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Sunday, 6 February 2011

यवनिका यादों की ...



सफ़ेद रंग का लम्बा वाला लिफाफा था और मोती से जड़े उसपर अक्षर. देखते ही समझ गई थी कि ख़त पापा ने लिखा है. पर क्या???? आमतौर पर पापा ख़त नहीं लिखा करते थे.बहने ही लिखा करतीं थीं और उनके लिफाफे गुलाबी,नीले ,पीले हुआ करते थे. कोई जरुरी बात ही रही होगी. झट से खोला था तो दो बड़े बड़े पन्ने हाथ आ गए थे, धक् से रह गया दिल, क्या हो गया ...इतना लम्बा पत्र.... बिना सांस लिए पढ़ डाला था पर वो पत्र कहाँ...भावनाओं की नदी थी. जैसे प्रत्येक पंक्ति एक कवित , वैरी अन यूजुवल  टू पापा ..."छ: बजने को आये हैं बाहर चिड़िया  की चहचहाहट  के साथ तुम्हारी यादों की टीस भी शोर मचाने लगी है,यूँ ही तो तुम्हारी किलकारियां गूंजा करती थीं कभी. अब और लिखा तो ये बाकी लिखे शब्द भी धुल ना जाएँ इसलिए बंद करता हूँ...  तुम्हारा पापा." इन आखिरी पंक्तियों के साथ ख़त मोड़ते  हुए सारा दृश्य सामने चलने लगा था. जरुर किसी टेंशन की वजह से आधी रात नींद खुल गई होगी उनकी. कोई ऑफिस की परेशानी होगी.. . चहलकदमी करते हुए सोच रहे होंगे कि कैसे किसी दुश्मन को अपना बनाया जाये.अजीब सा फलसफा था उनका, कि अगर कोई तुमसे चिढ़ता है तो चिढ़ से उसका जबाब मत दो. दुश्मन को प्यार से वश में करो. यदि कोई तुम्हें नीचा दिखाना चाहता है तो बदले में उसे गालियाँ ना दो बल्कि अपना कद इतना ऊंचा कर लो कि तुम्हारी ओर  नजर उठाकर देखने में सामने वाले की गर्दन ही अकड़ जाये.. .और बिलकुल यही किया करते थे वे. उनके मातहत उन्हें पूजा करते थे और अधिकारियों को उनकी लत सी लग जाती. हाँ कभी कभार कोई साथी जरुर जलन वश चिढ जाता तो वे मौका तलाशते रहते कि कब कैसे उसकी मदद की जाये कि उसकी भावनाए  बदल जाये.,और उसे अपना बनाकर ही चैन लेते. यही स्वाभाव था उनका ...
तभी मम्मी की नीद खुल गई होगी पूछा होगा " क्यों टहल रहे हो रात को २ बजे ? तो झट से बोले होंगे "आज डिनर में सब्जी ठीक नहीं बनाई तुमने , गणेश (नौकर)से बनवा दी थी क्या ?( जबकि वे जानते थे खाना मम्मी खुद ही बनाती थीं हमेशा),सैंडविच खाने का मन कर रहा है खीरा टमाटर वाला.खुन्खुनाती मम्मी उठ गई होंगी और ऊनी गाउन लपेट मुस्कुराती आ गई होंगी रसोई में "सीधे सीधे नहीं कह सकते कि भूख लग आई है." और ब्रेड की साइड करीने से काट कर तरीके से सैंडविच  बनाकर  दिया होगा.पापा को हर काम सुव्यवस्थित ही चाहिए होता है. जरा भी टेढ़ा - मेढ़ा  नहीं. यहाँ तक कि दरवाजे की चिटकनी लगा कर उसे अन्दर मोड़ना जरुरी होता था.वर्ना यह पहचान थी एक लापरवाह और काम अधूरा छोड़ देने वाले व्यक्तित्व की. मम्मी तो फिर सो गई होंगी आकर.सैंडविच  चबाते हुए अचानक याद आ गई होगी मेरी, और भावावेश  में यह ख़त लिख डाला होगा,साथ ही लिफाफा तुरंत चिपकाकर रख लिया होगा ऑफिस के बैग में. पता था मुझे, घर में किसी को बताया भी नहीं होगा ऐसे ही हैं वे..  अपनी भावनाएं दिखाना जरा भी पसंद नहीं उन्हें..फिर मम्मी को रात  को उठाकर सैंडविच बनवाया था, इस अपराधबोध को मिटाने के लिए चाय बना कर मम्मी को दी होगी और दोनों बहनों का टिफिन भी पैक कर दिया होगा....
पता नही किस माटी के बने हैं मेरे पापा अचानक होंठ फ़ैल गए मुस्कराहट में. एक तरफ शौक़ीन ,जिंदादिल ,गुस्सैल  और बेहद प्रेक्टिकल और दूसरी ओर गहन फिलॉसफर ,बेहद संवेदनशील, कवि ह्रदय .पता ही नहीं चलता था कब किस करवट बैठेंगे.जहाँ एक ओर लोगों से घिरे रहने का , अपनी तारीफें सुनने का शौक था वहीँ दूसरी ओर जबरदस्त आलोचना सहने की शक्ति थी ,और अद्भुत क्षम्य क्षमता...पल भर में मोम सा दिल पिघल जाता था...मम्मी भुनभुनाती रहती थीं "कोई एक दिन  बेच खायेगा हमें तो". और वो हंस दिया करते ठहाके मारकर .."अरे अब क्या  बिकेंगे... ..मेरठ में पढता था तब  रेखा (फिल्म अभिनेत्री ) का प्रोपोजल आया था.पर पढाई की वजह से मना करना पड़ा" ...और वहां खड़े सब उनके इस अंदाज पर खी खी कर हंस दिया करते और मम्मी अपना गुस्सा भूल कर गर्दन झटका दिया करतीं.

वैसे और लोग ही क्या ..हम भी आँख बंद करके आश्रित रहा करते थे पापा पर ,असंभव तुल्य ही काम क्यों ना हो बस कान में डाल दो पापा के और निश्चिन्त सो जाओ ..हो ही जायेगा वो भी पूर्ण व्यवस्थित तरीके से .
वैष्णो  देवी की यात्रा पर गए थे एक बार हम,साथ में छोटी सी ५ साल की बेटी ,वहां की व्यवस्था का कोई अंदाजा तो था नहीं. वैसे भी अब तक सारे भारत के तीर्थ पापा के साथ किये थे तो कुछ कभी समझने की जरुरत नहीं महसूस हुई थी .परन्तु ऊपर दरबार में पहुँच कर देखा तो पाया कि वहां रहने के लिए इस तरह कमरे नहीं मिला करते लाइन इतनी लम्बी है ..टोकन ले लीजिये और वहीँ कहीं लेट जाइये सारी रात, सुबह तक शायद नंबर आ ही जायेगा दर्शनों का  ..सुनकर सन्न रह गए हम. छोटी सी बच्ची के साथ इतनी ठण्ड में ये कैसे हो सकता है ...और सुबह की तो वापसी की ट्रेन भी है जम्मू से.पतिदेव  ने कहा तुम यहाँ बैठो मैं पता करता हूँ किसी से .वहां पत्थर पर बैठ जाने कैसे ज़हन में आया .."काश पापा होते.. बस एक फ़ोन करने भर की देरी थी.सब कुछ अरेंज हो जाता." ख्याल अभी गए भी नहीं थे कि जाने कहाँ से एक सज्जन प्रकट हुए, कहने लगे कहाँ से आये  हैं आपलोग माँ के दर्शन के लिए? हमने जबाब दिया तो उन्होंने एक वी आई पी  पास हमें पकड़ा दिया कि मैं यहाँ हर २-३ महीने में आता हूँ मेरे पास आज ये एक्स्ट्रा है आप यह ले लो और हाथ मुँह धोकर दर्शन के लिए चले जाओ .मैं फटी फटी आँखों से देख रही थी बस. उन्हें धन्यवाद भी पति ने आकर किया और हम जड़वत से  दर्शन कर आये आधे घंटे में ही.वापस जम्मू लौटकर एक होटल में शरण ली. बाहर बालकनी  से नजरें अनानयास ही  आस्मां की और उठ गईं एक सितारा टिमटिमाता दिख रहा था होंट स्वत:  बुदबुदा उठे  "थैंक्स पापा"... जैसे जबाब आया " पागल है बिलकुल ..दुनिया घूम आई पर जरा जरा सी बात पर परेशान हो जाती है.." खुले होंठ फ़ैल गए मुस्कराहट से....
आज छ: फरवरी है. एक बार फिर पलके उठ गई हैं आस्मां पर , कोई तारा फिर दिखा है ..और ये होंठ फिर खुल गए हैं " हैप्पी बर्थडे पापा........
मैं और मेरे पापा.

94 comments:

  1. hmam bakai uncle bahtu hi positve pravatti ke insaan the!
    aakpi is yadon ke jharokhe kafi kuch sikhne ko milata he !, bahut hi sudnar aur bhav-bibhore kar dene bali prastuti,

    ameen!

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  2. सच में ये स्पंदन ही है...आपकी ये मन में उठती भावनाओं ने निःशब्द कर दिया....
    तस्वीर तो बहुत ही अच्छी है दोनों...

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  3. हृदयस्पर्शी संस्मरण.
    बहुत अच्छा लगा पढ़ कर.

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  4. जब आपने इस पोस्ट के बारे में बताया था तभी मैं समझ गया था कि यह मेरी पोस्ट का बिटिया एडिशन होगा.. कम से कम यह संसमरण पढकर मुझे लगा कि मेरी समवेदनाएँ मेरी बिटिया के लिये क्या मायने रखती हैं..
    कहने की आवश्यकता नहीं कि दिल भर आया.. आपके डैडी वाक़ई स्मार्ट हैं, रेखा ने ज़रूर ऑफर दिया होगा!!
    मेरा नमन उनको और हैप्पी बर्थ डे!!

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  5. जीवन में पिता का क्‍या महत्‍व है .. कोई बेटियों के दिल से पूछे .. बहुत सुंदर प्रसतुति‍करण .. दिल के भाव खूबसूरती से उतर गए हैं यहां !!

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  6. शिखा ,

    सबसे पहले तुमको बधाई ...तुम्हारी यादों में अपने पापा की स्मृति हमेशा यूँ ही बरकरार रहें ... संवेदनशील भावनाओं से भरा संस्मरण बहुत भावुक कर गया ...तुम्हारे पापा सच बड़े डैशिंग लग रहे हैं .:):) रेखा का ऑफ़र ..हा हा ..अच्छा हुआ जो माना नहीं :):)
    उनकी गोद में तुम ...बहुत प्यारी सी बच्ची ..कितनी संवेदनाएं समेटे है यह पोस्ट ...बस अब और कुछ नहीं लिख पाऊँगी ....

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  7. शिखा जी, मैंने आज एक वर्ष पीछे जाकर देखा, जब आपने लिखा था मेरा हीरो
    वहाँ पर मेरा कमेंट था-पिता एक घने वृ्क्ष की तरह होते हैं जो स्वयं धुप मे खड़े रह कर अपने बच्चों को छाया देते हैं। आज हम उस छाया से वंचित है। उनका स्मरण करना ही कृतज्ञता व्यक्त करना है।

    आज फ़िर वही दिन है, जब हम पापा को याद कर रहे हैं, पापा हमेशा ही साथ रहते हैं हमारी यादों में। उनका आशीष सदा रक्षा करता है और उनके आदर्श हमारा मार्ग दर्शन।

    पापा को मेरा शत शत नमन

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  8. This comment has been removed by the author.

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  9. पिता की स्मृति में लिखी गयी ये भावुक सी पोस्ट . नेत्र कोरों को भिगो गयी . वैसे एकबात है , तुम्हारे पापा तो ग्रीक गोड की तरह दीखते थे , रेखा का ऑफर ठुकरा कर उन्होंने बहुत ही समझदारी का काम किया . नहीं तो उन्हें तुम्हारी जैसे समझदार और प्यार करने वाली बिटिया कहा से मिलती .उनके जन्म दिन पर उस शुभात्मा को मेरा नमन .

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  10. शिखा ,
    सच तुम्हारी ये पोस्ट आंखों में आंसू ले आई ,
    पिता बच्चों के लिये एक सायादार दरख़्त की तरह होता है ,जिस की छत्र छाया में ज़िंदगी कैसे गुज़रती है ,ज़िंदगी की कठिनाइयों की धूप कैसे नर्म ठंडी बयार में बदल जाती है पता ही नहीं चलता

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  11. आपका संस्मरण पढ कर मेरा दिल भर आया!...यादे अच्छी होते हुए भी रुला देती है कभी कभी!...धन्यवाद शिखाजी!

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  12. शिखा जी
    यह एक संस्मरण ही नहीं , बल्कि जीवन को शिक्षा देने का एक जीवंत दस्तावेज है .....सच में आपके पिता जी महान है और आप धन्य .."यदि कोई तुम्हें नीचा दिखाना चाहता है तो बदले में उसे गालियाँ ना दो बल्कि अपना कद इतना ऊंचा कर लो कि तुम्हारी और नजर उठाकर देखने में सामने वाले की गर्दन ही अकड़ जाये." कितनी गहरी बात है , काश हम अपना पाते ...आपका आभार

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  13. बहुत ही भाव-भीना...प्यारा सा संस्मरण.

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  14. बाप तो बाप ही होता है, बरगद की तरह...

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  15. बहुत अच्छी प्रस्तुति......

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  16. चाचा जी को हमारा भी चरण स्पर्श और साथ साथ जन्मदिन की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

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  17. येल्लो.. हम बेकार में ही आज तक समझते रहे कि आप अच्छा नहीं बहुत अच्छा लिखती हैं. चाहे समीक्षा हो, यात्रा विवरण हो, कविता हो, खबर या रिपोर्ट सब कमाल होता है.. लेकिन इसमें आपका क्या है.. कुछ भी नहीं.. फालतू ही आपको झाड़ पर चढ़ाए हुए थे सब के सब. अरे जो भी है अंकल का दिया हुआ है. उन्हीं के जींस मिले हैं तो स्वाभाविक था कि ये खूबियाँ तो आनी ही थीं.
    हाँ पर उन सबको आपने करीने से लगाया और सही इस्तेमाल किया.. इसे देख अनुशासनप्रिय हमारे अंकल जहाँ भी होंगे बहुत खुश होते होंगे और गर्व भी करते होंगे आप पर.. जैसे हम करते हैं.
    जन्मदिन की शुभकामनाएं अंकल..

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  18. दिल के भाव खूबसूरती से उतर गए हैं यहां !!

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  19. हृदय से निकली और हृदय छूती पोस्ट। पिता के साथ का चित्र बहुत ही आनन्द दे जाता है।

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  20. आपका सशक्त और मर्मस्पर्शी संस्मरण भावुक कर गया,आभार.

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  21. बहुत ही भाव-भीनी सुन्दरतम पोस्ट
    एक बेटी का यूँ अपने पापा को याद करना दिल को बेतरह भावुक कर गया
    -
    -
    तुम्हारे पापा तो सचमुच हीरो लग रहे हैं ,,, लायिक जुबली कुमार (राजेन्द्र कुमार)
    -
    पापा की गोद में नन्ही शिखा को देखकर बहुत ही अच्छा लगा, लेकिन तुम्हारी आँखें क्यूँ बंद हैं जी :)

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  22. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (7/2/2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।
    http://charchamanch.uchcharan.com

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  23. अपने पिता की यादों से आपकी भावनाएं बहुत गहरी जुडी हुई है, जब कुछ लिखती है पढने वाले को भी भाबुक कर जाती है |
    आपके पिता जहां कही भी होंगे, आप पर गर्व कर रहें होंगे |
    सुन्दर संस्मरण |

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  24. पूज्य पिता के जन्मदिन पर समर्पित यह संस्मरण भावुक कर गया !

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  25. आपके इस संस्मरण ने बहोत ही भावुक कर दिया

    ह्रदयस्पर्शी रचना...........

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  26. वाह पापा की यादो से भरी आप की पोस्ट बहुत अच्छी लगी, धन्यवाद

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  27. in yaadon ko meri bhi shubhkamnayen... papa ke saath ki tasweer aankhen nam kar gai... tumhari kalam kin ehsaason se nahi gujarti

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  28. बहुत ही भावुक रचना..... स्मृतियों को संजो कर रखना और फिर जब शब्दों से उकेरना वो भी इस तरह.... भावुक कर देता है.....

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  29. पिता की स्मृति में लिखी गयी, भावुक पोस्ट
    बहुत अच्छा लगा पढ़ कर.

    uncle जी को हैप्पी बर्थ डे

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  30. आपकी भाषिक संवेदना पाठक को आत्‍मीय दुनिया की सैर कराने में सक्षम है। पिताजी का व्यक्तित्व, अनुशासन प्रियता और अनेक पहलू अनुकरणीय हैं। निश्चय ही उनके प्रेरक व्यक्तित्व का आप पर गहरा असर है।
    संस्मरण हमारे मन को छू लेता है और साथ ही आपकी सामर्थ्‍य और कलात्‍मक शक्ति से परिचय कराता है। नितांत व्‍यक्तिगत अनुभव कैसे समष्टिगत हो जाता है इसे हम आपके इस संस्मरण में स्पष्ट देख सकते हैं।

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  31. मर्मस्पर्शी !
    राजकुमार से पापा की गोद में नन्ही सी परी सी शिखा बहुत खूबसूरत लग रही है ।

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  32. क्या कहूँ, दी ! बस मौन है सम्प्रेषित करने को।

    और एक चीज़ है "हैप्पी बर्थडे अंकल" …:) उनका आशीष हमेशा हम सब पर बना रहे !

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  33. मैं क्या लिखूं शिखाजी
    ऊपर तो सबने आपके इस लेखन पर बहुत कुछ लिख डाला है. वैसे भी आपने इतना भावुक कर दिया है कि की-बोर्ड पर उंगलियां रूक-रूककर चल रही है.संस्मरण तो मैंने बहुत से पढ़े है लेकिन एक बेटी की आदराजंलि पढ़ने का मौका पहली बार मिला है.
    आपके पापाजी को मेरा भी नमन है. ग्रेट

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  34. शिखा जी,
    आप द्वारा यादों की यवनिका का अनावरण बहुत भावुक कर दिया। आपकी नेखनी में व्यष्टिगत अनुभूति को समष्टिगत भाव में परिणत करने की अद्भुत क्षमता है।

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  35. पुनः दूसरे वाक्य में 'नेखनी' को 'लेखनी' पढ़ें। धन्यवाद।

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  36. शिखा क्या कहूं? बहुत मन से लिखा है तुमने, इसीलिये दूसरे के मन तक पहुंच रहा है तुम्हारा संस्मरण. इतने नम संस्मरण पर बहुत सुन्दर जैसी दाद नहीं दी जा सकती.

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  37. दरवाजे की चिटकनी लगा कर उसे अन्दर मोड़ना जरुरी होता .
    .
    सुंदर प्रस्तुति . वाह यह चिटकनी वाली आदत तो मुझमें भी है. चलो कोई तो अपने जैसे दिखा..

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  38. आप इतना सुंदर भी लिखती हैं यह पहली बार जाना। पिताजी को याद करने का आपका यह अंदाज बहुत भाया।

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  39. यहाँ तक कि दरवाजे की चिटकनी लगा कर उसे अन्दर मोड़ना जरुरी होता था.वर्ना यह पहचान थी एक लापरवाह और काम अधूरा छोड़ देने वाले व्यक्तित्व की.

    itti chhoti baat ko bhi aapne saja kar bataya, yaani uncle ka asar puri tarah se tum par hai...:)

    Happy Birthday to Uncle..!!

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  40. ओह आने में काफी दे कर दी सब ने सब कुछ पहले ही कह दिया कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं | पोस्ट अच्छी लगी बेटिया पिता से ऐसे ही जुडी रहती है हमेशा .......

    देर से ही सही आप के पापा को मेरी तरफ से जन्मदिन की बधाई | आप के पापा को फोटो देख कर समझ में आ रहा है रेखा ने रिश्ता क्यों भेजा था :)

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  41. oh my gosh...!! shikha, yaara ye kya likh diya.....papa ki itni yaad aa rahi hai na.... :(

    and believe me, mere papa bhi bilkul aise hi hain...total perfectionist...ek cheez idhar se udhar ho jaati to lecture milta tha....aur school se aane mein 10 minit zyaada lag jaate, to jaan bhi nikal jaati thi....muje bi papa paash jana hai :(

    ;)

    but seriously.....bohot bohot bohot acche andaaz mein likha hai....beautiful !!!

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  42. aapne to bhawon ka ek ayesa pitara khol diya ki sabki aankhen bhar gayeen.

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  43. ब्लॉग के नाम को सार्थक करती हुई पोस्ट.. ये एक स्पंदन ही है जो ह्रदय में होता रहता है..

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  44. भावमय करते शब्‍द इस संस्‍मरण के दिल को छू गये ...बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ।

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  45. दो बार पढी ये पोस्ट
    बस आभार प्रकट करना चाहता हूँ
    और आपके पापा को हैप्पी बर्थडे भी कह दिया है मैनें भी

    प्रणाम

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  46. सुन्दर शब्दों की बेहतरीन शैली ।
    भावाव्यक्ति का अनूठा अन्दाज ।
    बेहतरीन एवं प्रशंसनीय प्रस्तुति ।

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  47. अब सभी ब्लागों का लेखा जोखा BLOG WORLD.COM पर आरम्भ हो
    चुका है । यदि आपका ब्लाग अभी तक नही जुङा । तो कृपया ब्लाग एड्रेस
    या URL और ब्लाग का नाम कमेट में पोस्ट करें ।
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  48. बेहद सशक्त और आत्मीय चित्रण किया है आपने. बहुत सुंदर.

    रामराम.

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  49. पिताजी कों जन्मदिन की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

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  50. बेहद मर्मस्पर्शी संस्मरण... भावुक कर दिया. आभार.
    मेरी ओर से भी पिताजी को जन्मदिन की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    सादर,
    डोरोथी.

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  51. Bhagwan ki saugat hi nahi bhagwan ka roop hote hai mata-pita.Ganeshji ne yu hi saat parikarma nahi ki thi apne mat-pita
    ki, aur ganpati ban gaye sabhi devo me.Aapka yeh bhavuk lekh bhi mat-pita ki parikarma ki aur ek kadam hai jisne sabhi ko bhavuk
    bana diya hai.Bhagwan hamesa aap per kirpa kare,yahi kamana hai hamari.

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  52. शिखा जी,
    इस मर्मस्पर्शी संस्मरण ने सचमुच हृदय को पापा की यादों से स्पंदित कर दिया !
    इन्हीं यादों से ही तो जीवन भी स्पंदित होता है !

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  53. मन भर आया पढ कर पिता को बेटिओं से बहुत प्यार होता है माँ से भी अधिक। मै इतने सालों मे आज तक अपने पिता को एक दिन के लिये भी भूली नही। संस्मरण बहुत अच्छा लगा दिल को छू गया। शुभकामनायें।

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  54. पिता की यादों को इतना सम्हाल कर रखना बहुत अच्छा लगा. बहुत ही अच्छा सस्मरण है. सुंदर प्रस्तुति..........

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  55. हृदयग्राही, प्रभावशाली, अपने सँग बहा ले जाने वाली है यह सँस्मरणिका !
    पापा को इस शिद्दत से याद करते देख, मुझे अपनी बिटिया याद आ रही है !

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  56. शब्दातीत...इतनी रात गये, डा० अमर साब की तरह अपनी बिटिया की याद में मैं भी...शायद आने वाले कल को वो भी एक ऐसी ही पोस्ट लिखे मेरी याद में।

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  57. इस संस्मरण ने कितना भावुक कर दिया , काश की मैं शब्दों में बता पाती ...
    कितनी शामों को ऐसे ही तारों में ढूँढा किये हम उन्हें ..

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  58. कल शाम यह पोस्ट पढ़ी थी। बहुत आत्मीय संस्मरण। संवेदनशील।

    जबसे यह पोस्ट पढ़ी तब से आपके पिता और आपमें समानता के सूत्र खोज रहा था- अनायास। ऐसा लगा कि आप अपने पिताजी का ही विस्तार हैं। मिलती-जुलती शक्ल के साथ सबसे अच्छा व्यवहार करके उनको अपना बना लेने की सहज प्रवृत्ति दिखती है मुझे आपके लेखन और व्यवहार में।

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  59. नि:शब्‍द कर देने वाली रचना। ऐसे व्‍यक्तित्‍व तो कल्‍पनाओं में ही होते हैं लेकिन आपके पास साक्षात थे। आप कितनी भाग्‍यशाली रही हैं जिनके कारण आपके तन और मन में भी वही गुण समाहित हुए हैं। मेरा उन्‍हें नमन।

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  60. सच रोना तो आ ही गया पर नमी को सहेज कर आँखों में वापस रख लिया है, कभी अपने पापा के बारे में लिखने के इंसेंटिव के रूप में.

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  61. "आज छ: फरवरी है. एक बार फिर पलके उठ गई हैं आस्मां पर , कोई तारा फिर दिखा है ..और ये होंठ फिर खुल गए हैं " हैप्पी बर्थडे पापा......... " यादों के झरोखे कितने मार्मिक होते है . बहुत सुन्दर. मेरी बधाई स्वीकारें- अवनीश सिंह चौहान

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  62. अंतर्मन को गहरे से छूती पोस्ट|

    बेटियाँ अपने पिता को बहुत गहराई से चाहती हैं, यह पोस्ट पढ़ते हुए जानना दुखद इसलिए भी लगा क्योंकि जाके पैर में फटी बिवाई वो ही जाने पीर पराई... पर आपकी पीर बेहद मर्मभेदी और भावुक है जो भावुक भी कर देती है| जारी रखिए| यादों का उजाला ही संबल बनता है|

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  63. शिखा जी बसंत पर आपको शुभकामनाये |बहुत अच्छा संस्मरण लिखा है आपने बहुत बहुत बधाई |कवि कैलाश गौतम का एक दोहा भेंट कर रहा हूँ .लगे फूंकने आम के बौर गुलाबी शंख |कैसे रहें किताब में हम मयूर के पंख |

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  64. शिखा जी बसंत पर आपको शुभकामनाये |बहुत अच्छा संस्मरण लिखा है आपने बहुत बहुत बधाई |कवि कैलाश गौतम का एक दोहा भेंट कर रहा हूँ .लगे फूंकने आम के बौर गुलाबी शंख |कैसे रहें किताब में हम मयूर के पंख |

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  65. भावुक कर दिया...

    और क्या कहूँ....

    ये स्मृतियाँ हमारे जीवन को सुवासित और उर्जन्वित रखा करती हैं..इन्हें मन में सदैव सहेजे जगाये रखना चाहिए...

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  66. भावुक कर दिया इस संस्मरण ने...पिता जी की पुण्य स्मृति को नमन!

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  67. ek kavita hai arun chand roy ki .....कील पर टँगी बाबूजी की कमीज़ ..uske kuch ansh yun hai ...

    बाबूजी की जेब में
    जब होती थी
    डॉक्टर की पर्ची
    जांच की रिपोर्ट
    उदास हो जाती थी
    कील
    माँ से पहले

    ठुकने के बाद
    सबसे ज्यादा खुश थी
    कील
    जब बाबूजी लाये थे
    शायद पहली बार
    माँ के लिए बिछुवे
    अपनी आखिरी तनख्वाह से

    आज
    बाबूजी नहीं हैं
    उनकी कमीज़ भी नहीं है
    लेकिन कील है
    अब भी
    माँ के दिल में
    चुभी हुई
    हमारे दिल में भी ।


    aaj aapko padha to ye kavita yaad aayi....

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  68. बेहद भावुक है पोस्ट। एक-एक शब्द बोल रहा है।

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  69. लगता है बहुत प्यार करती हो अपने पापा से ...देव हमेशा साथ नहीं रहा करते मगर जब भी दिल से याद करोगी निस्संदेह उन्हें अपने पास ही महसूस करोगी ! भावुक कर गयी तुम्हारी यह पोस्ट ! शुभकामनायें पापा की प्यारी बेटी के लिए......

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  70. शिखा,
    ये एक ऐसा रिश्ता है कि जो कभी भी नहीं अलग होता , संस्मरण बहुत ही मर्मस्पर्शी है. ऐसी आत्माएं हमेशा रहा करती हैं और फिर जिस तरह से तुम्हें कोई मिल गया वो उस बात का ही प्रतीक है. मेरा पापा को नमन.

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  71. पिता और पुत्री के सम्‍बंधों के अनेकों आयाम से परिचित कराता संस्‍मरण।

    आभार।

    ---------
    समाधि द्वारा सिद्ध ज्ञान।
    प्रकृति की सूक्ष्‍म हलचलों के विशेषज्ञ पशु-पक्षी।

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  72. बहुत अच्छा लगा पढ़ कर

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  73. शिखाजी
    बहुत अपनी सी लगी यः पोस्ट |सब बेटियां और उनके पापा का स्नेह इतना ही मजबूत होता है |मुझे भी आपने बाबूजी की याद हो आई जो आज के ३१ साल पहले ही हमे छोड़ गये थे |
    ऐसे ही उनकी स्मर्तियाँ संजोये रखना जीवन में कोई कठिनाई नहीं आवेगी |

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  74. परसों पढ़ा था और कहने को कुछ नहीं जुटा पाए मेरे शब्द, शब्द आज भी नहीं हैं।
    मौन का स्पंदन ही है इन पर देने को।
    आशीष बना रहे, शुभकामनाएँ।

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  75. Hi..

    Man ke har bhav ko aapne badi khoobsurati se ukera hai...

    Eshwar Har Papa ko aap si beti de...

    Deepak..

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  76. hraday sparshi ........dil ko chu gaye aapke jajbaat.

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  77. shikha ji ,
    bahut hi marmshparsi sansmaran ...
    bahut pyara laga.

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  78. This comment has been removed by the author.

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  79. Very touching.. mere papa bhi hamare ghar k Mr. Perfectionist hain.. waise mere siwa sabhi hain bt unki baat alag h.. n yeah your papa luks damn handsome..

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  80. di yah mujhe aapka likha sabse accha sansmaran laga hai....iske do karan hai...ek iska bhavnatmak paksh...pita aur beti ke sambandh men jo pragaadhta hoti hai wah is post ko padhte hue sahaj hee mehsoos kee ja sakti hai... aur doosri sabse acchi baat hai is sansmaran ka craft...beech beech men hilighted paragraphs baandh ke bbaithne pe mazboor kar dete hain....gulzar saab jis tarah apni films men flashback ka khubsurat istemal karte rahe hain....highlighted parts theek waisa hee kaam kar rahe hain... :) aur haan uncle jee ek dum katal type smart lag rahe hain....:)

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  81. कुछ दिन पहले आपकी पोस्ट पढी थी मैंने.
    लेकिन कुछ लिख नहीं पाया तब.
    अपने पापा की यादों में खो गया था.
    शुक्रिया आपका .
    आपने मेरे कुछ फ़र्ज़ ,कुछ क़र्ज़ याद दिलवा दिए हैं.
    और क्या लिखूं....
    आप की कलम को ढेरों शुभ कामनाएं.

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  82. बहुत खूबसूरत हैं आपके पापा बिलकुल पापा जैसे.
    सलाम.

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  83. एक संस्मरण ही नहीं , बल्कि जीवन को शिक्षा देने का एक जीवंत दस्तावेज है .
    सुंदर प्रस्तुति..........

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  84. एक संस्मरण ही नहीं , बल्कि जीवन को शिक्षा देने का एक जीवंत दस्तावेज है .
    सुंदर प्रस्तुति..........

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  85. जैसे ही मेरे लैपटॉप पे ब्लॉग ओपन होने लगे सीधा आपके इस पोस्ट पे आ गया...लेकिन क्या कमेन्ट करूँ अभी तक समझ नहीं आया.

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  86. मर्मस्पर्शी प्रस्तुति!

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  87. स्‍मृतियों का अनमोल पिटारा.

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  88. शिखा जी
    आँखें नम हो गई आपका संस्मरण पढ़कर... मुझे भी अपने बाबूजी की याद आ गई... मैंने उनके कभी नहीं बताया था कि कालेज के दिनों से ही कविता लिख रहा हूँ और स्थानीय अखबार में छप रहा हूँ... लेकिन उन्हें पता था ... उन्होंने कम से कम मेरी दस कविताओं की कतरने मुझे उपहार स्वरुप दिए थे सन १९९५ में... बाबूजी के लिए थैंक यू बहुत कम है... एक बढ़िया संस्मरण पढवाने के लिए आभार...

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  89. अंत में रुला ही दिया. बस एक यही पिता की याद है, जो मुझे रुला सकती है. शायद अपने माँ-बाप को खोने से बड़ा दुःख कोई नहीं.

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  90. सब पापा ऐसे ही होते हैं क्या...कान में डाली बात और टेंशन फ्री सो गए...
    इम्शन का शानदार सप्न्दन दिल के अन्दर हिलोरे ले रहा है पढने के बाद...

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  91. पिता जी को जन्मदिन की शुभकामनायें। उनकी यादें भी मन को छूने वाली हैं।

    मेरी मांं की यादें मुझे मेरे मन को छूती हैं। पिता की भी यादें हैं पर उतनी भाव भीनी नहीं।

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  92. शिखा जी, अचानक ही आपके ब्लॉग पर गया। पिता जी को जन्म दिन की भावुक पोस्ट पढ़ी। बेटी की याद आ गई। शादी के बाद लंदन चली गई थी और मैं शून्य हो गया था। यादें ही रह जाती हैं। समेटकर रखिए।

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  93. दिल के भाव खूबसूरती से उतर गए हैं यहां !!

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