Enter your keyword

Thursday, 20 October 2011

गट्ठे भावनाओं के


जब भी कभी होती थी
संवेदनाओं की आंच तीव्र
तो उसपर 
अंतर्मन की कढाही चढ़ा
कलछी से कुछ शब्दों को 
हिला हिला कर
भावों का हलवा सा 
बना लिया करती थी
और फिर परोस दिया करती थी
अपनों के सम्मुख
और वे भी उसे 
सराह दिया करते थे
शायद  मिठास से 
अभिभूत हो कर ,
पर अब उसी कढाही में 
वही बनाने लगती हूँ
तो ना जाने क्यों
आंच ही नहीं लगती
थक जाती हूँ 
कलछी चला चला कर
पर  लुगदी भी नहीं बनती अब
और बन जाते हैं 
गट्ठे भावनाओं के
जिन्हें किसी को  परोसने की 
हिम्मत नहीं होती मेरी
इंतज़ार में हूँ कि 
कोई झोंका आकर बढ़ा जाये
कम होती आंच को
तो इन गट्ठों  को गला कर
परोस सकूँ अपनों के समक्ष

68 comments:

  1. आंच के ऊपर व्यस्तताओ की राख जम गई है ,फूंक मारिये ..आंच पुन: जीवित हो उठेगी और भांप बन आँखों से निकलेगी

    ReplyDelete
  2. बहुत-बहुत बधाई ||
    खूबसूरत ||

    ReplyDelete
  3. गट्ठे भावनाओं के...
    बढ़िया...!
    मार्मिक भावनाएं, मार्मिक जतन ... !!!

    ReplyDelete
  4. हलवा मुझे बहुत प्रिय है , अभी तो पढ़ के स्वाद ले रहा हूँ . शाम को जिह्वा वाला . हम अपनी दुआ में आपके लिए हवा का झोंका भी शामिल कर लेते है . भावनाओ की मिठास ने कविता को यम्मी यम्मी बना दिया .

    ReplyDelete
  5. शायर ने कहा है:
    बेख्याली में कहीं उंगलियां जल जायेंगी,
    राख गुज़ारे हुए लम्हों की कुरेदा न करो!
    आँच जेनेरली राख में ही दबी होती है.. कभी अकेले में उनको हवा दीजिए, खुद से मुलाक़ात कीजिये... बस हमारे लिए फिर से वही स्वादिष्ट व्यंजन बन जाएगा!!

    ReplyDelete
  6. प्रेमासिक्त अभिलाषा
    कड़ाई=कढाही?

    ReplyDelete
  7. मार्मिक भावनाएं, मार्मिक जतन, अति सुन्दर अगरिम दीपावली हार्दिक बधाई .

    ReplyDelete
  8. वाह शिखा जी क्या बात है, आखिर बोर होते-होते भी आपने गट्ठे ही सही.... कुछ तो बना ही लिया फिलहाल मुझ से तो अभी तक वो भी नहीं बन पाये ;)....

    ReplyDelete
  9. @अरविन्द मिश्रा!शुक्रिया ध्यान दिलाने का:)

    ReplyDelete
  10. वाकई शिखा !
    भावनाओं की गर्मजोशी कम होती जा रही है ! केवल दिखावे से काम नहीं चलने वाला ...
    परस्पर स्नेह और विश्वास पैदा करना ही होगा !
    शुभकामनायें आपको !

    ReplyDelete
  11. शिखा जी!

    इंतज़ार में हूँ कि
    कोई झोंका आकर बढ़ा जाये
    कम होती आंच को
    तो इन गट्ठों को गला कर

    जब प्रेरणा की आंच कम होने लगती है तब बहुधा
    रचनातमक ठहराव आ जाता है। उससे जनित कशमकश पर भावपूर्ण प्रस्तुति। बहुत सुंदर। शुभकामनायें

    ReplyDelete
  12. आज कल संवेदनाओं में ताप कहाँ रहा है? बहुत ही संवेदनशील और भावपूर्ण प्रस्तुति..

    ReplyDelete
  13. shikha jiaapto bekhayali me bhi sabhi ka khayal likh deti hai bahut bahut badhai
    rachana

    ReplyDelete
  14. bhaavnaaon ko dusron ke samakh parosnaa itna aasaan nahin hota, waqt ka jhonka hin lugdi bana deta hai, garm tazaa halua ke liye taazi hawaa kaise aaye? khud mein hin wo aanch laani hogi taaki swaadisht halua ban sake. bahut sundar bimb, badhai Shikha ji.

    ReplyDelete
  15. सुन्दर अभिव्यक्ति. सुना है धीमी आंच में पकाई हुई चीज अधिक लज्जतदार होती है.

    ReplyDelete
  16. अश्विनी जी को यहाँ कमेन्ट करने में कुछ परेशानी आ रही है.उनकी मेल से प्राप्त टिप्पणी-
    Ashwini Kumar Vishnu रसोईघर और घर-परिवार के बिंबों से बुनी हुई सुन्दर कविता है "गट्ठे भावनाओं के।"

    ReplyDelete
  17. प्रेरक एक झोंका कम होती आंच को सघन कर जाये!
    सुन्दर अभिव्यक्ति!

    ReplyDelete
  18. vaise aap jo bhi banati hain bahut swadisht hota hai.....chahe gatte hi kyun na ho.

    ReplyDelete
  19. पहली बार किसी पकवान में दर्शन देख रहा हूँ।

    ReplyDelete
  20. वाह! पकवानों की बातों में भी भावनाओं का सुंदर प्रयोग।

    ReplyDelete
  21. सुन्दर कविता है शिखा जी.

    ReplyDelete
  22. पर अब उसी कढाही में
    वही बनाने लगती हूँ
    तो ना जाने क्यों
    आंच ही नहीं लगती
    थक जाती हूँ

    जब संवेदनाओं की आंच
    पड़ने लगे मध्यम ...
    खींच एक गहरी साँस
    छोड़ दो जोर से ...
    दिल में जमी
    राख झड जायेगी ...
    मन में एक
    नयी चेतना आएगी ..
    फिर चढा देना
    मन की कढाही को
    उस आंच पर ..
    वैसे गट्ठे बनी
    भावनाएं भी
    मिठास से परिपूर्ण हैं ..
    उन्हें पा कर भी
    हम अभिभूत हैं

    भावनाओं से ओत- प्रोत सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  23. संवेदनाओं की आंच , भावनाओं का हलवा ...
    रसोई से उपजी इस कविता में भवनों के गट्ठे होने के बाद भी मिठास है ....
    बेहतरीन , लाजवाब !

    ReplyDelete
  24. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    यहाँ पर ब्रॉडबैंड की कोई केबिल खराब हो गई है इसलिए नेट की स्पीड बहत स्लो है।
    बैंगलौर से केबिल लेकर तकनीनिशियन आयेंगे तभी नेट सही चलेगा।
    तब तक जितने ब्लॉग खुलेंगे उन पर तो धीरे-धीरे जाऊँगा ही!

    ReplyDelete
  25. बहुत खूबसूरत कविता दीपावली की शुभकामनायें

    ReplyDelete
  26. बहुत खूबसूरत कविता दीपावली की शुभकामनायें

    ReplyDelete
  27. भावपूर्ण और मार्मिक रचना....

    ReplyDelete
  28. आपकी आंच तो इतनी तीव्र है कि हलुवा क्‍या जलेबी भी बन जाए।

    ReplyDelete
  29. भावों का हलवा और कविता में दर्शन, वाह..

    ReplyDelete
  30. उम्दा है यह तो.. खाने वाले पकवान को सोच वाले पकवान से मिलाया है आपने!

    ReplyDelete
  31. Waah.. bahut gahre bhav ukere hain aapne..
    Badhai..

    ReplyDelete
  32. वाह ...बेहतरीन अभिव्‍यक्ति ।

    ReplyDelete
  33. अरे यार तुम किस चक्कर मे पड गयीं………मोहब्बत की आँच पर पकाओ फिर देखो कितना स्वादिष्ट भोजन बनेगा।

    ReplyDelete
  34. आपकी इस कविता में काव्यात्मकता के साथ-साथ संप्रेषणीयता भी है। जीवन के जटिल से जटिल यथार्थ को बहुत सहजता के साथ प्रस्तुत कर दिया है आपने, और यदि गट्ठा है भी, तो बहुत ही स्वादिष्ट है, अब इसे दिखा दिया है तो परोस भी दीजिए। आपकी भा्षा काव्यात्मक है और इसमें उलझाव नहीं है, केवल गट्ठा होता तो शायद उलझाव होता। आपकी कविता पाठक को कवि के मंतव्य तक पहुंचाती हैं, यानी आपने अतिरिक्त पच्चीकारी नहीं की है, इसलिए यह गट्ठा भी हलवे की तरह ही स्वादिष्ट है।

    ReplyDelete
  35. ab log shabdo se duri banayenge to yahi hoga....:)
    shabdo ke halwa ke badle .....all time available shabdo ke pastry liye facebook pe samay beetayenge to kaise ban payega :)
    .
    .
    waise tumhare pass shabdo ki thathi hai, thori si koshish matra se hi wo jeevant ho uthegi...aur wo iss kavita me dikh bhi raha hai..!!

    god bless my friend!!
    puri duniya tumahre post ka wait karti hai:)

    ReplyDelete
  36. bahut khoob...aanch punah tej hogi ..visvas rakhiye....

    ReplyDelete
  37. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

    ReplyDelete
  38. बहुत अच्छी रचना,बधाई!

    ReplyDelete
  39. बहुत खूबसूरती से भावों को प्रस्तुत किया..बधाई.

    ReplyDelete
  40. पाक कला के साथ..जीवन दर्शन का अद्भुत संगम

    ReplyDelete



  41. अब उसी कढाही में वही बनाने लगती हूँ
    तो ना जाने क्यों
    आंच ही नहीं लगती
    थक जाती हूँ कलछी चला चला कर
    पर लुगदी भी नहीं बनती अब
    और बन जाते हैं गट्ठे भावनाओं के
    जिन्हें किसी को परोसने की हिम्मत नहीं होती मेरी
    इंतज़ार में हूँ कि कोई झोंका आकर बढ़ा जाये
    कम होती आंच को
    तो इन गट्ठों को गला कर
    परोस सकूँ अपनों के समक्ष

    नये बिंबों के सहारे भावनाओं की अद्भुत प्रस्तुति आपकी इस भावपूर्ण रचना में हुई है …

    बधाई और साधुवाद स्वीकार करें स्नेह मूर्ति शिखा वार्ष्णेय जी !



    आपको सपरिवार
    दीपावली की बधाइयां !
    शुभकामनाएं !
    मंगलकामनाएं !

    -राजेन्द्र स्वर्णकार

    ReplyDelete
  42. बहुत ही संवेदनशील और भावपूर्ण प्रस्तुति| दीवाली की शुभ कामनाएं|

    ReplyDelete
  43. MAN KO BAHLANE KE LIYE YAH KHYAL BEHTAR HAI

    ReplyDelete
  44. इन भावनाओं के गट्टों की मिठास के आगे हलवे की क्या बिसात....

    जय हिंद...

    ReplyDelete
  45. सुन्दर सृजन , प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें.

    समय- समय पर मिले आपके स्नेह, शुभकामनाओं तथा समर्थन का आभारी हूँ.

    प्रकाश पर्व( दीपावली ) की आप तथा आप के परिजनों को मंगल कामनाएं.

    ReplyDelete
  46. कहीं न कहीं चिंगारी जरूर होगी ... आंच आती रहेगी ... शब्दों को नए बिम्ब दिए हैं आपने इस रचना में ..

    ReplyDelete
  47. शिखा जी लगता हलवे की जगह
    स्वादिष्ट खीर परोस दी है आपने
    इस बार.खाते खाते मन ही नही
    भर रहा.क्या संवेदना की आंच
    के बजाय आपने स्पंदनों का
    'माइक्रो वेव'ऑन कर दिया है.

    अनुपम प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत
    आभार.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर भी
    आईयेगा.

    ReplyDelete
  48. तो इन गट्ठों को गला कर
    परोस सकूँ अपनों के समक्ष
    बहुत सुंदर ...सच बहुत कुछ रहता है भीतर कहे सुने जाने को...........

    ReplyDelete
  49. आपको एवं आपके परिवार के सभी सदस्य को दिवाली की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें !
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

    ReplyDelete
  50. कविता मुझे पसंद आई..... गट्ठे भावनाओं के..........बहुत ही प्यारी लाइंस......हैं...... आपको दीपावली की बहुत बहुत शुभकामनायें....

    ReplyDelete
  51. ऐसे ही भावना ओके गठ्ठे ही परोस दिया करे स्वादिस्ट लगते है ..और इन्ही गठ्ठो में भी कोई नयी ही मिठाई चखने को मिल जाएगी ...good..... posting ..

    ReplyDelete
  52. दीपावली केशुभअवसर पर मेरी ओर से भी , कृपया , शुभकामनायें स्वीकार करें

    ReplyDelete
  53. दीपावली के पावन पर्व पर आपको मित्रों, परिजनों सहित हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएँ!

    way4host
    RajputsParinay

    ReplyDelete
  54. आपके पोस्ट पर आना सर्वदा सार्थक सिद्ध होता है । पोस्ट बहुत ही अच्छा लगा । मेरे पोस्ट पर आपका स्वागत है । दीपावली की शुभकामनाएं ।

    ReplyDelete
  55. बहुत बढ़िया लिखा है आपने! लाजवाब प्रस्तुती!
    आपको एवं आपके परिवार के सभी सदस्य को दिवाली की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें !
    मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है-
    http://seawave-babli.blogspot.com/
    http://ek-jhalak-urmi-ki-kavitayen.blogspot.com/

    ReplyDelete
  56. आपके पोस्ट पर आना सार्थक सिद्ध हुआ। मेरे नए पोस्ट पर आपका स्वागत है ।.दीपावली की शुभकामनाएं ।

    ReplyDelete
  57. gatte itne zaykedar kbhi nhi khaye the shukriya happy divali

    ReplyDelete
  58. जीवन का सार कह दिया है आपने इस कविता में.. बहुत सुन्दर.. मर्मस्पर्शी..

    ReplyDelete
  59. आपकी पोस्ट की हलचल आज (30/10/2011को) यहाँ भी है

    ReplyDelete
  60. अद्भुत रचना...
    सादर...

    ReplyDelete
  61. चूल्हा-चौका,करछुल कड़ाही
    जिंदगी देती दिखाई
    सिम को थोड़ा ऑन करलो
    गट्ठे को पकवान करलो.

    शुभ-दीपावली.....

    ReplyDelete
  62. सुन्दर भावाव्यक्ति...बधाई.

    ReplyDelete

पसंदीदा पोस्ट्स

ईमेल से जुड़ें

संपर्क

Name

Email *

Message *