Enter your keyword

Monday, 11 October 2010

पर्दा धूप पे



ना जाने कितने मौसम से होकर
 गुजरती है जिन्दगी
झडती है पतझड़ सी 
भीगती है बारिश में 
हो जाती है गीली 
फिर कुछ किरणे चमकती हैं सूरज की 
तो हम सुखा लेते हैं जिन्दगी अपनी 
और वो हो जाती है फिर से चलने लायक 
कभी सील भी जाती है
जब कम पड़ जाती है गर्माहट
फिर भी टांगे रहते हैं हम उसे 
कड़ी धूप के इन्तजार में  
आज निकली है छनी सी धूप 
पर फिर से किसी ने सरका दिया है पर्दा 
मेरी जिन्दगी पर पड़ती हुई  धूप पे   .

71 comments:

  1. wah! kya bat he/
    shaandar kavita, jindgi aur dhoop
    ka talel achha he

    badhai

    ReplyDelete
  2. बहुत ही खुबसूरत..सुन्दर भाव..वो कहते हैं ना झक्कास...यूँ ही लिखते रहें....

    ReplyDelete
  3. Kahan se itne khoobsoorat khayalat aapko soojh jate hain??

    ReplyDelete
  4. ला-जवाब जबर्दस्त!!
    कुछ तो है इस कविता में, जो मन को छू गयी।
    सुंदर प्रस्तुति....

    नवरात्रि की आप को बहुत बहुत शुभकामनाएँ ।जय माता दी ।

    ReplyDelete
  5. वाह , जिंदगी को धुप दिखाने के लिए लटकाने वाला बिम्ब एकदम मस्त लगा . और जिंदगी एक बार सीलन से उबरी तो तो टनाटन दौड़ती है . काश जिंदगी हमेशा ऐसे ही बनी रहे और कोई गम का पर्दा ना पड़े इस पर . सुन्दर अभिव्यक्ति ,

    ReplyDelete
  6. आपके इस काव्य में मासूमियत, जिज्ञासा और नए अनुसन्धान की उत्‍कंठा स्पष्टतः झलकती है, जो आपके जिज्ञासु, निर्मल और सच्चे उदगार की प्रतीक है। अलग अंदाज़ से काव्‍य को नयापन देने वाली इस रचना में कल्पना की उड़ान भर नहीं है बल्कि जीवन के पहलुओं एवं खासियत को तुलनात्मकता से देखने और दिखाने की जद्दोजहद भी है। गीलापन और पर्दा के प्रतीक से आप मन के अंदर की छटपटाहट को, बेचैनी को, व्यक्त करने की कोशिश की है।

    सजा दिन भी, रौशन हुई रात भी,
    भरे जाम, लहराई बरसात भी,
    रहे साथ, कुछ ऐसे हालात भी
    जो होना था जल्दी, हुआ देर से

    ReplyDelete
  7. :) :) मैंने तो एक बार अलगनी पर ख्वाब ही टांगे थे.. तुमने ज़िंदगी ही टांग दी.......
    ज़िंदगी कि सीलन ...फिर धूप से चमकती ..हर रंग भर दिए हैं ज़िंदगी के ...बस पर्दा हटा कर खिलखिलाती धूप का आनंद लो ...


    बहुत अच्छी रचना ...ज़िंदगी के सच्चे रूप को बताती हुई ...

    ReplyDelete
  8. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 12 -10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
    कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

    http://charchamanch.blogspot.com/

    ReplyDelete
  9. आज निकली है छनी सी धूप
    पर फिर से किसी ने सरका दिया है पर्दा
    मेरी जिन्दगी पर पड़ती हुई धूप पे
    --
    वाह-वाह..!
    बहुत सुन्दर और हृदयस्पर्शी चित्रगीत प्रस्तुत किया है आपने!

    ReplyDelete
  10. शिखा जी,
    आज अपनी बात आपकी कविता का वज़न में नहीं कह पा रहा था...इसलिए बशीर बद्र साहब का कलाम इरशाद कर रहा हूँ
    धूप निकली है मुद्दतों के बाद
    गीले जज़्बे सुखा रहे हैं हम.
    बहुत ही शानदार कविता है आपकी...

    ReplyDelete
  11. आज निकली है छनी सी धूप
    पर फिर से किसी ने सरका दिया है पर्दा
    मेरी जिन्दगी पर पड़ती हुई धूप पे ....

    बहुत सुन्दर भावनात्मक अभिव्यक्ति...बधाई..

    ReplyDelete
  12. अपनी मर्ज़ी से उतारे तुमने,
    ख्वाब टांगे थे पलकों के लिए,
    जिन्दगी धूप पी गयी सारी,
    छाँव छलके तो अब कहाँ छलके.

    ReplyDelete
  13. इस परदे ने कितनो को वंचित किया है उन्मुक्त धूप खाने से।

    ReplyDelete
  14. आज निकली है छनी सी धूप
    पर फिर से किसी ने सरका दिया है पर्दा
    मेरी जिन्दगी पर पड़ती हुई धूप पे ....

    गहरी अभिव्यक्ति

    ReplyDelete
  15. tab jaker zindagi ko ek sahi arth mita hai ..... bahut badhiyaa

    ReplyDelete
  16. बहुत ही खुब सुरत रचना, जीवन को दरशाती हुयी, आप की कविता पढ कर बाहर देखता हुं तो पतझड् से झडे पत्ते आप की कविता को ओर भी सुंदर बना देते हे, आज कल हमारे यहां ठंडी शर्द हवाये चल् रही हे ओर पेडो से पीले पतो को गिरा कर अजीब सा शोर मचा देती हे रात को, धन्यवाद इस सुंदर रचना के लिये

    ReplyDelete
  17. बहुत सुंदर....बहुत खूबसूरत कविता .

    ReplyDelete
  18. ये किस बत्तमीज ने पर्दा सरका दिया....मिले कभी तो बताऊंगा उसे ;)...
    जोक्स अपार्ट, बहुत अच्छा लिखा है दी....
    खास कर के अंतिम वाली पंक्ति बहुत ज्यादा अच्छी लगी मुझे

    आज निकली है छनी सी धूप
    पर फिर से किसी ने सरका दिया है पर्दा
    मेरी जिन्दगी पर पड़ती हुई धूप पे ....

    बेहतरीन कविता..

    ReplyDelete
  19. तारीफ तो करनी पडेगी भई दम तो है कविता मेँ. हमारी तरफ से भी बधाई स्वीकारेँ.

    ReplyDelete
  20. बहुत ही भावपूर्ण रचना . बधाई

    ReplyDelete
  21. सच और सुंदर एहसास लिख डाले.

    खूबसूरत अभिव्यक्ति.

    ReplyDelete
  22. आज निकली है छनी सी धूप
    पर फिर से किसी ने सरका दिया है पर्दा
    मेरी जिन्दगी पर पड़ती हुई धूप पे .


    -अहसासों की सुन्दर और कोमल बानगी..बधाई.

    ReplyDelete
  23. जिंदगी पर पड़ती धूप पर सरदा दिया है फिर किसी ने पर्दा ...
    सीलन , गर्माहट ...
    फिर से जिंदगी की नयी जंग ...
    फिर नयी उड़ान ...
    जिंदगी के धूप छाँव पर बहुत अच्छी कविता ...
    शानदार ...!

    ReplyDelete
  24. आज निकली है छनी सी धूप
    पर फिर से किसी ने सरका दिया है पर्दा
    मेरी जिन्दगी पर पड़ती हुई धूप पे
    कश्मकश और जद्दोजहद की यह रचना .. शानदार

    ReplyDelete
  25. शिखा जी ...ये परदे भी ऐसे ही रहेंगे और इनको सरकाने वाले भी... चलिए थोड़ा बाहर घूम कर आतें हैं ... :)

    बहुत खूबसूरत कविता ...

    ReplyDelete
  26. सुन्दर अहसासो को खूबसूरती से पिरोया है……………।बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    ReplyDelete
  27. अहसास की कविता

    ReplyDelete
  28. धूप और छाँव का खेल तो जीवन में चलता ही रहता है .... आशा की किरण साथ होनी चाहिए ....बेहतरीन लिखा है ...

    ReplyDelete
  29. दिल को छु लेने वाली पंक्तियाँ है ..जैसे किसी ने चुपके से कुछ कह दिया हो ..बहुत खूब

    ReplyDelete
  30. भावपूर्ण अभिव्यक्ति।

    ReplyDelete
  31. .

    आज निकली है छनी सी धूप
    पर फिर से किसी ने सरका दिया है पर्दा..

    Beautiful creation !

    Regards,

    .

    ReplyDelete
  32. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है!
    या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    ReplyDelete
  33. ज़िंदगी पर पड़ने वाली धूप पर सरका दिया पर्दा! सारी उम्र जो बारिश, सीलन और नमी झेलती रही ज़िंदगी और उसे धूप से महरूम करना… शायद बहुत देर से दया आई उस आसमाँ वाले को (उसके घर देर है अंधेर नहीं) तभी उसने सोचा कि धूप में झुलाने से बचा ले! वाह रे ऊपर वाले, तू भी ना..!!

    ReplyDelete
  34. वाह कितना अनोखा है सब कुछ. सुंदर प्रस्तुति

    ReplyDelete
  35. लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

    जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

    मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

    भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

    अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

    थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

    http://umraquaidi.blogspot.com/

    उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
    “उम्र कैदी”

    ReplyDelete
  36. क्या वाकई आपने इतना अच्छा लिखा है या मैं समझ नहीं पा रहा हूँ.. लोग इतना झूठ क्यों बोलते है?

    ReplyDelete
  37. " कुश ! लोग झूठ क्यों बोलते हैं ....वह तो मुझे पता नहीं .हाँ पिछले दिनों किसी ने कहा कि मेरे स्वभाव की वजह से लोग तारीफ करते हैं ..तो यह वजह हो सकती है:).या शायद वो ऐसे लोग हैं जो तारीफें करना ही जानते हैं सिर्फ :)
    पर हाँ आप बहुत अच्छी तरह समझते हैं इसका मुझे विश्वास है:).
    आपका व्यस्त समय यहाँ आकर जाया हुआ .उसके लिए माफी चाहती हूँ .
    बहुत बहुत शुक्रिया.

    ReplyDelete
  38. कुश जी ,

    आपकी टिप्पणी पढ़ी ...और ऐसा लगा कि ऊपर टिप्पणी देने वालों की आपने आलोचना की है ..
    कविता या रचना की बात तो बाद में ...आपने सबको कह दिया कि सब झूठ बोल रहे हैं ..
    ऐसा मुझे नहीं लगता ...क्यों कि कोई भी रचना ..कविता हो या लेख या कहानी ..पाठक पढ़ कर स्वयं की
    सोच से जोड़ता है ...या स्वयं से भी ...और जब कुछ लिखा हुआ उसके साथ जुड़ता है तो उसे या उसके मन को शान्ति का अनुभव होता है या वो रचना उसे पसंद आती है ....कम से कम मैं तो अपनी बात स्पष्ट करना चाह रही हूँ ...ज़िंदगी में न जाने कितने उतार चढ़ाव आते हैं कभी लगता है कि हम हर जगह हार ही रहे हैं ..और फिर अपने प्रयासों से उन संकटों से उबरते हैं ...कुछ बेहतर लगता है तो फिर कोई नया संकट छाँव कर देता है ...तो इसलिए मुझे यह रचना अपनी ज़िंदगी से जुडी हुई लगी और मुझे पसंद आई ...मैंने झूठी प्रशंसा नहीं की ... हो सकता है आपकी ज़िंदगी को सीलन और धूप की चमक न महसूस हुयी हो ..और इसी लिए आपको यह कविता कुछ खास न लगी हो ...यह अपना अपना नजरिया है ...पर यह कह देना कि लोंग झूठ बोल रहे हैं ...यह मुझे कुछ अजीब सा लगा ...आप अपनी बात कहिये ..आलोचना कीजिये पर बाकी पाठकों पर आपकी टिप्पणी.... मुझे तो आहत कर गयी ...

    खैर ...आपको शुभकामनायें ...

    ReplyDelete
  39. मन की कशमकश और धूप पर्दे का बिम्ब। बहुत खूब। शुभकामनायें।

    ReplyDelete
  40. ma'am nice ur blog and ur writing

    if u free so visit my blog www.onlylove-love.blogspot.com

    ReplyDelete
  41. बहुत अच्छी रचना....बहुत सुन्दर भावों से सजाया है आपने इसे !

    ReplyDelete
  42. बहुत सुंदर....बहुत खूबसूरत कविता .

    ReplyDelete
  43. killer......!!!

    bohot hi acchi lagi mujhe, crisp and bang on !
    luv to read u

    ReplyDelete
  44. shikha ji

    rachna mujhe bahut acchi lagi aur zindagi se ekdum judi hui lagi aur specially punch lines bahut jabardasht turning liye hue hai ..

    maine ise kal bhi padha tha aaj phir padh raha hoon ..

    poem ke jo shadows hai - garmahat etc wo bahut hi impressive hai ..

    hats off for such lively poem..

    haan , kuch ji ka comment kuch samjah nahi aaya .. phir bhi jo kuch sangeeta ji ne kaha hai , main usse 100% sahmat hoon..

    kyonki main khud ek poet hoon... main ye kahunga ki kavita kabhi bhi jhoothi nahi hoti hai ..

    badhayi aapko

    ReplyDelete
  45. उसे पता है कि धूप के साथ जीवन को थोड़ी सी सीलन और थोड़ी सी छाया की भी दरकार होगी तभी तो फिक्रमंद होकर पर्दे पर हाथ डाला है उसनें !

    सुन्दर बिम्ब लेकर गढी हुई कविता पर जरा देर से हाजिरी दे पाया हूं ! पर टिपियाने का लोभ संवरण नहीं कर सका !

    ReplyDelete
  46. पतझड़
    बारिश
    सीलन
    गर्माहट
    कड़ी धूप

    इन शब्द-संकेतों से मन के मौसम के अनेक इंगितार्थ उभर आए हैं...बधाई एक अच्छी रचना पर!

    ReplyDelete
  47. बाह्य धूप और परदे के अवरोध के समान्तर जीवन में सुखेच्छा और उसपर अवरोध के भाव को व्यक्त करती कविता ! बाकी किसी को कोई चीज क्यों अच्छी लग रही है , इस 'अच्छे ' पर क्या विवाद किया जाय , सबके व्यक्तिगत चयन और समझ की भूमिका है ! किसी को अगर कहना ही है तो यह कहे कि उसे वह अच्छी क्यों नहीं लगी , इसकी आजादी उसे होनी चाहिए | मैं अपनी कहूँ तो मैं छंदमुक्त कविता को गद्य से करीब रखकर देखता हूँ और फिर शास्त्रीय नियमों पर परखने का सवाल ही नहीं रह जाता ! इस कविता की प्रतीकात्मकता ठीक है , यह गद्य में भी हो सकती थी , इसलिए जब भाव का निर्वाह हो जा रहा हो तो अनुचित कुछ नहीं ! हाँ अगर शब्द , वाक्य आदि बेठीक हों तो प्रश्न होना चाहिए पर ऐसा तो यहाँ नहीं दिख रहा है ! बेहतर है कि असहमति को बताया जाय , यह तो एक हल्की बात हुई कि ' .......लोग झूंठ क्यों बोलते हैं !'

    ReplyDelete
  48. जाने क्या-क्या सहती है जिन्दगी...
    ''कभी पलकों पे आँसू हैं कभी लब पे शिकायत है.. मगर ऐ ज़िन्दगी फिर भी हमें तुमसे मोहब्बत है''

    ReplyDelete
  49. कौन है ये पर्दा सरकने वाला ......?
    शिखा जी ये धुप यूँ ही खिली रहे ....!!

    ReplyDelete
  50. जिंदगी में पल पल बदलते मौसमों की छ्टा हमारी जीवनों में नए नए अर्थों आयामों और संभावनाओं का सतरंगी आकाश रचती है.
    खूबसूरत अहसासों को पिरोती हुई एक सुंदर रचना. आभार.
    सादर
    डोरोथी.

    ReplyDelete
  51. दशहरा की ढेर सारी शुभकामनाएँ!!

    ReplyDelete
  52. "कभी सील भी जाती है
    जब कम पड़ जाती है गर्माहट
    फिर भी टांगे रहते हैं हम उसे
    कड़ी धूप के इन्तजार में"
    आहा ! बहुत सुन्दर.

    ReplyDelete
  53. शिखा,

    जीवन को मौसम से जोड़ कर जो संयोग बनाया है वो काबिले तारीफ है. बस ऐसे ही कवि की कल्पना कब किस चीज को किस रूप में देख ले और उसे बांध देता है सुन्दर शब्दों में. यही तो उसकी कल्पनाकी उड़ान है जो उसे कहाँ तक पहुंचा दे ये तो कोई नहीं जानता.

    ReplyDelete
  54. पर फिर से किसी ने सरका दिया है पर्दा
    मेरी जिन्दगी पर पड़ती हुई धूप पे
    naheeeeeeeeeeeen aisa nahin ho sakta.

    ReplyDelete
  55. फिर कुछ किरणे चमकती हैं सूरज की
    तो हम सुखा लेते हैं जिन्दगी अपनी
    और वो हो जाती है फिर से चलने लायक
    बहुत सुन्दर कविता है शिखा जी. कुछ इसी तरह तो जीते हैं सब...

    ReplyDelete
  56. वाह! शिखा जी,
    ज़िन्दगी की धूप छावं को कविता के कैनवास पर बड़ी ही बखूबी से उकेरा है.
    बधाई हो.
    -ज्ञानचंद मर्मज्ञ

    ReplyDelete
  57. अरे, गिरा दिया पर्दा तो क्‍या हो गया? धूप के लिए पर्दा हटाया भी तो जा सकता है। अत्‍यंत भावुक अभिव्‍यक्ति है। लिखना जारी रखिए धूप आपके ब्‍लॉग तक पहुंच जाएगा।

    ReplyDelete
  58. धूप के मोहक रंगों का अहसास हर कोई महसूस तो नहीं कर सकता. आपने किया है इसका अन्दाजा आपकी रचनाओं को पढ़ने के बाद हो ही जाता है।
    आपने अच्छी कविता लिखी है। आपको बधाई.

    ReplyDelete
  59. I do not have any word to express about the emotional exposition of your thought right now but will continue to introspect myself for making beautiful comment after going through your other post at a latter stage.After all.this has been beautifully expressed coupled with darker and brighter side of life. Thanks.

    ReplyDelete
  60. Dhoop aur chhaon se sani kavita ko apne jivant roop me prastut kiya hai Manmohak si lagi.Man me uthe in khuburat bhaon ke liye main ap ko tahe dil se shukriya ada karta hun.Well done.

    ReplyDelete
  61. Dhoop aur chhaon se sani kavita ko apne jivant roop me prastut kiya hai Manmohak si lagi.Man me uthe in khuburat bhaon ke liye main ap ko tahe dil se shukriya ada karta hun.Well done.

    ReplyDelete
  62. आज निकली है छनी सी धूप पर फिर से किसी ने सरका दिया है पर्दा
    मेरी जिन्दगी पर पड़ती हुई धूप पे.
    बढिय़ा कविता है। सहेजने लायक।

    ReplyDelete

पसंदीदा पोस्ट्स

ईमेल से जुड़ें

संपर्क

Name

Email *

Message *