Enter your keyword

Tuesday, 14 September 2010

कहाँ बुढापा ज्यादा .

कुछ समय पहले एक परिचित भारत से लन्दन आईं थीं घूमने ..कहने लगीं यहाँ के  बुड्ढों  को देखकर कितना अच्छा लगता है ..कितने भी बूढ़े हो जाये अपना सारा काम खुद करते हैं घरवालों पर भी निर्भर नहीं रहते. अपना घर, अपनी कार , खुद सामान लाना ,अपने सारे काम करना .एक हमारे यहाँ के बुड्ढ़े  होते हैं  जरा उम्र बढ़ी   नहीं कि बस ..छोड़ दिए हाथ पैर.. फिर बस बैठ कर परेशान करेंगे घरवालों को ...यहाँ के लोगों पर बुढ़ापा नहीं आता क्या?..

.
उनका ये सवाल बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर गया मुझे ...क्या वाकई यहाँ के बुजुर्ग ज्यादा समर्थ हैं ,ज्यादा मजबूत और आत्मनिर्भर हैं ,ज्यादा ज़िंदगी  से भरपूर ?क्या सचमुच उनपर बुढ़ापा हावी नहीं होता ?मेरी ही एक पडोसी थीं ८० की अवस्था तो होगी ही .. बेटा- बेटी अलग रहते हैं ,अपना एक कमरे का घर है ,एक कार है आराम से अकेले जीती हैं एक दिन किसी काम से उनका दरवाया खटखटाया तो खुला नहीं ,  सोचा सो रही होंगी ,फिर दुसरे दिन गई फिर भी नहीं ...कार बाहर ही खड़ी थी तो ये पक्का था कि घर के अन्दर ही हैं ..मैने  २-४ बार घंटी बजाई तो दरवाजा खुला बहुत ही उनींदी  सी आँखों के साथ. मैंने पूछा तो पता चला कि पिछले ३ दिनों से वह  बहुत बीमार हैं ..कमर की हड्डी में कुछ परेशानी है जो ज्यादा बढ़ गई है और उन्होंने ३ दिन से कुछ खाया पिया भी नहीं है ..डॉ०  का अपोयमेंट  लिया है जो २ दिन बाद है ...तब जाएँगी. बेटा पास  ही  में रहता है पर उसे क्या बताना.. वो क्या कर सकता है. मैंने उनसे कहा कि किसी मदद की  जरुरत हो तो मुझे बता दें. उसके बाद वो खुद ही डॉ०  के यहाँ चक्कर लगाती रहीं और अपना काम चलाती रहीं पर उसके बाद से मेरे बच्चों के लिए गाहे बगाहे चॉकलेट   भेज देतीं कि उनके यहाँ कोई नहीं है खाने  वाला ...लोग गिफ्ट दे जाते हैं वो इनका क्या करें, हमारे त्योहारों पर फूलों के गुल्दास्त्ते देने आतीं .यहाँ तक कि छुट्टी में इंडिया जाते वक़्त बच्चों को १०-१० £ भी दिए कि एन्जॉय करना जैसे हमारी दादी नानी देती थीं कहीं जाते समय.उनकी ये हरकते जैसे उनके अन्दर की कसक निकाल देती थीं ...हाँ वैसे सब ठीक ही था .
एक और थीं बुजुर्ग महिला ... घर के सामने ही रहती थीं एक दिन उनकी पोस्ट गलती से हमारे घर आ गई , तो देने गई मैं .घर में घुसते ही देखा, पूरे कॉरिडोर  में कुछ लोगों के फोटो ही फोटो लगे हुए हैं ..अपने डंडे के सहारे चलते हुए वो मुझे .लिविंग रूम से होते हुए बेडरूम  में ले गईं ..कोई भी कोना ऐसा नहीं था जहाँ कोई फोटो  ना रखा  हो अचानक बोली "हैव यू  सीन दीज़   पिक्चर्स ?" कोई अँधा ही होगा जिन्हें वो ना दिखेंगी ..मैने सर हिलाया ..और वो शुरू हो गईं परिचय कराना  .".ये मेरी पोती है ..और ये बेटा...ये मेरी बेटी का बेटा है ...और ये मेरी बेटियां" ...कुल मिलाकर १० लोग होंगे परिवार में ..मैने पूछा आप मिलती हैं इनसे ? बड़े फख्र  से जबाब दिया उन्होंने " यस  ऑफकोर्स ... ऐवरी क्रिसमस  आई सी देम " .और ये कप देख रही हो? मेरे बेटे ने मदर्स  डे पर भेजा था " .वो मुझे ऐसी चीज़ें दिखाए जा रही थीं पर  मुझे जैसे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था ...अचानक सुना .".बहुत बहुत "शुक्रिया ...कभी आना कॉफ़ी  पियेंगे साथ ..अभी मुझे जरा ब्यूटी पार्लर  जाना है ..फेशियल कराने और बाल सेट कराने .वहाँ  वो लड़की बहुत अच्छा फेशियल  करती है सारा तनाव दूर होता जाता है ..और समय भी कट जाता है" .वो मुस्कुराकर कह रही थीं. पर वहां रखी निर्जीव तस्वीरें जैसे उस मुस्कान के पीछे का सब अनकहा बयाँ कर रही थीं. मैं भी मुस्कुराई और वापस आ गई ..कितनी खुशहाल जिन्दगी है इनलोगों की .
घर से बच्चे सत्रह साल के होते ही चले जाते हैं अपने अपने रास्ते .काम से छुट्टी तो बड़ा घर छोड़ एक छोटा घर ले लेते हैं ये बुजुर्ग ,कार का साइज़ भी छोटा हो जाता है.... सेवेन सीटर का क्या करना अब ? गुजारा  भत्ता सरकार दे देगी और चिकित्सा  के लिए सरकारी क्लिनिक हैं ही ...और क्या चाहिए जीने के लिए. जब तक खुद चलने फिरने के काबिल हैं ठीक है वर्ना एक बार फिर गृह  परिवर्तन ...ओल्ड एज  होम ..वहां भी सब सुविधा होंगी... इमरजेंसी  के लिए एक बटन भी होगा जिसे दबाने से एम्बुलेंस  आ जाएगी और किसी चीज़ की क्या जरुरत .अपने आसपास अपने ही जैसे अनगिनत लोगों को रोज़ मरते   देख अपनी मौत से पहले ही ना जाने कितनी मौत मर जाते हैं ,और नई परेशानी को लेकर क्लिनिक के चक्कर लगाते ..रास्ते चलते बार बार पीछे मुड़कर देखते रहते हैं शायद कोई पुकार रहा है .फिर अपने आप से ही बात करते मुस्कुराते हैं  "आज हेयर डाई  के लिए जाना है ." ..आते हुए अचानक अपने घर वाली गली का ध्यान नहीं रहता ..कहीं दूसरी गली में मुड  कर भटक जाते हैं ..फिर कोई पुलिस  को इत्तला कर देता  है और वो किसी तरह पता करके घर तक छोड़ आते हैं .कितना व्यवस्थित  है सब कुछ .,
और हमारे यहाँ... बुजुर्ग कहीं नहीं जाते ..घर पर एक खाट  पर  बैठ कर ही भुनभुनाते रहते हैं .फिर जोर का ठहाका लगा कर कहते हैं अच्छा जरा बढ़िया सी चाय पिलाओ और चाय पीकर एकदम तरोताजा और फिर चर्चाएँ यहाँ की वहाँ  की .उसपर अपनी कार भी नहीं ..बीमार तो वो भी होते हैं .पर घर से कोई ना कोई ले जाता है अपने साथ. वहाँ  भी डाक्टर को हड़का आते हैं कि बेकार की फीस लेते हैं ये लोग कुछ हुआ  ही नहीं है... उन्हें बस जरा सा सर दर्द हुआ है ..बच्चे आयेंगे अभी स्कूल से उनसे बातें कर ठीक हो जायेगा .पोते - नातिओं के साथ अपनी उम्र का आभास ही नहीं रहता... अपना बचपन फिर जी लेते हैं एक बार ..और जीने की ख्वाहिश  बनी रहती है ..भले ही समय बुदबुदाते बीते या बहु बेटे की खुन्खुनाहट  सुनकर, पर मजे में कट जाता है .आस पास की चहल पहल, बच्चों का शोरगुल और जवानों की कार्यशक्ति ,  कभी बुड्ढा  होने ही नहीं देती उन्हें ..फेशियल  की ना जरुरत है, ना ही समय. चेहरे की आभा बनी रहती है घर की मलाई लगा कर ही .समय सारा बीत जाता है घरवालों पर नजर रखने में   और यहाँ वहां गपियाने में .



और मैं सोच रही थी ....कि बुढ़ापा कहाँ नहीं आता ? किसको नहीं आता?








कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि अब हम भी पश्चिम  से प्रभावित होकर वैसे ही व्यवस्था अपनाने लगे हैं .हमारी आजादी में खलल ना पड़े इसलिए अपने बुजुर्गों को आत्मनिर्भर  देखना चाहते हैं हम ..भले ही तिल तिल कर  क्यों ना हजारों मौत मरें वो ,क्या प्यार और अपनेपन  की जरुरत सिर्फ बच्चों और जवानों  को होती है...? बुड्ढों के जीने के लिए तो सिर्फ व्यवस्था ही  जरुरी है. 


चित्र गूगल से साभार 

73 comments:

  1. बहुत बढ़िया आलेख शिखा जी , मगर मैं समझता हूँ की हमें आपने वृद्धो की तुलनात्मक बात नहीं करनी चाहिए पश्चिम के साथ, क्योंकि उनका अपना कल्चर है हमारा अपना ! ऐसे दो बंगाली परिवारों को बहुत करीब से जानता हूँ, जो एन आर आई है , कनाडा के नागरिक, मॉन्ट्रियल में रहे करीब ४० साल और अब बुढापे में वापस भारत आ गए ! हाँ यह सच है कि हमारे यहाँ के बुड्ढे लोग ( सभी नहीं कुछ ) स्वत ही बूढापन अपने में वक्त से पहले ले आते है !

    ReplyDelete
  2. सही बात है शिखा जी..

    ReplyDelete
  3. बिलकुल ठीक कहा गोदियाल जी आपने ..सारी जिंदगी यहाँ बिताने के बाद सभी सुविधाएँ होने के वावजूद बुढ़ापे में लोग भारत लौट जाते हैं.क्योंकि अपनेपन की कमी सालती है उन्हें ..
    यही मतलब था मेरे कहने का. यहाँ तुलना कल्चर की नहीं बल्कि इंसानों की है जो हर जगह एक हैं जिन्हें प्रेम की जरुरत होती है. बेशक वो अपनी समाजिक व्यवस्था की वजह से कह नहीं पाते.

    ReplyDelete
  4. जीवन के अंतिम प्रहर में , मनुष्य को भावनात्मक संबल की ज्यादा जरुरत होती है, जो उसे उसके परिवार से ही मिल पायेगी. पश्चिम में संयुक्त परिवार के प्रचलन ना होने से हमेशा देखा गया है की वहा का बुजुर्ग एकाकीपन में जीता है . जहा तक बात है भौतिक सुविधाओ की , ये ठीक है की हमारे बुजुर्ग , उतने भौतिकतावादी नहीं होते, लेकिन उन्हें अपने परिवार के रहते हुए एकाकीपन झेलना पड़े, ऐसा क्म ही होता है . बहुत अच्छी एवं सामाजिक दृष्टि से उपयोगी पोस्ट.

    ReplyDelete
  5. शिखा,

    बहुत अच्छे से तुमने लिखा है, यहाँ फिर भी बहुत अच्छे हैं, बीमार को डॉक्टर के यहाँ जाने के लिए कई दिनों का इन्तजार नहीं करना पड़ता है. लड़के बहू अब बदल रहे हैं लेकिन फिर भी उन्हें लोकलाज की फिक्र रहती हैं. अभी ये प्रतिशत बहुत कम है की उन्हें वृद्धाश्रम में छोड़ दें या अकेला छोड़ दें. चलो अपनी संस्कृति फिर भी बहुत अच्छी है.

    ReplyDelete
  6. आपकी पोस पढ़कर मुझे भी कुछ याद आ गया मेरे मामा की बेटी पिट्सबर्ग में रहती है हमरी अक्सर घंटों फोन पर गप्पें होती हैं उसकी भी एक वयोवृद्ध महिला से दोस्ती हुई क्योकि मेरी बहन का घर ग्राउंड फ्लोर पर है एक रात उन्होंने ने दरवाज़ा खटखटाया और बोला की ये व्हील चेयर रख लो मेरे पति बहुत बीमार है उन्हें अस्पताल ले जाना है मेरी बहन ने उन्हें अकेला देखा सो उनकी मदद करने पहुंची उन्हें उठाकर अम्बुलेनस में लिटाया पर तब तक बहुत देर हो गयी थी उसके पह्य्ले उनकी कभी बात भी नहीं हुई थी अब वो दोनों दोस्त हैं

    ReplyDelete
  7. शिखा ,

    आज की यह पोस्ट सोचने पर मजबूर करती है ...संयुक्त परिवार की परम्परा यहाँ भी टूट रही है ...भले ही ऐसा लगता हो किबुजुर्ग यहाँ पर अकेलेपन का एहसास नहीं करते पर कभी कभी भीड़ में भी अकेलापन महसूस करते देखा जा सकता है ...पश्चिम देशों की तो संस्कृति में है अलग रहना लेकिन भारत में ऐसा नहीं है ..ज़रूरत है उम्र के साथ सामंजस्य की ...यदि अपना अस्तित्त्व बनाये रखना है तो बच्चों के हिसाब से सोचना चाहिए ..बच्चों को प्यार के साथ साथ सम्मान भी देना चाहिए ...वरना साथ तो रहते हैं लेकिन बुजुर्गों की स्थिति दयनीय भी देखी जा सकती है ..

    ReplyDelete
  8. बहुत सही आलेख। अच्छा भाव। आज कुछ नहीं दो शे’र
    (१) घने दरख़्त के नीचे मुझे लगा अक्सर
    कोई बुज़ुर्ग मिरे सर पर हाथ रखता है।
    (२) बहुत हसीन सा एक बाग मेरे घर के नीचे है,
    मगर सकून मिलता पुराने शज़र के नीचे है।
    मुझे कढ़े हुए तकियों की क्या ज़रूरत है,
    किसी का हाथ अभी मेरे सर के नीचे है।

    ReplyDelete
  9. बहुत ही बढ़िया आलेख....मन द्रवित हो गया, उन लोगों की अवस्था की सोच.

    पर पहले जैसा ,यहाँ भी नहीं रहा सबकुछ , खासकर शहरों में. बुढापे में अकेलेपन से बहुत त्रस्त रहते हैं..ये लोग, भी....परिवारजनों के पास समय नहीं होता,उनके लिए. और अक्सर अब वृद्धावस्था अकेले ही कटता है...बेटे,बेटियां कहीं सुदूर होते हैं.....पर हाँ, आँखों में इतनी शर्म, यहाँ अब भी बची है कि बीमार पड़ने पर देखभाल में कोताही नहीं करते. और अपनी जिम्मेवारियों से पीछे नहीं हटते.

    ReplyDelete
  10. बिलकुल सही लिखा है अपने यहाँ तो शारीरिक रूप मे चाहे बुढे न भी हों मगर मानसिक परेशानियों की वजह से व्यक्ति असमय ही बूढा हो जाता है। बहुत अच्छा आलेख। धन्यवाद।

    ReplyDelete
  11. लगता है कि जितना प्रकृति से जितना इन लोगों ने सीखा उतना हम नहीं सीख सके दी. खासकर पंछियों से जिनके बच्चे पर निकलते ही हमेशा के लिए फिर हो जाते हैं और चिड़िया फिर से अपनी नयी जिंदगी शुरू करने में लग जाती है..
    खूबसूरत पोस्ट..

    ReplyDelete
  12. वाह मनोज जी ! कितनी खूबसूरत पंक्तियाँ हैं ..आपकी इन पंक्तियों ने तो जैसे पूरी कर दी मेरी पोस्ट.
    बहुत शुक्रिया.

    ReplyDelete
  13. poori vyavastha dayniy ho gai hai......nakal karte karte hum kya se kya ho gaye

    ReplyDelete
  14. भगवान करे कि यह पश्चिम संस्कृति हमारे यहाँ न आये वहीं रहे ज्यादा अच्छा है। हमें हमारे बुजुर्गों से प्यार मिलना अच्छा लगता है।

    ReplyDelete
  15. पोस्‍ट और टिप्‍पणियों नें विमर्श को पूरा कर दिया है .... अब अपने वृद्ध होने का इंतजार है जिसमें अभी काफी लंम्‍बा अंतराल है.

    ReplyDelete
  16. shikha ji,
    bhartiya parampara aur pashchimi parampara mein bahut antar hai, aur jine ke dhang mein bhi. ye to achha hai ki umradaraaz log wahan aatmnirbhar hain, parantu jab asahaay hon to wo sthiti dukahd hai, parantu koi bhi tareeka jo jine ka ang ban chuka hai sabhi waise hin jine ke aadi ho jaate hain. hamare yahan bhi aisa hota hai par tulnaatmak roop mein bahut kam. waise yahan bhi bahut se asahaay hain jinko unke apne chhod dete aur bahut se aise pariwaar hain jahan aaj bhi buzurgon ka shaasan chalta hai.
    sab kuchh paristhiti aur pariwar par nirbhar hai.
    bahut achha laga padhkar, sochna hai ki hamein kaun see sanskriti pasand aati aur hum kya chahte? jaisa hum karenge hamare sath bhi wahi hoga. shubhkaamnaayen.

    ReplyDelete
  17. बहुत सुंदर चित्र खींचा आप ने, ओर यह सच भी है, लेकिन भारत मै भी अब मां बाप को बोझ ही समझा जाता है, सभी घरो मै नही, लेकिन ज्यादातर घरो मै, य फ़िर उन्हे अलग थलग छोड दिय जाता है

    ReplyDelete
  18. अपने भविष्य पर ही कील ठोंक रहे हैं।

    ReplyDelete
  19. शिखा जी, आपने तो पूर्व और पश्चिम के समाज का पूरा यथार्थ अपनी इस पोस्ट में बयां कर दिया---सच में हमारा भारत बहुत बेहतर है----तभी तो यहां डाल डाल पर सोने की चिड़िया बसेरा करती हैं।

    ReplyDelete
  20. बहुत सही आलेख ....
    आपकी बात सटीक भी भी हैं और प्रासंगिक भी ....
    बधाई

    ReplyDelete
  21. शिखा जी खटिया पर बैठे भुनभुनाते बुज़ुर्गों की छवि अब यहां भी खंडित हो रही है. संयुक्त परिवार अब लगभग समाप्तप्राय हैं. फिर भी बच्चे जब तक छोटे रहते हैं तब तक दूर-दराज बसे बेटे बहू अपने परिवार के बीच दीवाली जैसे त्यौहार मनाने लौटते ही हैं. और जो भी संयुक्त परिवार हैं, उनके भीतर बुज़ुर्ग भी सम्मानित, अहम दर्जा रखते हैं. बीमार मां-बाप को अकेला छोड़ने का माद्दा अभी यहां घर नहीं कर पाया है, और ईश्वर करे, न कभी घर कर पाये.
    बहुत सुन्दर, सार्थक और विचारणीय पोस्ट.

    ReplyDelete
  22. बहुत मार्मिक तुलना... हमको तो फिलिम 36 चौरंगी लेन याद आ गया... हमरे देस का बाते अलग है... मगर ई भी सकसच है कि सब दिन एक जईसा नहीं होता है, इसलिए अब बदलाव आने लगा है... मगर सच में मन को छू गया ई पोस्ट!!

    ReplyDelete
  23. बहुत सुन्दर और सार्थक लेख |

    ReplyDelete
  24. शिखा जी दिल छू लेने वाली एक भावपूर्ण आलेख...हम हर जगह पश्चिमी नकल करते जा रहे है यही कारण है हमारे संस्कृति में भी बदलाव हो रहे है...बुज़ुर्गो के प्रति सम्मान की भावना छोटे शहरों तक ही सीमित रह गई है..जबकि ज़रूरत है इस रिश्ते के प्रति हम और कोमल बनें....बढ़िया बहुत बढ़िया आलेख..बधाई

    ReplyDelete
  25. मुझे बुड्ढा नहीं होना.... उं उं उंउं उं उं ...... वा वा वा वा .....वा वा .....वा .......वा...उं उं उं उं उं उं उं ....

    ReplyDelete
  26. पता नहीं पश्चिम पर पक्षियों का प्रभाव है या पूर्व की अपेक्षाएं ही अधिक हैं...बहरहाल एक बात है कि वहां लोगों को मानसिक पीड़ा तो नहीं होती कि बुढ़ापे में बच्चे दुत्कार देते हैं क्योंकि वहां नियति ही यही है. हमारे यहां तो बहुत सी बहुएं मन मसोस कर ही रह जाती हैं कि मुआ मर्द इस काबिल ही नहीं कि अपना अलग मकान लेकर उन्हें आज़ादी दे पाता..

    ReplyDelete
  27. सही कह रही हो..बढ़िया विषय लिया.



    हिन्दी के प्रचार, प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है. हिन्दी दिवस पर आपका हार्दिक अभिनन्दन एवं साधुवाद!!

    ReplyDelete
  28. sundar bahut kuch kehta,
    lekin jo india me hai wo kahi nhi shayd, kam se kam old age me maa-baap, sath to rehte hain, kuch apwad hain, lekin picture wahi he jo pehle thi, old age me atm nirbahrta hi nhi, apna pan bhi chahiye, apne chahiye, aur appnbe wo keh hi diya ant me

    ek shandar prastuti seekh deti hui

    ReplyDelete
  29. बहुत यथार्थ चित्रण किया है आपने -मगर हम सभी अब पश्चिमी जीवन शैली को ही अपनाते जा रहे हैं-शायद यही हमारा अभीष्ट है और उचित भी !
    सेल्फ रिलायंट होना भी अब एक पुरुषार्थ है.....बच्चों की एक अपनी जिन्दगी है वे हमारे बुढापेपन से क्यों अभिशप्त हों !

    ReplyDelete
  30. मैं रश्मि से सहमत हूँ ...अब यहाँ भी कुछ पहले जैसा नहीं रह गया है ...
    अपने परिवार के प्रेम के लिए ये अपने आत्मसम्मान को गिरवी रख देते हैं ...संयुक्त परिवार के नाम पर इन पर जो अत्याचार होता है , उससे अच्छा तो यही लगता है कि वे आत्मनिर्भर रहे ...मैं ये नहीं कहती कि सभी संयुक्त परिवार ऐसे होते हैं मगर अधिकांश मामलों में मैंने वृद्धों को दुखी और उपेक्षित देखा है ...जब तक खुद के बच्चे छोटे हों , बुजुर्गों के पास पैसा हो तभी तक उनकी पूछ है ...वरना उनकी दुर्दशा पक्की है ...इतना जरुर है कि हमारे देश में अगर घर वाले नहीं पूछ रहे हों तो पडोसी आ जाते हैं हाल चाल पूछने...

    बहुत अच्छा विषय व आलेख ...!

    ReplyDelete
  31. बहुत बढिया विषय और आलेख ………………जरूरत है तो सिर्फ़ समझने की……………ऐसा दौर सभी का आता है अगर इतना जान लें तो ज़िन्दगी आसान हो जाये।

    ReplyDelete
  32. शिखा जी हमारे बुजुर्गो को समर्पित आपका ये लेख बहुत ही पसन्द आया। आभार! -: VISIT MY BLOG :- (1.)जिसको तुम अपना कहते हो..............कविता को पढ़कर तथा (2.) Mind and body researches.......ब्लोग को पढ़कर अपने अमूल्य विचार व्यक्त करने के लिए आप सादर आमंत्रित हैँ। आप उपरोक्त लिँको पर क्लिक कर सकती हैँ।

    ReplyDelete
  33. मुझे लगता है की वो शायद उतना अकेलापन महसूस ना करते हो जितना हम सोच रहें है | क्योंकि रिश्तों को लेकर उनमें उतनी उम्मीदें नहीं होती है जितना की हमें क्योंकि वो शुरू से उसी तरह की संस्कृति में रहते आये है इसलिए वो ना तो किसी तरह की उम्मीद करते है और ना ही उतना अकेलापन महसूस करते है उनको देख कर हमें ज्यादा ख़राब इसलिए लगता है क्योंकि हम एक बड़े परिवार के साथ रहते आये है और हम अकेले रहना जानते ही नहीं | ऐसा हम सिर्फ पश्चिमी समाज के लोगों को देख कर ही नहीं भारत में रह रहे अकेले लोगों को भी देख कर कहते है" बेचारा कैसे अकेले रहता है उसे अकेलापन लगता होगा" पर एक बार उनसे पूछिये वो आप को बताएँगे की उनको कोई परेशानी नहीं है बल्कि उनको तो घर में ज्यादा लोग आ जाये तो परेशानी होने लगती है |

    रही भारत की बात तो मुझे लगता है की यहाँ पर बुढ़ापा ज्यादा है बेटे ने कमान शुरू नहीं किया की लोग रिटायर्मेंट की सोचने लगते है मुझे समझ में नहीं आता की वो घर पर खाली बैठना क्यों चाहते है | कई बार तो लोग समय से पहले ही बुढा बना देते है ४० की उम्र में ही एक आम आदमी खुद को बुढा और दूसरे भी उसे बुढा मानने लगते है "अब अपनी उम्र देखो ये सब अच्छा लगता है " कोई उनसे पूछे की शाहरुख आमिर सलमान को भी क्या वो बूढ़े की श्रेणी में रखेंगे |

    माँ बाप की सेवा करना और दादा दादी के साथ खेलना अब बीते ज़माने की बात हो गई है ये तभी संभव है जब दादा दादी समय के साथ चल रहे हो नहीं तो पूरे परिवार के साथ रह कर भी वो अकेले ही होते है ज्यादा दुखी होते है क्योंकि उनको सबसे उम्मींदे रहती है और वही अकेलेपन का कारण बनाती है |

    ReplyDelete
  34. दो संस्‍कृतियों का अन्‍तर है लेकिन मानव एक ही है और उसमें प्रेम की चाहत एकसी है। जब परिवार का रिवाज ही नहीं है तो चाहत भी कैसे करें? लेकिन मन में आकांक्षा के अंकुर तो हैं ही। यहाँ परिवार अभी शेष हैं तो प्रेम पाने का अधिकार भी है और नहीं मिलने पर आघात भी है। कुछ दिन में यहाँ भी अधिकार समाप्‍त हो जाएगा तब व्‍यक्ति ऐसे ही जिएगा। बहुत अच्‍छी पोस्‍ट, बधाई।

    ReplyDelete

  35. बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

    आशा है कि अपने सार्थक लेखन से, आप इसी तरह, हिंदी ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

    ReplyDelete
  36. कोई देश में रहे या विदेश में वृद्ध तो उसे हर हाल में ही होना है.
    हो सकता है कि हमारे यहां वृद्धों को ज्यादा उपेक्षित किया जाता हो लेकिन यह भी सच है कि वृद्धों की उपेक्षा विदेशों में भी बहुत होती है.
    उपेक्षा यदि जवान की भी होगी तो वह वृद्ध हो जाएगा और फिर वृद्ध तो वृद्ध है.
    आपने सही कहा कि प्रेम की ताकत से वृद्धों में नई आशा का संचार किया जा सकता है.
    आपने हमेशा की तरह शानदार लिखा.
    बधाई.

    ReplyDelete
  37. बढ़िया आलेख लिखा है तुमने ...वैसे काजल कुमार की टिप्पणी पर भी गौर किया जाए:]

    ReplyDelete
  38. भारतीय भावनात्मक ज्यादा होते हैं इसलिए विदेश गयी पहली पीढ़ी जीवन भर समायोजन करने मे ही लगी रहती है । जो नहीं समायोजित कर पाते लौट आते हैं । संस्कृतियों की दीवार भी गिरने लगी है ।
    वैसे प्रेम में बड़ी ताकत है जो की आपके आलेख में अच्छी तरह से प्रदर्शित है।

    ReplyDelete
  39. bahut badhiya aalekh....budha ho jaane se jyaadaa kastakar swayan ko budhaa man lenaa hai..

    ReplyDelete
  40. अच्छा आलेख ,जानकारी परख ,धन्यवाद । देश-काल और परिस्थिति जन्य है जीवन शैली । जो हमारे पास है दूसरों के पास नहीं ,ठीक उसी तरह कि जो उनके पास है वह हमारे पास नहीं । यही भिन्नता हमें एक दूसरे के प्रति जिज्ञासू और आकर्षक बनाती है ।

    ReplyDelete
  41. @झरोखा जी,
    अब कहाँ सोने की चिड़ियाँ बसेरा करती हैं मैम.. अब तो सब चिड़ियाँ मिट्टी की हो गई हैं वो भी चिकनी मिट्टी की.. अलबत्ता कौवे जरूर सारे सोने के हैं यहाँ जो उसके बावजूद चिड़ियों के दाने मार खा रहे हैं और कई बार चिड़ियों को भी..

    ReplyDelete
  42. बहुत खूबसूरत पोस्ट है दी, बेहद मार्मिक...और क्या कहूँ,
    आज सुबह से कुछ भावुक सा हूँ, एक दोस्त की कुछ परेशानियाँ थी, और अब ये पोस्ट पढ़ के थोड़ा भावुक होना स्वाभाविक है.

    ReplyDelete
  43. Duniya ke har buzurg ko apnon kaa saath chahiye hota hai. Jab log jawan hote hain to shayad hi sochte hain,ki wo bhi kisi din boodhe,akele ya apahij hoke rah jayenge..

    ReplyDelete
  44. Sahi baat hai Shikha Jii
    Chahe wo apne ko maintain rakh lete hain par yahaa ki tarah apne tajurbe apne bachcho se share tak nhi kar pate...........

    ReplyDelete
  45. बहुत अच्दी प्रस्तुति. यहां भी बुजूर्ग नयी पीढी के दंश सह रहे है व संयुक्त परिवार टूट रहे है। मगर ग्रामीण परिवेश में आज भी बुजूर्ग मुखिया का दर्जा रखता है।

    ReplyDelete
  46. Bahut gahara kataksh.....aapse puri tarah sahmat hun . apane ass paas bhu kuch aise hi prasang dekh mera man bhi masosata hai.

    ReplyDelete
  47. पोस्ट पढ़कर अच्छा लगा। मेराज फ़ैजाबादी जी का एक शेर याद आ गया:
    मुझे थकने नहीं देता ये जरूरत का पहाड़
    मेरे बच्चे मुझे बूढा नहीं होने देते।

    ReplyDelete
  48. बढ़िया विषय चुना है आपने,
    सुन्दर प्रस्तुति,

    यहाँ भी पधारें :-
    अकेला कलम...

    ReplyDelete
  49. शिखा जी हर देश की अलग रीती रिवाज़ हैं और उसी के अनुसार लोग ढल जाते हैं..पश्चिम के बुजुर्गों को अकेलापन काटने नहीं दौड़ता जब के हमारे यहाँ बुजुर्गों को परिवार पसंद है...दुखी वाहन भी लोग रहते हैं और यहाँ भी...अपनी सोच का फर्क है...
    नीरज

    ReplyDelete
  50. बहुत अच्छा लिखा है .... अपनो की ज़रूरत सभी को होती है देश हो या विदेश .... पर कितना भी ग़लत हो अपना समाज और कल्चर अभी भी इस मामले में हर देश से आगे है ..... बुजुर्गों को नही पूछते बहुत से लोग ... पर जो पूछते हैं उनकी तादाद भी कम नही है .....

    ReplyDelete
  51. Sochne ko majbboor kar diya aapne, naujawano kee jimmedari kewal apni jindagi jeena hee hai.

    ReplyDelete
  52. didi ,,,royen royen tak pahunch gaya aap ka ye aalekh... bas yahi kahna tha ... :)

    ReplyDelete
  53. प्रेरक प्रस्तुति

    ReplyDelete
  54. जीवन की जो सब से बरी सच आप ने जो लिखा है वह बहुत ही बढ़िया है .आप की लेखनी में एक छुपा हुआ दर्द होता है बिल्बुल अंतर्मन मन से लिखतीहै.

    ReplyDelete
  55. अच्छा भाव।
    बहुत सही आलेख...हमारे बुजुर्गो को समर्पित ....

    ReplyDelete
  56. आपकी संवेदनशील दृष्टि ने एक अछूते विषय से परिचय कराया . जो पका सो झरा. मगर ऐसा झरना सचमुच कष्टकारी है. संयुक्त परिवार की अहमियत तो है. मगर कई जगह संयुक्त परिवार में भी बुजुर्गों को चैन नहीं मिलता. बुजुर्गों को इस उमर में ही सहारे की जरुरत होती है. जिन पर सहारे की जिम्मेदारी होती है वे उदासीन हो कर एक दिन खुद भी कष्ट पाते हैं.

    ReplyDelete
  57. शिखा जी, इतने विलंब से आ रहा हूं कि कहने के लिए कुछ बचा ही नहीं है...
    वैसे ये सब जीवन शैली है, जो जहां होते हैं उसी के अनुसार खुद को ढाल लेते हैं.
    आपकी हर पोस्ट की तरह ये भी बहुत अच्छी लगी.

    ReplyDelete
  58. शिखा जी . बहुत अच्छा लिखा ।

    ReplyDelete
  59. कितना अच्छा है ना हमारा देश.
    फिर भी नज़र में है विदेश .
    क्यों भागते हैं आप सब वहाँ
    क्यों नहीं लौट आते अपने देश.

    बहुत सुंदर पोस्ट. मन की आँखे भीग गयी.

    ReplyDelete
  60. बहुत समसामयिक आलेख |
    पश्चिम की अपनी सभ्यता और सोच है जिसके लिए वहां के लोग आदि है उन्हें कोई फर्क भी नहीं पड़ता अपने यहाँ कितने भी वैचारिक मतभेद होंगे पर अभी भी बुजुर्गो की देखभाल तो की जाती है भावनाओ से जुड़े रहने के कारण कहे या की भारतीय संस्कारो के खातिर ?
    मुझे अपनी ही कविता की कुछ पंक्तिया यद् हो आई
    उन्होंने तो हमे दी थी
    घने दरख्तों की छाया
    जिसमे हम भरपूर फले भी, फुले भी
    हम अभी से है आतंकित, आशंकित
    क्योकि हमने तो दी है इन्हें
    बोगनबेलिया और मनी प्लांट की छाया |

    ReplyDelete
  61. अपनी संस्कृति में कुछ अच्छाई और बुराई है. कितना भी कोई कहे की यहाँ बूढों को बहुत सम्मान मिलता है. पर क्या सच में ऐसा है. शायद नही जहाँ बड़ों ने हमारे बीच दखल देना शुरू किया वैसे ही वो हमारे लिए बुरे हो जाते है. दूर से देखने पर लगता है की यहाँ बहुत प्रेम है पर हम साथ रहते हुए भी साथ नही है . बूढ़े माँ बाप चिल्लाते रहते है की तबियत खराब है पर बेटे बहु को फुर्सत नही की उनको डॉक्टर के पास ले जाये. अरे कहने को बहुत है पर अपनी कमियों को कौन देखता है?

    ReplyDelete
  62. बहुत सही आलेख। अच्छा भाव।
    बिलकुल सही लिखा है अपने यहाँ तो शारीरिक रूप मे चाहे बुढे न भी हों मगर मानसिक परेशानियों की वजह से व्यक्ति असमय ही बूढा हो जाता है। बहुत अच्छा आलेख। धन्यवाद।

    ReplyDelete
  63. सही कहा आपने शिखाजी!...यूरोप के प्रवास के दर्मियान जब मैने बुजुर्ग महिलाओं को हैल्मेट पहन कर साइकिलें चलाते हुए देखा...तो मन हर्षोल्हास से भर उठा!...यहां भारत में स्कूटर चालक तक हैल्मेट पहनने से जी चुरातें है!....बहुत सुंदर रचना!

    ReplyDelete
  64. एकदम मन से लिखा है आपने!! पूरा पढ़ने के बाद तो ऐसा लगा मानो अपना फ्यूचर भी ऐसा ही रहेगा… एकदम अकेला…
    वर्तमान में ही यही हाल है… आगे की क्या कहें…

    ReplyDelete
  65. बेहद सुन्दर आलेख शिखा जी. गणेश चतुर्थी पर हमारे केम्पस में संध्या विभिन्न कार्यक्रम होते हैं. कल ही चार पांच छोटे छोटे बच्चे बच्चियों ने आकर बड़े प्यार से हमसे कार्यक्रम स्थल में आने को कहा. दादाजी आप हमारे स्पेशल गेस्ट हैं और हम लोगों का भी स्पेशल प्रोग्राम है. आप अनुमान लगा सकते हैं की हमें कैसा लगा होगा.

    ReplyDelete
  66. buzurgo ki sthathi ka sahi chitran kiya aapne sikha ji

    ReplyDelete
  67. bahut acha likha hai aapne shikha ji, lekin bharat mein bhi kamobesh yahi stithti hoti ja rahi hai.

    ReplyDelete
  68. आपकी इस पोस्ट को आज के ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है...
    आज का बुलेटिन, महंगी होती शादियाँ, कच्चे होते रिश्ते

    ReplyDelete

पसंदीदा पोस्ट्स

ईमेल से जुड़ें

संपर्क

Name

Email *

Message *