकी आँख में यह लोचा हुआ और क्यों ? और कब इसे एक इमोशन से जोड़ दिया गया,और कब एक स्त्रियोचित गुण बना दिया गया,यह सब हमें नहीं मालूम। हाँ इतना जरूर मालूम है कि, काफी समय से इस पर महिलाओं की मोनोपोली रही है। मर्दों के लिए यह लगभग पुरुषत्व की अवमानना और शर्म का विषय रहा है . जहाँ पुरुष अपनी उफनती भावनाओं को इन आंसुओं के रास्ते बहा देने के लिए किसी एकांत को ढूंढते हैं और एकांत में बड़ा हिचकते हुए, अपने अहम् को पीछे धकेलते हुए इस काम को अंजाम देते हैं,अपने करीबी से करीबी मित्र के कंधे पर भी वह रोना गवारा नहीं करते। वहीँ महिलायें बड़े गर्व से इन्हें हर सुख दुःख में किसी भी मित्र के सहानुभूति पूर्ण कंधे पर बहा कर तृप्त हो लेती हैं।।इसके लिए न तो उन्हें किसी एकांत की जरुरत होती है, न ही किसी अहम् नाशक तत्व की। यहाँ तक कि वो तो इसे एक आभूषण समझती हैं जो उनकी भावात्मक अभिव्यक्ति को और प्रभावी बना देता है और कभी -कभी एक अचूक औजार भी, जहाँ कोई और नुस्खा न चले वहां आज़मा लिया ज्यादातर सफलता मिल ही जाती है।और शायद महिलाओं के इसी एक  गुण या अस्त्र से पुरुष समाज थोड़ा घबराता है। हिंदी फिल्मो में भी "मैं तुम्हें रोता हुआ नहीं देख सकता" या "तुम जानती हो तुम्हारे आँसू मुझे कमजोर बना देते हैं " जैसे संवाद आम तौर पर पाए जाते हैं।  इससे बचने के लिए एक मुहावरा भी ईजाद कर लिया गया - घडियाली आँसू  ...पर इसका भी कुछ खास असर नहीं हुआ और आँसुओं पर महिलाओं का वर्चस्व बना रहा। 

परन्तु अब सदियों बाद लग रहा है कि इस पर से महिलाओं की मोनोपोली ख़त्म होने वाली है। विश्व के सबसे ताक़तवर देश के सबसे ताक़तवर इंसान ने अपनी ख़ुशी में सबके सामने आंसू बहाकर पुरुषों के लिए भी यह रास्ता खोल दिया है। जी हाँ जब अमरीका का राष्ट्रपति अपनी भावनाओं के उबाल को आँखों के इस खारे पानी के माध्यम से जाहिर कर सकता है तो किसकी मजाल जो कहे कि यह काम मर्दों का नहीं। बल्कि उन्होंने सिद्ध कर दिया कि राष्ट्रपति के लिए भी यह गुण होना एक सकारात्मक तत्व है न कि नकारात्मक। आज के दौर में एक संवेदनशील, भावात्मक और कोमल ह्रदय नेता को जनता ज्यादा पसंद करती है।और उन्हें अपनी भावनाओं को दबाना नहीं चाहिए। 

याद कीजिये इतिहास में कितने ही ऐसे महापुरुष हुए जो सार्वजनिक तौर पर भी अपनी गीली आँखें नहीं छुपाते थे, नेहरु को लता मंगेशकर के "ए मेरे वतन के लोगो " गीत पर आंसुओं के साथ देखा गया, तो राणा प्रताप को चेतक के लिए,2006 में अपने आखिरी प्रोफेशनल खेल की समाप्ति पर आंद्रेय अगासी हारने के वावजूद दर्शकों के खड़े होकर उनके लिए ताली बजाने पर रो पड़े थे। और जोर्ज वाशिंगटन भी राष्ट्रपतिपद की शपथ लेने के बाद अपने आंसू पोंछते देखे गए थे। 

तो रोना पुरुषार्थ को कम नहीं करता बल्कि उसे बढाता है, उसे महापुरुष बनाता है .पुरषों को अपने आंसुओं को ज़ब्त करने की अब कोई जरुरत नहीं। कोई जरुरी नहीं कि दुखों का पहाड़ टूटे तभी एक पुरुष को रोना चाहिए। एक इंसान को और एक अच्छे इंसान को अगर रोना आये तो जरुर रो लेना चाहिए बेशक आप विश्व के सबसे ताक़तवर व्यक्ति ही क्यों न हों।

39 comments:

  1. Replies
    1. शिखा जी,आपकी एक सुंदर सी रचना हैं ,पर मैं मैं कहना चाहूँगा की जब दिल आये रो लेना चाहिए ....मन हल्का हों जाता हैं .....
      कमेन्ट पोस्ट करने में दिक्कत आ रहीं थी इसलिए बन्दना जी को रिप्लाई करने के द्वारा पोस्ट किया है,

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  2. ओबामा बुक्का फाड़ के रोये की नहीं ? अगर नहीं तो उन्हें ऐसा करना चाहिए काहेकी संवेदन शीलता तब चरमस्थिति को प्राप्त होती . मजाक से इतर ये की आंसू पुरुष और स्त्री में विभेद नहीं करते है . हाँ , बस उनके निकास की आवृति और कारकों में भेद हो सकता है .

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  3. हॉस्टल में कॉलेज के आखिरी दिन दारू-पार्टी की जाती है कि चलो एन्जॉय करते हैं, पर जो रुदन-समारोह होता है | पूछो मत आप | न जाने कहाँ कहाँ की बात पर रोते हैं | लड़की की विदाई का सीन फेल हो जाये इनके आगे :) :)

    बाकी हंसने-रोने पर कोई बंदिश नहीं होनी चाहिए !!!! जब मर्जी तब शुरू हो जाओ :)

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  4. आँसू नहीं होते तो हम सभी पूरे पागल ही रहते ..आंशिक रूप से तो हैं ही .

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  5. ओबामा बुक्का फाड़ के रोये की नहीं ? अगर नहीं तो उन्हें ऐसा करना चाहिए काहेकी संवेदन शीलता तब चरमस्थिति को प्राप्त होती . मजाक से इतर ये की आंसू पुरुष और स्त्री में विभेद नहीं करते है . हाँ , बस उनके निकास की आवृति और कारकों में भेद हो सकता है .
    TOTALY AGREED WITH ASHIS BHAI SAHAB.
    ANY HOW NICE POST

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  6. सच,किसी को अब आंसू छिपाने की ज़रूरत नहीं

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  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (11-11-2012) के चर्चा मंच-1060 (मुहब्बत का सूरज) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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  8. मैंने बहुत पहले एक स्टेटस डाला था , आज उसे आपके इस लेख पर पुनः टिप्पणी के रूप में लिख रहा हूँ :

    "ए.सी. के आउटलेट से पानी टपकने का अर्थ है ,ए.सी. ठीक तरह से कार्य कर रहा है | कार के साइलेंसर ( एक्जास्ट मेनिफोल्ड ) से पानी टपकने का अर्थ है ,इंजन भली भांति कार्य कर रहा है और आँखों से आंसू टपकने का अर्थ है ,दिल अच्छी तरह से कार्य कर रहा है |"

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  9. आँसू तो भावनाओं का ही दूसरा नाम है .... अच्छी या बुरी । मेरा यह निश्चित तौर पर मानना है कि स्त्री व पुरुष दोनो में लगभग समान संवेदना होती है , सिर्फ अभिव्यक्ति का रूप भिन्न होता है । वैसे अतिश्योक्ति तो सर्वत्र पाई जाती है .... क्या स्त्री , क्या पुरूष ।
    बधाई आपको कि इस विषय की चर्चा करके इसे इतना महत्वपूर्ण बना दिया ।
    सादर , नीता .

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  10. एक इंसान को और एक अच्छे इंसान को अगर रोना आये तो जरुर रो लेना चाहिए बेशक आप विश्व के सबसे ताक़तवर व्यक्ति ही क्यों न हों।

    बिलकुल सही कहा ..... सार्थक लेख

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  11. मैं तो कॉमेडी सीरियल देखते हुए भी रोता हूं।

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  12. Diwali kee anant shubh kamnayen!

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  13. शिखा जी बहुत ही अलग ढंग की जानकारी के लिए आभार |दीपावली की शुभकामनायें |शायर एहतराम इस्लाम का एक शेर -दीवाली पे घर -घर दिए मुस्कुराये /मगर तुम न मेरे लिए मुस्कुराये |

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  14. मेरे लिए तो ये विषय बहुत ही सटीक तौर पर लागू होता है... ऑफिस में कोई वृद्ध ग्राहक आशीर्वाद के लिए सिर पर हाथ रख दे तो आंसू निकल जाते हैं.. कई बार तो कुछ छू लेने वाली पोस्ट पढकर भी आँखें गीली हो जाती हैं!!
    इस पोस्ट के लिए ख़ास तौर पर धन्यवाद!! हाँ, इसका मतलब ये नहीं कि मैं स्वयं को महापुरुषों की श्रेणी में रखने जा रहा हूँ!! :)

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  15. आंसूं किसी भी की कमजोरी की निशानी नहीं है बल्कि उसके संवेदनशील होने का प्रतीक है। ये सिर्फ नारी के एकाधिकार वाली चीज नहीं है पुरुष के लिए भी ये उतने अधिकार वाली चीज है बशर्ते की वह उतने ही संवेदनशील हों।

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  16. आँसूं की अपनी ही भाषा और ज़ज़्बात होते है


    दीवाली की बहुत बहुत शुभकामनाएँ

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  17. क्या बात है.... मुझे लगता है कि महिलाएं कमज़ोर दिल की वजह से नहीं, बल्कि अपनी असहाय स्थिति के काराण जल्दी रोती हैं. महिलायें अगर पुरुषों के क्षेत्र में दखल दे सकती हैं, तो भाई पुरुषों को भी उनकी मोनोपॉली तोड़ने का हक है :)

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  18. आंसू दिल की जुबान होते हैं, आपसे पूर्णतः सहमत हूँ ... दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं...

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  19. आखिर ओबामा को रो कर अपनी पत्नी मिशेल का भी
    तो "thanks giving" अदा करना था।
    वैसे मर्दों को महिलाएं ही मना करती है रोने को,
    "आप ही अगर रोओगे तो हमारा क्या होगा ...!" या फिर
    "फ़ना हो जाएगी सारी ख़ुदाई आप क्यूँ रोए ...!"
    वैसे ये आँसू स्त्रियों को पितृसत्ता की भी देन है ...नहीं
    रोने वाली स्त्री को पाषाण हृदयी मान लिया जाता है।
    देखा गया है, नकली आँसू बहाने में स्त्री-पुरुष दोनों ही
    माहिर होते हैं।

    पर यह भी सच है 'आँसू तो दिल की ज़ुबान' होते है
    और दो दिलों को कस कर बांधे रखने वाला ब्रिज भी ...!

    शिखा जी एक भरा-भरा सा और आँसू के मुताल्लिक
    कितनी ही व्यापक सामाजिक सच्चाइयों को conclude
    करता सा आलेख। थैंक्स !

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  20. दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ!

    कल 12/11/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  21. लेकिन कुछ पुरुषों में एक आदत देखी जाती है, कि वे बात-बात पर रोते हैं। कोई भी भावनात्‍मक बात हो उनका मुंह बनना शुरू हो जाता है। उनकी तरफ देखकर बात ही नहीं कर सकते। हमारे घर में भी यह रोग है।

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  22. कइसा मोनोपोली जी? आपका अस्टेट्मेंट अकदम सही नहीं कहा जा सकता काहें से कि हमारी ऊ मतबल अरधांगिनी जी त कहती हैं कि आप याने के हम याने के उनके ऊ माने पति जी त अँसुवन के मामला में त जनाना लोग को भी फेल कर दिये। भगवान जी अँखिया जवन-जवन काम के लिये दिये हैं उनमें से एगो सबसे महत्वपूरन काम है टेसुवा बहाना .....अ हमरे दिल का साइज़वये अइसा है कि तनक दिल को छूने बाला बात हुआ नहीं के छलक जाता है। का कीजियेगा ...ई त दिल का बात है।

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  23. वैज्ञानिक विषलेषणों के इतर देखें तो मुझे यह संवेदनशीलता लगती है जो कठोर से कठोर इंसान में भी समय समय पर देखने को मिलती है. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम

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  24. अँसुअन को अब बह जाने दो,
    कहते हैं जो कह जाने दो।

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  25. खुले दिल से रोना अपराध नहीं - स्त्री हो या पुरुष

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  26. mere aankho me aaanshu aa gaye:D
    deewali ki shubhkamnaaeyen...

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  27. हाल ही में ओबामा जी को रोते हुए देखा होगा आपने । भावनाओं के उद्वेग को रोकना नही बह जाने देना ही श्रेयस्कर है ।

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  28. अच्छा किया जो ओबामा रो लिये। अब वे अपने देश वालों को रुलायेंगे। :)

    वैसे आंखें गीली होने का कारण न जाने क्या-क्या होता है। खोज का विषय है।

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  29. सौ फ़ीसदी सही.जब मन में आये,रोने पे काहे का कंट्रोल,आँसू बेकार में महिलाओं के पल्ले बाँध दिये.

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  30. आपने शीर्शक बहुत ही बेहतरीन चुना....और बहुत रोचक तथ्यों के साथ आँसुओं को गरिमा प्रदान करते हुए..ओबामाइ आसुओं की चर्चा के द्वारा पुरषों को भी इसमे हिस्सेदार बना दिया....बड़ी खूबसूरती के साथ...
    बहुत ही उत्तम लेख.....वाह।

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  31. आंसू मन हल्का कर देते हैं तो इसपर सिर्फ स्त्रियों का अधिकार ही क्यों हो :)

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  32. शब्दों की जीवंत भावनाएं.सुन्दर चित्रांकन,पोस्ट दिल को छू गयी..कितने खुबसूरत जज्बात डाल दिए हैं आपने.बहुत खूब.
    बहुत सुंदर भावनायें और शब्द

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  33. आंसू भी सो मन की अभिव्यक्ति हैं...
    सार्थक आलेख...

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  34. Aapka diya hua sheershak behtar hai. Jansatta ne sambhavatah badal diya. Anyway, article is good, as if you said something new. Ansoo have got important place in poetry. Manika Mohini

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  35. सुंदर और सार्थक लेख.
    हर आंसू कायरता की पहचान नहीं होता है
    बाहर आओ एकसाथ मिलकर रोओ
    मिलकर रोने में कोई अपमान नहीं होता है.

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