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Wednesday, 12 January 2011

हाथ में सुट्टा लबों पे गाली ,हाय री मीडिया बेचारी....




समाचार माध्यमो द्वारा खबरों की शुचिता , उनको बढ़ा चढ़ा कर दिखाना, उनकी निष्पक्षता , और समाचारों के नाटकीकरण एक ज्वलंत मुद्दा बन चुका  है आज, समाज के आम हलको में . वो कहते है ना की साहित्य समाज का आइना होता है तो आप  लोगों को ऐसा नहीं लगता की इस समाचारों को हम तक पहुचाने वाले पत्रकारों की बोलचाल की भाषा भी कई बार प्रतिबिंबित होती है जनता पर. असल में कल  "नो वन किल्ड जेसिका " देखी. एक बेहतरीन कोशिश एक सच को दिखाने की ,हालाँकि पूरी फिल्म में ऐसा लगता  रहा कि और बेहतर हो सकती थी.फिर भी एक मिनट के लिए भी उठने का मौका नहीं दिया प्रभावशाली दृश्यों  ने . सबकुछ एकदम वास्तविकता के एकदम करीब . शायद मेरे इस फिल्म के प्रति आकर्षण की  एक वजह उसका मीडिया आधारित  होना भी था .

वैसे मैं यहाँ बात फिल्म की नहीं  करुँगी . बल्कि उन सवालों की करुँगी जो इसे देख कर मेरे ज़हन  में ताज़ा हो गए .जो आज से १२ वर्ष पहले भी मेरी सोच का कारण थे और आज एक अरसा गुजर जाने के बाद भी वहीँ के वहीँ हैं." क्या प्रभावी पत्रकारिता के लिए महिला पत्रकारों का  गालियाँ देना जरुरी है ?..बेशक आप कितने भी अंग्रेज़ बने पर गालियाँ हिंदी.की ही प्रभावी क्यों ठहरती हैं?.
शायद दबंग बनने के लिए बहुत जरुरी है कि राह चलते छिछोरों को भेंण.....बोला जाये.तभी पता चलेगा कि आपमें लड़ने की हिम्मत है...या फिल्म की नायिका  जब तक ये ना बोले " तुम वहां होते तो...... फट के हाथ में आ जाती." तब तक उसका एक कर्मठ  और तेज तर्रार महिला पत्रकार होना सिद्ध कैसे होता ..
"यू आर रियल बिच सम टाइम" ...जबाब .."सम टाइम ? एवेरी टाइम ".ठीक बात है. बिना बिचनेस के भला पत्रकारिता क्या होगी ?और होगी भी तो इतनी प्रभावी थोड़े ना हो सकती है कि अदालत का फैसला बदल कर रख दे..
अबे यार सुट्टा दे एक ...साला दिमाग का दही हो गया....सही बात है जब तक मुँह से धुंए के छल्ले नहीं निकलेंगे मगज काम कैसे करेगा ?और करेगा भी तो पता कैसे लगेगा कि मगज को काम पर लगाया जा रहा है ..
वो बहन का......वहां मेकअप लगा कर घूम रहा है हम साले  क्या यहाँ चू.................हैं गर्मी में कवर कर रहे हैं.वो साला मा ........वहां सलेब्रटी बना बैठा है कैमरे के सामने..
अबे काट के छाप इसे ..साले  की ...... जाएगी..
बाकी  बातें सब अंग्रेजी में. आखिर टाईट लो वेस्ट जींस और हाथ में उधार की सिगरेट को भी तो जस्टिफाय  करना है .एक शब्द हिंदी का अच्छा बोल दो तो सुनाई पड़ेगा "संस्कृत मत झाडा कर यार "साला एक तो वैसे ही  लगी पडी है..परन्तु गालियाँ जितनी ज्यादा परंपरागत हिंदी की उतनी ज्यादा प्रभावशाली ,अंग्रेज़ तो वैसे ही डिप्लोमाटिक  होते हैं सो उनकी गालियाँ भी डिप्लोमेटिक.  ना बोलने में मजा आता है ना सामने वाले को कुछ असर होता है .ना ही आप पत्रकार जैसे खतरनाक पेशे के लायक समझे जाते हो.


अपने पत्रकारिता के बहुत छोटे से कार्यकाल में  अपनी साथियों के मुँह से इसी तरह के जुमले सुनकर अपने कानो पर यकीन नहीं आता था फिर बाद में लगा कि शायद यही जरुरी होता हो एक प्रभावी पत्रकार बनने के लिए और  एक पुरुषो के  वर्चस्व   क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए .और शायद इसलिए हम विख्यात पत्रकार ना बन पाए और आज ब्लॉग घिस रहे हैं

81 comments:

  1. शिखा जी
    गालियों का संबंध किसी विशेष कार्य से न होकर संस्कारों से हैं... अच्छे संस्कारी परिवार के लोग गालियां नहीं देते...

    हमारा मानना है कि कमज़ोर और हताश लोग ही गालियों का इस्तेमाल ज़्यादा करते हैं... जिन लोगों में आत्मविश्वास की कमी हुआ करती है, वो गालियां देकर ख़ुद को मज़बूत साबित करने की नाकाम कोशिश करते हैं...

    आपने देखा होगा...लड़ाई-झगड़ों में भी कमज़ोर लोग गालियों का ही सहारा लेते हैं...
    दरअसल, गालियां देने वाला व्यक्ति अपनी कमज़ोरी का तो सबूत देता है है, साथ ही अपने (कु) संस्कारों का भी प्रमाण देता है...

    एक पत्रकार मित्र हैं- वो कहते हैं कि वक़्त पड़ने पर मैं किसी को पीट तो सकता हूं, लेकिन गाली नहीं दे सकता...

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  2. ठीक कहती हो फिरदौस !

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  3. शिखा जी
    गालियों का संबंध किसी विशेष कार्य से न होकर संस्कारों से हैं... अच्छे संस्कारी परिवार के लोग गालियां नहीं देते...

    हमारा मानना है कि कमज़ोर और हताश लोग ही गालियों का इस्तेमाल ज़्यादा करते हैं... जिन लोगों में आत्मविश्वास की कमी हुआ करती है, वो गालियां देकर ख़ुद को मज़बूत साबित करने की नाकाम कोशिश करते हैं...

    आपने देखा होगा...लड़ाई-झगड़ों में भी कमज़ोर लोग गालियों का ही सहारा लेते हैं...

    दरअसल, गालियां देने वाला व्यक्ति अपनी कमज़ोरी का तो सबूत देता ही है, साथ ही अपने (कु) संस्कारों का भी प्रमाण देता है...

    एक पत्रकार मित्र हैं- वो कहते हैं कि वक़्त पड़ने पर मैं किसी को पीट तो सकता हूं, लेकिन गाली नहीं दे सकता...

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  4. This comment has been removed by the author.

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  5. आपने बहुत बढि़या लिखा है
    गालियों के प्रयोग के लिए आपने शब्द की जगह जिस तरह से बीप का प्रयोग किया है वह तो कमाल का है।

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  6. वर्क लोड डायवर्ट करने या ओवर लोडेड साबित करने के लिए भी गालियाँ बकी जाती हैं| रफ एंड टफ जताने के लिए भी| और भी कई कारण होंगे|

    जहां तक संस्कारों की बात है तो गाली देना बुरा समझा जाता है मगर देखिए कि सबसे संस्कारी देश हमारा समझा जाता है लेकिन यहाँ किस्म किस्म की हैरतनाक गालियाँ बकी जाती हैं जिसका विश्व रिकार्ड बन सकता है |आपने जिसको बीप बीप किया है वो गाली तो अखिल भारतीय एकता का सबूत है|

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  7. फिरदौस जी ने मेरे मन की कह दी...

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  8. सही बात !
    आगे उड़नतश्तरी जी ने मेरे मन की बात कह दी ! सुन्दर ! आभार !

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  9. गालियाँ देना संस्कार विहीनता तो है लेकिन मैंने देखा है कुछ लोग बिना किसी लाग लपेट की धरा प्रवाह गालिया देते है .गलियों के इतिहास के बारे कुछ पाता तो नहीं लेकिन मुझे लगता है की इनका भूगोल एक ही होगा बस भाषाए बदल गयी है .कुछ लोगों के लिए गालिंया देना आभूषण धारण करने जैसा ही है , हाहाहा , ज्यादातर पुलिसकर्मी बिना इस आभूषण के आभाहीन ही दीखते है . पत्रकारिता और गालियों की गलबहिया वाली ये पोस्ट आपकी तीक्ष्ण पत्रकारों वाली नजर की पुष्टि कर रही है .

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  10. पता नहीं, गालियों का प्रयोग प्रतिरोधक की तरह होता हुआ सा लगता है।

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  11. mast shikha mast ....karara lekh hai, per kaun samjhega sutta lekar?

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  12. sarthak evam vicharniya aalekh...... gali bakvakar ( ek mahila se ) shayad is film ko masaledar banwana aur hit karwana moto raha ho....

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  13. अफ़सोस कि ऐसी भाषा का इस्तेमाल आजकल स्कूलों में बच्चे भी करने लगे हैं , यहाँ तक कि लड़कियां भी ।
    बेशक कहीं से भी शोभा नहीं देता ।
    मेरे विचार से इसका किसी वर्ग विशेष से कोई सम्बन्ध नहीं है ।
    सिर्फ भाषा का अंतर हो सकता है ।

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  14. har gali par darshakon jo jordar latiyan bajana bhi shayad iske nirmataon ke uddeshya ko sahi sidh karta hai.......ye film vaise aaj ke medea ka sahi chehra dikha rahi hai.

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  15. shikhaji jis tarah har nadi/river ka jal/pani/water alag alag hota hai usi tarah har vykti ka sanskar alag hota hai.

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  16. उपेन्द्र जी ! यही मैं कहना चाहती हूँ फिल्म वास्तविकता के बहुत निकट है ..मीडिया का आज का ही नहीं शायद हमेशा का यही चेहरा है.

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  17. गलियां हमारी मानसिकता की परिचायक हैं ..जो हमारे में में भरा होगा वही तो बहार आएगा ...और सही मायने में हमारे संस्कारों से इनका सीधा सम्बन्ध है ..जो व्यक्ति संस्कारवान होगा वो कभी भी भद्दे शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा ..बहुत बढ़िया

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  18. लोंगों के अपनें -अपने अंदाज़ हैं जीने के,.कोई परिस्थितियों के चलते यह वर्ताव करता हैं ,कोई परिवरिश के चलते और कोई हनक बनाने के चलते.

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  19. जो व्यक्ति संस्कारवान होगा वो कभी भी भद्दे शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा

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  20. शिखा जी,
    ये फिल्म देखी है मैने भी, मिडिया का सही चेहरा प्रस्तुत हुआ है इसमे,
    जहँा तक गालियों का सवाल है तो ये हमारे संस्कार नही है फिर भी हमारे समाज मे इन का प्रयोग हो रहा है और र्निविरोध।

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  21. shikha di ...

    bahut zaroori mudda uthaya hai aapne .... galiyaan hindi me dene kee soch ko sahi pakda hai aapne... purushon dwara dee jane wali maa- bahan samabandhi galiyan unki yaun kuntha ko pratibimbit karti hain ..lekin ye galiyaan aurat kee zabaan par chadh jayengi aisa nahi socha tha...filmon men in dino mahilaon dwara maa bahan ke galiyon ko dene ka bhi chalan badha hai..jo darshakon aur nirmata nirdeshakon kee kuntha kaa pratibimb hai shayad...

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  22. गालियां बकना जैसे एक नया फैसन हो गया है । खासकर ये विषाक्त शहरों में ज्यादा व्यापक है । बात-बात में छोटे भाई को ही बहन की गाली देना , माँ की गाली देना जैसे आम बोलचाल की भाषा हो , बसों में माहिलाओं के सामने, बुजुर्गों के सामनें अश्लिल भाषा का प्रयोग बस चालक या कडंक्टर द्वारा यहां तक तो सीमित था , लेकिन अब ये फिल्मों और टीवी सीरियल के माध्यम से घर-घर में पहुँच रहा है , इसका उपाय कुछ नहीं है, हाँ जैसे आपकी पोस्ट है, ऐसे अवरोधक से हम इसको कुछ हद शायद रोक सकते हैं । बढ़िया और सार्थक पोस्ट के लिए बधाई । वैसे आप अमेरिका में ही है ना ?

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  23. इंगलैंड में रहते हुए भी ... :-)

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  24. सतीश जी ! ये इंडिया की ही देन है :)..पुराने जख्म थे "नो वन किल्ड जसिका" देख कर ताज़ा हो गए.लगता है तब से अब तक कुछ नहीं बदला न मीडिया न मीडिया वाले.

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  25. सब ने मेरे मन की बात कह दी, तो फ़िर हम इन्हे क्यो देखते हे, अगर हम सब इन्हे देखना बन्द करेगे तो ही अच्छॆ प्रोगराम आयेगे, इस लिये हमे इन सब का बिरोध करना चाहिये

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  26. शिखा जी, ये गालियों के ’संस्कार’ अधिकांश परिवार से न होकर समाज से मिलते हैं...वो समाज जो परिवारों का समूह होता है...
    फिर भी कोई नहीं चाहता कि इनका प्रयोग अपने घरों में किया जाए...
    लेकिन कुछ अरसे से ऐसी फिल्मों की बाढ़ आ गई है, जिनमें गालियों का खुलकर इस्तेमाल किया जाता है...जिस फिल्म का आपने ज़िक्र किया है, वो भी इसी श्रेणी में आती है...
    मैं इस बात से सहमत नहीं हूं कि घर परिवार के साथ देखने के बनने वाली फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों में ऐसा किया जाए...इस और सैंसर बोर्ड की उदारता हैरत में डालने वाली है.

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  27. बहुत बुरे हाल हैं शिखा दी...
    मैं तो कई राज्य घूम चूका हूँ...कुछ राज्यों में तो मामला इतना गंभीर है कि दोस्त हो या भाई, लोग एक दूसरे को उच्स्तरिय गालियाँ देने से भी नहीं चूकते...

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  28. शिखा जी आप ने तो बड़े पत्रकार बनने का मूल मन्त्र दे दिया वैसे ये भी पता चल गया की अब तक क्यों नहीं बन पाए थे | विशेष आभार इसी फिल्म का एक गाना साली रे सुन कर गली पर एक पोस्ट दिमाग में बन रही थी किन्तु लिखने से पहले अच्छे से सोचना चाहती थी आप ने रास्ता दिखा दिया धन्यवाद |

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  29. aap kaun se media ki baat kar rahi hain ? aap ne kab kaur kaun se media men kaam kiya hai ? jara detail bataane ka kasht karen

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  30. @Anonymous ! आप अपनी पहचान बताने का कष्ट करें तो हम भी डिटेल जरुर बताएँगे..:) .

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  31. क्या गलियां पत्रकार ही देते है ?

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  32. हमारा मानना है कि कमज़ोर और हताश लोग ही गालियों का इस्तेमाल ज़्यादा करते हैं... जिन लोगों में आत्मविश्वास की कमी हुआ करती है, वो गालियां देकर ख़ुद को मज़बूत साबित करने की नाकाम कोशिश करते हैं...

    firdos ji ki is baat se picture JAB WE MET yaad aa gayi jahan ladki apni koft mitane ke liye ladko ko gaaliyan dekar khud ko shant karti hai...kyuki us samay vo itni hataash aur kamjor hoti hai.

    aap ki ye sab baate sach ko aayina dikha rahi hain.

    sunder prastuti.

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  33. गालियां थीं , हैं , रहेंगी। इनका स्वरूप बदल सकता है लेकिन कम-ज्यादा इनका उपयोग हमेशा से होता आया है, होता है और रहेगा।

    इस बारे में अपनी लिखी एक पोस्ट याद आ गयी- गालियों का सामाजिक महत्व

    आपने इस पोस्ट में बहुत सटीक तरीके से अपनी बात कही। ठोस और प्रभावी पोस्ट! मजा आ गया पढ़कर। सबसे ज्यादा यह लाइन जमी- और शायद इसलिए हम विख्यात पत्रकार ना बन पाए और आज ब्लॉग घिस रहे हैं :)

    जय हो! ब्लॉग घिसाई मुबारक हो!

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  34. नहीं शोभना जी ऐसा नहीं है कि सिर्फ पत्रकार ही गलियां देते हैं ...बल्कि बहुत से ऐसे पत्रकार हैं जो बिलकुल गलियां नहीं देते होंगे.
    परन्तु लड़कियों को इस तरह की गालियाँ देते हुए मैंने सबसे ज्यादा पत्रकारिता के क्षेत्र में देखा है.

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  35. गालियों पर एक पूरी पोस्ट लिखी थी मैंने.. राही मासूम के नॉविल में (टोपी शुक्ला को छोड़कर) तो गालियों का ये आलम रहा है कि जहाँ आपने डॉट डॉट डॉट डाले हैं वहाँ उन्होंने रिक्त स्थानों की पूर्ति की है.. उनका कहना है कि उनके किरदार की ज़ुबान के मामले में उन्हें किसी पर भरोसा नहीं..
    इस फ़िल्म में भी इसीलिये वो महिला किरदार वही बोलती है जो कोई महिला पत्रकार बोलती है..
    जंतर मंतर पर एक स्टोरी कवर करती हुई युवा महिला पत्रकार को सिगरेट का छल्ला बनाते और खाँटी गालियों से अपने साथी कैमेरामैन को बुलाते देखा है..
    और बात सिर्फ हिंदी की ही नहीं, अंगरेज़ी का वो एफ से शुरू होने वाला चार अक्षरवाला शब्द स्कूली लड़कियों, जी हाँ लड़कियों का तकिया कलाम बन चुका है, जो रोज़ाना 22 मिनट के सफर में कानों को पवित्र करते रहते हैं..
    चेहरा दिल का आईना होता है और उसी चेहरे पर एक ज़ुबान होती है, आज के कोढ़ग्रस्त मीडिया की सड़ी गली ज़ुबान!!

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  36. गलियां सिर्फ पारिवारिक संस्कार की ही बात नहीं है , समाज में जिस माहौल में आप लगातार रहते हो ,उसका असर भी होता ही है ...

    फिल्मों और टेलीविजन में दिखाए गए दृश्यों का भी अवचेतन मन पर इसका असर होता है तथा निराशा जनक स्थितियां होने पर स्वाभाविक रूप से फूट पड़ती है!

    सिर्फ टोका टाकी कर सकते हैं , कर देते हैं ..!

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  37. कहाँ खो गई है हमारी सभ्यता और संस्कृति!

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  38. शिखा जी
    आप जो संदेश देना चाहती हैं निसंदेह सफल रही हैं।
    बहुत सार्थक और प्रभावशाली लिखा है।

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  39. अभी यह पिक्चर देखी नहीं है ...लेकिन जिस तरह से बात उठायी गयी है सोचने पर विवश कर देती है यह पोस्ट ...जहां तक गालियाँ देने का प्रश्न है वो आज कल घर से नहीं समाज से और अपनी संगत से इंसान सीखता है ..कुछ लोग शायद स्वयं को विशेष दिखाने के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग करते हैं ..और कुछ अपनी हताशा से प्रभावित हो कर ...
    गालियाँ देने से बेहतर तो ब्लॉग घिसाई ही है ...तो घिसते रहिये ...

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  40. बहुत ही सुन्‍दर एवं सटीक लेखन है आपका न कि ब्‍लाग घिसाई ...इस सार्थक लेख के लिये बधाई ।

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  41. मीडिया की सच्चाई तो ये है ही, सभी जगह यही हाल है, गाली फिलहाल का फैशन है, जो जितनी उच्च स्तरीय गालियां दे सकता है, उतना ही फैशनेबल होता है...तभी तो सड़क पर गाड़ियों से ज्यादा गालियां चलती हैं

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  42. आज की मानसिकता का सही चित्रण किया है अच्छा है इनसे बची हुई हो।

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  43. शिखाजी, मैंने अपनी पोस्‍ट श्रद्धा और उपहास के बीच झूलता आदमी में यही कहने का प्रयास किया था कि हमारी मीडिया को क्‍या हो गया है? क्‍यों लोगों का व्‍यक्तित्‍व बौना करती है? जिस तरह की भाषा कल तक पुलिस वाले बोलते थे आज वही भाषा मीडिया बोल रही है। पुलिस वाले तो कहते हैं कि हमें चोर-डाकुओं के बीच कार्य करना है इसलिए ऐसी भाषा ही चाहिए लेकिन मीडिया तो सभ्‍य लोगों के बीच कार्य करती है, फिर? आपने बहुत स्‍पष्‍ट शब्‍दों में स्‍पष्‍ट बात कही इसके लिए बधाई।

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  44. सेक्टर-16 नोएडा की फिल्म सिटी हो या साउथ दिल्ली वाले चैनल, सुट्टेबाज मीडियाकर्मीयों द्वारा इन गालीयों को हमनें भी बहुत सुना है, परंतु यह गालीयां उस गलीच दलाली के सामने उपेक्षा की पात्र है, जो यह सभ्य भाषा में अपने अपने मालिकों के चैनल पर, देश के साथ रोज़ करते हैं!

    80 करोड़ भारतीयों की समस्याओं की उपेक्षा करके,
    बालीवुड और क़्रिकेट की अफीम चटाकर,
    समाचार को मनोरंजन बना देने वाले
    खबर के दलाल खबरचीयों की भाषा चाहें संस्कृत ही हो, हमारे लिये तो वह सबसे भद्दी गाली है।

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  45. शिखा जी, मीडिया की सही क्‍लास ली है।

    लेकिन मीडिया भी हमारे समाज का एक प्रतिबिम्‍ब भर है। हॉं, वहां पर पैसा और हनक भी है, सो ये दोनों चीजें खुलकर सामने आ जाती हैं।

    ---------
    बोलने वाले पत्‍थर।
    सांपों को दुध पिलाना पुण्‍य का काम है?

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  46. यह आज के युग का फैशन है बोल्ड बनना है तो गलियों का इस्तेमाल आना ही चाइये यह हिंदी या इंग्लिश दोनों मैं है फैशन. और केवल मीडिया नहीं ,बड़े लोगों की पार्टी मैं भी ऐसे ही बात हुआ करती है और अब तो महिलाएं भी इस से अछूती नहीं रहीं.
    .
    ना करो तो बहनजी टाइप और पापा जी का गुड्डा का खिताब मिल जाया करता है..

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  47. वैसे एक बात कहूँ... तो..गाली देना भी एक आर्ट है... गाली के बारे में एक चीज़ यह भी कहा जाता है कि यह ऑफिसर लाईक कवालीटीज़ है... और गाली देने से यह भी रहता है कि सामने वाला डेस्परेट महसूस करता है ...अगर किसी को दबाना हो तो मार के साथ गाली कैटालिस्ट की तरह एक्ट करती है... हालांकि पत्रकारिता में गाली मैंने कभी सुनी नहीं है... हाँ! यह है कि हर इन्सान की तरह पत्रकार भी गाली देता है...पत्रकार बनने के लिए गाली ज़रूरी नहीं है .... लेकिन एक लीडर या फिर ऑफिसर बनने के लिए गाली का आना बहुत ही ज़रूरी है... कुल मिला कर बहुत ही शानदार पोस्ट...

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  48. वाह क्या बात है?!
    आज ही एक महिला पत्रकार टाइप की महिला को सिगरेट के छल्ले उड़ाते देखा तो बहुत उत्सुकता हुई। और धीरे-धीरे उसके क़रीब पहुंच गया यह देखने कि कैसे पीती है और पीते कैसी लगती है। हां, उसने गाली नहीं दी, और अगर दी भी होगी तो मन ही मन। पर मैंने पूछ ही लिया कैसा लगता है, तो वो भी हें-हें-हें ही कह पाई।

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  49. गालियों का अपना महत्व है। इसका अर्थ लेने वाले और देने की भाव-भंगिमा पर भी निर्भर करता है। बनारस जैसे शहरों में यह आत्मीयता बढ़ाने में बड़ा सहायक रहा है। दो पक्के बनारसी बात कर रहे हों तो हर वाक्य में एक गाली घुसेड़ने की कला जानते हैं। उनकी बातें सुनकर किसी बाहरी को अचंभा हो सकता है लेकिन यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा है।
    जहाँ एक स्थान पर गाली हास्य का सृजन करता है वहीं दूसरे स्थान पर वही गाली भयंकर मारक क्षमता रखता है।
    बहरहाल आप ने जिस संदर्भ में यह पोस्ट लिखी वह सही व सार्थक है।

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  50. "और शायद इसलिए हम विख्यात पत्रकार ना बन पाए और आज ब्लॉग घिस रहे हैं"

    हम भी तुम्हारे साथ हैं शिखा :(:(

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  51. कुछ समय पहले एक शोध की खबर आई थी कि - 'गालियां देने वाले कर्मचारी निजी कंपनियों में ज्यादा तेजी से आगे बढते हैं, ये शायद अपने तनावों को झटकने में भी अपेक्षया सक्षम होते हैं...'गालियां वाकई मन की कमजोरी हैं, जो शब्दों की कमी से बाहर निकल आती हैं. मगर अब तो ये स्टेटस सिम्बल भी हो गई हैं, खासकर यदि ये अंग्रेजी में हों तो.

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  52. सुन्दर ...अति सुन्दर !

    १३ जनवरी को पौष माह का आखिरी दिन यानि ठंड का अंत !इसी दिन लोहरी होती है ।
    आप हमारे संग लोहरी मनाने हमारे यहाँ आईएगा ।

    आभार
    हरदीप

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  53. पढ़ते-पढ़ते मुस्कुराहट आ गई। ऐसा कुछ नहीं है कि विख्यात पत्रकार बनने के लिए गालियों का सहारा लेना पड़ता हो। कई बार तो गालियां देने की लोगो की आदत सी बन जाती है। घर में सभ्य भाषा का प्रयोग तो बाहर धाराप्रवाह गाली। जिन मोहतरमा पर फिल्म का किरदार बना है वो हाल में फिर विख्यात हुईं राडिया प्रकरण में.....

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  54. मिडिया का कुछ बदरंग चेहरा आजकल बराबर दिख रहा है...२G scam के बाद से...

    वैसे भी आजकल इमानदारी को बखूबी दिखने के लिए भी मूवी में गलियां दिखने का रिवाज हो रहा है...:P

    और आपका ये पोस्ट कुछ जायदI ही crisp लग रहा है...:)

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  55. बात अगर मीडिया दफ्तर में करें (जो की आपने लिखा है) तो गलत है.. वो भी सिर्फ स्मार्ट बनने के लिए .....

    कला पक्ष के देखें तो गालियाँ जबान साफ़ करती हैं, इसके उच्चारण में एक अलग वितान है, आलाप टाइप... आप कभी काशी का अस्सी पढ़िए.... गालियाँ साफ़ दिल देनी चाहिए... निष्पक्ष होकर, नदी जैसे, निःस्वार्थ होकर तब ठीक लगता है...

    विवाह में भी गालियों का रिवाज़ है. राम जी ने भी खायी थी..और लक्ष्मण को समझाया था...

    बहरहाल, व्यथित ना हों... बात दिल से निकली है दिल तक पहुंची है. और असर हुआ है.

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  56. शिखाजी ,

    बहुत ही ज्वलंत और महत्वपूर्ण विषय पर लिखा है आपने |

    फिल्मों में फिल्म निर्माता यदि गाली परोसना ही चाहता है तो सेंसर बोर्ड और सरकार भी इसका पूर्ण समर्थन क्यों कर रहे हैं ?

    क्या छिछले स्तर की ऐसी फिल्मे नयी पीढ़ी को और भटकाव के अलावा कोई सार्थक सन्देश दे पाएंगी ?

    बस हमें कलम से वार करना है सो तो कर ही रहे हैं |

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  57. अंशु जी की पोस्‍ट से यहां तक पहुंचा। संयोग से कल रात को ही वह फिल्‍म देखी जिसका जिक्र आपने किया है।
    *
    जिस शब्‍द का इस्‍तेमाल वहां फिल्‍म में हुआ है अव्‍वल तो वह गाली नहीं है,हमारे शरीर का एक अंग है। हां उसका उपयोग और शब्‍दों को जोड़कर गाली में जरूर बदल दिया जाता है,जिसमें अपमान करने का इरादा होता है। पर यहां तो जो वाक्‍य बोला गया है वह केवल स्थिति की भयावहता को दिखाने के लिए कहा गया है।
    *
    गाली देने का एक सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष भी है। जहां कुछ लोग लोगों को नीचा दिखाने के लिए गालियां देते हैं वहीं कुछ लोग अपना,गुस्‍सा निराशा,हताशा और गुबार निकालने के लिए गाली देते हैं। अगर वे यह न करें तो पता नहीं और क्‍या कर बैठेंगे। अब यह अलग बात है कि आजकल गाली देना एक संस्‍कृति के रूप में विकसित हो गया है।
    *
    मेरे पिताजी रेल्‍वे में थे। सो रेल्‍वे स्‍टेशन के आसपास रेल लाइन पर काम करते गैंगमेनों को देखने का अवसर मिला। जब वे रेल की पटरियां बदल रहे होते थे तो जोश दिलाने के लिए एक दूसरे को इस तरह की गालियां बोलते थे। पहले पहले मुझे लगा कि कितने गंदे लोग हैं। फिर धीरे धीरे बात समझ में आई।
    *
    शादी विवाह में गाली देने का बाकायदा आयोजन किया जाता है। होली पर भी बाकायदा गालियां दी जाती हैं।
    *
    इसलिए गालियों का अपना महत्‍व है।

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  58. gaaliya jitani bhi puarani ho, is par garv nahi kiyaa ja sakata. aadami de ya aurat, yah ghatiyaa-karm hai. aadami ya aurat kitanaa patit hai yah uski gaaliyon se bhi saajha ja sakataa hai. maa-bahan ek karna, ashleel hgaaliyaan denaaasabhya samaj ki nishani hai. iske virodh mey hi likha jana chahhiye.

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  59. जो व्यक्ति संस्कारवान होगा वो कभी भी भद्दे शब्दों का प्रयोग नहीं करेगा|

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  60. गालियों के विषय में मेरी सोच अलग है. मैं उसे समाज का एक हिस्सा मानती हूँ. हाँ, औरतों को उद्देश्य करके दी गयी गालियों की भर्त्सना करती हूँ.
    ये फिल्म मैंने नहीं देखी, पर ट्रेलर देखे हैं. रानी मुखर्जी का ऐसे गले बकना आपको अजीब लग रहा होगा, मुझे नहीं लगा. ये बात पेशे से नहीं जुड़ी है. सामाजिक माहौल से जुड़ी है. ये बात नहीं है कि रानी इसलिए गाली देती है कि वो एक तेज-तर्रार पत्रकार सिद्ध हो सके, बल्कि इसलिए गाली देती है क्योंकि वो दिल्ली की है.
    मैंने दिल्ली में एक काउंसलर के रूप में एक संस्था में काम किया है, जहाँ मेरे अलावा सारी लड़कियाँ लोकल थीं और मैंने पहली बार वहाँ लड़कियों को धकाधक गाली बकते देखा. मुझे तब आश्चर्य हुआ था क्योंकि लगभग सारी लड़कियाँ अंगरेजी माध्यम में पढ़ी थीं. ये दिल्ली का कल्चर है. और ज्यादातर अंगरेजी माध्यम वाले ही गालियों का प्रयोग स्टेटस सिम्बल के रूप में करते हैं.
    मेरे ख्याल से फिल्म में इसी वास्तविकता को दिखाने का प्रयास किया गया है.

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  61. अगर ये फ़िल्म चल गई तो कल हर फ़िल्म के शीर्षक में भी ऐसे ही सत्य वचन होंगे...

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  62. यह एक बिमारी है। एक बुरी आदत है।

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  63. यह एक बिमारी है। एक बुरी आदत है।

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  64. पीपली लाईव में इस पवित्र शब्द का मंत्रोच्चारण क्या कर दिया गया रघुवीर यादव के श्री मुख से कि अब यह ट्रेंड बनता जा रहा है और फिर आज की असेर्तिव वूमैन क्यों इसे बोल अपनी जिहवा को पवित्र न कर ले ...औरतों के मुंह से गालियाँ यह बताती हैं की वे वाकई कैसे असुरक्षित माहौल में जी रही हैं और गालियों से वे एक खोखली दबंगता और अभेद्यता का क्षद्म आवरण बनाती हैं और मुझे लगता है इन सबसे वे और असुरक्षित हो लेती हैं -कहीं यही कारण तो नहीं कि लड़कियां सबसे अधिक शोषण और बलात्कार की शिकार दिल्ली में बन रही हैं -वे अनजाने की एक प्रतिहिंसा का महाल सृजित कर चुकी हैं ="साली हरामजादियां " ! (यह मैं नहीं कह रहा हूँ !)यह लौंडों की अभिव्यक्तियाँ हैं गालियाँ सुनने के बाद !
    चाहे पुरुष हो या औरत ,शील संकोच मनुष्यता का आभूषण है -चिंतित कदापि मत होईये आपने जो मुकाम हासिल कर लिया है बहुत सी दिल्लीवालियों को वह अलभ्य है -भला गाली बक कर कौन महान बना है ?

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  65. media jabse ek service n hokar business ho gaya hai tabhi se ye problem ki shuruaat hui hai..

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  66. ऐसे ही दुबारा चला आया। यहां सब म‍ीडिया या फिल्‍मों को ही दोष देते नजर आ रहे हैं। लगता है सबके सब मेट्रो और बड़े नगरों में ही रहते हैं। भारत के गांवों और कस्‍बों में तो इनका जाना हुआ ही नहीं है।
    वहां ये गालियां इतनी आम हैं कि किसी को उससे बहुत फरक नहीं पड़ता। हां अब यह इस तबके में भी प्रवेश कर गई हैं जहां नहीं थीं, तो अलग बात है।
    *
    पीपली लाइव में वही दिखाया है जो वहां बोला जाता है।

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  67. @राजेश जी से भी पूर्णतः सहमत !

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  68. दाद देनी पड़ेगी आपकी...ऐसी पोस्ट लिखने के लिए...एकदम हेवी टाइप...शुरूआती कमेन्ट पढ़ा मैंने, फिरदौस जी की बात एकदम सही लगी...

    एक समय था जब छोटी मोटी गालियाँ मेरे मुहं से निकल जाती थी, नौ साल हो गए, अब शायद ही निकलती हो...(कुछ ऐसी बात हो गयी थी उस समय, बताऊंगा आपको कभी :) )

    वैसे ये फिल्म देखने की बहुत ईच्छा है...कुछ दिनों बाद देखूंगा जरुर

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  69. Nice right up. BTW, English expletives are not that effective, as they are used most of the times for non malice ways.

    But to me, it doesn't look good to see girls who have loose mouth.

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  70. .सराहनीय प्रस्तुति. आजकल तो ये आम भाषा सी हो गयी है. कोई एक बात भी इस सब के बिना पूरी नहीं होती और युवा वर्ग इसे स्टेटस सिम्बल कहते हैं.

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  71. गाली देना मानसिक विकृत है जो धीरे धीरे आदत में शुमार हो जाता है !
    लेकिन लोकतंत्र का चौथा पाया जिसके हर कदम का समाज पर प्रभाव पड़ता है ,अगर वह इसका इस्तेमाल करके गौरवान्वित होता है तो यह शर्म की बात है !
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  72. बहुत ही अच्छी पोस्ट है शिखा जी ... ये बात मुझे भी समझ नहीआती की क्यों हम आधुनिकता के नाम पे ये सब परोस रहे हैं ... कई लोग चर्चा करते हैं की ये तो आम भाषा है समाज की पर ये ज़रूरी नही है की इस आम भाषा को ज़बरदस्ती झेला जाए ... गलियाँ तो जैसे आजकल फिल्मों की भाषा बनती जा रही है ...

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  73. apne anubhav ke aadhar par aapne jo chitran prastut kiya...bahut thoda sa media ka anubhav mujhe bhi raha hai isliye aapki bat samajh sakta hun.......

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  74. नमस्कार...

    मैं फिरदौस जी की बात से सहमत हूँ . गलियां आपकी मानसिक विकृति को दर्शाती हैं...सही हैं लोग अपने को रफ और टफ दर्शाने के लिए गलिओं का सहारा लेते हैं...पर क्या वास्तव मैं ऐसा होता है...? शायद नहीं....हाँ पत्रकारों पर एक बहुत सुन्दर फिल्म कुछ समय पहले आई थी..नाम था पेज ३.. आज की पत्रकारिता बस ख़बरों की मिर्ची से समाज मैं व्याप्त नफरत की आग पर धुंगार देने मैं ही अपनी सार्थकता सिद्ध करने की कोशिश करती नज़र आती है....रही बात गलियों की तो एक वाकया याद आता है....

    मेरे आफिस मैं मेरे एक बॉस गलिओं के हेल्पिंग वेर्ब लगा का अपनी वाणी को सुशोभित करते रहते थे...एक दिन दो लोगों ने आपस मैं झगडा कर लिया और साथ ही गली-गलौज भी की....बात बॉस तक पहुंची...उन्होंने दोनों को बुलवाया...और पूछा की या हुआ...तो एक ने कहा साहब इसने मुझे माँ-बहन की गलियां दी हैं....उन्होंने कहा....किस बहन..............मा........की मजाल है की मेरे आफिस मैं गाली दे....आगे से ऐसी कोई शिकायत मेरे पास आई तो मैं सबकी .....................दूंगा......

    ये तो खैर हंसी की बात थी...पर आपके लेख ने कम से कम आपके ब्लॉग के पाठकों के ह्रदय मैं तो एक सुसंवेदना का संचार किया...इसके लिए आप बधाई की पात्र हैं....

    दुनिया भर के मुद्दों के बजाये अगर सुसंस्कारों पर पर सभी लोग ध्यान दें तो यह धरा पुनः स्वर्ग हो सकती है....

    शुभकामनायें...

    दीपक...

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  75. आज रिश्तों की अज़्मत रोज़ कम से कमतर होती जा रही है। रिश्तों की अज़्मत और उसकी पाकीज़गी को बरक़रार रखने के लिए उनका ज़िक्र निहायत ज़रूरी है। मां का रिश्ता एक सबसे पाक रिश्ता है। शायद ही कोई लेखक ऐसा हुआ हो जिसने मां के बारे में कुछ न लिखा हो। शायद ही कोई आदमी ऐसा हुआ हो जिसने अपनी मां के लिए कुछ अच्छा न कहा हो। तब भी देश-विदेश में अक्सर मुहब्बत की जो यादगारें पाई जाती हैं वे आशिक़ों ने अपनी महबूबाओं और बीवियों के लिए तो बनाई हैं लेकिन ‘प्यारी मां के लिए‘ कहीं कोई ताजमहल नज़र नहीं आता।
    ऐसा क्यों हुआ ?
    इस तरह के हरेक सवाल पर आज विचार करना होगा।
    ‘प्यारी मां‘ के नाम से ब्लाग शुरू करने का मक़सद यही है।
    इस प्यारे से ब्लाग को एक टिनी-मिनी एग्रीगेटर की शक्ल भी दी गई है ताकि ज़्यादा से ज़्यादा मांओं और बहनों के ब्लाग्स को ब्लाग रीडर्स के लिए उपलब्ध कराया जा सके। जो मां-बहनें इस ब्लाग से एक लेखिका के तौर पर जुड़ने की ख्वाहिशमंद हों वे अपनी ईमेल आईडी भेजने की कृपा करें और जो अपना ब्लाग इसमें देखना चाहती हों, वे अपने ब्लाग का पता इसी ब्लाग की टिप्पणी में या फिर ईमेल से भेज दें।
    मेरा ईमेल पता है- eshvani@gmail.com

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  76. .और शायद इसलिए हम विख्यात पत्रकार ना बन पाए और आज ब्लॉग घिस रहे हैं....

    हा...हा...हा....
    शिखा जी इस ब्लॉग घिसाई में भी माहिर हो गई हैं ....

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  77. बात आपने सही पकड़ी....गालियों में दबंगई अधिक दिखती है,इसलिए इसकी और अनजाने की सबके रास्ते मुड़ पड़े हैं..

    तामसिक वृत्ति बहुत tejee से विस्तार paa rahi है...

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  78. इसमें कोई शक नहीं कि‍ गालि‍यों के बि‍ना भी काम बेहतर चल सकता है।

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  79. भाई मुझे तो अमिताभ बच्चन की बीप बीप वाली गली बहोत पसंद आई वही सबसे सही ग़ाली है

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