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Monday, 17 September 2012

उलझा सुलझा सा कुछ...



मन की राहों की दुश्वारियां
निर्भर होती हैं उसकी अपनी ही दिशा पर
और यह दिशाएं भी हम -तुम निर्धारित नहीं करते 
ये तो होती हैं संभावनाओं की गुलाम 
ये संभावनाएं भी बनती हैं स्वयं 
देख कर हालातों का रुख 
मुड़ जाती हैं दृष्टिगत राहों पे
कुछ भी तो नहीं होता हमारे अपने हाथों में 
फिर क्यों कहते हैं कि आपकी जीवन रेखाएं 
आपके ही हाथों में निहित होती हैं.
****************************

कुछ पल छोड़ देने चाहिए यूँ ही 
तैरने को हलके होकर 
शून्य में 
मिले जहाँ बहाव ,बह चलें
क्यों जरुरी है उनका 
सही गलत निर्धारण करना
उन्हें भारी बना देना 
और करना ज़बरदस्ती,
बाँधे रखने की कोशिश।
जबकि बंध तो नहीं पाते वे फिर भी
क्योंकि मन की डोरी होती है बड़ी कच्ची 
उससे बाँध भी लें  उन पलों को 
तो रगस उसमें भी लगती है 
फिर शनै : शनै :  कोमल सी वो डोरी 
टूट जाती है कमजोर होकर. 


***************

मेरा अपना मेरा है 
उस पर हक़ भी मेरा है
क्यों हो वो तेरा,इसका, उसका 
क्यों ना मुझसे मेरा साक्षात्कार हो 
जिसपर मेरा, सिर्फ मेरा अधिकार हो .

52 comments:

  1. वाह जी, बहुत ही खूबसूरती से मन के भावों को शब्दों में पिरोकर यहाँ प्रस्तुत किया है आपने....:)

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  2. उन्मुक्त मन से उन्मुक्त रचना | लिखने से पहले ठोस मन , लिखने के बाद तरल हुआ सा लगता है |

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  3. उलझा सुलझा सा कुछ...
    दोनो कविताएं पसंद आई...
    मन प्रसन्न हुआ...
    यह देखकर की तुम्हारी जीवन की राह
    या जीवन की सोच में संभावनाएं संतुष्टि की सी...
    'हर फ़िक्र को हवाओं में अड़ाना जैसे जानो...'
    क्योंकि सच ही कहा है:
    कुछ पल छोड देने चाहिए यूं ही
    तैरने को हल्के होकर
    शून्य में...

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  4. क्यों ना मुझसे मेरा साक्षात्कार हो
    जिसपर मेरा, सिर्फ मेरा अधिकार हो ........बहुत सुन्दर ...बहुत सही भाव उभरे हैं इन पंक्तियों में

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  5. उलझे सुलझे मन की दोराहे पर , परिस्थिति जन्य मोड़ पर खुद की सोच ही कम आती है . इत्ती दार्शनिकता भर दिया , मूड पीरा गया समझने के चक्कर में . मन हल्का करते है अब .अपना साक्षात्कार पहुचे लोग ही करते है , बहुत सुन्दर

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  6. मन के साथ दिमाग बड़ी जबरदस्ती करता है। सामाजिक प्राणी होने का सबसे बड़ा बोझ ते यही बिचारा सहता है। एक गीत है...

    मन के मत से मत चलियो, बेसबरा है मरवा देगा...

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  7. man to sach me sambhavnayen hi talash karti hai..:)
    par ye sambhavnayen kahan ban pate...
    behtareen...

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  8. मन की ऐसी उलझन सुलझन से हर मन कभी न कभी दो चार होता है.....मगर अपनी नैया खेने से ये बाज नहीं आता.....धार में खुद-ब-खुद बह जाने देना इसकी फितरत में नहीं शायद ....

    अनु

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  9. कुछ भी तो नहीं होता हमारे अपने हाथों में
    फिर क्यों कहते हैं कि आपकी जीवन रेखाएं
    आपके ही हाथों में निहित होती हैं.
    बहुत सुन्दर... बढिया कवितायें हैं शिखा. बधाई.

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  10. मन के विचारों की खूबसूरत रचना

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  11. मेरा अपना मेरा है
    उस पर हक़ भी मेरा है
    क्यों हो वो तेरा,इसका, उसका
    क्यों ना मुझसे मेरा साक्षात्कार हो
    जिसपर मेरा, सिर्फ मेरा अधिकार हो .

    इसी को आत्मसाक्षात्कार कहते हें. जो अपने से अपना ही होता है .
    बहुत सुंदर भावों को व्यक्त किया है.

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  12. बहुत ही उम्दा और भावपूर्ण रचना |
    मेरी नई पोस्ट में आपका स्वागत है |
    बुलाया करो

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  13. मनकी उलझने सुलझने के लिए कहाँ होती है
    बहुत सुंदर कविता|

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  14. बहुत ही प्यारी प्रस्तुति ! बहुत सुन्दर !

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  15. उलझा सुलझा, पर प्रवाह सा।

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  16. आपकी भाषा पर पकड़ काफी अच्छी है |
    शब्दों का सुन्दर प्रयोग |

    -आकाश

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  17. देखा!! भारतवर्ष की आध्यात्मिक यात्रा के उपरांत दार्शनिकता का बोध होना स्वाभाविक है!! बहुत ही गहराई लिए!!

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  18. हर पल जीवन में कुछ न कुछ घटित होता है .... एक ही साथ खुशियाँ और परेशानियाँ दोनों ही आ जाते हैं .... सामंजस्य बैठाना ही एक मात्र उपाय रह जाता है
    ऐसे समय जो मन में भाव आते हैं उनको बहुत खूबसूरती से पिरोया है .... उलझाने हौसले के आगे अपना दम तोड़ ही देती हैं ....

    भाव प्रवण रचनाएँ

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  19. हर पल बदलता जीवन ...
    पल पल बदलता मन ...
    इक पल ठहरता मन ....
    दे जाता स्पंदन ....बस वो पल .....
    वही है जीवन ...!!भाव प्रवण....
    बहुत सुन्दर रचना .....एक सोच सी देती हुई ...!!

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  20. मेरा अपना मेरा है

    उस पर हक़ भी मेरा है
    क्यों हो वो तेरा,इसका, उसका
    क्यों ना मुझसे मेरा साक्षात्कार हो
    जिसपर मेरा, सिर्फ मेरा अधिकार हो .

    खुबसूरत मनोभाव सहज सरल कथन जो अंतरद्वन्द को प्रकट करती है.

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  21. फिर क्यों कहते हैं कि हथेली की रेखाएं ही जीवन है ...
    सोचना हो जाता है कई बार क्योंकि पढ़ा यह भी कि किस्मत तो उनकी भी होती है , जिनके हाथ नहीं होते !
    मन के बंधन जबरदस्ती नहीं बांधे जा सकते .
    जिंदगी उस दम ही लगी सबसे भली , जब जिंदगी से मैं मैं बनकर मिली !
    मन के विभिन्न आयामों की क्षणिकाएं !

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  22. क्यों ना मुझसे मेरा साक्षात्कार हो

    जिसपर मेरा, सिर्फ मेरा अधिकार हो .

    यह निचोड़ जो विस्मृत न हो तो जीवन बन जाए...


    सार्थक आत्मचिंतन व भावपूर्ण अभिव्यक्ति ....

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  23. आखिरी पंक्तियां बेहद सुंदर और सारगर्भित...

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  24. बहुत सुंदर कविता|

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  25. भावुक मन की बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति --

    कुछ पल छोड़ देने चाहिए यूं ही

    तैरने को हलके होकर

    शून्य में

    मिले जहाँ बहाव ,बह चलें |

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  26. क्यों ना मुझसे मेरा साक्षात्कार हो
    जिसपर मेरा, सिर्फ मेरा अधिकार हो .

    बेहद खूबसूरत, हृदयस्पर्शी और भावप्रवण प्रस्तुति.

    बधाई शिखा जी.

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  27. अपने आप से मिलने की चाह से बढ़कर क्या हो सकता है.... ? ऐसा साक्षात्कार निश्चित ही स्वयं की थांती होगा.....

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  28. मन को समझने के लिए मन का हो जाना होता है। और जब मन के भीतर प्रवेश करते हैं हैं तो उस अनंत से साक्षात्कार हो जाता है, फिर न कोई उलझी हुई डोर होती है न कोई बंधन ही।

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  29. दार्शनिक अंदाज़ ... पर सच ... खुद को छोड़ देना चाहिए लहर के सहारे ... कोई न कोई किनारा तक तो वो पहुंचा ही देती है ....
    कई बार खुद से मिलना जरूरी भी होता है ...

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  30. सुन्दर प्रस्तु्ति

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  31. आत्म साक्षात्कार ही सबसे बड़ा अभीष्ट है !

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  32. क्यों ना मुझसे मेरा साक्षात्कार हो
    जिसपर मेरा, सिर्फ मेरा अधिकार हो .
    bahut khoob sochne pr majboor karti hai aapki ye kavita
    rachana

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  33. मन के विचारों की खूबसूरत अभिव्यक्ति,,,,

    शिखा जी,,,,मै बहुत पहले से आपका फालोवर हूँ और आपकी पोस्ट पर आता रहता हूँ,
    आपसे अनुरोध है कि आप भी फालोवर बने तो मुझे हार्दिक खुशी होगी,,,,आभार,,,

    RECENT P0ST ,,,,, फिर मिलने का

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  34. साक्षात्कार ,वो भी खुद से खुद का और लहरों पर ....कितना मुश्किल है पर हाँ आवश्यक भी .....

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  35. बेह्तरीन अभिव्यक्ति .आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको
    और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.
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  36. मेरा अपना मेरा है
    उस पर हक़ भी मेरा है
    क्यों हो वो तेरा,इसका, उसका
    क्यों ना मुझसे मेरा साक्षात्कार हो
    जिसपर मेरा, सिर्फ मेरा अधिकार हो

    Oh my god.. thats profound... how can somebody write this beautifully.. congratz keep writing.

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  37. कल 23/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  38. interview to nahin, autograph please... :)

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  39. सुन्दर रचना

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  40. इस तरह की भावनाएं मन को जब जकड़ती हैं, तो मन उसमें उलझता चला जाता है।

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  41. मेरा अपना मेरा है

    उस पर हक़ भी मेरा है
    क्यों हो वो तेरा,इसका, उसका
    क्यों ना मुझसे मेरा साक्षात्कार हो
    जिसपर मेरा, सिर्फ मेरा अधिकार हो ....शानदार कवि‍ता

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  42. आपकी इस सुन्दर और भावपूर्ण कविता को पढकर मन की उथलपुथल को कुछ राहत महसूस हुई ।

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  43. सुंदर रचना ।

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