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Tuesday, 18 January 2011

जाने क्यों???

.
आज इन पलकों में नमी जाने क्यों है 
रवानगी भी इतनी थकी सी जाने क्यों है 
जाने क्या लाया है समीर ये बहा के 
सिकुड़ी सिकुड़ी सी ये हंसी जाने क्यों है.

खोले बैठे हैं दरीचे  हम नज़रों के 
आती है रोशनी भी  उन गवाक्षों से 
दिख रहा है राह में आता हुआ उजाला 
बहकी बहकी सी ये नजर जाने क्यों है

यादों की स्याही में आस यूँ खोई  है 
या कल की सेज पे आज यह सोई है
कानो में फुसफुसाती सी है कैसी आहट 
सहमी सहमी सी ये रूह जाने क्यों है. 

कोई पल छन्न से जैसे बिखरा है 
कोई तारा शायद कहीं पे गिरा है
आँखों के कटोरों में नमकीन पानी 
भीगी भीगी सी ये बरसात जाने क्यों है.

75 comments:

  1. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति...

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  2. This comment has been removed by the author.

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  3. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  4. वाह ! बेहद खूबसूरती से कोमल भावनाओं को संजोया इस प्रस्तुति में आपने ...

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  5. शब्द जैसे ढ़ल गये हों खुद बखुद, इस तरह कविता रची है आपने।

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  6. आखिर क्यूं क्यूं है ऐसा ?

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  7. मन को छू लिया इन पंक्तियों ने

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  8. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  9. बहुत सुन्दर.........

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  10. गहरी अभिव्यक्ति समेटे सुंदर रचना के लिए बधाई ।

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  11. आंख के कटोरों में नमकीन पानी
    क्या बात है शिखाजी
    शानदार- जानदार और......
    और खामोशी से कुछ समझने की अपील करती हुई रचना।

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  12. अरेरेरेरेरे --------यह क्या हुआ ? क्यों हुआ ? जानना तो पड़ेगा ....
    ये सिकुडना , बहकना , सिमटना और बरसात का भी भीगा भीगा सा होना ....आखिर यह माजरा क्या है ?

    बहुत खूबसूरती से उकेरे हैं अपने जज़्बात ...बहुत खूब

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  13. कोई पल छन्न से जैसे बिखरा है
    कोई तारा शायद कहीं पे गिरा है
    आँखों के कटोरों में नमकीन पानी
    भीगी भीगी सी ये बरसात जाने क्यों है....

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....

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  14. कोई पल छन्न से जैसे बिखरा है कोई तारा शायद कहीं पे गिरा हैआँखों के कटोरों में नमकीन पानी भीगी भीगी सी
    ये बरसात जाने क्यों है

    बहुत सुन्दर ....

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  15. सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  16. आंख के कटोरों में नमकीन पानी
    क्या बात है

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  17. कोई पल छन्न से जैसे बिखरा है
    कोई तारा शायद कहीं पे गिरा है
    आँखों के कटोरों में नमकीन पानी
    भीगी भीगी सी ये बरसात जाने क्यों है.
    waah shikha , bahut hi bheene bheene bhaw

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  18. बेहतर व्यक्त किया है ....यूँ दर्द की अभिव्यक्ति आसान नहीं होती ...शुभकामनायें शिखा !

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  19. बहुत सुन्दर रचना खूब सूरत अहसास कराती हुई बहुत-बहुत धन्यवाद.

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  20. बहुत सुंदर रचना जी. धन्यवाद

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  21. जाने क्यों है........... इसलिए की हमें इतनी सुंदर पंक्तियों को पढने का अवसर मिलने वाला था...... सुन्दर अभिव्यक्ति।

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  22. ऐसी गहरी रचनाओ को समझने की अपनी समझ तो थोड़ी छोटी है पर जितना भी समझ आया वो अच्छा लगा |

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  23. आँखों के कटोरों में नमकीन पानी
    भीगी भीगी सी ये बरसात जाने क्यों है!
    वाह!
    बेहतरीन अभिव्यक्ति!

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  24. कोई पल छन्न से जैसे बिखरा है
    कोई तारा शायद कहीं पे गिरा है
    आँखों के कटोरों में नमकीन पानी
    यह कविता किसी तरह का बौद्धिक राग नहीं अलापती, बल्कि अपनी गंध में बिल्‍कुल निजी हैं, जिसमें जीवन कि विविधता की अंतरवस्‍तु सांस ले रही है। कविता में जीवन की सुगंध, है, ऐसा लग रहा है कि विचार इस रूप में हैं, जिनमें गुथी जीवन की कडि़यां कानों में स्‍वर लहरियों की तरह घुलने लगती है। कुल मिलाकर कविता जीवन के अनेक संदर्भों को उजागर करने का सयास रूपक है, जीवन के खाली कैनवास पर विरल चित्रांकन

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  25. दिख रहा है राह में आता हुआ उजाला
    बहकी बहकी सी ये नजर जाने क्यों है...
    काव्य विधा में बहुत प्रभावित करने वाली रचना है शिखा जी.

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  26. याद की बर्फ जो पिघली है दिल के कोने में
    बस वही पलकों पर नमी सी है
    ये हवा याद उनकी लाइ है पुरवाई में
    दर्द छिप जाए, तभी तो हँसी सिकुड़ी सी है.

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  27. कोई पल छन्न से जैसे बिखरा है
    कोई तारा शायद कहीं पे गिरा है

    न न न न...
    यह किसी के आने की आहट है
    मन के भीतर

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  28. जाने क्यों ऐसा होता है ...
    सिकुड़ी सिकुड़ी सी हंसी ने गुदगुदाया ..!

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  29. जाने क्‍यों, जानी-पहचानी सी है.

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  30. gambhir bhavabhivykti se saji sabdon ki kalatmkata se saji sundar kavita.

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  31. कोई पल छन्न से जैसे बिखरा है
    कोई तारा शायद कहीं पे गिरा है
    आँखों के कटोरों में नमकीन पानी
    भीगी भीगी सी ये बरसात जाने क्यों है.
    --
    रचना बहुत ही मार्मिक है!

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  32. यादों की स्याही में आस यूँ खोई है
    या कल की सेज पे आज यह सोई है
    कानो में फुसफुसाती सी है कैसी आहट
    सहमी सहमी सी ये रूह जाने क्यों है.


    beautiful....just beautiful. aapka ye andaaz bada accha laga :)

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  33. खोले बैठे हैं दरीचे हम नज़रों के
    आती है रोशनी भी उन गवाक्षों से

    खूबसूरत रचना के लिए आभार

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  34. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।
    दिल से निकला लगता है हर एक शब्द. मुझे तो लगता है ये किसी अपने के आने की आहट है. जिसकी राह हम बहुत ज़माने से ताक रहे थे.

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  35. कोई पल छन्न से जैसे बिखरा है
    कोई तारा शायद कहीं पे गिरा है

    वाह ...बहुत खूब इस सुन्‍दर भावमय करती रचना के लिये बधाई ।

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  36. वाह!!!!

    भावपूर्ण कोमल भावाभिव्यक्ति......

    मनमोहक सुन्दर रचना...

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  37. मुझे भी ऐसा लिखना सीखना है...
    आप बहुत अच्छा लिखतीं हैं...
    पहले तारीफ कि जगह व्यथा सुनाने के लिए sorry

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  38. कोई पल छन्न से जैसे बिखरा है
    कोई तारा शायद कहीं पे गिरा है
    आँखों के कटोरों में नमकीन पानी
    भीगी भीगी सी ये बरसात जाने क्यों है.

    सुन्दर प्रभावशाली और जीवन से भरी कविता . आपकी कविता कोश में एक और नगीना .

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  39. आज इन पलकों में नमी जाने क्यों है
    रवानगी भी इतनी थकी सी जाने क्यों है
    जाने क्या लाई है पवन ये बहा के
    सिकुड़ी सिकुड़ी सी ये हंसी जाने क्यों है.

    मन को छू लिया इन पंक्तियों ने

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  40. यह स्तब्धता, न जाने क्यों है।

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  41. कोई पल छन्न से जैसे बिखरा है
    कोई तारा शायद कहीं पे गिरा है
    आँखों के कटोरों में नमकीन पानी
    भीगी भीगी सी ये बरसात जाने क्यों है....


    kya ho gaya?
    ye post aapke blog pe suit nahi kar raha :)

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  42. आपकी रचना में एक अजग सा खिंचाव है, जाने क्‍यों, शायद ये लफजों को करीने से सजाने का प्रभाव है।


    ---------
    ज्‍योतिष,अंकविद्या,हस्‍तरेख,टोना-टोटका।
    सांपों को दूध पिलाना पुण्‍य का काम है ?

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  43. kucchh aacchha saa lagaa hai mujhe bhi yah padhkar.....jaane kyun....!!

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  44. jindgi mani nhi jo bhi kahaa maine use
    jindgi krti rhi jo bhi lga achchha use
    main isi mjhdhar me fns kr akela rh gya jindgi ko jidd thi fir aur kua khta use
    undr rchna pdhne ka avsr prapt huaa
    bdhai

    aap ne mere blog pr aane kee kripa kee hardik aabhar swkar kren nirntr smvad bna rheyhi sb kuchh hai
    mail :dr.vedvyathit@gmail.com

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  45. क्या जरूरी है कि हर बार कुछ कहा ही जाये… इस बार कुछ नहीं कहना। बस गुजरने दीजिये इस बहाव से… :)

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  46. भावप्रधान सुन्दर गीत है। हाँ एक बात कि पवन शब्द पुल्लिंग होता है जबकि हवा स्त्रीलिंग। गीत में पवन स्त्रीलिंग प्रयुक्त हुआ है। अतः उपयुक्तानुसार सुधार कर लें।

    आभार

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  47. आज इन पलकों में नमी जाने क्यों है
    रवानगी भी इतनी थकी सी जाने क्यों है
    जाने क्या लाई है पवन ये बहा के
    सिकुड़ी सिकुड़ी सी ये हंसी जाने क्यों है.

    खोले बैठे हैं दरीचे हम नज़रों के
    आती है रोशनी भी उन गवाक्षों से
    दिख रहा है राह में आता हुआ उजाला
    बहकी बहकी सी ये नजर जाने क्यों है

    Sunder vichar, gehri abhivyakti
    agr aapko sammay mile to aap mere bolg p bhi aakar dekhe plz....
    http://amrendra-hukla.blogspot.com/

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  48. BAhut sunder Abhivyakti
    http://amrendra-shukla.blogspot.com

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  49. कोई पल छन्न से जैसे बिखरा है
    कोई तारा शायद कहीं पे गिरा है
    आँखों के कटोरों में नमकीन पानी
    भीगी भीगी सी ये बरसात जाने क्यों है.

    bahut sundar rachna...so touchng...

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  50. बेहतरीन भावाभिव्यक्ति...
    बधाई !!

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  51. ....मार्मिक, हृदयस्पर्शी पंक्तियां हैं। अच्छी कविता के लिये बधाई स्वीकारें।

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  52. बहुत खूब! आपकी कवितायें मुझे इसलिये भी बहुत अच्छी लगती हैं कि उनको पढ़ने के बाद आपके संस्मरण लेख और अच्छे लगने लगते हैं।

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  53. आपकी भावनाओं की काल्पनिक उड़ान मन के संवेदनशील तारों को झंकृत कर गए। आपके लिए मेरे पास कोई भी विशेषण नही है। सादर।

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  54. यादों की स्याही में आस यूँ खोई है
    या कल की सेज पे आज यह सोई है
    कानो में फुसफुसाती सी है कैसी आहट
    सहमी सहमी सी ये रूह जाने क्यों है.

    सुन्दर भावों से लबरेज कविता !

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  55. मन को छू गये आपके भाव।

    -------
    क्‍या आपको मालूम है कि हिन्‍दी के सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग कौन से हैं?

    ReplyDelete
  56. आज इन पलकों में नमी जाने क्यों है-आपकी य़ह अभिव्यक्ति मन के संवेदनशील तारों को झंकृत कर गए।मेरे पास आपके लिए कोई विशेषण नही है।कृपया मुझे भी प्रोत्साहित करते रहिए।धन्यवाद।

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  57. आप सब को गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभ कामनाएं.
    सादर
    ------
    गणतंत्र को नमन करें

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  58. सुन्दर अभिव्यक्ति
    गणतंत्र दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई ... जय हिंद

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  59. बहुत साल पहले मैंने एक कविता लिखी थी, युहीं बचपने में..उसका शीर्षक भी था "जाने क्यों". इस कविता के पीछे एक बात थी/..वो ये की मेरी बहन ने मुझे वो कविता चिट्ठी में लिख के भेजी थी और कही थी की वो लिखी है लेकिन आड़ी तिरछी...इसलिए कुछ सही करने के लिए मुझे भेज दिया था :)
    शुरूआती दो लाईने याद है
    "जाने क्या हो गया है मुझे,
    जाने कहाँ खोयी रहती हूँ,
    कौन आता जा रहा है ख्यालों में"
    :)

    वैसे आपकी ये कविता और कविता के लिए जो फोटो लगाया है आपने...दोनों बहुत अच्छा है :)

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  60. जब तीरगी में हो सहर की रौशनी महसूस.
    ये समझना अल्लाह ने कुछ करम किया है.
    प्रांजल अभिव्यक्ति !!

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  61. जब तीरगी में हो सहर की रौशनी महसूस.
    ये समझना अल्लाह ने कुछ करम किया है.
    प्रांजल अभिव्यक्ति !!

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  62. Aapke spandano ne spandit kar diya.
    Sunder,atisunder.

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  63. नमस्कार...

    जाने क्यों है लगता ऐसा....
    कोई भाव छुपाये बैठे...
    मन मैं कोई दर्द लिए तुम...
    उसको ह्रदय लगाये बैठे...

    सुन्दर कविता....

    दीपक...

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