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Wednesday, 11 July 2012

कितने नैचुरल ये अननैचुरल रिश्ते.

बस काफी भरी हुई है .तभी एक जोड़ा एक बड़ी सी प्राम लेकर बस में चढ़ता है.लड़की के हाथ में एक बड़ा बेबी बैग है और उसके साथ के लड़की नुमा लड़के ने वह महँगी प्राम थामी हुई है.दोनो  प्राम को सही जगह पर टिका कर बैठ जाते हैं. प्राम में एक बच्चा सोया हुआ है खूबसूरत कम्बल से लगभग पूरा ढका हुआ. सिर्फ आँख कान मुँह ही दिख रहे हैं. तभी लड़की ने बैग खोला उसमें से इवेंट की बोतल निकाली जो आधी दूध से भरी हुई है. उसने चुपचाप बच्चे के मुँह में लगा दी और कुछ सेकेंड में ही निकाल कर बैग में रख ली , अब लड़के ने बैग खोला उसमें से एक डाइपर निकाला और बड़ी ही कुशलता से कम्बल के अन्दर ही अन्दर बदल दिया. पहला डाइपर एक थैली में रखकर बैग की पिछली जेब में रख दिया , फिर दोनों चुप चाप बैठ गए. कुछ मिनट बाद लड़की ने फिर बैग में  हाथ डाला,फिर दूध की बोतल निकाली और फिर बच्चे के मुँह में लगा दी.फिर छोटे से मोज़े निकाले और बच्चे को पहना दिए , अब लड़के ने टोपी निकाली और पहना दी.वो जोड़ा जितनी देर बस में रहा लगातार उस बच्चे के साथ उनकी यही गतिविधियाँ बारी- बारी चलती रहीं, पर बिना एक भी शब्द बोले और बच्चा भी एक दम शांत. न  जाने क्यों सब कुछ बहुत अजीब सा था फिर भी लगा कि शायद तीनी गूंगे -बहरे हैं.ये ख्याल मन में आया तो एक कुछ सहानुभूति भी हुई. फिर वह जोड़ा अगले स्टॉप पर उतर गया. उतरते ही लड़की ने बच्चे को गोद में उठा लिया और लड़का बैग को प्राम में रख चलने लगा.इत्तेफाक से हमें भी उसी जगह उतरना था.अत: तब उस बच्चे का चेहरा करीब से देख अहसास हुआ कि वह बच्चा कोई बच्चा नहीं बल्कि बच्चे के लाइफ साइज का गुड्डा है..थोड़ी देर को जहाँ खड़े थे हम वहीँ खड़े रह गए थोड़ी देर में होश आया तो समझ में आया कि क्यों वह दोनों उस बच्चे का जरुरत से अधिक ख्याल रख रहे थे.क्यों उनमें उसके काम करने की होड़ लगी हुई थी. और क्यों वह कुछ भी नहीं बोल रहे थे.ओह.. हे भगवान्  तो यह जोड़ा लिस्बियन है. उफ़ उनकी मनोदशा का अहसास वेदना से भर गया. एक बच्चे की ललक उस जोड़े में इस कदर थी कि ...और आखिर एक अप्राकृतिक रिश्ते को पूर्ण करने के लिए वे एक अप्राकृतिक बच्चा भी पाल रहे थे.वह एक तथा कथित असामान्य  जीवन जरुर जी रहे थे परन्तु अपने बच्चे को पालने के आनन्द की अनुभूति उनकी एकदम सामन्य और प्राकृतिक थी.
गर्भवती रिकी और मैरी  पोर्टास लिस्बियन बाल में।
इस बात को करीब चार साल गुजर गए .कई दिनों तक उस जोड़े के बारे में सोचती रही, उनकी घरेलू  जिन्दगी का अहसास करने की कोशिश करती रही और आखिर में बात आई गई हो गई.परन्तु कल एक समाचार पत्र में पढ़ी खबर ने जैसे फिर इस किस्से को मेरे स्मृतिपटल पर साकार कर दिया. और फिर से ना जाने कितने ही सवाल मेरे मस्तिष्क में हलचल मचाने लगे.खबर थी कि लन्दन में पहली बार आयोजित  "सिर्फ महिलाओं के लिए पॉश लिस्बियन बाल" में मैरी  पोर्टास (मैरी कुईन ऑफ शॉप ,एक अंग्रेजी व्यवसायी, खुदरा विशेषज्ञ, और प्रसारक, इन्हें  खुदरा और व्यापार से संबंधित टीवी शो, हाल ही में ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा ब्रिटेन की हाई स्ट्रीट बाजार के भविष्य पर एक समीक्षा का नेतृत्व करने के लिए उनकी नियुक्ति के लिए  - सबसे अधिक जाना जाता है.) अपनी गर्भवती महिला साथी फैशन  जर्नलिस्ट मलीन रिक्की के साथ हाथ में हाथ डाले पधारीं. लगभग २०० मेहमानों और हाई क्लास सेलेब्रिटी से भरी इस हाई क्लास पार्टी का उद्देश्य हाई सोसाइटी में लिस्बिअनिज्म को सामान्य दिखाना था .और तब पहली बार  गे अधिकारों से जुड़ा इंद्र धनुषी झंडा व्हाईट हॉल पर फहराया गया.
यहाँ यह गौरतलब है कि मैरी करीब १४ सालों से एक सामान्य शादीशुदा जीवन जी रहीं थीं. उनके पति से उनके २ बच्चे भी हैं और उसके बाद करीब २ साल से वह अपनी महिला साथी रिक्की के साथ रह रही हैं और अब यह घोषणा करती हैं कि उनकी साथी गर्भवती है और इस बच्चे का वह दोनों बेसब्री से इन्तजार कर रहीं हैं.

यूँ किसी भी इंसान का  अपनी रूचि अनुसार जीवन जीने के अधिकार को लेकर मेरे मन में कोई शंका नहीं है. हर इंसान को अपने मनपसंद साथी के साथ रहने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए.परन्तु इस खबर ने मेरे मन में अजीब सी उथल पुथल मचा दी है  कि आखिर क्यों जो लोग एक विपरीत सामाजिक परिवेश में एक अप्राकृतिक कहा जाने वाला जीवन अपनी रूचि से स्वीकारते हैं, यह कहते हुए कि वह सामाजिक बन्धनों को नहीं मानते, उनकी जरूरतें और रुचियाँ अलग हैं, और उन्हें उनके अनुसार ही जीवन जीने दिया जाना चाहिए, वैसे ही स्वीकार किया जाना चाहिए . फिर वही लोग शिशु जन्म और बच्चे की चाह को लेकर वही सामान्य इच्छा रखते हैं और वो भी उस हद  तक कि उसके लिए कोई भी अप्राकृतिक तरीका अपनाते हैं. इस बारे में मैंने जब कुछ जानने की कोशिश की तो ना जाने कितने ही तरह के तथ्य सामने आये, कितने ही सवाल मैंने नेट पर देखे यह जानने के लिए, कि कैसे  लिस्बियन अपने साथी को गर्भधारण करा के बच्चा पा सकते हैं ? और मुझे आश्चर्य हुआ यह जानकार कि मेडिकल साइंस इतनी आगे बढ़ गई है कि उसके लिए कितने आसान तरीके बताये और अपनाये जाते हैं. जहाँ एक ओर  स्पर्म दान लेकर यह काम किया जाता है,यहाँ तक कि उसके लिए किसी डॉक्टर या लैबोरट्रि   की भी जरुरत नहीं समझी जाती खुद ही सीरिंज से उसे इन्सर्ट कर लिया जाता है, वहीँ स्कूलों में भी सामाजिक विषय के अंतर्गत पढाया जाता है कि किस तरह सामान सेक्स वाले लोग बच्चे का सुख ले सकते हैं. उनके लिए ज्यादातर किराये  की कोख लेने का प्रावधान है जहाँ दोनों साथियों के स्पर्म/एग्ग के नमूने लिए जाते हैं और उन्हें बताया नहीं जाता कि होने वाला बच्चा उनमें से किसका है, जिससे कि बाद में कभी वह अलग हों तो कोई एक बच्चे पर अपना अधिकार ना जमा सके.और यह सब अब कानूनी तरीके से होता है.और सभी अधिकार  और मान्यता प्राप्त है.

कितना आसान लगता है ना सुनने में यह सब. कोई समस्या ही नहीं. बच्चा पैदा करने के लिए एक स्त्री एक पुरुष का होना जरुरी नहीं ..जैसे बस खाद लेकर आइये खेत में डालिए और आलू प्याज की तरह उगाइये.
सभी को अपना जीवन अपनी तरह से जीने  का और हर तरह की खुशियाँ पाने अधिकार है.पर विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण नकारने वाले को आखिर ये शिशु जन्म और पालन जैसी इच्छा हो ही क्यों ?वो भी इस हद तक कि इन सब तरीकों में मुश्किल हो तो एक बेजान गुड्डे से पूरी की जाये.?  ऐसे जोड़ों की मानसिक स्थिति मेरी समझ में नहीं आती.क्या कभी वे उस बच्चे के भविष्य के बारे में सोचते हैं? माना कि आज उन्हें सारे कानूनी अधिकार हासिल हैं. पर कल वह बच्चा स्कूल भी जायेगा क्या वह अपने साथियों के बीच अपने गे/लिस्बियन माता पिता को लेकर सहज हो पायेगा.? आज भी स्कूलों में समानसेक्स में रूचि रखने वाले बच्चों को अलग दृष्टि से देखा जाता है, उन्हें परेशान किया जाता है , चिढाया जाता है. यहाँ तक कि कितने ही बच्चे इस सबसे तंग आकर आत्म हत्या तक कर लेते हैं.ऐसे में ऐसे मातापिता के प्रति वह मासूम बच्चा किस स्थिति से गुजरेगा क्या कभी ये लोग सोचते होंगे? 

मैं मानती हूँ कि उनकी अपनी स्थिति पर उनका कोई जोर नहीं. वह ऐसे हैं तो हैं. इसमें कोई बुराई नहीं. पर एक मासूम बच्चे को बिना उसके किसी दोष के इस स्थिति से दो चार होने पर मजबूर करने का क्या उनको हक़ है?

आज इस तरह के सम्बन्ध कानूनी तौर पर मान्य हैं.और काफी कुछ सामाजिक तौर पर भी उन्हें माना जाने लगा है. यह भी एक सामान्य व्यवस्था है. फिर क्यों ये लोग अपनी अलग ही परेड निकालते हैं? खुद को अपने पहनावे, हाव भाव से सामान्य लोगों से अलग दिखाने की कोशिश करते हैं ?अपने को अलग,बताते और होते हुए भी एक सामान्य परिवार की चाह भी रखते हैं...क्या आपको यह सब बेहद कन्फ़्यूजिंग  नहीं लगता? मैं तो बहुत कंफ्यूज हो गई हूँ. 




103 comments:

  1. can't digest...can't convince my self...
    so better say,i'm confused....

    regards

    anu

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  2. क्या कह सकते हैं ये तो वो लोग खुद ही बता सकते हैं ।

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  3. ये जानकारियाँ हम भारतीयों के दिलो दिमाग में भूकंप लाने के लिए काफी है ..पर ऐसे रिश्तों से एक सवाल हमेशा उठता है ....प्रकृति के विपरीत कबतक और कहाँ तक...इस अप्राकृतिक रिश्तों के बाद फिर वो प्राकृतिक रूप से माँ या पिता बनना चाहते है ....उफ़

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    1. Hum Bhartiye baccho ke rape ko digest kar lete hain lekin jab samlanglik sambandh ki baatt aati hain to tufan aa jaata hai aur bhukamp bhi aa jata hai. Kab tak hum je dohari aur banwati zindagi jiyege.Sam Lnaglik rishta unnatural nahi hota.Apni mansikta ko badaliye naa ki inki.

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  4. वाकई सब यह बहुत बहुत कन्फ्यूजन है ...आखिर ऐसे रिश्ते बनाने की सबसे बड़ी वजह क्या रहती होगी ..?

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  5. देखिये नेचर के खिलाफ जो भी काम होगा तो उसका रिज़ल्ट भी अच्छा नहीं होगा.. गेइज्म और लेस्बियनिज्म कुछ है नहीं.. यह एक टाईप का सेक्सुअल फ्रस्ट्रेशन है... जो चेंज के बहाने शुरू किया जाता है.. और फिर आदत में शुमार हो जाता है.. और कुछ सोशल एटमौसफेयेर का भी असर होता है.... जैसे घर में जब बच्चा छोटा होता है.. तो घर के चाचा ..मामा.. और भी ऐसे रिश्ते .. एक अलग तरह से शोषण करते हैं.. जिनके साथ होता है.. वो फिर मानसिक विकार के शिकार हो जाते हैं.. ऐसे ही बड़े होने पर जब कोई रिश्तों में खटास या रिश्ता टूटता है तो .. उसके बाद सेल्फ सैटिसफेक्शन के लिए लोग शुरू करते हैं.. और फिर उसी में धंसते चले जाते हैं.. इसीलिए तलाक /विधवा होने के बाद लेस्बियंस बहुत मिल जाती हैं.. अगर इस मानसिक विकार को दूर करना है.. तो सबसे पहले घर से ही शुरुआत करनी होगी.. और सामाजिक रूप से सुधार करना होगा.. क़ानून बनाना तो मजबूरी होती है.. जो चीज़ प्रिवेलेंट हो जाती है तो उसके लिए क़ानून ही एक ऑलटरनेटिव होता है... वैसे ऐसे लोगों का सामाजिक बहिष्कार होना ही चाहिए.. सोशल टैबू होने से भी चीज़ें सुधरतीं हैं.. पोस्ट बहुत अच्छी लगी ..

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    1. काफी हद तक ठीक कारण बताएं हैं.

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    2. सही कारण हैं पर फिर यह भी सही है की ऐसे संबंध आज से नहीं सदियों से चले आ रहे हैं पर ढंके छिपे ढंग से। निश्चित तौर पर आज जब हर प्रकार की वर्जनाओं को नकारने का मौसम आ चुका है तो फिर इन रिश्तों को उजागर करने में क्या देरी है। वैसे कभी गौर किया की इस तथ्य के पीछे क्या कारण है की अचानक इन रिश्तों को सामान्य सिद्ध करने की होड़ लग गयी है। कोई विशेषज्ञ आज इसे अप्राकृतिक मानने को तैयार नहीं है।

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  6. beshak aise shambandho ko jo bhi manyata mil jaye, ham beshak hikarat se na dekhen.... par kuchh to gadbad hai, kuchh to aisa hai, jo digest nahi ho pata, ham aam bhartiye ko... ye manta hoon wo bhi insaan hain, unhe bhi jeene ka hak hai... par fir bhi kuchh jamta nahi.... ye sambandh!!

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  7. acchi post hai mam,poori padhi.is lesbian sammelan ke bare me padha tha kher kya kahu unki m,ansik sthiti alag ho sakti hai shayad aur bhi kai karan ho sakte hain aur karan hai bhi.

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  8. I am backward to them, they are sick people to me...

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  9. अप्राकृतिक बस अप्राकृतिक है | जीवन जीना और अच्छा जीवन जीना दो भिन्न पहलू हैं | क्षणिक सुख के लिए स्थायी समस्याएं आमन्त्रित करने जैसा है यह सब तो |god, forgive them, they know not ,what they are doing.

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    1. They know what they are doing.. that's why they are doing .... and they always will be... :)

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  10. कन्फ्यूजन अपने लिए, समलैंगिक सामान्य |
    धीरे धीरे ही सही, कई जगह पर मान्य |
    कई जगह पर मान्य, एक से दोनों हमदम |
    महिलाओं का जोड़, गर्भ-धारण में सक्षम |
    कर खुद का एहसास, करें बच्चे का सृजन |
    अगर हुवे दो मर्द, करे क्या है कन्फ्यूजन |

    विज्ञान ने यह भी संभव कर दिया है वैसे तो ||

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    1. रविकर जी ! मर्दों के लिए सेरोगेट मदर का रिवाज है.

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  11. इसमें नेचुरल या अननेचुरल कि बात कहा से आ गयी!
    ये पसंद और न पसंदगी कि बात है! और अब तो संसार
    भर में इन रिश्तों को मन्येता बहुत तेजी से मिल रही अहि!
    लोग अब खुलकर सामने आने लगे हैं! हमें उनकी भावनाओ कि
    कद्र करनी चाहिए! और इसको सिम्पली एक्सेप्ट करना चाहिए!
    इसमें कंफुईस होने कि कोई बात नही है

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    1. अप्राकृतिक बात बच्चों के जन्म और उनके पालन को लेकर है.

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    2. as u suggested in your writeup, there are scientific way to get child not a big issue! and as the time pass on every changes in the society will be accepted. I think u r concernign abt identity of the child!

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    3. बड़े ही स्पष्ट बहुमत से मायावती बहन जी और मुलायम सिंह जी जीते...तो क्या इसका मतलब यह हो गया कि वो महान नेता , अनुकरणीय व्यक्तित्व हैं...?

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    4. Ranjan ji> bilkul nhi! but us bat ko is mudde se justify karna jara jama nahi!

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  12. I do not agree because this is opposite for natural

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  13. बहुत लम्बे समय से यह विषय मेरे भी दिमाग को मथ रहा है..आज की किशोर और युवा पीढी के बच्चों से इस विषय में खुलकर बातें और बहस की है और अंततः अभी जिस निष्कर्ष पर खड़ी हूँ,उसमे यही समझ में आया है कि कुछ हटके/विशेष /रोमांचक कर गुजरने की लालसा खींचकर लोगों को इस ओर लिए जा रही है..लोग जा तो रहे हैं,पर चूँकि यह प्रकृति के विपरीत है, तो नेचुरल उन आवश्यकताओं की ओर भी एक समय के बाद सहज ही इनका झुकाव हो जाता है..

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  14. दुनिया के आधुनिक कहे जाने वाले लोग कितनी भी उत्श्रृंखलता कर लें। आखिर प्रकृति के नियमों को तोड़ने की सजा भुगतनी ही पड़ेगी। ईश्वर ने प्रकृति को स्त्री-पुरुष के रुप में सृजनकर्ता दिया है। इससे इतर सब हा हा कारी ही होगा।

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  15. मेरी चिन्ता तो उस बच्चे के साथ ही है शिखा, जिसे आगे जाकर सामाजिक मखौल और तिरस्कार का सामना करना पड़ेगा. कम से कम बच्चे की चाह ऐसे जोड़ों को नहीं करनी चाहिये, ऐसा करके वे एक बच्चे की ज़िन्दगी से खिलवाड़ करते हैं.

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    1. तुमने इस लेख की सही नव्ज़ पकड़ी वंदना.मेरा कंसर्न भी वही है.

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    2. ye ham apko lagega.. unhe to aisa sambandh bura hi nahi lag raha, to we iske baare me kaise sochen...!1

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  16. शिखा जी,
    आपने एक अच्छा प्रश्न उठाया है.जहाँ तक बच्चों की बात है तो माना यही जाता है कि एक बच्चे का मानसिक विकास तभी अच्छी तरह हो पाता है जब उसे माता और पिता दोनों का साथ मिले.लेकिन अब तो समाज बदल रहा है.अविवाहित रहकर भी लोग बच्चे गोद ले रहे हैं.दुनियाभर में एकल माताओं और पिताओं की संख्या बढती जा रही हैं.समाज ने भी इन्हें स्वीकारना शुरू कर दिया है भारत में भले ही ये चलन थोडा कम हैं.तो यदि समलैंगिक जोडे भी बच्चे पालना चाहें तो उन्हें रोका तो नहीं जा सकता यदि समाज ऐसे संबंधों को स्वीकारना शुरू कर देगा तो इनके बच्चों को कोई समस्या नहीं आएगी.लेकिन पहले दुविधा तो इस बात की है कि ऐसे संबंध प्राकृतिक और स्वाभाविक भी होते हैं या नही? पहले यह तो तय हो जाए लेकिन इस बारे में ही कोई एकमत नहीं है.खुद दुनियाभर के विशेषज्ञों में ही गंभीर मतभेद है कुछ इसे प्राकृतिक मानते है तो कुछ इसे बीमारी बताते है.ऐसे में आम आदमी तो कनफ्यूज़ होगा ही.
    हाँ यदि यह प्राकृतिक हैं तो फिर देर सवेर ऐसे संबंधों को स्वीकारना ही पडेगा.क्योंकि हम पारंपरिक नजरिये को ही देखेंगे तब तो किसी व्यक्ति का अविवाहित रहना भी अप्राकृतिक और समाज के खिलाफ माना जाएगा.

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    1. आपकी बात भी गौर करने वाली है..

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  17. हमें बिल्कुल भी कन्फ़्यूज़न नहीं हुआ। इसका एकमात्र कारण यह है कि आपने बड़े स्पष्ट तरीक़े से विषय-वस्तु के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है। आपने एक बेहद सशक्त आलेख लिखा है। लेख में आपके बारिक विश्लेIषण गहरे प्रभावित करते हैं। आधुनिकता के नाम पर मानसिक खोखलापन के दर्शाते हुए लोगों के इस दौर में आधुनिकता और प्रगतिशीलता की वैचारिक डगर के निर्धारण में विचलनों और असावधानियों का जिस दक्षता से आपने वर्णन किया है, वह अलग से रेखांकित करनेवाली बात है। आपका यह विचारोत्तेजक लेख इस विषय और उससे जुड़ी समस्या को समझने के लिए अत्यं।त उपयोगी है और इस लिहाज से आप सफल रही हैं। टेन ऑन टेन!

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    1. शुक्रिया :) टेन ऑन टेन का .

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  18. आप लन्दन में हैं तो इस विषय को थोड़ी असहजता से ही सही यहाँ प्रस्तुत कर तो ले रही हैं -
    अपने यहाँ की देवियों के लिए यह वर्जित अलेर्जिक विषय है -
    मानव व्यवहार एक ऐसी देहरी पर आ खड़ा है कि न जाने ऐसे कितने अकल्पित घटनाएं -बात व्यवहार आये दिन सामने आयेगें
    पश्चिमी देशों में कृत्रिम गुड्डे गुड्डियों को पालना ,पूरा ध्यान रखना ,वात्सल्य भाव का पूरा शमन करना सहज घटना बनती जा रही है... ....
    एक आंख खोलने वाला और विचारणीय लेख !

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  19. भले ही परम्पराएँ बदलती हैं .... बदलाव आवश्यक भी है .... अप्राकृतिक सम्बन्धों को जहां कानूनी मानिता मिलती जा रही है ... हो सकता है समाज भी इसे धीरे धीरे स्वीकार कर ले .....हो सकता है आने वाले समय में इन बच्चों को कोई कठिनाई न हो .... लेकिन फिर भी मासूम बच्चों की ज़िंदगी से या उनकी भावनाओं से खेलने का तो अधिकार किसी को नहीं है .... ज्वलंत विषय पर अच्छा और सार्थक लेख .... विचार विनिमय भी अच्छा चल रहा है ...

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  20. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 12 -07-2012 को यहाँ भी है

    .... आज की नयी पुरानी हलचल में .... रात बरसता रहा चाँद बूंद बूंद .

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  21. वाकई, है तो यह सब बड़ा confusing इसमें कोई संदेह नहीं है। सब की अपनी-अपनी मांससिकता है और सबको अपनी मर्जी से अपना जीवन जीने का सम्पूर्ण अधिकार भी, लेकिन यहाँ अंत में उठाया गया बच्चों की ज़िम्मेदारी और परवरिश से जुड़ा सवाल सोचने पर मजबूर कर रहा है। बाकी तो रंजना जी की बात से सहमत हूँ परंतु दूसरी बात जो लोग भारतीय-भारतीय कर रहे हैं..।तो क्या अपने यहाँ ऐसा नहीं होता है? ऐसा नहीं है अपने हाँ भी यह सब होता है या यूँ कहें की अब तो अपने हाँ भी यह संस्कृती पनप रही है अब यह अच्छी है या बुरी यह अलग बात है।

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  22. प्यार और पहचाने जाने की खोज में भटकती जीवनियाँ..

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  23. देखिये, अब समलैंगिकता पुरे विश्वपटल पार धीरे धीरे अपनी पहचान समाज में पुष्ट करती जा रही है .. प्राकृतिक या अप्राकृतिक है ये सम्बन्ध , इस विषय पर बहसों का आयोजन होता रहा है . पाश्चात्य जगत में ना जाने कितने प्रभावशाली और लोकप्रिय पुरुष -महिलाएं ऐसे रिश्तों को छुपाते नहीं है. मुझे लगता है की इस रिश्ते में पूर्णता की खोज , जो शायद एक दंपत्ति के लिए बालक का जन्म भी होता है , वो ऐसे कदम उठाते है.. जहाँ तक ऐसे दंपत्ति के बालक की पहचान का सवाल है निश्चय तौर पर कठिन सामाजिक परिष्ठितियाँ उसकी राह देख रही होगी . आपकी लेखनी ने इस ज्वलंत समस्या की तरफ सशक्त इशारा किया है जो की हमारे समाज पर भी देर सबेर आसन्न है .

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  24. एक प्रश्न और मुझे मथ रहा , की ऐसी दंपत्ति के बच्चे की सेक्सुअलिटी क्या होगी ? शारीरिक नहीं तो मानसिक प्रभाव से वो भी समलैंगिकता को अपना सकता है? अगर ऐसा हुआ तो भैये ,राम ही राखे .

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    1. आपका डर स्वाभाविक है..हो सकता है आगे चलकर यही सामाजिक व्यवस्था हो जाये..

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  25. आदरणीय शिखा जी,सादर प्रणाम
    इस बार स्पंदन में आपने काफी ज्वलंत मुद्दा उठाया हैं |यह संस्कृति अपने भारत में भी फ़ैल रही हैं|
    आपका अजय

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  26. ब्लॉग शीर्षक को सार्थक करती दमदार पोस्ट। इस स्पंदन में छुपे क्रंदन को पोस्ट पढ़कर ही हम क्या महसूस कर पायेंगे भला! दो बालिग अपनी जिंदगी चाहे जैसे जीयें, स्वतंत्र हैं। गुड्डे को पाल कर बच्चे के सुख का एहसास करें, यह भी ठीक है। लेकिन अपने सुख की खातिर बच्चे पैदा कर मासूम जिंदगी की भावनाओं के साथ खेलें, यह ठीक नहीं है। यह प्रतिबंधित होना चाहिए। इसकी स्वतंत्रता नहीं मिलनी चाहिए।

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  27. आपकी पोस्ट कल 12/7/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 938 :चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  28. जो लोग मानसिक विकृति से नहीं बल्कि प्राकृतिक रूप से ऐसे (लेस्बियन या गे) हैं, उनके लिए जो कानून बना है वो जायज है, क्योंकि ये लोग अप्राकृतिक नहीं हैं और न मानसिक विकार से ग्रस्त हैं. इस तरह के लोग हर सदी और समाज में रहे हैं. इनसे घृणा या इन पर आरोप निराधार है. कानून और मीडिया के कारण ये सब अब हमारे सामने आ रहा है. जहां तक बच्चे का सवाल है तो मातृत्व का सुख अलग होता है जिसे हर कोई पाना चाहता है. समाज में बदलाव के कारण ही ये सब खुल कर सामने आया है और कानून भी बने हैं तो निःसंदेह ऐसे माता पिता की संतान को कोई समस्या नहीं होगी. एक तरफ तो ये विश्वास है कि ईश्वर ही सब कुछ करता है तो ऐसे इंसानों की उत्पत्ति भी उसी ने की है. फिर रंज क्यों? अप्राकृतिक कह कर किसी के जीने के तरीके को गलत नहीं ठहराया जा सकता. इस मुद्दे पर अच्छी परिचर्चा हो रही है. शुभकामनाएँ.

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  29. इस तरह के सम्बन्ध कुछ लोगों में प्रकृति के भेद भाव के कारण हो सकते हैं . लेकिन ऐसा लगता है , आजकल होमो या लेस्बियन होना एक फैशन सा बन गया है . इसमें बहुत बड़ा रोल हमारी फैशन इंडस्ट्री का भी है . अफ़सोस इन्हें कानूनी मान्यता देकर हम बढ़ावा ही दे रहे हैं . इनके बच्चों के बारे में सोचकर तो दुःख ही होता है .

    बड़ा विवादस्पद विषय है .

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    1. यही बात मुझे भी खलती है अगर प्राकृतिक है तो समझ में आता है.परन्तु १५ साल सामान्य गृहस्थ जीवन बिताने के बाद २-२ बच्चे पैदा करने के बाद अचानक इस तरफ मुड जाना किस तरह प्राकृतिक हो सकता है ये मुझे समझ में नहीं आता.

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  30. इस तरह के सम्बन्ध कुछ लोगों में प्रकृति के भेद भाव के कारण हो सकते हैं . लेकिन ऐसा लगता है , आजकल होमो या लेस्बियन होना एक फैशन सा बन गया है . इसमें बहुत बड़ा रोल हमारी फैशन इंडस्ट्री का भी है . अफ़सोस इन्हें कानूनी मान्यता देकर हम बढ़ावा ही दे रहे हैं . इनके बच्चों के बारे में सोचकर तो दुःख ही होता है .

    बड़ा विवादस्पद विषय है .

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  31. शिखा जी
    संभव है की वो दोने बच्चे के आने से पहले उसका लालन पालन कैसे होगा कौन कितनी जिम्मेदारी उठाएगा और बच्चे को पाला कैसे जाये इस बात की अभ्यास कर रहे हो क्योकि मैंने टीवी पर इस बारे में देखा था | ये उन लोगों के लिए भी होता है जो बच्चे तो चाहते है कितु जिम्मेदारी से डर लगता है तो उन्हें इस तरह के असली दिखने वाले गुड्डो के साथ रहने के लिए दिया जाता है और बच्चो को पालने से जुडी हर जानकारी दी जाती है और रात में चेक भी किया जाता है की उन्होंने सभी काम ठीक से किया है की नहीं | कई बार जोड़े ये भी देखना कहते है की एक बच्चे के आने से जीवन में क्या परिवर्तन होता है उन्हें कितना फर्क पड़ता है ताकि वो बच्चे को लेकर आगे सोच सके | ऐसे बहुत से लोग है जिन्होंने तो बिना विवाह के ही बच्चो को जन्म दिया है नीना गुप्ता , कमलहासन सारिका ना जाने कितने नाम है और गोद लिए बच्चे भी है जहा उनसे उनके पिता का नाम नहीं पूछा जाता है इसमे परवरिश का फर्क नहीं पड़ता है , हा जहा तक बात समाज के कुछ कहने की है तो भारत में तो लड़की होने पर भी बहुत कुछ कहा जाता है तो क्या लड़कियों को जन्म नहीं लेना चाहिए, दो जाति या धर्म के माता पिता हो तब भी उनके बच्चो को कुछ ना कुछ कहा जाता है तो क्या वो सब गलत है उन्हें बच्चो को जन्म नहीं देना चाहिए समाज के डर से , इसलिए समाज की चिंता इस बारे में नहीं करनी चाहिए और जो सम्लैंगिंग है तो वो अपने बच्चो को हमेसा ही इस बात की सीख देंगे की लोगों की परवाह ना करो | अपने बच्चे को पालना उसे जन्म देना मुझे लगता है इसका रिश्ता कही से भी विवाह या अपने साथी से जुड़ा हुआ नहीं है ये एक अलग भावना है जिसे बहुत सारे लोग पाना चाहते है |
    जहा तक बात इस रिश्तो की है तो मुझे कुछ भी अलग नही लगता है इन जोड़ो के लिए भी उनका साथी विपरीत लिंग सा ही होता है भले दुनिया के लिए वो एक लिंग के हो | संभव है की सामान लिंगी एक दूसरे के प्यार , भावनाओ , इच्छाओ और जरूरतों को ज्यादा अच्छे से समझते है इसलिए ही ये रिश्ता बन जाता है |

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    1. हो सकता है आपका नजरिया ठीक हो..और मैं रूडिवादी हो रही हूँ इस मामले में. पर दो सलैंगिक प्राकृतिक तौर पर तो बच्चा पैदा कर नहीं सकते कोई बाहरी तरीका ही अपनाना पड़ेगा उन्हें.कुछ जैन्युन केसेज की बात तो ठीक है पर फैशन के लिए यह सब करना....फिलहाल मुझे कुछ अजीब लगता है पर हो सकता है आने वाले वर्षों में यह सामान्य सामाजिक व्यवस्था हो जाये.और फिर सब सामान्य ही लगे.

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  32. एक ज्वलंत समस्या पर बहुत प्रभावशाली और विचारोत्तेजक लेख ...

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  33. बढ़िया पोस्ट ..
    सोच का सुथरापन है लेखन में...
    confusion इस बाबत इस लिए है कि हमारा अनुकूलन वैसा हुआ है...उनका
    अनुकूलन (conditioning) हम जैसा नहीं हुआ है...जो उनके लिए उतनी हैरानी वाली बात न हो...
    तुम्हारे मेरे लिए हैरानी वाली बात हो सकती है...और दूसरा हम अन्य को अपने मानसिक लेवल
    से समझते हैं, या समझने की कोशिष करते हैं, हमारे सालों से अनुकूलित हुए नज़रिये से देखते हैं...
    और कुछ extreme judgemental भी हो जाते हैं...पर इस
    आलेख में judgemental सा कुछ भी नही...

    और तुमने सही कहा है सभी को अपने आनंद और खुशी के साथ जीने का हक है...

    उनसे सहानुभूति भी होती है... बच्चों को लेकर पीडा और चिंता होना
    स्वाभाविक है, पर यह उनके भविष्य के अनुकूलन पर ही छोड दिया जाए...
    वहां की सरकारें, उनके सांस्कृतिक विभाग इस विषय में कुछ तो सोचते
    ही होंगे, या कुछ सोच भी रखा हो...

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    1. जी...बिलकुल. फिलहाल तो सरकार का समलैंगिक विवाह को भी मान्यता देने का प्रस्ताव है.

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  34. आप ने कहा आप को बच्चे की चिंता हैं , आगे आने वाले समय में समाज से उसको क्या मिलेगा
    शीखा जी
    वर्तमान में आप उसको स्वीकार कर ले , भविष्य खुद अपना निर्णय ले लेगा
    बच्चा चाहना केवल पति पत्नी का अधिकार क्यूँ हैं ??
    आप बता सकती हैं क्या की पति पत्नी बच्चा क्यूँ चाहते हैं
    परिवार के सुख के लिये यानी पति पत्नी परिवार नहीं होते हैं
    परिवार बच्चे के आने से बनता हैं और परिवार सब चाहते हैं चाहे वो किसी भी प्रकार के सम्बन्ध में ही क्यूँ ना हो .
    बच्चा दो लोगो को जोड़ता हैं
    हम सड़क पर भी अगर जाते हैं तो अनजान बच्चे की आखें अगर हमारी आँखों से टकराती हैं और वो मुस्कुराता हैं तो हम भी मुस्करा ही पडते हैं और स्वयं उस से उस पल में उस पल के लिये ही जुड़ जाते हैं
    उसी प्रकार से समलैंगिक भी एक दूसरे से जुड़ जाते हैं एक बच्चे के आने से .
    विदेशो में बच्चा गोद लेना एक फैशन हो गया हैं , क्युकी पैसा बहुत हैं , बच्चे कम हैं
    अब समस्या ज्यादा उन बच्चो की हैं जिन्हे एक कपल { कपल का अर्थ विवाहित भारत में प्रचलित है पर विदेशो में जोड़े को कपल कहते हैं } गोद ले लेता हैं , लेकिन फिर जब कपल अलग होता हैं तो बच्चा फिर एक नये कपल के पास यानी २ कपल के बीच में बड़ा होता हैं और फिर उसको दुबारा गोद भी लिया जाता हैं { समझाना ज़रा मुश्किल हैं , पर आप समझ गयी हैं }

    आज से २० साल बाद का समाज क्या होगा , ये सोच कर हम अपना वर्तमान क्यूँ ख़राब करे , ये सोच लोगो को अपनी ख़ुशी और अपनी इच्छा पूरा करने के लिये प्रेरित करती हैं
    १० साल पहले तक तो हम हिंदी ब्लॉग नाम की बात को भी नहीं जानते थे , २० साल पहले समलैंगिकता की बात नहीं होती थी
    अब ब्लॉग लिखा जाता हैं यूके में , टिपण्णी आती हैं गाजियाबाद से , जब ये संभव हैं तो २० साल बाद का समाज क्या होगा , व्यवस्था क्या होगी
    क्युकी तब ऐसे बच्चे बहुत होंगे और व्यसक होगे , एक दूसरे के प्रति ज्यादा जुड़ाव महसूस करेगे

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    1. बिलकुल ऐसा हो सकता है रचना जी !

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  35. रोचक आलेख है। बच्चे की चिंता तो जायज है। इस तरह के लोग कम हैं लेकिन हैं तो सही। ऐसे लोग लेकिन कम ही सही लेकिन रहेंगे! धीरे-धीरे समाज में इनके प्रति उपहास का भाव भी समाप्त हो जाये -शायद!

    अच्छा लेख!

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  36. अपनी अपनी भावनाएं हैं...

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  37. कारण तो कई सारे हैं पर इसे भटकाव से ज्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता ..... और इसका खामियाजा सबसे ज्यादा वे बच्चे भोगते है जो बिना किसी भावी जिम्मेदारी के दुनिया में लाये जाते हैं

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  38. दीदी
    शुभ प्रभात
    आपने भविष्य का खाका खींच कर रख दिया
    भारत में कुछ समलैंगिक विवाह हुए है
    सोचती थी कि उनका भविष्य क्या होगा
    बच्चा गोद ले लेना भी एक विकल्प है
    सच बताऊँ विचार तो बुत बन रहे हैं मन में
    पर लिख पाऊं ऐसे शब्द मेरे शब्दकोष में नहीं हैं
    सादर

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  39. जो प्रकृति के विरूद्ध है अतः अप्राकृत है उसे कितना भी कोई जायज कहे रहेगा तो वो अप्रकृत (नाजायज) ही ना......!!
    शयद अपने देश में भी ये अप्रकृत रिश्ते हौले हौले जायज कर दिया जाए पर फिर भी क्या इसे जायज कहना जायज होगा....
    व्याकरण का एक नियम है "हर शव्द का एक विलोम शव्द होता है" जैसे प्राकृत का अप्रकृत.....
    अगर यैसे रिसे भी जायज हो गए तो कमसे कम नाजायज और अप्रकृत जैसे शव्दों को फिर से परिभाषित करना होगा....!!

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  40. सोचने के लिए मजबूर करता लेख.बधाई.

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  41. दो इंसानों को आपसी सहमति के आधार पर किस तरह रहना है , यह उन पर छोड़ देना बेहतर है . बच्चों को लेकर आपकी चिंता से मैं सहमत हूँ मगर ठीक इसी समय मुझे एकल माताएं भी याद आती हैं . या सुष्मिता सेन जैसी अभिनेत्री जिसने बिना विवाह के बच्चों को गोद लिया है , क्या बच्चों के प्रति उनकी ममता पर अंगुली उठाई जा सकती है ?
    मानसिक या शारीरिक विकृति के कारण उपजे ऐसे सम्बन्ध त्रासदी का कारण हो सकते हैं ,मगर यह त्रासदी सामान्य स्त्रीपुरुष के बीच भी घटित हो सकती है . मुझे भी कन्फयूजिंग लगता है यह !

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    1. वाणी जी ! मुझे लगता है यह तुलना ही ठीक नहीं.यहाँ नीना गुप्ता सरीखों के भी उदाहरण दिए जा रहे हैं.हम उन्हें शायद बोल्ड तो कह सकते हैं पर क्या उन्हें रोल मॉडल बनाया जाना चाहिए?
      रही बात सुष्मिता सेन जैसे लोगों की जो उन बच्चों को लेते हैं जिन्हें ऐसे ही कुछ अविवाहित या गैरजिम्मेदार माता पिता पैदा करके उनके हाल पर छोड़ देते हैं. जहां उन्हें माता पिता का प्यार तो क्या एक घर भी नहीं नसीब होता.न कोई जीवन होता है न भविष्य. तो कम से कम सुष्मिता सरीखे लोग ऐसे बच्चों को कम से कम माँ का प्यार ,एक घर और एक बेहतर जिंदगी और भविष्य तो दे पाते हैं.और इस तरह से वे इस तरह के बच्चों की संख्या में कमी करते हैं न कि कृतिम तरीके से पीछा पैदा करके उनकी संख्या में इजाफा.

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    2. अप्राकृतिक रूप से जन्म दिए जाने वाले बच्चों के बारे में मैं आपसे सहमत हूँ . यदि मातृत्व/बच्चों को जन्म देने का इतना शौक है तो जरुर बेसहारा बच्चों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए . मैंने अपनी टिप्पणियों में सरोगोटे ते तकनीक से बच्चा प्राप्त करने की कई बार आलोचना की है . मेरा आशय अकेले बच्चों के पालन पोषण से था .
      बिलकुल , एक स्वस्थ सामाजिक परिवेश के लिए ये लोंग रोंल मॉडल नहीं हो सकते !

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    3. रोल मॉडल
      जब नीना गुप्ता अविवाहित माँ बनी थी तब वो अबोर्शन भी करा सकती थी नहीं करा पायी अपनी नैतिक सोच की वजह से , की जो जिन्दगी उनके अन्दर हैं उसको वो अपने कारणों से लाई हैं और उसको जीने देने का अधिकार देना होगा , चाहे इसके लिये समाज उनको सूली पर चढ़ा दे . उनको बोल्ड इस लिये नहीं कहा जाता क्युकी वो उन्होने अविवाहित रह कर एक बच्चे को जनम दिया , उन्हे बोल्ड इसलिये कहा गया क्युकी अगर वो चाहती तो दबे ढंके तरीके से गर्भ पात करवा देती . बोल्ड हैं उनकी मानसिकता जो किसी भी सम्बन्ध के कारण पैदा हुए बच्चे को इस दुनिया में आने का अवसर देती हैं
      सुष्मिता सेन
      वो कहती हैं की शादी करना जरुरी नहीं जरुरी हैं हाँ बच्चो की बहुत जरुरत हैं और वो रोल मॉडल इस लिये बन गयी क्युकी उनकी वजह से ही १९९४ में अविवाहित महिला को कानूनन बच्चा गोद लेने का अधिकार मिल सका


      अप्राकृतिक रूप से जन्म दिए जाने वाले बच्चों

      अगर दुनिया बिना भगवान् के बन गयी हैं जैसा अभी higgs boson particle की खोज से पता चल ही गया हैं तो बिना पुरुष के माँ बनने की चाहत रखना क्यूँ गलत हैं
      लोग अपना खून अपना बच्चा , अपने खून के संस्कार , परिवार का उतराधिकारी , वंशज ये सब सोचना बंद कर दे . यही कारण हैं की लोग साइंस का सहारा लेकर अपना अंश इस दुनिया में लाना चाहते हैं
      और अब तो विवाहित जोड़े पैदा करने की जगह गोद लेना चाहते हैं , कुछ लोगो को ये अब्नोर्मल लगता हैं क्यूँ
      क्युकी हमारा समाज किसी भी ऐसी बात को सहज स्वीकार नहीं करना चाहता जो नयी हो , कभी उसको क्रांति तो कभी उसको विद्रोह , कभी उसको अश्लील , कभी उसको अब्नोर्मल कह ही दिया जाता हैं

      अब ऊपर दिया महफूज का कमेन्ट देखिये
      इसीलिए तलाक /विधवा होने के बाद लेस्बियंस बहुत मिल जाती हैं
      और आप का अनुमोदन भी मिल गया हैं
      पर ये क्या सही हैं , हैं कहीं किसी के पास क़ोई आकडे अगर हैं तो उपलब्ध हो नहीं हैं तो इस प्रकार की बात कहना अपने आप में में एक अब्नोरमेल्सी{ क्षमा सहित } ही हैं

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    4. रचना जी ! मैंने महफूज़ की "काफी" बातों को ठीक कहा है.."सभी" को नहीं.

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    5. thank you for the clarification

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    6. शिखा जी
      शायद कुछ गलत फहमी हो गई | नीना गुप्ता का उदाहरन उनके बोल्ड होने की बात के लिए नहीं बल्कि ये बताने के लिए लिया गया की , अपनी कोख से अपने बच्चे को जन्म देने की ललक किसी किसी में इतनी होती है की वो समाज की भी परवाह नहीं करता है जबकि वो फिल्म जगत से थी जहा माँ बनी नायिकाओ को कोई पूछता नहीं ( उस ज़माने में ऐसा ही था ) फिर भी उन्होंने ऐसा किया सिर्फ भावनाओ की बात हो रही है | इसी कारण समान लिंगी भी या तो अपने बच्चे को जन्म देते है या सेरोगेट मदर से प्राप्त करते है इसमे भी सामन लीगी जोड़े में से किसी एक का ही बच्चा होगा जिसके में अपने ही बच्चे की ललक ज्यादा होती है | और जहा तक बात बच्चा गोद लेने की है तो कितने लोग है जो दूसरे के बच्चो को अपना पाते है समाज में कितने ही लोग सारा जीवन बे औलाद रहा जाते है किन्तु बच्चा गोद नहीं लेते है और महिलाए तो बच्चे ना होने पर इस इस तरह के तकलीफ देह डाक्टरी जाँच से गुजरती है की उन्हें सुन कर ही सिहरन हो जाती है फिर भी सब सहती है और अपने बच्चे को जन्म देने के लिए सह लेती है ये बहुत ही प्राकृतिक है की अपने ही अंश को इस दुनिया में लाना | इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है की वो किस तरह आ रहा है और हमारा जीवन साथी कौन है |

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  42. आलेख बहुत ही गंभीर और सोचने को मजबूर करता है। पिछली टिप्पणियों को पढ़कर मेरे लिए विशेष कुछ कहना रह नहीं जाता है।

    सादर

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  43. ये कैसा आया ज़माना

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  44. kafee confusion hai ...aur yashwant ne theek kha ..upar kee sari tipaniyon ke aage ab kuchh aur kahna ko nahi rhta ...

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  45. पता नहीं पर हमारे तो गले के नीचे ही नहीं उतरती इस तरह की चीजें, इस मामले में शायद हमारा नजरिया संकीर्ण ही है, या फ़िर हमने इस तरह के रिश्ते अपने आसपास नहीं देखे और महसूस किये इसलिये हम इसे पचा नहीं पा रहे ।

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  46. bahut sahi mudda hai ye main aapse bilkul sahmat hun
    agar ye apne aapko itna alag samajhte hai samaj se to fir aage aakar jindagi ko kyun usi tarah se samanya banana men jut jaate hain hai.
    ek bara accha line yaad aa raha hai mujhe yahan par "der kitna bhi ho jaae par laut kar to ghar hi aana tha na"
    is line se kuch baaten clear ho jaati hain.
    to phir ye sab karne ki kya jaroorat hai jo sansar ke niyam ke wirudh ho.
    aur haan agar jindagi men kuch dikkaten aati hain to ghabra kar galat raaste ikhtyar karna koi samajhdari nahi hoti, aakhir isi ka to naam jindagi hai.

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  47. स्पन्दन में देख लो, कुदरत का व्यवहार।
    प्राकृतिक का साथ दो, पा जाओगे प्यार।।

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  48. एक बेहद सशक्त आलेख ... आभार और बधाइयाँ !

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    1. वैसे जहां तक मैं समझा आपके आलेख को ... यहाँ शायद आपने दोनों की ही बात कही है ... चाहे वो ... गेइज्म हो चाहे लेस्बियनिज्म ... फिर बात केवल किसी महिला के माँ बनने के अधिकार तक कैसे सिमट कर रह गयी ... पूरी परिचर्चा को पढ़ने के बाद भी नहीं समझ पाया ???

      क्या पुरुष पिता नहीं बनना चाहते ... उनके भी तो अधिकार होते ही होंगे ... शायद ... है कि नहीं ???

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    2. सही समझे हैं आप शिवम! पुरुषों/गे को भी पूरे अधिकार होने तो चाहिए और उनके लिए सेरोगेट मदर का प्रावधान है भी शायद.
      वैसे अब आप पुरुष अधिकारों की लड़ाई कब से शुरू कर रहे हो ??

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    3. शिवम जी
      हम बस यही कहने का प्रयास कर रहे है की अपने बच्चे की ललक सभी को होती है स्त्री और पुरुष दोनों को ही भले दोनों विपरीत लिंग के साथी के साथ रहे या समान लिंगी के साथ पर उदाहरन के लिए महिलाए ही ज्यादा है और सभी उनसे परिचित भी है जबकि पुरुषो में ज्यादा नाम लोगों को नहीं पता है एक गे जोड़ा इजराइल से आ कर यहाँ सेरोगेट मदर से अपने बच्चे का जन्म कर कर ले जा चुके है नाम याद नहीं और शयद कइयो को पता ना हो | उनका नाम नहीं दे सके यदि आप के पास कुछ नाम हो तो बताये |

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  49. आज पढ़ रहा हूँ तो इतनी उथल पुथल भी देख रहा हूँ ... आपने लगता है ब्लोगिंग को आज हिला के रख दिया है ... पर जो भी है ... जिस तरह से आपने पूरे विषय को रक्खा है वो बहुत प्रभावी बन पड़ा है और आपके कुशल लेखन की गवाही दे रहा है .... आगे की टिप्पणियों को भी आप बाखूबी संभाल रही हैं इसके लिए भी सादुवाद है आपको ...
    विषय पे मुझे तो कुछ ज्यादा कमांड नहीं है और न ही कुछ ज्यादा ज्ञान है ... पर हां प्राकृति के विरुद्ध किया कोई भी कार्य लंबे समय तक विपरीत असर ही दिखाता है ... इतिहास भरा पड़ा है ऐसी बातों से ...

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  50. विद्वानों का विमर्श पढ़ रहे है। कितने तर्क कितने दृष्टिकोण हो सकते है अभी तो यही समझने का प्रयास है।

    बाकी मनुष्य की मानसिकता सदैव एक पहेली रही है।

    विचारोत्तेजक विमर्श!!

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  51. फेसबुक पर किसी ने शेयर किया था लिंक शायद अभिषेक ने ही और वहीं से लिंक मिला। कुछ टिप्पणियां भी पढ़ीं।

    मेरे हिसाब से तो ये एक बीमारी ही है। सब कुछ यदि As per demand accepted घोषित हो जाय तो इतने सारे रूल रेगुलेशन बनाने की क्या जरूरत है। लोग ड्रग्स लेते हैं, गुटखा खाते हैं, डांस बार जाते हैं तो क्या इसे यह कहकर परमिशन दे दिया जाय कि बदलते समाज के साथ चलने दिया जाय, उनकी लाइफ है वे जानें ?

    यहां महाराष्ट्र में गुटखे पर प्रतिबंध लग गया, डांस बार पर रोक लगा दी गई लेकिन लोग छिप-छिपाकर जा रहे हैं लेकिन पहले की मात्रा में कम जाते हैं क्योंकि एक तरह का सामाजिक दबाव है कि ये खराब चीज है इससे बचना चाहिये। कभी कभी चीजें सीधे न कहकर प्रतिकात्मक रूप में ही कही जाती हैं, सिगरेट के डिब्बे पर बिच्छू या ऐसे निशान उसी प्रतिकात्मकता को दर्शाते हैं ( ये अलग बात है कि सीधे सीधे बंद करने से सरकार के रिवेन्यू पर असर पडेगा :)

    तो जब सामने से जाना जाता हो कि ये विकार है तो क्यों उसे पोषित करना, क्यों ऐसी हरकतों को बढ़ावा देना कि उनका अधिकार है, निजी जीवन है ब्ला ब्ला। वैसे भी कोई उन्हें जबरी रोक नहीं रहा बस प्रतीकात्मक रूप से कहा जा रहा है कि ये गलत है, अप्राकृतिक है..... अब "यह गलत है" वाली बात "सिगरेटहे बिच्छू" की तरह प्रतीकात्मक होगी कि ऐसे लोग वाकई उस तरह का जीवन जीना चाहते हैं, ये अलग बात है।

    वैसे ईश्वर ने तो अपनी कृति सभी जीवों में जोड़े के रूप में ठीक-ठाक ही बनाकर भेजी थी, किंतु वो कुछ इंसानी जमात ही है जो ईश्वरीय कृति को अपने हिसाब से व्याख्या करते हुए समलैंगिकता को वैलिड करार दे रही है। वरना तो पशु-पक्षियों में भी समलैंगिकता वाले संबंध अब तक तो नहीं ही जाना।

    क्या पता उनमें भी कोई अति-प्रगतिशील, महाबुद्धिजीवी अब तक प्रकट हो गया हो जो समलैंगिता को वैलिड मानता हो और सहज प्राकृतिक रिश्तेबाजी को दकियानुसी बताता फिर रहा हो :)

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    Replies
    1. बात में दम तो है.

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    2. सतीश जी
      जानवरों में यदि ये हो तो क्या आप उसे प्राकृतिक मान लेंगे | तो इंटरनेट में जरा घोघो स्नेल के बारे में पता करे वो उभय लिंगी होता है { बहुत पहले पढ़ा था इस बारे में यदि यादास्त सही है तो मै ठीक कह रही हूं :)} ज्यादा कुछ यहाँ तो मै बता नहीं पाऊँगी आप खुद देखे इस बारे में | और जुरासिक पार्क देखी है क्या आप को याद है की एक ही लिंग के डायनाशोर बाहर रखने के बाद भी उनके अंडे बाहर कैसे मिले | दोनों के बारे में देखीये शायद आप की बात का जवाब मिल जायेगा | बिल्कुल वैसा ही तो नहीं किन्तु कुछ कुछ वैसा ही उसका बस एक हिस्सा मनुष्यों पर भी लागु होता है |

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    3. शब्दशः सहमत हूँ आपसे सतीश जी..विषय को सुस्पष्टता देने के लिए आपका साधुवाद..

      कोई भी बुराई यदि व्यापक रूप में समाज में स्थान बनाये हुए है, तो इसका यह मतलब नहीं की वह सही या अनुकरणीय हो गया..

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  52. ’लिस्बियन ’परिधारणा,एक विकृति ही है,जो एक और विकृति को जन्म देती है.
    प्रकृति भी नियमबद्ध है,अन्यथा सब कुछ यूं ही, ना सुंदर होता.
    हां,बहुत ही कन्फ़ुजिन्ग है—उल्टे चलना,फिर सीधे चलना. यहां भी,’ईगो’ को नया रूप देकर
    स्वंतुष्टि की ही इक्षा है.

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  53. यह तो अपना अपना सोच है |प्रकृति के खिलाफ जाना न्याय संगत नहीं लगता |आशा

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  54. इस जहां में हर किसी का अपना अपना आसमां ,

    हर कोई अपने जुनू की कह रहा है दास्ताँ .

    बढिया प्रस्तुति .आदमी अयूनिक सृष्टि की और बढना चाहता है जहां स्त्री योनी से प्रसव न हो .

    कुछ तो यहाँ मर्जी जीवन इकाइयों की भी लगती है .

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  55. जानवर से आदमी का विकास हुआ या आदमी विकसित होकर .....

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  56. अापकी िचंता अपनी सोच से ठीक है, दुनिया हमारे बचपन से लेकर अाजतक, ही बदल गयी है। बच्चे की चाह का होना किसी भी मनुष्य के लिए सामान्य बात है. और अब जबकि जीवनसाथी,, घर, परिवार, देश, माता-पिता सब एक समय के बाद छूट जाते हैं, बच्चों के साथ ही किसी भी मनुष्य का न टूटने वाला रिश्ता पनपता है.मेरे बच्चों के साथ गे या लेसबियन परिवारों के बच्चे पढतें हैं, और अपने बच्चों को मैं यही कहती हूँ कि कई तरह के परिवार संभव है., माता-पिता, अकेली माता, अकेले पिता, दो माँ या दो बाप वाले भी. अपने समाज और समय की मेरी जितनी भी समझ है, उस पर जितना संभव हो सकता है, अपनी निजी चुनावों और पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर सोचने की कोशिश करती हूँ. इतना ही कहूंगी, कि हमारे चाहे-अनचाहे हमारे बच्चे, अपने दोस्तों, स्कूलों, खेल के मैदानों और मीडिया के ज़रिये इस बात से परिचित हो रहे हैं कि परिवार का कोई एक खाका नहीं है. यही एक्सपोजर उन्हें इस तरह के परिवारों से आये बच्चों को स्वीकार करने, उनका उपहास न उड़ाने, और उनके जीवन में सामाजिक त्रास न पैदा करने में मदद करेगा.

    अच्छा यही है कि अपने से भिन्न लोगों के लिए, चाहे वों दूसरे धर्म/जात, रंग या फिर सेक्सअल प्रवृति के हो उदार हो जायें, किसी तरह की सामाजिक पीड़ा उन्हें न पहुंचाए और जितना सद्दाव संभव हो उसे बनाने में योगदान दें, उंगलियाँ उठेगीं तो फिर हर तरह के माँ-बाप पर उठेंगी. अभी बंगाली कपल का स्वीडन वाला केस पुराना नहीं हुआ है. और २०१० में एक भारत से आये १८-१९ साल के बच्चे की कुछ हरकतों/कोतुहल की वजह से उसके अमरीकी रूममेट ने आत्महत्या की, और वों भारतीय बच्चा दो साल से जेल में हैं, उसकी लम्बी सजा का फैसला होना अभी बाक़ी है. तो हमारी आज की नैतिकता की कीमत हर तरह के बच्चे चुकायेंगे.
    अपनी समझ से इसी विषय पर तीन साल पहले भी कुछ लिखा था

    http://swapandarshi.blogspot.com/2009/07/02.html

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  57. शायद एक असुरक्षा की भावना ..या एक पहचान बनाने की ढृढ़ता ....उन्हें इस तरह की परेड के लिए विवश करती हो ...वैसे ऐसे परिवेश में ..ऐसे समाज में जहाँ लेस्बिअनिस्म मान्य है ...शायद बच्चों को भी ज्यादा दिक्कतें न हों...यह तो वक़्त ही बताएगा ...सृष्टि के नियमों के उल्लंघन का कोई तो मुआवजा देना ही पड़ेगा

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  58. आप सभी की सार्थक टिप्पणियों का बहुत शुक्रिया.

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  59. हिलाकर रख दिया। हम चाहे प्रकृति को कितना भी नकारे लेकिन वह हम पर हावी रहती है। बहुत ही अचछी और प्रासंगिक पोस्‍ट।

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  60. अब क्या कहा जाए....हर किसी की अपनी इच्छा और मर्ज़ी हैं अपने रिश्ते बनाने में ....फिर भी कुदरत के नियम के विरुद्ध कुछ भी करना ...कभी भी सही नहीं कहा जा सकता

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  61. apni icchha poorti k liye apne aur sathi tak to jo badlaav kiye vo uchit hai lekin agli peedhi par bhi ek tarah se apni icchha ka dabaav dalne wali baat he ye to aur vo b uske bhavishy me aane wali samasyaon ko nazar andaaz karke.

    is icchha poorti ki seemaon ka bhi koi kanoon hona chaahiye.

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  62. काफी संवेदनशील विषय पर आपने मन के तारो को झनझना दिया है

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  63. अगर गे और लेस्बियन प्राकृतिक कॉल है तो, उन्‍हें क्‍यों जरूरत पड़ती है, एक बच्‍चे की।

    एक तरफ हो सकता है कि यह समाज या व्‍यवस्‍था का दबाव हो कि सुख लेना है तो ऐसे ही लिया जा सकता है, एक परिवार बनाकर।

    दूसरी तरफ हो सकता है कि जिसे प्राकृतिक समझने या समझाने की कश्‍मकश चल रही है, वह मूल रूप से ही अप्राकृतिक हो...

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  64. सरकार तो हर उस चीज को मान्यता देना चाहती है जहाँ से उसे कुछ वोटों के पाने का लालच हो. मैं समझता शयद यह सरकारी बीमारी भारत में ही है, पर शायद वोटों के लालच में मर्यादा, देशहित, जनहित, समाजहित को तक पर रखने वाली सरकारे है जगह है.

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  65. aprakritikta ko samanya kaise kaha jaa sakta hai. magar hamen pragatisheel dikhna bhi hai aur yaktigat swatantrata ka bhi champion dikhna hai. Ham karen to kya karen ? Yaksha Prashna hai hamare jaise logon ke liye.

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  66. इस टिप्पणी में एक घटना की चर्चा है। एक प्रवृत्ति की ओर संकेत है। बहुत संक्षेप में और विनम्रता के साथ मैं कहना चाहता हूँ कि इस मामले पर अधिक गंभीरता से गौर किये जाने की जरूरत है। विस्तार में तो मैं नहीं जा सकता यहाँ, लेकिन मैं यह कहना चाहता हूँ कि ऐसे रिश्ते को सीधे अ-प्राकृतिक कह देने के पीछे कोई तर्क नहीं है, अगर कुछ है तो बस इतना ही कि इसे अप्राकृतिक कहकर इससे छुटकारा पा लेने की 'नैतिक परंपरा' का निर्वाह। प्रकृति बहुत व्यापक और विविधताओं से संपन्नहै। वस्तुतः जो अ-प्राकृतिक है वह किया ही नहीं जा सकता है! नहीं तो घर बनाकर रहना, हजामत करवाना, कपड़ा पहनना, भोजन पका कर खाना आदि अप्राकृतिक क्यों नहीं हैं? यह सिर्फ नैतिक मसला नहीं है। असल में यह सांस्कृतिक और मनोवैज्ञानिक मसला है और इसके जैविक-सामाजिक कारण हैं, मुझे लगता है कि इस नजरिये से विचार किया जाना शायद अधिक उचित है। बहरहाल एक जरूरी बात तो यह है ही और बढ़ती हुई वैश्विक प्रवृत्ति भी ...... इस पर और गंभीरता से विचार यहआं किया जाना अपेक्षित है..

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