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Tuesday, 22 February 2011

यही होता है रोज.


रोज जब ये आग का गोला 
उस नीले परदे के पीछे जाता है 
और उसके पीछे से शशि 
सफ़ेद चादर लिए आता है 
तब अँधेरे का फायदा उठा 
उस चादर से थोड़े धागे खींच  
अरमानो की सूई से 
मैं कुछ सपने सी  लेती हूँ
फिर तह करके रख देती हूँ 
उन्हें अपनी पलकों के भीतर 
कि सुबह जब सूर्य की गोद से कूदकर 
धूप मेरे आँगन में स्टापू खेलने आएगी 
तब इन सपनो को पलकों से उतार कर 
उसकी नर्म गर्म बाँहों में रख दूंगी  
शायद उसकी गर्मजोशी से 
मेरे सपने भी खिलना सीख जाएँ.
पर इससे पहले ही घड़ी के अलार्म  से 
मेरी पलकें खुल जाती हैं 
और सारे सपने 
कठोर धरातल पर गिर टूट जाते हैं.

72 comments:

  1. बेहद ही सुन्दर और नाज़ुक से बिम्बों में पिरोई हुई चमत्कृत करती एक अत्यंत सुकोमल रचना ! प्रकृति का मानवी स्वरुप और अठखेलियाँ करती कल्पना और शब्दों का सुन्दर संयोजन. इस अप्रतिम रचना के लिए आपको बधाई सम्मानिया शिखा जी ! आभार !

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  2. काश ये अलार्म घडी टिक टिक करना भूल जाती , काश ये समय रुक जाता . आपने मनो भावो की कलियाँ और अरमानो के पुष्प इस कल्पना में ऐसे पिरोये की दिल बाग बाग हुआ . चाँद के सफ़ेद चादर के साथ आने वाला बिम्ब और उसमे से धागे निकाल लेने वाली बात एकदम निराली . रही बात अलंकारो से अलंकृत होने की तो ये कविता मुझे तो अलंकरण की प्रतिमा सी दिखी .

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  3. रोज जब ये आग का गोला
    उस नीले परदे के पीछे जाता है
    और उसके पीछे से शशि
    सफ़ेद चादर लिए आता है
    तब अँधेरे का फायदा उठा
    उस चादर से थोड़े धागे खींच
    अरमानो की सूई से
    मैं कुछ सपने सी लेती हूँ
    Kya kamaal kee kalpana hai!

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  4. बेहद उम्दा शिखा जी ... बहुत खूब !
    कमबख्त यह अलार्म घड़ियाँ बड़ी बेदर्द होती है !

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  5. बेहतरीन रचना के लिए बधाई ।

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  6. उस चादर से थोड़े धागे खींच
    अरमानो की सूई से
    मैं कुछ सपने सी लेती हूँ
    ....
    aaj alarm mat lagana kuch sapne subah hone tak si hi lo

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  7. बहुत अच्छी रचना

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  8. • आपकी आवाज़ संघर्ष की जमीन से फूटती आवाज़ है। सपनों को देखने वाली आंखों की चमक और तपिश भी बनी हुई है। क्रूर और आततायी समय में आपके सच्चे मन की आवाज़ है यह कविता।

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  9. भावनाओं का सुन्दर अहसास. उम्दा प्रस्तुति...

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  10. Rachna mun ko bharpoor sparsh karne
    kee kshamta rakhti hai. laga ki
    jaese
    gaagar mein saagar bhar diya gayaa
    hai . Badhaaee aur shubh kamna .

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  11. @तब अँधेरे का फायदा उठा
    उस चादर से थोड़े धागे खींच
    अरमानो की सूई से
    मैं कुछ सपने सी लेती हूँ.

    वाह वाह!
    बहुत नाजु्कता से पिरोए हैं ये धागे।
    आभार

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  12. आज बस इतना ही कहूँगा.. सो सवीट!!

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  13. तब अँधेरे का फायदा उठा
    उस चादर से थोड़े धागे खींच
    अरमानो की सूई से
    मैं कुछ सपने सी लेती हूँ|
    बेहतरीन रचना के लिए बधाई ....

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  14. बहुत सुंदर कविता, धन्यवाद

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  15. उस चादर से थोड़े धागे खींच
    अरमानो की सूई से
    मैं कुछ सपने सी लेती हूँ

    निशब्द करती पंक्तियाँ...बेहद सुंदर

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  16. ओह ऐसे ही कई बार हसीन सपने टूट जाते है | अच्छी रचना |

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  17. चादर से थोड़े धागे खींच
    अरमानो की सूई से
    मैं कुछ सपने सी लेती हूँ
    फिर तह करके रख देती हूँ
    उन्हें अपनी पलकों के भीतर...
    शिखा जी, कमाल की रचना लगी.

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  18. बहुत कोमल सी कल्पना ...ज़िंदगी की हकीकत को बयाँ करती हुई ..खूबसूरत बिम्बों से सजी हुई ...

    धूप का स्टापू खेलना ..चाँद की चादर से धागे ले कर सिलना .. ..घडी के अलार्म से वक्त को इंगित करना ...बहुत सुन्दर भाव ....

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  19. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.
    खूबसूरत बिम्ब
    किसी एक हिस्से की दाद दूंगा तो अन्याय होगा.
    पूरी रचना लाजवाब है
    सलाम.

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  20. बहुत ही उम्दा रचना , बधाई स्वीकार करें .
    आइये हमारे साथ उत्तरप्रदेश ब्लॉगर्स असोसिएसन पर और अपनी आवाज़ को बुलंद करें .कृपया फालोवर बन उत्साह वर्धन कीजिये

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  21. behad sundar.......chitratmak kavita

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  22. सुंदर रचना -
    खूबसूरती सी ख्वाब पिरोये और पूरा होने का इंतज़ार और उस पर जीवन की सच्चाई ...!!-
    बहुत सुंदर .

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  23. बड़ा बदमाश है ये मुआ अलार्म।

    इसे पढ़कर बहुत दिन पहले की लिखी ये बात याद आ गई:

    सबेरा अभी हुआ नहीं है
    लेकिन लगता है
    यह दिन भी सरक गया हाथ से
    हथेली में जकड़ी बालू की तरह!

    अब
    सारा दिन फ़िर
    इसी एहसास से जूझना होगा।

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  24. शशि की सफ़ेद चादर , उसके धागे ..अरमानों की सुई से सपने पिरोना ...

    लफ़्ज़ों की नाजुकमिजाजी कमाल है ...!

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  25. इससे पहले ही घड़ी की अलार्म से , मेरी पलकें खुल जाती है,अओर सारे सपने कठोर धरातल पर गिर टूट जाते हैं।
    बेहतरीन पंक्ति , ख़ूबसूरत रचना, बधाई शिखा जी।

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  26. बेहतरीन रचना के लिए बधाई

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  27. कि सुबह जब सूर्य की गोद से कूदकर
    धूप मेरे आँगन में स्टापू खेलने आएगी
    तब इन सपनो को पलकों से उतार कर
    उसकी नर्म गर्म बाँहों में रख दूंगी
    शायद उसकी गर्मजोशी से
    मेरे सपने भी खिलना सीख जाएँ.

    itni khubshurat panktiyan...:)
    par mua ye ghari aur alarm ne sab chaupat kar diya.....koi nahi sapne tute nahi...unhone sayad khule palko me aapke vastvik jeevan me pravesh kar liya ho..:)

    bahut khub!! allrounder ho gaye aap...har vidha me parangat!

    god bless you!

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  28. 'Subah jab surya ki god se koodkar dhoop mere aagan me staapoo khelne
    aayegi'
    Wah! ji Wah! laajabaab.

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  29. ऱ्चना बहुत ही वजनदार है, बधाई। लेकिन एक बात - जब हम सपने देखेते हैं तभी तो हकीकत बनती है, इसलिए सपने देखिए और जब भी भोर की पहली किरण का उदय हो उन्‍हें पूरा होने का अवसर भी दें। पुन: बधाई।

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  30. शायद उसकी गर्मजोशी से
    मेरे सपने भी खिलना सीख जाएँ.

    बहुत ही सुन्‍दर भाव ...।

    ReplyDelete
  31. .

    काश ये अलार्म घडी टिक टिक करना भूल जाती , काश ये समय रुक जाता । आपने मनो भावो की कलियाँ और अरमानो के पुष्प इस कल्पना में ऐसे पिरोये की दिल बाग बाग हुआ . चाँद के सफ़ेद चादर के साथ आने वाला बिम्ब और उसमे से धागे निकाल लेने वाली बात एकदम निराली . रही बात अलंकारो से अलंकृत होने की तो ये कविता मुझे तो अलंकरण की प्रतिमा सी दिखी .

    आशीष जी की बेहतरीन टिपण्णी कों मेरी भी मानी जाए । इस शानदार रचना के लिए बधाई स्वीकार करें।

    .

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  32. इस बार के दो शब्द शशि और स्टापू.. बहुत स्मार्टली इन्क्ल्युड किये गए है..

    Nice thought..!!

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  33. पर इससे पहले ही घड़ी के अलार्म से
    मेरी पलकें खुल जाती हैं
    और सारे सपने
    कठोर धरातल पर गिर टूट जाते हैं.

    यथार्थ का धरातल कितना कठोर होता है…………है ना।
    सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  34. गहरी नींद के सपनों से समय अक्सर जगा देत है ... यथार्थ के कठोर धरातल पटक देता है ...
    सपने और बचपन के दिन ... स्टापू का खेल .... यादों में उतार दिया इस रचना ने ...

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  35. शायद उसकी गर्मजोशी से
    मेरे सपने भी खिलना सीख जाएँ.
    पर इससे पहले ही घड़ी के अलार्म से
    मेरी पलकें खुल जाती हैं
    और सारे सपने
    कठोर धरातल पर गिर टूट जाते हैं.......

    कविता की प्रत्येक पंक्ति में अत्यंत सुंदर भाव हैं .... बहुत-बहुत बधाई !

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  36. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.
    खूबसूरत बिम्ब
    पूरी रचना लाजवाब है

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  37. आप का ह्र्दय से बहुत बहुत
    धन्यवाद,
    ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.

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  38. wow di....so so sweet...:)
    very beautiful...:)

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  39. आदरणीय शिखा जी ,

    सुकोमल भावों की बहुत ही सुन्दर रचना है आपकी | सुन्दर शब्दों का चयन करके कल्पना का इतना सुन्दर बिम्ब प्रस्तुत किया है आपने जो सपनो की दुनिया को जीवन की अठखेलियाँ भेंट करता हुआ लगता है |

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  40. मै क्या कहूँ ... कुछ कहने के लिए नहीं.. इतनी सुन्दर रचना के आगे मेरे बोल फीके ना पढ़ जाएँ ... सादर

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  41. bahut sundar kavita hain
    neend main dekhe hue khwaab
    aksar aankh khulne par tut kar
    bikhar jaate hain.
    ...par ye aankhe khwaab dekhna
    chodti nahi.

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  42. bilkul sahi kha aapne.....khwab aise hi kabhi adhure rah jate hain ...to kabhi toot jate hain..

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  43. सपने अक्सर ऐसे ही तो होते हैं ...
    शुभकामनायें आपको !

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  44. प्रकृति के बिम्बो के जरिये मानव जीवन के कोमल पहलुओं की तुलना करते हए एक अद्भुत अहसास की कविता !

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  45. बहुत सार्थक प्रस्तुति .आभार.....

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  46. Acchi kavita hai.Sapne kabhi nahi toot te .bas wo ek naya aakar le lete hain..apne sapno ko khilne dijiye...khulne dijiye...unki akriti ko pahchaniye..khud ko janiye.
    aapki rachna bahut achhi hai...par mujhe sapno ko tootna accha nahi lagta...main unhe har din naye roop me ,naye rang me dekhta hun..

    ReplyDelete
  47. अरमानों की सूई? सुन्दर बिम्बों से शब्दों मे पिरो कर बेहतरीन अभिव्यक्ति बनाई है। बधाई।

    ReplyDelete
  48. badi khubsurti se apni baat kah di aapne,bahut achchi lagi aapki ye kavita.......

    ReplyDelete
  49. badi khubsurti se apni baat kah di aapne,bahut achchi lagi aapki ye kavita.......

    ReplyDelete
  50. नए प्रतिमानों के साथ ज़िन्दगी का वो सपना आपने गूंथा है जो बड़ी बेरहमी से आँखों से फुदक कर किसी पंक्षी के तरह दूर चला जाता है !
    खूबसूरत अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  51. एलार्म से पुरानी दुश्मनी है।

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  52. रचना में प्रयुक्त बिम्ब बड़े ही मोहक हैं। लेकिन आशा इतनी जल्दी दम नहीं तोड़ती। अंत की दो पंक्तियों को बदलकर इस प्रकार पढ़ें-
    सजाने के लिए
    पुनः नये सपने।
    और देखें। यह मात्र सुझाव है, कृपया अन्यथा नहीं लेंगी।

    ReplyDelete
  53. रचना में प्रयुक्त बिम्ब बड़े ही मोहक हैं। लेकिन आशा इतनी जल्दी दम नहीं तोड़ती। अंत की दो पंक्तियों को बदलकर इस प्रकार पढ़ें-
    सजाने के लिए
    पुनः नये सपने।
    और देखें। यह मात्र सुझाव है, कृपया अन्यथा नहीं लेंगी।

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  54. बहुत खूबसूरत और सकारत्मक सुझाव है परशुराम जी! बहुत धन्यवाद आपका.

    ReplyDelete
  55. इससे पहले ही घड़ी के अलार्म से
    मेरी पलकें खुल जाती हैं
    और सारे सपने
    कठोर धरातल पर गिर टूट जाते हैं

    बहुत सुन्दर रचना रही ..यक़ीनन बंधाई की हक़दार ...दाद हाज़िर है क़ुबूल करें

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  56. आपके तखय़ुल्लात की दाद देनी होगी.ख्य़ालों की उडान लाजवाब है.

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  57. सपने, नाजुक सपने.

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  58. रोज जब ये आग का गोला
    उस नीले परदे के पीछे जाता है
    और उसके पीछे से शशि
    सफ़ेद चादर लिए आता है

    बहुत ही खूबसूरत पंक्तियों से आरम्भ हुई ये कविता और अंत तक दिल को लुभा गयी

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  59. बहुत सुन्दर उपमायें और उपमान प्रयोग किये हैं..

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  60. shikha ji , one of your best poems . padhkar bahut accha laga. thanks

    ----------
    मेरी नयी कविता " तेरा नाम " पर आप का स्वागत है .
    आपसे निवेदन है की इस अवश्य पढ़िए और अपने कमेन्ट से इसे अनुग्रहित करे.
    """" इस कविता का लिंक है ::::
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/02/blog-post.html
    विजय

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  61. shikha ji , one of your best poems . padhkar bahut accha laga. thanks

    ----------
    मेरी नयी कविता " तेरा नाम " पर आप का स्वागत है .
    आपसे निवेदन है की इस अवश्य पढ़िए और अपने कमेन्ट से इसे अनुग्रहित करे.
    """" इस कविता का लिंक है ::::
    http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/02/blog-post.html
    विजय

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  62. kho gaye hum to...
    apke aagosh me rah gaye hum to...
    chahat hai...simte rahe yunhi!!!

    ReplyDelete

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