Enter your keyword

Friday, 13 July 2012

एक कली...

लरजती सी टहनी पर
झूल रही है एक कली
सिमटी,शरमाई सी
थोड़ी चंचल भरमाई सी  
टिक जाती है
हर एक की नज़र
हाथ बढा देते हैं
सब उसे पाने को 
पर वो नहीं खिलती
इंतज़ार करती है 
बहार के आने का
कि जब बहार आए
तो कसमसा कर 
खिल उठेगी वह 
आती है बहार भी 
खिलती है वो कली भी
पर इस हद्द तक कि 
एक एक पंखुरी झड कर 
गिर जाती है भू पर 
जुदा हो कर 
अपनी शाख से
मिल जाती है मिटटी में.
यही तो नसीब है 
एक कली का


52 comments:

  1. जीवन का यही सत्‍य है लेकिन यदि किसी कली को जबरन बिखेरदे तब यह हमारी विकृति का प्रतीक है।

    ReplyDelete
  2. सौभाग्य ही है कली का जो पूरी तरह खिल सकी ...यथा समय खुशियाँ भी बिखेर सकी ...
    क्षणभंगुर जीवन की सुंदर कहानी ....
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति ...शिखा जी ...

    ReplyDelete
  3. बहुत ही खूबसूरत भावभिव्यक्ति...:)वाकई यही तो नसीब है हर एक कली का...

    ReplyDelete
  4. kali khili ,phuli phali, bikhri hui tamam.
    mager mehek ka de gai, duniya ko inaam....

    ReplyDelete
  5. jindagi kitni chhoti hoti है naa ! isliye jitna ho sake khushiyan बिखेरते रहिये .

    ReplyDelete
  6. सुन्दर अभिव्यक्ति......

    ReplyDelete
  7. ज़िन्दगी की हकीकत बयाँ करती सुन्दर प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  8. मिट्टी से बनना और मिट्टी में मिल जाना यही जीवन है... कली का खिलना जीवन की सुन्दरता... सुन्दर भाव

    ReplyDelete
  9. jeevan ka shashwat satya... janam, fir khilkhilana, fir thora sundar dikhna... fir khatm:)
    ek baar fir se dikha diya, tumhe har vidha me maharat hasil hai.!!

    ReplyDelete
  10. सौन्दर्य का एक यथार्थ -अच्छी लगी कविता

    ReplyDelete
  11. एक भारतीय स्त्री का जीवन झलक रहा है इस कविता में... अद्भुत

    ReplyDelete
  12. क्या बात है... खूबसूरत अभिव्यक्ति...

    ReplyDelete
  13. इस से कुछ उल्टा भी होता हैं ...कुछ कलियाँ देवों को भी अर्पित की जाती हैं ...हर कली धूल में मिलने के लिए पैदा नहीं होती ......

    ReplyDelete
  14. अत्यंत सुंदर और सटीक, क्या जीवन भी कली की तरह नही होता?


    रामराम

    ReplyDelete
  15. bahut sundar rachna ............kali bhi ek sandesh de rahi hai

    ReplyDelete
  16. सत्याभिव्यक्ति.... बहुत सुंदर रचना...
    सादर।

    ReplyDelete
  17. जीवन का यथार्थ , उसकी क्षण भंगुरता , इस कली के माध्यम से ख़ूबसूरती से चित्रित किया है . आभार

    ReplyDelete
  18. जीवन का सच ...सुंदर बिम्ब लिए रचना

    ReplyDelete
  19. यथार्थवादी कविता ... यदि कुछ देवों को अर्पित होती हैं तो कुछ को पैरों तले भी मसलने का प्रयास होता है .... यह मानसिकता कहाँ और कब जा कर रुकेगी नहीं पता ...

    ReplyDelete
  20. बहुत ही सुन्दर सुकोमल कविता |

    ReplyDelete
  21. कली खिल कर फूल बनी...खुशबु फैलाई....फिर तो झरना ही था उसे....
    यही तो जीवन है....
    जी भर कर जी लिया तो फिर क्या गम....
    :-)

    अनु

    ReplyDelete
  22. कली का जीवंत चित्रण...मानो कली भी ऍम आप में ही कोई हो...बहुत सुन्दर...!!

    ReplyDelete
  23. ख़ुशबू बिखर जाए बस इतनी सी चाह है ,
    मृत्यु से बचने की कहाँ कोई राह है |

    ReplyDelete
  24. ये इस संस्कृति का, परंपरा का सत्य है। अपनी डाल से बिछड़कर दूसरे की मिट्टी में उसे (कली को) नया जीवन शुरू करना पड़ता है।

    ReplyDelete
  25. सुन्दर अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  26. Eeshwar aapkee lekhan kshamta barqaraar rakhe! Mai to likhna bhool-si gayee hun!

    ReplyDelete
  27. डूबकर जो ना देखे , वो कैसे जाने !

    ReplyDelete
  28. बहुत खूबसूरत है

    ReplyDelete
  29. आती है बहार भी
    खिलती है वो कली भी
    पर इस हद्द तक कि
    एक एक पंखुरी झड कर
    गिर जाती है भू पर

    वह आप इतना खुबसूरत लिखती भी हैं ,प्रकृति के निकट मन के भाव ..वाह

    ReplyDelete
  30. कली का छिपा सौन्दर्य बाहर आना ही है, प्रकृति सहायक है...

    ReplyDelete
  31. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (15-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

    ReplyDelete
  32. महादेवी वर्मा जी की एक कविता की याद दिला रही है, जो आठवीं कक्षा में पढ़ी थी। सुंदर....

    ReplyDelete
  33. हम सब अपना काम करते हैं और चले (बिखर) जाते हैं !
    आभार एक प्रभावशाली रचना के लिए !

    ReplyDelete
  34. नसीब अपना अपना

    ReplyDelete
  35. हमेशा की तरह सुंदर रचना पर
    यही तो नसीब है एक कली का - मेरी असहमति दर्ज करे

    ReplyDelete
  36. यही तो जीवन है..
    बहुत ही बेहतरीन रचना:-)

    ReplyDelete
  37. बहुत सुन्दर रचना. यह किस फूल की कली है, जानना चाहूँगा.

    ReplyDelete
  38. जीवन का यही तो सच है. सुंदर प्रस्तुति.

    ReplyDelete
  39. सुंदर रचना !!

    कली को खिलना
    भी तो पड़ता है
    आज नहीं तो कल
    एक फूल बनना
    भी पड़ता है
    नई कली के आने
    के लिये खाली
    करनी ही पड़ती
    है डाल !

    ReplyDelete
  40. Hi there,
    Fantastic blog post, I wish to apprentice at the same time how you amend your website.

    ReplyDelete
  41. hmesha ki traha is bar bhi aap ki kvita ka jwab nhi

    ReplyDelete
  42. जीवन के सत्य को कालि के माध्यम से लिखा है आपने .. इंसानी जीवन का सत्य भी ही तो यही है ...

    ReplyDelete
  43. सुन्दर कविता है शिखा.

    ReplyDelete
  44. पर वो नहीं खिलती
    इंतज़ार करती है
    बहार के आने का
    कि जब बहार आए

    कली खिली और फिर माटी में मिली.
    यही तो जीवन चक्र है.

    असल बात है जीवन में तो बस खिलना.

    आप का भी तो इन्तजार रहता है,मेरे ब्लॉग की
    कली को खिलने का.

    देखतें हैं बहार कब आती है.

    ReplyDelete
  45. कली के बिम्ब से एक पूरी जिंदगी का शब्द चित्र रख दिया !

    ReplyDelete
  46. बहुत अच्छी लगी आपकी यह रचना ... लरजती सी टहनी पर
    झूल रही है एक कली काफी सांगीतिक और मधुर लगी यह पंक्तियाँ

    ReplyDelete
  47. हकीकत समझाने का प्रयास।

    ReplyDelete

पसंदीदा पोस्ट्स

ईमेल से जुड़ें

संपर्क

Name

Email *

Message *