Enter your keyword

Monday, 9 January 2012

यूँ ही .....कभी कभी...


रद्दी पन्ना -
सफ़ेद कोरे पन्ने सी थी मैं 
जिस पर जैसी चाहे 
इबारत लिख सकते थे तुम
पर तुमने भी चुनी काली स्याही 
यह सोच कर कि उसी से चमकेगा पन्ना 
पर भूल गए तुम 
उन काले शब्दों को उकेरना होता है 
बेहद एहतियात से 
तनिक स्याही बिखरी नहीं कि  
शब्द बदल जाते हैं धब्बों में
और फिर वह पन्ना 
जो सज सकता था किसी पुस्तक में 
रह जाता है बस एक रद्दी बनकर 
जिसमें सिर्फ 
मूंगफलियाँ लपेटी जा सकती है.

माचिस -
दोष तुम्हारा नहीं जान 
तुमने तो वही किया 
जो दस्तूर था
चाहा अपना भला 
सोचा अपने लिए
और बन गए घी का दीया
गुनाह तो मेरा था 
जो खुद को भुला 
बन गई डिब्बी माचिस की 
और जली तीली तीली तेरे लिए.

वापसी -
यूँ चलते चलते तेरे साए में 
राह से मिटा डाले कदमो के छापे भी 
जो उन्हीं के सहारे वापस जा सकती 
अब तो ढूँढनी होंगी नई राहें 
तलाशने होंगे जरिये
जोड़ना होगा सामान 
फिर से सफ़र के लिए 
यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना 
अब आसां ना होगा.

90 comments:

  1. teeno ek se badhkar ek.. :) :)

    ReplyDelete
  2. all is good but the last one is best..... तलाशने होंगे जरियेजोड़ना होगा सामान फिर से सफ़र के लिए यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना अब आसां ना होगा....bahut khub likha hai aapne :)

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर..
    सभी कवितायेँ लाजवाब.

    ReplyDelete
  4. विचार और चिंतन के धरातल पर तीनो कविताएँ ठीक है. महज भावुकता ही नहीं है यहाँ, यथार्थ की स्वीकारोक्ति भी है.

    ReplyDelete
  5. तीनो रचनाये शानदार भावों को संजोये।

    ReplyDelete
  6. एक बात बताइए भई.... आप अपनी तरह ही सुंदर क्यूँ लिखतीं हैं?

    दोष तुम्हारा नहीं जान
    तुमने तो वही किया
    जो दस्तूर था

    चाहा अपना भला
    सोचा अपने लिए
    और बन गए घी का दीया

    बहुत ही गहरी पंक्तियाँ हैं....


    कम आआआल है....

    ReplyDelete
  7. बहुत खूबसूरत क्षणिकाएं ।
    लेकिन ये मन में उपजी कैसे ! !

    ReplyDelete
  8. तीनों रचनाएँ बहुत भावपूर्ण और लाज़वाब...

    ReplyDelete
  9. बेहद खूबसूरत तीनो क्षणिकाएं...


    यूँ ही कभी कभी दिल में
    कुछ बाते उठती हैं
    और बन जाती हैं
    एक खूबसूरत कविता ... अनु

    ReplyDelete
  10. दर्शन का सम्पुट , क्षणिकाओ को विशेष बना रहा है . चिंतन के धरातल पर यथार्थ का उल्लेख , खूबसूरत .

    ReplyDelete
  11. bahut bahut bahut khoob
    aapki soch kamal hai sunder bhav sunder shbd badhai
    rachana

    ReplyDelete
  12. शब्द लिखने के प्रयास में स्याही फैल जाती है, उसे एक कला का रंग दे दें हम सब।

    ReplyDelete
  13. तीनों ही अच्छी रचनाएं हैं.

    ReplyDelete
  14. Teeno rachanayen ek se badhke ek hain! Maza aa gaya!

    ReplyDelete
  15. सर्दिया उदास होती है सुना था पर इसकी कोहरे की नमी मौसम के साथ कविताओं में महसूस कर रही हूँ .....

    ReplyDelete
  16. सभी अच्छी हैं. दूसरी मुझे अधिक अच्छी लगी तीनों में.

    ReplyDelete
  17. सुन्दर भावाभिव्यक्ति है आपकी
    इसके लिए आभार
    http://vicharbodh.blogspot.com

    ReplyDelete
  18. भावपूर्ण रचनायें साथ ही नया कलेवर अच्छा लगा
    - शुभकामनायें

    ReplyDelete
  19. कुछ सुना-सुना सा लगा.. कुछ गुनगुनाया सा, ऐसा लगा कि ये क्षणिकाएं चुपके से कोइ कानों में फुसफुसाकर कह गया हो.. पीछे मुडकर देखा तो कोइ नहीं था..शायद ठंडी हवा थी, गुनगुना कर चली गयी!! और छोड़ गयी एक स्पंदन!!

    ReplyDelete
  20. जो सज सकता था किसी पुस्तक में
    रह जाता है बस एक रद्दी बनकर
    जिसमें सिर्फ
    मूंगफलियाँ लपेटी जा सकती है.

    ......................................................................
    बहुत सी संवेदनशील कविताऐं, आभार कि संवेदना के उच्च शिखर पर जा कर इसे महसूस किया और फिर शब्दों की सुन्दर बगीया बना दी। बहुत दिनों बाद आना हुआ, अफसोस है। जारी रखिए ताकि हिन्दी साहित्य को इसी तरह की उंचाई मिलती रहे।
    सादर।

    ReplyDelete
  21. तीनों रचनाएँ बहुत लाज़वाब| आभार|

    ReplyDelete
  22. आपके शब्द स्वयं तो स्पंदित होते ही हैं,पढने वाले को भी स्पंदित कर जाते हैं |

    ReplyDelete
  23. बहुत ही खुबसूरत रचनाये.....

    ReplyDelete
  24. तीनो ही रचनाएँ बेहद सारगर्भित और यथार्त्वादी दृष्टिकोण से रूबरू होती, खास कर तीसरी कविता मुझे बेहद ही अच्छी लगी.. शुभकामनाएँ ! सादर नमन !

    ReplyDelete
  25. मूंगफलियाँ लपेटी जा सकती है.

    मूंगफलियाँ ही क्योँ ???

    यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना
    अब आसां ना होगा.

    बात तो सही है .....लेकिन कोशिश करके देखिये ..उससे भी अच्छी मंजिल मिल सकती है .......!

    ReplyDelete
  26. सफ़ेद कोरे पन्ने सी थी मैं
    जिस पर जैसी चाहे
    इबारत लिख सकते थे तुम
    पर तुमने भी चुनी काली स्याही ... aur ab khoj rahe ho syaahi sokhnewala kagaj ...sari rachna kshnik , per gahri

    ReplyDelete
  27. बेहतरीन आभार

    ReplyDelete
  28. एक गहन सोच से निकली तीनो क्षणिकाएं ...!!
    बहुत सुंदर .

    ReplyDelete
  29. Teeno kavitayen ek se badhkar ek hain....bhavpoorn, saargarbhit aur paripoorn kavitayen...

    Shubhkamnayen...kavitaon ki taraf vapasi ke liye....

    Saadar...

    Deepak..

    ReplyDelete
  30. सर्दी के मौसम में मूंगफली ही याद रही ... पुडिया में लिपटी हुई ...

    तीली तीली जल किया दिए को रौशन ..बहुत संवेदनशील क्षणिका ..

    लौटते कदम मंजिल तक वापस नहीं आते बस राहें ही मिलती हैं ...

    तीनों क्षणिकाएं गहन भावों को समेटे हुए ..

    ReplyDelete
  31. "रद्दी पन्ना" तो पहले पढ़ चुका हूँ और अपने अभिप्राय से भी अवगत कराया है । "माचिस" और "वापसी" दोनों ही अति-लघु कविताओं ने बहुत प्रभावित किया । "माचिस" में 'घी का दीया' प्रतीक के मिस पुरुष की स्वार्थपरक अहम्मन्यता को अंतर्तम तक पहुँच कर चुनौती दी है । तिल-तिल तीली-तीली मिटकर एक स्त्री अपना सर्वस्व निछावर कर जिस पुरुष को सभी के सम्मान का दर्ज़ा हासिल कराती है वही पुरुष उसे सामान्य मनुष्यता की श्रेणी में भी रखने को तैयार नहीं दिखता, इसी संतप्त करते सच को प्रकट करती सशक्त रचना है यह ! 'वापसी'में "अब ढूंढनी होंगी नई राहें...उसी मंज़िल पर लौटना अब आसाँ न होगा" पंक्तियाँ बहुत सहज लगीं । कब तक आखिर स्त्री आज़माइशों के दौर से गुजरती रहे, अग्निपरीक्षाओं पर खरी उतरती रहे ? ऐसी किसी भी मंज़िल पर न चल सक्ने की असमर्थता व्यक्त करती नारी का दृष्टिकोण बहुत भाया ! अभिनन्दन शिखा जी, इतने कम शब्दों में इतनी सच्ची और अच्छी बातें बनाना हर किसी के लिए संभव नहीं होता !

    ReplyDelete
  32. तीनों रचनाओं में गजब के भाव।
    बेहतरीन।

    ReplyDelete
  33. तीनों क्षणिकाएं बेहतर .....
    हर जगह पुरुष है ..अपने अहम् के साथ.
    हर जगह स्त्री है ...शिकायतों के साथ....
    अस्तित्व की पहचान का संकट पुरानी समस्या है.
    उसके संरक्षण की ज़द्दोजहद के साथ हर जगह शिखा जी भी हैं....
    शिखा जी ! आप क्रांतिकारी हैं क्या ?

    ReplyDelete
  34. ज़बरदस्त!!!! तीनों की तीनो!!!!

    ReplyDelete
  35. सोचने को मजबूर करती रचनाएँ ....
    शुभकामनायें आपको !

    ReplyDelete
  36. माचिस की तीली सी जली तेरे लिए ...
    कोरा कागज़ रद्दी बांटे देर कितनी लगती है ...
    उन्ही राहों पर भी चले मगर मंजिल वही अब कहाँ ...
    सभी बेहतरीन!

    ReplyDelete
  37. यु ही कभी -कभी ऐसा भी होता हैं ....बहुत ही सुंदर क्षणिकाए ...पेश करने का अंदाज भी जुदा ..

    ReplyDelete
  38. गहन सोच से निकली तीनो क्षणिकाएं ...!

    ReplyDelete
  39. यह निराशा के भाव क्‍यों? भारत में स्‍त्री को मातृ-स्‍वरूप मानते हैं जिसमें सारी दुनिया को बदलने और संस्‍कारित करने की क्षमता होती है।

    ReplyDelete
  40. उम्दा...
    बेहतरीन..
    क्या कहने हैं.....
    हर शब्द बोल रही है...
    क्या कहूँ शब्दों की कमी है..
    बहुत हो गया.........
    अब:)))))

    ReplyDelete
  41. वाह शिखा जी.. रद्दी पन्ना और माचिस तो बेहतरीन कृतियाँ हैं..
    बेहद भावनात्मक...

    प्यार में फर्क पर आपके विचार ज़रूर दें..

    ReplyDelete
  42. एक अच्छी रचना के लिए ढेर सारी बधाइयाँ |

    ReplyDelete
  43. एक से अधिक बेहतरीन रचना एक बार में पोस्ट नहीं करनी चाहिए, यह ब्लॉगिंग का असूल है, वरना किस पर कमेंट करें किसको छोड़ें का प्रश्न सामने खड़ा हो जाता है ...

    हम तो बस लाजवाब कहेंगे और बधाई देंगे।

    ReplyDelete
  44. खूबसूरत कवितायें... तीनों की तीनों

    ReplyDelete
  45. तीनों रचनाएं बेहद सशक्त. ये चाँद शब्द बहुत गहरे अर्थ रखते हैं...
    जोड़ना होगा सामान
    फिर से सफ़र के लिए
    यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना
    अब आसां ना होगा.
    शुभकामनाएं.

    ReplyDelete
  46. बेहतरीन कविता बधाई शिखा जी

    ReplyDelete
  47. Vapsi aur machis ... Bahut kuch sochne pe majboor karti hain ... Lajawab .....

    ReplyDelete
  48. SORRY DIOSA,
    APKO IS MOOD MAIN ACCEPT NAHI KAR SAKTE HAM, PLZ ............

    ReplyDelete
  49. हर वह चीज जिसे हम यूँ ही देख कर नजरअंदाज कर देते हें उसको अगर इस शिद्दत से लिखा और पढ़ा जाय तो फिर वो कुछ और ही बन जाता है. रद्दी कागज और माचिस की डिब्बी बहुत सुंदर प्रस्तुति .

    ReplyDelete
  50. वाह ....तीनों क्षणिकाएं ..बेहतरीन हैं ।

    ReplyDelete
  51. बढिया हैं तीनों कवितायें.

    ReplyDelete
  52. वाह जी वाह...क्या माहौल बना है....बेहतरीन!!

    ReplyDelete
  53. उन काले शब्दों को उकेरना होता है
    बेहद एहतियात से
    तनिक स्याही बिखरी नहीं कि
    शब्द बदल जाते हैं धब्बों में
    और फिर वह पन्ना
    जो सज सकता था किसी पुस्तक में
    रह जाता है बस एक रद्दी बनकर
    wah! kya shabda hain. kuchh hi shabdon men pura jeevan darshan. badhai.

    ReplyDelete
  54. क्या कवितायें है!

    ReplyDelete
  55. वाह क्या कवितायें हैं। :)

    ये ऊपर वाला अनामी कमेंट भी हमारे माउस से ही छिटककर भाग गया था। सबर नहीं कमेंट तक को!

    ReplyDelete
  56. सुन्दर और स्पष्ट भाव
    बहुत ही सुन्दर और सार्थक कविता

    ReplyDelete
  57. यूँ चलते चलते तेरे साए में
    राह से मिटा डाले कदमो के छापे भी
    जो उन्हीं के सहारे वापस जा सकती
    अब तो ढूँढनी होंगी नई राहें
    तलाशने होंगे जरिये
    जोड़ना होगा सामान
    फिर से सफ़र के लिए
    यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना
    अब आसां ना होगा.
    सारगर्भित पोस्ट है भुत सुन्दर|

    ReplyDelete
  58. सभी कवितायेँ बेहतरीन

    ReplyDelete
  59. शनिवार 14-1-12 को आपकी पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    ReplyDelete
  60. आपकी कवितायेँ आपके संस्मरणों से कतई उन्नीस नहीं ....कई भावों को स्फुरण दे दती हैं.... हाय रे .....

    ReplyDelete
  61. Wah....adbhut...bahut khub...

    www.poeticprakash.com

    ReplyDelete
  62. bahut gahrai hai aapki kavitaon mein

    ReplyDelete
  63. तीनों एक से बढ़कर एक ! बहुत सुन्दर !

    ReplyDelete
  64. भावपूर्ण लाजबाब प्रस्तुति,बढ़िया अभिव्यक्ति,क्षणिकाए अच्छी लगी.....
    new post--काव्यान्जलि : हमदर्द.....
    कई बार अनुरोध के बाद आप मेरे पोस्ट पर नही पहुची,क्या यही शिष्टाचार है,ब्लॉग जगत का,..

    ReplyDelete
  65. तनिक स्याही बिखरी नहीं कि
    शब्द बदल जाते हैं धब्बों में
    .....

    और जली तीली तीली तेरे लिए.
    ......

    यूँ तो उसी मंजिल पर लौटना अब आसां ना होगा.
    ...
    शिखा जी की कलम कुछ लिखे और वो सोंचने पर मजबूर न करे ऐसा हो ही नहीं सकता.
    तीनों लघु कवितायेँ सशक्त !!

    ReplyDelete
  66. तीनो रचनाये बहुत ही लाजवाब है
    बेहतरीन अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  67. माचिस की तीली सी जली तेरे लिए..अनुपम भावो से सजी कविता दर्द के दरिया से गुजरती है और उसका एहसास कराती है.

    ReplyDelete
  68. तनिक स्याही बिखरी नहीं कि
    शब्द बदल जाते हैं धब्बों में...
    bahut khoob...aabhar

    ReplyDelete
  69. wow!!!!!!!!!! first tym i read article in spandan blog.........i really like it alot!!!!....frn now...i vl b regular reader.......n share my thots tooo.......!!!!!

    ReplyDelete
  70. देखन में छोटन लगे.. घाव करे गंभीर। तीनों कविताएं पसंद आईं

    ReplyDelete
  71. वाह-वाह
    कागज़ पर जज्बा-ए-दिल बहुत ही ख़ूब-सूरत अंदाज़ से लिखा है/

    http://rhythmvyom.blogspot.com/

    ReplyDelete
  72. .
    बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति, बधाई.

    पधारें मेरे ब्लॉग पर भी और अपने स्नेहाशीष से अभिसिंचित करें मेरी लेखनी को /

    ReplyDelete
  73. तीनो रचनाये बहुत ही लाजवाब है
    बेहतरीन अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  74. kammal ka likha hai......

    ReplyDelete
  75. teeno kavitaye bahut hi sundar avm prbhavshali abhivykti ke sath ....abhar shikha ji.

    ReplyDelete
  76. तीनों कविताएँ वास्तविकता दर्शाती है...सुन्दर प्रस्तुति!

    ReplyDelete
  77. AGNI SHIKHA WALI KAWITA..SABHAAR

    ReplyDelete
  78. आपकी किसी पोस्ट की चर्चा है नयी पुरानी हलचल पर कल शनिवार 21/1/2012 को। कृपया पधारें और अपने अनमोल विचार ज़रूर दें।

    ReplyDelete
  79. गहन भावों ले भरी कविता मन को आंदोलित कर गयी । पोस्ट अच्छा लगा । मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है । धन्यवाद .

    ReplyDelete
  80. ओह! बेहतरीन कविताएँ.
    एक से एक लाजबाब.
    आपकी कवितायें आपके स्पंदनों
    को इतना मृदुल कर देती हैं
    कि आपके ब्लॉग से वापिस
    जाने का मन नही करता.

    पर मजबूरी है.अब आप मेरे ब्लॉग
    पर आईयेगा अपने मृदुल स्पंदनों का
    विस्तार करने के लिए.ताकि मैं
    अपने ब्लॉग पर भी रह सकुं

    ReplyDelete
  81. शब्द बदल जाते हैं धब्बों में
    और फिर वह पन्ना
    जो सज सकता था किसी पुस्तक में
    रह जाता है बस एक रद्दी बनकर
    जिसमें सिर्फ
    मूंगफलियाँ लपेटी जा सकती है.
    लाजवाब। सुन्दर कविता के लिये बधाई।

    ReplyDelete
  82. 'Vaapsi' aur 'raddi panna' pasand aaee... ek arse ke baad ('buzz' ke baad)aaj spandan par aana achchha laga...

    ReplyDelete
  83. इतने गहरे एहसास...
    इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति!
    वाह!

    ReplyDelete

पसंदीदा पोस्ट्स

ईमेल से जुड़ें

संपर्क

Name

Email *

Message *