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Tuesday, 16 March 2010

अहसास

गीली सीली सी रेत में
छापते पांवों के छापों में
अक्सर यूँ गुमां होता है
तू मेरे साथ साथ चलता है
..
सुबह की पीली धूप जब
मेरे गालों पर पड़ती है
शांत समंदर की लहरें
जब पाँव मेरे धोती हैं
उन उठती गिरती लहरों में अब भी
मुझे अक्स तेरा दिखाई देता है
.
उस गोधुली की बेला में
जब ये दिल दिए सा जलता है
दूर क्षितिज में जब सूरज
अपनी संध्या से मिलता है
तब मेरी इन बाँहों को भी तेरे ,
आलिंगन का अहसास होता है
इस ठंडी सिकुड़ी रात में जब
तन मेरा सिहरने लगता है
तपते आग के शोलों में
मन मेरा पिघलने लगता है
तेरे सपनो की आस में तब
मेरे नैना धीरे से मुंद जाते हैं
माँ की गोद में सर रख जैसे,
नन्हा बच्चा कोई सो जाता है
पाँव के नीचे से जैसे
ये रेत फिसलती जाती है
वैसे ही चुपके से मेरी
रातें गुजरती जाती हैं.
दिन रैन की धूप छाँव में
लेकिन
यकीन हर पल ये होता है
मेरे दिल के किसी कोने में
कहीं न कहीं तू रहता है

49 comments:

  1. बहुत ही प्यारी सी कविता है...मीठे से अनछुए अहसास लिए...विरह की थोड़ी थोड़ी तड़प भी है...सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. पाँव के नीचे से जैसे
    ये रेत फिसलती जाती है
    वैसे ही चुपके से मेरी
    रातें गुजरती जाती हैं.

    दिन रैन की धूप छाँव में
    लेकिन

    यकीन हर पल ये होता है
    मेरे दिल के किसी कोने में
    कहीं न कहीं तू रहता है
    बहुत खूबसूरत एहसास हैं । किसी के न होने पर भी उसके होने का एहसास ! वाह बहुत अच्छी लगी रचना शुभकामनायें।

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  3. मेरे दिल के किसी कोने में
    कहीं न कहीं तू रहता है

    bahut pyaree rachna hai, shikha..badhaii

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  4. बहुत सुंदर एहसासो से भरी आप की यह कविता.
    धन्यवाद

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  5. बढ़िया रचना है
    नव संवत्सर की बहुत बहुत शुभकामनाये ...

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  6. गीली सीली सी रेत में
    छापते पांवों के छापों में
    अक्सर यूँ गुमां होता है
    तू मेरे साथ साथ चलता है
    वाह वाह...आज तो निराला ही अंदाज़ है.:):)अरे खाली गुमां क्यों? छापो भाई और महसूस करो..


    सुबह की पीली धूप जब
    मेरे गालों पर पड़ती है
    शांत समंदर की लहरें
    जब पाँव मेरे धोती हैं
    उन उठती गिरती लहरों में अब भी
    मुझे अक्स तेरा दिखाई देता है
    लहरों में तो अक्स दिखता है पर जब पीली धूप पड़ती है तब क्या होता है? हा हा हा


    उस गोधुली की बेला में
    जब ये दिल दिए सा जलता है
    दूर क्षितिज में जब सूरज
    अपनी संध्या से मिलता है
    तब मेरी इन बाँहों को भी तेरे ,
    आलिंगन का अहसास होता है

    यहाँ मैं कुछ नहीं कह रही....खूबसूरत एहसास

    इस ठंडी सिकुड़ी रात में जब
    तन मेरा सिहरने लगता है
    तपते आग के शोलों में
    मन मेरा पिघलने लगता है
    तेरे सपनो की आस में तब
    मेरे नैना धीरे से मुंद जाते हैं
    माँ की गोद में सर रख जैसे,
    नन्हा बच्चा कोई सो जाता है

    कोमल और प्यारे एहसास


    पाँव के नीचे से जैसे
    ये रेत फिसलती जाती है
    वैसे ही चुपके से मेरी
    रातें गुजरती जाती हैं.
    दिन रैन की धूप छाँव में
    लेकिन
    यकीन हर पल ये होता है
    मेरे दिल के किसी कोने में
    कहीं न कहीं तू रहता है

    वाह क्या बात है....एहसासों को बहुत खूबसूरती से लिखा है...कहाँ छिपे हुए हैं ये सारे एहसास?
    बहुत खूबसूरत रचना...

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  7. बेसाख्ता वाह ! वाह !! क्या बात है !!
    यही या ऐसा ही कुछ निकलता है..ज़बान से .....अत्यंत सहज पर पाने प्रभाव और भाव में समग्र रचना!! ये पंक्तियाँ सर्वाधिक पसंद आयीं.
    तेरे सपनो की आस में तब
    मेरे नैना धीरे से मुंद जाते हैं
    माँ की गोद में सर रख जैसे,
    नन्हा बच्चा कोई सो जाता है.

    अदना सा सुझाव है कि अगर अंतिम पंक्तियों को न भी रखा जाय तो भी कविता सम्पूर्ण है!
    दिन रैन की धूप छाँव में
    लेकिन
    यकीन हर पल ये होता है
    मेरे दिल के किसी कोने में
    कहीं न कहीं तू रहता है

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  8. बहुत बढ़िया अभिव्यक्ति!
    भारतीय नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  9. बहुत ही खूबसूरत और मधुर एहसास लिये हुये लाजवाब रचना.

    रामराम.

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  10. "यकीन हर पल ये होता है
    मेरे दिल के किसी कोने में
    कहीं न कहीं तू रहता है"

    बहुत ही खूबसूरत एहसास। वाह! बहुत अच्छी रचना शुभकामनायें!!

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  11. bahut hi khoobsurat ahsaas se labrez hai kavita...
    barbas man ko choo gayi hai...

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  12. शब्द सृजन के बारे में कुछ कह पाना संभव नहीं है. शिल्प और कथ्य कविता में इस करीने से बुने हुए हैं कि सिर्फ आह के अतिरिक्त उच्चारण हो नहीं सकता. आपकी पोस्ट के साथ जो तस्वीरें होती है वे आपकी डेप्थ की ओर इशारा करती है.... लाजवाब

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  13. गीली सीली सी रेत में
    छापते पांवों के छापों में
    अक्सर यूँ गुमां होता है
    तू मेरे साथ साथ चलता है
    जब पांव के निशान है तो यकीनन कोई होगा ही.
    सुन्दर एहसास की रचना

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  14. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति. शब्दों में असीमित खूबसूरती भर दी है.

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  15. बहुत ही खूबसूरत रचना ! मन को गहराई तक उद्वेलित कर गयी ! अनायास ही इन भावनाओं के साथ खिंची चली जाती हूँ ! इतनी हृदयस्पर्शी रचना के लिये बहुत सारा आभार और धन्यवाद !

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  16. खूबसूरत रचना........"
    प्रणव सक्सैना
    amitraghat.blogspot.com

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  17. शांत समंदर की लहरें..जब पाँव मेरे धोती हैं
    उन उठती गिरती लहरों में अब भी..मुझे अक्स तेरा दिखाई देता है.

    आपके पास खूबसूरत शब्दों का ख़ज़ाना है शिखा जी.

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  18. Hi..
    Wah.. Kya kavita hai..
    Makhmali ahsaas shabd dar shabd..pankti dar pankti kavita unwan par aati hai aur antim anuchhed sab raaz kah jata hai.. Ek prashn ke sath....

    Ek khubsurat, ahsason bhari aur bhavpurn kavita..

    DEEPAK SHUKLA..

    ReplyDelete
  19. Hi..
    Wah.. Kya kavita hai..
    Makhmali ahsaas shabd dar shabd..pankti dar pankti kavita unwan par aati hai aur antim anuchhed sab raaz kah jata hai.. Ek prashn ke sath....

    Ek khubsurat, ahsason bhari aur bhavpurn kavita..

    DEEPAK SHUKLA..

    ReplyDelete
  20. अति सुन्दर रचना .....
    आभार .

    ReplyDelete
  21. यकीन हर पल ये होता है
    मेरे दिल के किसी कोने में
    कहीं न कहीं तू रहता है

    -वाह! बहुत सुन्दर!

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  22. लेकिन
    यकीन हर पल ये होता है
    मेरे दिल के किसी कोने में
    कहीं न कहीं तू रहता है

    शिखा जी ,बस यही यक़ीन पूरी ज़िंदगी जीने के लिए काफ़ी है,
    सुंदर रचना

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  23. अच्‍छी कविता के लिए बधाई।

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  24. "माँ की गोद में बच्चा.."
    विरह रस की रचना में वात्सल्य घोल देना.. और पढने वाले को पता भी नहीं चलने देना कि कब मूड चेंज हुआ है..और फिर विरह पर लाकर छोड़ देना..

    क्या बात है.. .!

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  25. वाह!क्या बात है!अद्भुत्।

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  26. सुंदर कवित के लिए आभार

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  27. सुन्दर एहसास समेटे बेहद खुबसूरत रचना लिखी है आपने बहुत पसंद आई शुक्रिया

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  28. पाँव के नीचे से जैसे
    ये रेत फिसलती जाती है
    वैसे ही चुपके से मेरी
    रातें गुजरती जाती हैं.
    दिन रैन की धूप छाँव में
    लेकिन
    यकीन हर पल ये होता है
    मेरे दिल के किसी कोने में
    कहीं न कहीं तू रहता है
    bahut hi badhiyaa

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  29. waah shikha ji lagta he kisi beech par par baith kar is rachna ka janam hua he...jaha dhalti godhuli ki bela ho aur uske baad dhere dhere chaand apki ankho me sarak aaya ho..

    bahut dil ko chhune wali rachna...kisi ki yado se ot-prot.

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  30. kam shabdon mein yahi kahunga ki
    behtreen !

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  31. Khubsurat ahsaason se sarabor behtreen rachana...Badhai.
    Bahut hi acchi lagi kavita.

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  32. गहरी संवेदना....अच्छी प्रस्तुति के लिये बहुत बहुत बधाई....

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  33. बहुत प्यारी सी, दुलराती सहलाती सी कान में शहद घोलती कविता है।

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  34. सचमुच आपकी कविता भावनायों का एक शब्द चित्र खड़ा करती है वह भी संगीतक लय के साथ...

    साथ ही आपके अध्यन और प्राप्तियों का भी पता चला...

    बाकी आपकी पुस्तक भी अब ढूँढनी पड़ेगी इन ढेर सारी उपलब्धियों पर मुबारक हो.....!

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  35. सुबह की पीली धूप जब
    मेरे गालों पर पड़ती है
    शांत समंदर की लहरें
    जब पाँव मेरे धोती हैं
    उन उठती गिरती लहरों में अब भी
    मुझे अक्स तेरा दिखाई देता है

    .........aapke man ke udweg ko salam!! aap jaise hi hindi ko aage le jayenge!! meri subhkamnayen.......:)

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  36. photo ke sath ye kavita romanch bhar detee hai

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  37. ek dam apni si hi hai ye kavita
    ,
    extreemly good. Shikha ji

    ReplyDelete
  38. यकीन हर पल ये होता है
    मेरे दिल के किसी कोने में
    कहीं न कहीं तू रहता है..
    BAHUT HEE BHAV -POORNA PRASTUTI ,BDHAI SWEEKAR KRE.

    ReplyDelete
  39. Itne saare comments ke baad alag shabd kahanse le aaun? Nishabd hun...!

    ReplyDelete
  40. waah maine kah diya ab isko aap jitni baar dohra sakti hain samajhiyega utni baar main kahna chahta hoon.. aur haan picture ne kavita ko aur jeevant kar diya.

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  41. achhi kavita.....sayad mere galo par bhi dhoop khilegi .....

    lazabab....

    ReplyDelete
  42. शिखा जी
    क्या कहूं निशब्द हूँ बहुत .........................सुन्दर

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  43. @ सुबह की पीली धूप जब
    ---------सुबह पर इस पीली धूप का विधान खटक रहा है !
    @ पाँव के नीचे से जैसे
    ये रेत फिसलती जाती है
    वैसे ही चुपके से मेरी
    रातें गुजरती जाती हैं.
    ----------- यह रचाव सुन्दर है ! आभार !

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  44. गहरे एहसास लिए ... दिल को हल्के से छूते हुवे, ठंडी हवा के झोंके की तरह गुज़रती रचना ....

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  45. सरल व् सार्थक बयानी

    गोधुली की बेला में जब ये दिल दिए सा जलता हैदूर क्षितिज में जब सूरजअपनी संध्या से मिलता हैतब मेरी इन बाँहों को भी तेरे , आलिंगन का अहसास होता है इस ठंडी सिकुड़ी रात में जब तन मेरा सिहरने लगता हैतपते आग के शोलों में मन मेरा पिघलने लगता है

    दिल के किसी कोने में कहीं न कहीं तू रहता है

    सुन्दर...

    ReplyDelete

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