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Monday, 9 May 2011

पुरानी कमीज



कल रात
किवाड़ के पीछे लगी खूंटी पर टंगी 
तेरी उस कमीज पर नजर पड़ी 
जिसे तूने ना जाने कब 
यह कह कर टांग दिया था 
कि अब यह पुरानी हो गई है.
और तब से 
कई सारी आ गईं थीं नई कमीजें 
सुन्दर,कीमती, समयानुकूल 
परन्तु अब भी जब हवा के झोंके 
उस पुरानी कमीज से टकराकर 
मेरी नासिका  में समाते हैं 
एक अनूठी खुशबू का एहसास होता है
शायद ये तेरे पुराने प्रेम की सुगंध है 
जो किसी भी नई कमीज़ से नहीं आती
इसीलिए मैं जब तब 
उसी की आस्तीनों को 
अपनी ग्रीवा  पर लपेट लेती हूँ 
क्योंकि 
कमीजें कितनी भी बदलो 
प्रेम नहीं बदला जाता 



84 comments:

  1. क्योंकि
    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता

    वाह वाह ………सच कहा प्रेम कभी नही बदलता वो तो हर युग मे शाश्वत रहता है…………बहुत सुन्दर भाव भरे हैं।

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  2. "एक अनूठी खुशबु का एहसास..."
    पढ़ लेने से ही
    लिखे गए शब्द काव्यमय होने लगते हैं
    गुज़रे दिनों की दास्ताँ का इज़हार
    वैसे भी ज़रा मुश्किल सी पैदा कर देता है
    नज़्म अच्छी बन पड़ी है...
    पुराने प्रेम की सुगंध, सच में प्रयोगात्मक जान पड़ा !!

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  3. सच कहा प्रेम कभी नही बदलता| धन्यवाद|

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  4. "क्योंकि
    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता"

    सच कहा आपने ...

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  5. पुरानी कमीज का प्रेम का प्रतीकात्मक बिम्ब प्रयोग मुझे प्रयोगधर्मिता का सही उदहारण लगा . आज कल तो लोग कमीज की तरह प्रेम बदलते है , पुरानी कमीज में सुगंध अगर रची हुई है तो वो प्रेम ही है .आभार इस अद्भुत कविता के लिए .

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  6. प्रेम नहीं बदला जाता --
    क्या लन्दन में भी ऐसा होता है ?

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  7. वाह वाह
    प्रेम नहीं बदलता।

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  8. kammej ke madhyam se aapne, prem ki wo anubhuti jo ki shuruaat me thi ko ujagar kiya he, sundar rupak ka istemaal karte hue,

    ek ehsaaspurn prastuti!

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  9. वाह! वाह! शिखा जी,
    बहुत दिनों से आपकी सुन्दर कविता का इंतजार कर रहा था.
    पुरानी कमीज के माध्यम से प्रेम को अभिव्यक्त करती अनुपम प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत आभार.

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  10. प्रेमाभिव्‍यक्ति के लिए पुरानी कमीज का प्रयोग नया सा लगा। सुंदर प्रस्‍तुति के लिए धन्‍यवाद।

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  11. कमीज़ की सुगंध में लिपटा नारी-विश्वास...
    जो प्रेम को अकूत बना दे...
    ताज़ा-ताज़ा रचना. बढ़िया...

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  12. प्रेम बदला नहीं जाता तो यह पुराना नया कैसे हो गया जी?

    ये नासिका और ग्रीवा पढ़कर ही लगा कि कोई सुसंस्कृत कविता लिखी गयी है।

    बहुत खूब!

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  13. wah kameej bhi nahin badalti, jismein khushboo hoti hai pyaar kee ... bahut achhi rachna

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  14. wah kameej bhi nahin badalti, jismein khushboo hoti hai pyaar kee ... bahut achhi rachna

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  15. बहुत खुश्बूमयी रचना । मेरी साइकिल में एक बार उसका दुपट्टा फ़ंस गया था और उसका एक छोटा सा टुकड़ा फ़ट कर अलग हो गया था , वो आज भी मेरे पास है ,और ’उसकी’ मक्खन जैसी भीनी भीनी खुश्बू आज भी उसमें से ’यदा-कदा’ आ ही जाती है ।
    पता नही ये "यादों की खुश्बू है" कि "खुश्बू की यादें" हैं

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  16. कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता ...

    प्रेम तो सदैव शाश्वत रहता है...बहुत सुन्दर भावमयी प्रस्तुति..

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  17. शायद ये तेरे पुराने प्रेम की सुगंध है
    जो किसी भी नई कमीज़ से नहीं आती
    इसीलिए मैं जब तब
    उसी की आस्तीनों को
    अपनी ग्रीवा पर लपेट लेती हूँ
    क्योंकि
    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता

    pyaar ka bahut hi kareebi ehsaas....

    bahut bahut sunder........

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  18. प्रेम में पगी हुई एक बेहतरीन अभिव्यक्ति, कमीज से. वाह...

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  19. ....................शायद ये तेरे पुराने प्रेम की सुगंध है...........
    विशुद्ध मनोदैहिक घटना का यथार्थ शब्द चित्र खींचा है आपने. प्रथम प्रेमान्कुरण के समय का सम्पूर्ण परिवेश जीवन में स्थायी खुशबू का फ़ासिल बन जाता है. मैं अपनी एक पुरानी रचना को यहाँ लिखने का मोह संवरण नहीं कर पा रहा हूँ. क्षमा याचना के साथ प्रस्तुत है .....

    सुनो ........
    आज डियो मत लगाना
    हमारे प्रेम की पचासवीं वर्ष गाँठ पर
    मैं करना चाहता हूँ
    अपने प्रेम के बीते हुए
    कुंवारेपन का अहसास .
    मैं कैसे बताऊँ
    कि तुम्हारे पसीने की गंध के फ़ासिल
    आज भी जगाते हैं
    प्रेम के नव कोपल
    ठीक
    प्रथम अंकुर की तरह.
    तुम्हारी शलवार और कुरते के
    बेमेल रंग का मेल
    इतना ख़ूबसूरत था
    कि आज के कई
    बेशकीमती सूट भी
    नहीं कर सकते उसका मुकाबला.
    सुनो .......
    मैंने बहुत सहेज कर रखा है
    इन सारी चीज़ों को
    अपनी यादों के फ़ासिल में

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  20. कमीज़ को बिम्ब बना कर प्रेम की अनुभूति को कहना अच्छा लगा ...जो एहसास पहले थे वो खुशबू की तरह कमीज़ में रचे बसे हैं आज भी ..वक्त के साथ एहसासों में बदलाव आना संभव है उनका एहसास नयी कमीजों में नहीं मिलता ...

    प्रेम की गहन अनुभूति को महसूस कराती अच्छी रचना .

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  21. कौशलेन्द्र जी ! इतनी खूबसूरत रचना को यहाँ हमारे साथ बांटने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.

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  22. यह तो है की प्रेम नहीं बदला जाता...

    ग्रीवा मीन्स?

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  23. कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता


    इंसान कोशिश करता है कि वह अपनी जिन्दगी में कुछ नया हासिल करे लेकिन नया हासिल करना उसकी सोच का भ्रम होता है जीवन सदा वैसे ही रहता है ......आपने जैसे कहा है कि कमीजें बदलने से प्यार नहीं बदलता ....बहुत गहरा अर्थ लिए है यह शब्द ...आपका आभार इस सार्थक रचना के लिए ...!

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  24. सटीक कहा ...प्रेम नहीं बदला जाता

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  25. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 10 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  26. इसीलिए मैं जब तब
    उसी की आस्तीनों को
    अपनी ग्रीवा पर लपेट लेती हूँ
    क्योंकि
    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता
    sunder abhi vyakti sahi kaha hai prem kabhi nahi badalta .
    badhai

    ReplyDelete
  27. वाकई !
    प्रेम नहीं बदला जाता ....शुभकामनायें !!

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  28. उनमें बसी हैं यादें।

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  29. • आप, मानवीय भावनाओं और व्यवहार के विस्तृर दायरे की अच्छी समझ रखती हैं।
    इस कविता में कुछ है जो इसे बहुत देर से, कई कई बार पढ़े जा रहा हूं, पर कुछ प्रतिक्रिया नहीं लिख पा रहा।

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  30. कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता
    ekdam alag kism ke bhaw.....achche lage.

    ReplyDelete
  31. कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता

    बहुत सुन्दर भाव ....

    सच कहा प्रेम कभी नही बदला जाता ....

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  32. शायद ये तेरे पुराने प्रेम की सुगंध है
    जो किसी भी नई कमीज़ से नहीं आती
    इसीलिए मैं जब तब
    उसी की आस्तीनों को
    अपनी ग्रीवा पर लपेट लेती हूँ
    क्योंकि
    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता
    Aapko aise anoothe,sundar vichar kahan se soojh jate hain? kaash! Aisee kalpakta mere paas bhee hotee!

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  33. वाह!! आज तो अजब अंदाज रहा..बहुत खूब!!

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  34. बहुत सुंदर अहसास से भरी रचना, धन्यवाद

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  35. अद्भुत ...सुन्दर...मादक ...मधुर...मोहक. और क्या लिखूं....निश्शब्द.
    पंकज.

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  36. प्रेम लपेटे अटपटे.

    ReplyDelete
  37. एक स्पस्ट हताक्षर संबंधों के संस्मरण का ,विकृतियों के दौर में अनावृत होता साक्ष्य ,स्पंदित कर गया ,स्पंदन ने /
    शुक्रिया जी .

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  38. प्रेम और गन्ध का अन्यानोश्रित रिश्ता बखानती कविता
    वह प्रणय -गंध मेरी पहचानी सी !

    ReplyDelete
  39. कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता.

    इस प्रेम कि खुशबु दूर तक फ़ैल रही है. सुंदर कविता खूबसूरत ज़ज्बात लिए हुए.

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  40. .

    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता...

    यथार्थ के बहुत करीब लगी ये रचना । नहीं बदलता है वो प्रेम जो स्मृतियों में रचा बसा होता है । दुनिया का कोई भी ऐश्वर्य , मुकाबला नहीं कर सकता उस प्रेम का।

    .

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  41. कमीजें कितनी भी बदलो , प्रेम नहीं बदलता ..
    प्रेम बदलता नहीं , बस ऊपर धुंधली परत जमती है ...जैसे कई दिनों से रखे सामान पर धूल ...जरा सा झाड़ पोछ दो , फिर से वही रंग-रूप !

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  42. हाय क्या नसीब पाया है मुई इस कमीज़ ने...

    जय हिंद...

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  43. प्रेम की यही तो खासियत है की वो बदला नही जाता --?

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  44. pehalaa pyaar hota hi aesaa hai jo kabhi bhulaa nahi jaataa.bahut saarthak rachanaa.badhaai aapko .

    please visit my blog also and leave the comments.thanks

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  45. बहुत खूब .. पुराने एहसास की खुश्बू सच में जहाँ से नही जाती .... लाजवाब ...

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  46. आदरणीय शिखा जी,
    नमस्कार !
    प्रेम नहीं बदला जाता
    ..........दिल को छू लेने वाली प्रस्तुती

    ReplyDelete
  47. यादों के झरोखे से झाँकना कभी बहुत सुखद तो कभी पीड़ा दायक। परंतु यादें तो होती ही ऐसी। अनुभूति भरे भाव।

    ReplyDelete
  48. बहुत खूब अंतिम पंक्तियाँ प्रभाव छोडती हैं

    ReplyDelete
  49. प्यार वाकई नहीं बदला जा सकता.

    दुनाली पर पढ़ें-
    कहानी हॉरर न्यूज़ चैनल्स की

    ReplyDelete
  50. "शायद ये तेरे पुराने प्रेम की सुगंध है
    जो किसी भी नई कमीज़ से नहीं आती
    ****************************
    *************************
    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता "
    .......................,,,,,,,,,,,,,,,,,,प्रेम रस रांची , ह्रदय की रचना

    ReplyDelete
  51. बहुत खूब , मैं ब्लॉग जगत में नया हूँ तो मेरा मार्गदर्सन करे..
    www.anjaan45.blogspot.com

    ReplyDelete
  52. ..एक अनूठी खुशबू का एहसास होता है
    शायद ये तेरे पुराने प्रेम की सुगंध है
    जो किसी भी नई कमीज़ से नहीं आती...
    --
    बहुत ही सशक्त रचना प्रस्तुत की है आपने!

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  53. उसी की आस्तीनों को
    अपनी ग्रीवा पर लपेट लेती हूँ
    क्योंकि
    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता
    ..esi ko to pyar kahte hain..
    badiya prempadi rachna

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  54. सहेजे हुए अहसास अन्तर्मन के... कमीज के रुप में विशेष खुबसूरती से.

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  55. शिखा जी,
    अभी ये रचना वटवृक्ष पर देखी...
    वाक़ई बहुत उम्दा लिखा है आपने.

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  56. waak kya soch hai....kya likha hai aapne..

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  57. कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता
    अच्छा लगा कभी मेरे ब्लॉग पैर भी पधारे आपका सवागत है

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  58. किताबों में पाए जाने वाले सूखे फूलों की पंक्ति में ला खडा किया है आपने उस पुरानी कमीज़ को.. आज तो ताजमहल भी शर्मा रहा होगा.. एक शहंशाह दौलत का सहारा लेकर भी इस पुराणी कमीज़ का मुकाबला नहीं कर सकता.. शिखा जी बधाई!!!

    ReplyDelete
  59. कमीज का रूपक! सुन्दर उपयोग !!

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  60. bahut sundar .....purani kamij ka pyar bhi koi kam nahi hota,,,yaden jo judi hoti hain. aabhar

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  61. बहुत सुंदर!प्यार व कमीज!बढिया.
    घुघूती बासूती

    ReplyDelete
  62. क्योंकि
    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता
    बहुत खूब हर नई कमीज मे एक स्वार्थ जुडता जाता है और वास्त्विक प्रेम उस गन्ध मे चुपचाप अलसाये बैठा रहता है।लेकिन फिर भी प्रेम का अर्थ समझने वाले को उस गन्ध का एहसास रहता हैभले ही कमीज वाला इन्सान भूल जाये। गहन विचार। शुभकामनायें।

    ReplyDelete
  63. वाह... वक्त के साथ धुंधलाते रिश्तों के मिठास की खूबसूरत सांकेतिक अभिव्यक्ति.... बहुत सुन्दर....

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  64. बढिया सवाल, जवाब वही जो सबका है।

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  65. बड़ी ही कोमल अनुभूति है। साधुवाद।

    ReplyDelete
  66. वाह क्या बात है, पुरानी कमीज़ से आती प्रेम की खुशबू... बहुत प्यारी कविता, बधाई स्वीकारें शिखा जी.

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  67. डियर शिखा!....आप ने दी हुई वेबसाइट बहुत बढिया है..पैकेज अच्छा है...शीघ्र ही जानकारी दुंगी!...धन्यवाद!

    ReplyDelete
  68. Shikha ji charcha manch ke madhyam se aapke blog par first time aai hoon.Puraani kameej ko padha.bahut rochak lagi.really ek choti si kavita ne bahut badi baat kahi hai.kavita me chipe bhaavon ko salute.

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  69. वाह ! आप कविता भी लिखती हैं ! बहुत अच्छा लगा पढ़कर।

    पुरानी कमीज
    हैंगर में टांगते वक्त
    हैंगर का प्रश्न चिन्ह
    कुछ नहीं पूछता ?

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  70. पुरानी कमीज़ केवल कमीज़ नहीं होती .. बहुत सी यादें जुडी होती हैं उनसे... संवेदनशील कविता...

    ReplyDelete
  71. Shikha ji sabse pehle to aapko is anokhi aur khubsurat kavita ke liye badhai.
    prem ko abhivyakt karne ka ek khubsurat tarika...aaj kal purane kapdo main prem ke ahsaas ko koi kaha talashta hain..bas wo to matr ek kapda ban khuti par yunhi tanga rehta hain.

    ReplyDelete
  72. shikha ji
    bahut hi behatreen abhivyakti .antim do panktiyon me aapki rachna ka pura saar uatar aaya hai.
    kitni hi sarlta v sahjta ke saath aapne prem ki paribhashhh ko vykt kiya hai .jo haqikat ka aaina hai .
    kammal ki post
    hardik badhai swikaaren
    poonam

    ReplyDelete
  73. क्योंकि
    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता

    बहुत ही भावपू्र्ण रचना...

    ReplyDelete
  74. सच कहा प्रेम कभी नही बदलता ,बहुत सुन्दर भाव..

    ReplyDelete
  75. क्योंकि
    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता
    मन को छू लेने वाले भाव ...

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  76. चलिये अपनी पत्नी को पढ़ाता हूं शायद वह भी कुछ पुराने अंदाज मे बाते करें

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  77. I like your all post really, Its all are combination of truth of life..............

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  78. बस इतना ही कह सकती हूँ...बहुत सुन्दर

    ReplyDelete
  79. क्योंकि
    कमीजें कितनी भी बदलो
    प्रेम नहीं बदला जाता ....
    आपके लेख जितने पैने और ज्ञानवर्धक होते हैं कवितायेँ उतनी ही सुकोमल ....
    आप एक मुकम्मल लेखनी और समझ से परिपूर्ण हैं!

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