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Monday, 8 November 2010

टूटते देश में बनता भविष्य.(मेरा रूस प्रवास.)

कड़कती सर्दी में क्रेमलिन.
जब मैंने अपने रूस प्रवास पर यह पोस्ट लिखी थी तो जरा भी नहीं सोचा था कि इसकी और भी किश्ते लिखूंगी कभी .बस कुछ मजेदार से किस्से याद आये तो सोचा बाँट लूं आप लोगों के साथ. परन्तु मुझे सुझाव मिलने लगे कि और अनुभव लिखूं और मैं लिखती गई जो जो याद आता गया. पर  यहाँ तक पहुँचते पहुँचते फरमाइशें  होनी लगीं कि और लिखो, और इसे किताब का या उपन्यास का रूप दे दो. यहाँ तक कि एक मित्र ने इसे छपवाने की भी जिम्मेदारी ले डाली .परन्तु उपन्यास तो क्या एक लघुकथा लिखना भी मेरे बस की बात नहीं .ये तो बस स्मृति पटल पर अंकित कुछ यादगार लम्हें हैं, कुछ जिन्दगी के तजुर्बे जो जस का तस मैं शब्दों में उतार देती हूँ .किताब बने ना बने परन्तु आप लोगों का सुझाव सर माथे. तो जितना भी हो सकेगा मैं लिखती रहूंगी.कम से कम ये पल मेरे खजाने में सजे रहेंगे.
वोरोनेज़ से फाऊंडेशन  कोर्स के बाद मॉस्को  में मेरे पोस्ट ग्रेजुएट  डिग्री का पाठ्यक्रम पांच  साल (१९९१- १९९६ )का था. और पेरेस्त्रोइका के बाद रूस का चेहरा तीव्रता  से बदल रहा था. राजनैतिक  हलचल से तो हमें उस समय ज्यादा सरोकार नहीं हुआ करता था परन्तु सामाजिक परिस्थितियां भी आश्चर्य जनक ढंग से बदल रही थीं .अपने देश और संस्कृति पर गुमान करने वाले रूसी, रूस को छोड़कर बाहर मुल्कों में जाकर बसने की चाह रखने लगे थे. जो कि रूसी भाषियों के लिए बेहद मुश्किल था.अंग्रेजी आने पर भी सिर्फ रूसी बोलने वाले रूसी अब अंग्रेजी और फ्रेंच सीखना चाहते थे. अपने रूबल पर नाज़  करने वाले लोग रूबल को डॉलर  में बदल कर जमा करने लगे थे क्योंकि रूबल का मूल्य हर दिन तेज़ी से गिर रहा था. 
आर्थिक तंगी का असर लोगों के काम पर उनके व्यक्तित्व पर जाहिर तौर पर पड़ रहा था और हल्के- फुल्के रिश्वत जैसे भ्रष्टाचार की नींव पडने  लगी थी. बाजार बाहरी देशो के लिए खुलने लगा था जहाँ मोस्को में गूम और सूम नाम के २ बड़े बड़े सरकारी मॉल थे वहां अब इटालियन और अमेरिकेन ब्रांड के बड़े बड़े शो रूम्स खुलने लगे थे और उनके प्रति जनता का आकर्षण स्वाभाविक था. 
गूम विशालकाय डिपार्टमेंटल  स्टोर.
इन्हीं सब परिवर्तन के चलते छोटी मोटी  सुविधाएँ विदेशी लोग हासिल कर लिया करते थे .वैसे पहले साल में हॉस्टल में एक कमरे में ५ लोगों के रहने का प्रावधान था .परन्तु वार्डन को बहला कर लोग अपने कमरे में ऐसे  २-३ छात्रों का नाम लिखवा लिया करते थे जो होस्टल में ना रहकर कहीं और  रहा करते थे और इस तरह एक बड़े कमरे में ज्यादा से ज्यादा ३ लोग ही रहा करते थे और उसे भी अपनी निजता की सुरक्षा के लिए लकड़ी के पट्टों से बाँट लिया करते थे और थोड़ी सी कोशिश के बाद पूरा एक कमरा भी मिल जाया करता था .वैसे एक कमरे में एक ही लिंग के छात्रों के रहने का नियम था परन्तु किसी के भी किसी वक़्त भी आने जाने की कोई पाबंदी नहीं थी .और जब तक आपके साथ वाला साथी शिकायत ना करे किसी भी काम की कोई मनाही नहीं थी. मतलब  यह कि हमारा होस्टल का कमरा होस्टल का नहीं बल्कि किसी होटल का सा था, जिसके एक छोटे से हिस्से में हम अपना रसोई भी बना लिया करते थे .हालाँकि पहले साल हमने होस्टल के कैफे  में खाकर ही गुजारा  जबकि ज्यादातर विदेशी छात्र रूसी स्वाद के अभ्यस्त ना होने के कारण अपने कमरे में ही खाना बनाया करते थे .परन्तु हमें बचपन से ही सिखाया गया था जैसा देश वैसा भेष . और हमारी किस्मत भी  ऐसी थी कि हमें हमेशा ही अलग कमरा मिला या फिर किसी विदेशी के साथ तो खुद के अकेले के लिए खाना बनाने में बड़ा आलस आता था और हम मजे से कैफे  में रूसी पकवानों को भारतीयता के रंग में ढाल कर खाया करते थे .जैसे बोर्ष  ( रूसी चुकंदर का सूप ) से मीट निकाल  कर , या मैश  पटेटो में टमाटर की ग्रेवी डाल कर.  
 बोर्ष एक रूसी सूप.
पर धीरे धीरे इससे ऊब होने लगी तो हमने भी एक छोटी सी हॉट प्लेट  खरीद कर अपने कमरे में रख ली , हालाँकि कमरों में किसी भी प्रकार की कुकिंग  की इजाजत नहीं थी .परन्तु वे  छात्र ही क्या जो नियमों के मुताबिक काम करें? तो हर कमरे में हॉट प्लेट पाई जाती थी . और यह  वहाँ  की वार्डन  को भी पता था पर शायद छात्रों की मजबूरी वे  भी समझा करती थीं , तो जब भी रूम चैकिंग  होती तो, कोरिडोर से ही चिल्लाती हुई आती थीं, जिससे कि सब सतर्क हो जाएँ और हॉट प्लेट  कहीं पलंग- वलंग  के नीचे छुपा दें .और वो आकर ऊपरी  तौर पर चैकिंग  करके चली जाया करती थीं .हॉट प्लेट  के आते ही हमारे भारतीय स्वाद तंतु जाग्रत हो उठे थे और हमने सब्जी ,चावल ,दाल ( जितनी भी वहां  मिलती थीं :)) बनाना  शुरू कर दिया था. फ्रिज ,टीवी भी खरीद लिया था और एक तरह से हमारा एक कमरे का छोटा सा घर बस चुका था.वैसे फ्रिज की जरुरत वहां सिर्फ २ महीने ही पड़ती थी बाकी समय इतनी ठण्ड होती थी कि खिड़की के बाहर ही लोग एक टोकरी बाँध देते थे या थैला  ही लटका देते थे और वो डीप - फ्रीजर बन जाया करता था .खैर घर तो हमारा बस गया अब बारी कैरियर बनाने की थी - रूसियों के साथ उनके स्तर पर पढना नामुमकिन  था क्योंकि रूसी भाषा की पहली सीढी पर ही थे हम .पर विदेशी साथियों के साथ पढना टेडी खीर था.८०% छात्रों को सिर्फ पास होने से मतलब था जो वो किसी ना किसी तरह हो ही जाया करते थे उनके बीच रहकर आप पढाई करो या क्लासेस  ठीक से जा पाओ उसके लिए काफी इच्छा शक्ति की जरुरत थी.तो पहला साल तो उनसे अलग थलग रह कर अच्छे बच्चों की तरह नियमित क्लास जाते रहे पूरी निष्ठा से पढाई करते रहे और उसका फल भी हमें मिला परन्तु दूसरे  साल तक आते आते हमें भी होस्टल के छात्र जीवन की हवा लगने लगी दोस्तों के साथ एक पार्टी का मतलब होता था २ दिन की क्लास बंक .और इसी गफलत में हमने भी यही तरीका इख्तियार कर लिया .".हो जायेगा यार ..एक्जाम्स में देख लेंगे ".और इसी चक्कर में एक बार- पहली और आखिरी बार, हम समय से एक टेस्ट नहीं दे पाए. हालाँकि ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी लोग आगे पीछे ये सब किया करते थे अपनी और टीचर की सुविधा अनुसार टेस्ट की डेट फिक्स की जा सकती थी और उसमें मार्क्स नहीं सिर्फ पास- फेल  मिलता था परन्तु हमें रातों को डरावने सपने आने लगे थे कि भारत लौटने का समय हो गया है और हमारा वो टेस्ट अब तक क्लीअर नहीं हुआ .वो दिन था... हमने फैसला कर लिया सारी खुदाई  एक तरफ और पढाई एक तरफ. उसके साथ कोई भी समझौता हम नहीं करेंगे .और तब से हर टेस्ट और एक्ज़ाम समय से भली भांति  देते रहे .
वैसे पश्चिमी देशों की शिक्षा  व्यवस्था  के तहत ये कोई बहुत मुश्किल काम मुझे नहीं लगता था .भारत की रट्टू और किताबों पर आधारित शिक्षा के विपरीत वहां शिक्षा  प्रैक्टिकल  और व्यक्ति आधारित होती थी .अगर आपने सारे लेक्चर  और सेमिनार ईमानदारी  से अटेंड  किये हैं और थोड़ी भी गंभीरता से पढाई को लिया है तो घंटों किताबों  को लेकर बैठने  की जरुरत नहीं थी.वहां चैखव  की रचनाओं की व्याख्या करने के लिए किसी और की लिखी  पुस्तक या कुंजी की जरुरत नहीं थी आपके खुद के विचारों की और समझ की जरुरत थी .आप पहले लिखी किताबों से मार्गदर्शन तो पा सकते हैं  परन्तु अंतिम विचार और इम्तिहान  आपकी अपनी क्षमता और बुद्धि  ,विचार पर निर्धारित होता है. 
खैर होस्टल, दोस्त और पढाई तीनो में संतुलन बन चुका था और रूस में हमारी गाड़ी  काफी हद तक पटरी पर आ गई थी.
बाकी फिर कभी :). 

65 comments:

  1. सारी खुदाई एक तरफ और पढाई एक तरफ.
    .....
    संस्मरण से शिक्षा जी शिक्षा की पद्धतियों और उसके साकारत्मक पहलु के बारे में जानकारी मिली। आपके विवरण की सरसता इसे रोचक भी बनाए रखा।

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  2. आप का संस्मरण पढकर अच्छा लगा ......इसे एक किताब की शक्ल दे ही दिजीये.

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  3. Waaqayi aapkaa ye sansmaran padhne me bahut,bahut mazaa aata hai!

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  4. राहुल जी ने तो रूस का बहुत नजदीकी से वर्णन किया है, देखते हैं कि आप कितना घुमा पाती हैं हमें रूस में..

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  5. आपने बहुत ही रोचक संस्मरण प्रस्तुत किया है!
    पुरानी यादों को दुहराना बहुत अच्छा लगता है!

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  6. रोचक संस्मरण। इसे पुस्तक रूप देने के लिये मेरी अग्रिम बधाई स्वीकार करें। कोई रशियन दिश हमे भी बनानी सिखायें मगर प्योर वेज। शुभकामनायें।

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  7. बहुत अच्छा लिखा है...रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए शुक्रिया शिखा जी.

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  8. आप जब लिखती हो तो पढने पर हम आपके संस्मरण से जुड़े महसूस करते है . भिन्न परिस्थिति और तमाम कठिनाइयों के बाद भी पढाई को तन्मयता से पूरा करना एक चुनौती होती है. आपके जीवट भरी इस यात्रा को पढ़कर रोमांचित होते है . पूर्व सोवियत संघ के बारे में बहुत सारी जानकारिया मिली जो ग्लास्नोस्त और प्रेस्त्रोइका से पहले बाहरी दुनिया के लिए पहेली जैसा ही होता था . खासकर उनकी अर्थव्यस्था और सामजिक ताना बाना . सारी खुदाई एक तरफ और पढाई एक तरफ , हाहा , नया स्लोगन बताने के लिए शुक्रिया ., शायद ये रूस में प्रचलित होगा . अभी जल्दी में इतना ही फिर पढ़ते है लौटकर .

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  9. आप का संस्मरण अच्छा लगा
    शुभकामनायें

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  10. रूस प्रवास के संस्मरणों को यहाँ पर हम सबके साथ बाँटने के लिए आभार ...बहुत सी बातों की जानकारी तुम्हारे इन संस्मरणों से मिल जाती है ...जब कोई भारतीय वेदेशी धरती पर शिक्षा पाता है तो लगता है कि अरे वाह ..क्या ज़िंदगी होगी ...पर वहाँ आने वाली कठिनाईयों का आभास नहीं होता ...इन लेखों में जहाँ वहाँ की मस्ती है वहाँ कठिनाईयों से दो चार होने की बात भी है ...और इसी संघर्ष का नाम ज़िंदगी है ...बहुत अच्छा संस्मरण ..आगे भी इंतज़ार रहेगा ..

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  11. @भारतीय नागरिक ! आप किस राहुल जी की बात कर रहे हैं कृपया थोडा विस्तार से बता दीजिए.मैं भी उनका लिखा पढ़ना चाहती हूँ.

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  12. जिन मित्रों ने यह कहा कि और लिखिए
    जिन मित्रों ने यह सुझाव दिया है कि इसे पुस्तक की शक्ल दे डालिए..... वे सही कह रहे हैं।

    मेरा भी सुझाव यही है कि आपको मित्रों की बात मान लेनी चाहिए
    आपका लेख वहां के आर्थिक, सामाजिक पक्ष को बड़ी शिद्दत के साथ सामने रखता है।

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  13. शिखा जी ... बहुत अच्छा लगा आपका ये लेख पढ़ कर ... वक़्त बीत जाता है बस यादें हैं जो साथ है ... अपनी यादें और अनुभव हमारे साथ बांटने के लिए धन्यवाद ...

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  14. एक पार्टी का मतलब होता था २ दिन की क्लास बंक ?

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  15. यह कड़ी लम्बे समय बाद आयी और पहले की ही तरह भायी !

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  16. रूस में रहकर पढने के बारे में जानना दिलचस्प लगा ।

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  17. आपके साथ साथ हम भी रुस की सैर कर रहे हैं। पेरेस्त्रोईका के दौर रुस में परिवर्तन भी बहुत हुए जिसमें सत्ता परिवर्तन और संयुक्त रुस का विखंडन महत्वपुर्ण था।

    आभार

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  18. @डॉ महेश सिन्हा ! अब ये कैसे? ये किसी और किश्त में बता दूंगी ये किश्त बहुत लंबी हो गई है हा हा हा .

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  19. बहुत ही सटीक सारगर्वित प्रस्तुति ..... आभार

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  20. तुम्हारे संस्मरण के साथ हम भी उस काल-खंड में पहुँच गए और तुम्हारा कमरा, वो हॉट प्लेट, सब नज़रों के सामने घूम गया...बड़ी जीवन्तता के साथ लिखा है.

    विदेशों की पढ़ाई की तो सही कही...रटने और किताबें घोंटने का चक्कर वहाँ नहीं है...इसलिए थोड़ा attentive रहो क्लास में तो परिणाम अच्छे ही मिल जाते हैं....अच्छी यादें हैं ...पढ़ाई के साथ इतनी सारी मस्ती के भी

    जारी रखो ये संस्मरण...आनंद आ रहा है.

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  21. क्या विवरण !!!!! बहुत अच्छी सुनहरी यादें.रोचक संस्मरण.ये ही एक चीज़ है जो कोई छीन नहीं सकता हमसे.

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  22. This comment has been removed by a blog administrator.

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  23. ओह सॉरी महफूज़ ! गलती से तुम्हारा कमेन्ट डिलीट हो गया मुझसे .दूसरा लिख देना प्लीज़

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  24. यादों को ऐसे ही संजोकर रखो ...बढ़िया लगा आपके साथ रूस घूमना !

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  25. आज हम भी शरीक हो गए हैं आपकी इस यादो की सैरगाह में.

    रोचक लग रहा है पढ़ना.आगे इंतज़ार रहेगा.

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  26. 6/10

    प्रभावी व जानकारीपरक संस्मरण / सार्थक पोस्ट
    आपके लेखन से बहुत सी रोचक जानकारी के अलावा दो देशों के मध्य शिक्षा की पद्धतियों का अंतर भी पता चलता है.
    अगर पाठक हिन्दुस्तानी हैं तो आप संस्मरण में इतनी तेज गति न पकड़िये थोडा ठहराव के साथ बीच-बीच में हलकी-फुल्की बतकही और ज्यादा बढाईये :)
    और हाँ ...
    भारतीय नागरिक जी बात कर रहे हैं - प्रतिष्ठित बहुभाषाज्ञानी, महापंडित और महा घुमक्कड़ राहुल सांकृत्यायन जी की. जिन्होंने अपनी आत्मकथा 'मेरी जीवन यात्रा' में रूस का खूबसूरती से वर्णन किया है.

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  27. बाप रे राहुल सांकृत्यायन जी से मेरी तुलना...तौबा तौबा ....यहाँ तक तो मेरी सोच का कोई कोण नहीं जा सकता था मैंने तो सोचा था ब्लॉग जगत के कोई राहुल जी होंगे.
    शुक्रिया उस्ताद जी बताने का.
    चलिए आपका भी सुझाव सर आँखों पर मैं कोशिश करुँगी गति धीमी हो..

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  28. बहुत ही रोचक रहा संस्मरण....

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  29. रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए शुक्रिया शिखा जी

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  30. वे छात्र ही क्या जो नियमों के मुताबिक काम करें?

    कितनी सही बात है :-)

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  31. आप संस्मरण अच्छा लिखती हैं। किताब वाला आइडिया बुरा नहीं है। आप एक अन्य ब्लॉग बना लें तो और अच्छा रहे, जिसमें पूरा यात्रा वृतांत मिल जाए। ताकि नए रीडर को पढऩे के लिए ज्यादा पीछे न जाना पड़े।

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  32. मेरे एक मित्र जो गैर सरकारी संगठनो में कार्यरत हैं के कहने पर एक नया ब्लॉग सुरु किया है जिसमें सामाजिक समस्याओं जैसे वेश्यावृत्ति , मानव तस्करी, बाल मजदूरी जैसे मुद्दों को उठाया जायेगा | आप लोगों का सहयोग और सुझाव अपेक्षित है |
    http://samajik2010.blogspot.com/2010/11/blog-post.html

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  33. बेहतरीन संस्मरण...


    जब उस्ताद जी ६ अंक दे गये मतलब अब उपन्यास की तो बनती है. :)

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  34. संस्मरण बहुत अच्छा लगा।

    बदलते रूस की झलक और विद्यार्थी जीवन के मजेदार किस्से पढ़ना रोचक अनुभव है।

    एक नई भाषा सीखकर उस माध्यम में पढ़ाई करके स्वर्ण पदक पाया आपने। इससे पता लगता है कि आप कित्ती जिद्दी पढ़ाकू हैं और आगे रहने की कितनी ललक है आपमें। फ़िर से बधाई स्वर्ण पदक पाने के लिये।

    आगे और किस्सों का इंतजार है।

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  35. अच्छा संस्मरण ! टिप्पणियों वाले राहुल जी से किस्सा नायाब हुआ :)

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  36. बहुत ही बढ़िया संस्मरण, कॉलेज के बीते दिन याद आ गये।

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  37. रूसप्रवास की पिछली पोस्ट की तरह ही रोचक और रोमांचक ...
    दोस्तों का साथ बनाता है तो बिगड़ता भी बहुत है ...
    पतिदेव ने २ वर्ष पूर्व LLB और इस महीने MBA का दूसरा सेमेस्टर क्लीअर किया है ...मुझे हैरानी होती है कि इतना कम समय पढने के बाद वो पास कैसे हो जाते हैं ...अब यही लग रहा है कि व्यवहारिक ज्ञान ज्यादा काम आ जाता है ...
    तुम्हारे और संस्मरण इसी तरह काम आते रहेंगे ...
    रोचक पोस्ट !

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  38. कुछ दिन पहले एक रशियन नोवेल पढ़ा था, आज आपका लिखा पढ़ा...आकर्षण है रूस में, आपकी लेखनी में..खासकर इसमें तो बहुत.
    शुक्रिया, इसे जारी रखने का.

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  40. shikha ji,
    aapke sansmaran hamare liye wahaan kee yaatra ki tarah hai aur aapke chhatrawaas ke sansmaran se mujhe fir se padhaai karne aur kisi hostel mein jaakar rahne ka mann ho raha. khud ka kamra, fridge, cooking stove aur apna bhaartiye khana aur test paper chhod gayab...hahahhahahahah
    achha lag raha aapke sansmaran ko padhna aur yaatra karna.
    shubhkaamnaayen.

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  41. आपके संस्‍मरण के माध्‍यम से रूस के बारे में भी पता लगा। अच्‍छा लेखन।

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  42. बहुत रोचक और जानकारीपूर्ण वृत्तांत...। इसे आगे भी जारी रखें।

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  43. रोचक संस्मरण हमेशा की तरह्।

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  44. bahut sundar..sukhad sansamaran...padhakar bahut acchhaa lagaa.

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  45. after the break.. gaadi ne fir raftaar pakadi hai.. mazaa aa rahaa hai aise jaise pratyaksh ghatit ho raha hai sab..

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  46. सुबह में कमेन्ट टाइप कर लिया था फिर लाईट चली गयी :( दिन भर सोया, फिल्म देखा, अभी फिर से आया ब्लॉग पे तो कमेन्ट कर रहा हूँ. :)

    दीदी मेरी एक दोस्त है "ऋषिता"...वो २००२ में गयी थी रूस...वो भी काफी बातें बताती रहती है..कभी आपका लिखा पढता हूँ तो कभी उसका सुनाया हुआ..मुझे तो ऐसा लगता है की रूस मैं यहीं बैठे बैठे घूम आया :)

    बहुत बहुत मस्त रहा ये पोस्ट... :) जबरदस्त मजा आया :)

    वैसे,
    सारी खुदाई एक तरफ और पढाई एक तरफ... - हम भी अगर ये कभी कर लेते तो आज कहीं और रहते :) :)

    अगला भाग जल्दी से लाया जाये...

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  47. बहुत सुन्दर सँस्मरण लिखा है आपने बधाई

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  48. बड़ा रोचक संस्मरण लग रहा है, जारी रहे।

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  49. आईं! मेरा कमेन्ट कैसे डिलीट हो गया.... ऊं ऊं ऊं....ऊं ऊं ऊं ऊं .... कित्ती मेहनत से लिखा था... अच्छा एक बात बताइए... आप इतना सुंदर संस्मरण कैसे लिख लेती हैं... ? पोस्ट रशिया यानी (CIS) का डिस्क्रिप्शन आपने बहुत लाइव दिया है... बहुत सुंदर पोस्ट... बिलकुल आपकी तरह..

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  50. और यह इक्यावनवा कमेन्ट... शुभ होता है ना.. इक्यावन...

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  51. सहज और ईमानदार स्वीकारोक्ति।

    लेखन आकर्षक, सुन्दरऔर प्रभावशाली है।

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  52. आपके संस्मरण के साथ हम भी अपने जीवन के उन लम्हों में घूम आये जो मस्ती और सजीवता के पर्याय होते हैं !
    अगली किश्त का इंतज़ार है!
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

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  53. रूस के बारे में बहुत कुछ सुनते रहते हैं, आज आपके बहाने देख भी लिया। शुक्रिया।

    ---------
    इंटेली‍जेन्‍ट ब्‍लॉगिंग अपनाऍं, बिना वजह न चिढ़ाऍं।

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  54. रोचक यात्रा वर्णन पढ़कर बहुत अच्छा लगा। आज के रूस के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला।

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  55. rochak sansmaran!
    looking forward to read the coming posts!!!

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  56. shikha ji ,
    aapse aapki houstal life ke baare me jankar pdhna achha laga aur pura padhti hi chali gai.vastav me jo kuchh ruush lif style ke baare me likha vah bahut hi rochak laga aur agla sansmaran padhne ki jigysh bhi badh gai hai,kripya aage bhi likhe.
    punah prateexha me.
    poonam

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  57. बहुत ही रोचक संस्मरण...

    ऐसा ही बडा डिपार्टमेंटल स्टोर हूबहू ऐसे ही , मिलानो ईटली में भी है.

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  58. जी दिलीप जी! मिलान का वह मॉल देखा है मैंने हुबहू तो नहीं सकते हाँ काफी कुछ ऐसा ही है.इन फेक्ट फोटो में तो एक सा ही लगता है .

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  59. sansmaran wo bhi aapka!! ek dum jeevant hota hai.......aisa lagta hai aapke kamre me rakhe hot plate ke upar bankar coffee ya chai hame bhi milne wali hai...:)

    waise student life chahe jahan ki ho, ek alag sa safar yaad kara deta hai.........:)

    kash ho jindagi fir se laute!! hame to apne third class college kke jeevan se jura sirf wo chehra yaad hai, kaise ham, class bunk kar ke movie ke line me rahte the.......:D

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  60. संस्मरण पढकर अच्छा लगा ।
    रोचक जानकारी .......

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  61. nihayat hi imaandari se likhi gayi post/ aur baie bhi aapka sansmaran likhne me jawab nhi / shuru se lekar akhir tak bandhe rakhti hain,... kuch to bat he aapme i mean aapki lekhni me.aapke sansmaran aap hi ki tarha khoobsurat hain!

    badhai

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  62. मुझे तो अपने होस्टल के दिन याद आ गए ....मस्त दिन होते हैं वे ....लौट कर नहीं आते |

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  63. एक सुखद एहसास होता है आपके ब्लॉग को पढ़कर. लगता है जैसे खुद ही वे पल हमारे पास आ रहे हैं. आपके संस्मरण के द्वारा विदेश घुमने, देखने की जो चाह है वो भी साकार होती लगती है. ऐसे ही लिखती रहिये. अच्छा लगता है.

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  64. आज दिनांक 13 दिसम्‍बर 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में आपकी यह पोस्‍ट स्‍मृतियों में रूस  शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्‍कैनबिम्‍ब देखने के लिए जनसत्‍ता  पर क्लिक कर सकते हैं। कोई कठिनाई आने पर मुझसे संपर्क कर लें। 
    दिसम्‍बर के आखिरी महीने में जहां गर्मी रहती है वहां सपरिवार घूमने आना चाहता हूं

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