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Tuesday, 15 December 2009

आँखों का सागर.

सागर भरा है
तुम्हारी आँखों में
जो उफन आता है
रह रह कर
और बह जाता है
भिगो कर कोरों को
रह जाती है
एक सूखी सी लकीर
आँखों और लबों के बीच
जो कर जाती है
सब अनकहा बयाँ
तुम
रोक लिया करो
उन उफनती ,
नमकीन लहरों को,
न दिया करो बहने
उन्हें कपोलों पे
क्योंकि देख कर वो
सीले कपोल और
डबडबाई आँखे तुम्हारी
भर आता है
मेरी भी आँखों का सागर.

31 comments:

  1. बहुत सुंदर कविता...... बेहतरीन गढ़े हुए लफ़्ज़ों में ....शानदार प्रस्त्तुती.....

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  2. क्या बात है शिखा !!
    आज की कविता तो दर्द के उफान मार रही है....
    बहुत सुन्दर बन पड़ी है...
    और तस्वीर तो माशाअल्लाह....लाजवाब है...
    बधाई..

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  3. ek behtreen ehsaas liye hui rachna

    beautifullu expressed

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  4. बहुत ही भावभरी कविता है...एक अनछुआ सा अहसास लिए

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  5. नमकीन लहरें कहाँ रुकने वाली हैं ..
    सागर तो बिना उमड़े नहीं रह सकता ..
    फिर भी जुस्तजू तो जारी रहती है !
    .................... आभार ,,,

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  6. रह जाती है एक
    सूखी सी लकीर
    आँखों और लबों के बीच
    जो कर जाती है
    सब अनकहा बयाँ

    दर्द को बखूबी महसूस किया है...

    देख कर वो सीले कपोल
    और डबडबाई आँखे तुम्हारी
    भर आता है
    मेरी भी आँखों का सागर.

    प्रेम की पराकाष्ठा बताती नज़्म बहुत खूबसूरत लिखी है....बधाई

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  7. वाह बहुत भावभरी रचना !!

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  8. बेहद बेहद सुन्दर रचना !!! सचमुच रचना में बहुत दर्द है !!!

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  9. संवेदना का संस्पर्श लिए एक सुकोमल कविता !

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  10. क्या बात है शिखा जी ,
    दो खारे सागरों का मिलन तो अनोखा ही लगा ....बहुत ही भावपूर्ण

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  11. भावपूर्ण रचना बढ़िया प्रस्तुति....

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  12. this is nice poen. I am editor of katha chakra net magazine. please read this
    http://katha-chakra.blogspot.com

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  13. शानदार भावपूर्ण अभिव्यक्ति..बहुत सुन्दर.

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  14. क्या बात है..बहुत ही बढ़िया..खूबसूरत रचना..

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  15. बहुत बढिया भावपूर्ण रचना है।

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  16. रह जाती है

    एक सूखी सी लकीर

    आँखों और लबों के बीच

    waah bahut khoob

    man ke jazbato ko bahut acchhe shbdo ka jama pehnaya hai..bahut khoobsurat rachna.

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  17. शिखा जी,
    ........देख कर वो
    सीले कपोल और
    डबडबाई आँखे तुम्हारी
    भर आता है
    मेरी भी 'आँखों का सागर'
    भाव विभोर कर गयी आपकी ये रचना
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

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  18. Bhaavpoorn Rachna hai ji
    padhkar achchha laga

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  19. कविता उम्दा है.. नो डाउट!

    सोच रहा हूँ वो कौनसी बात होगी आपके ब्लॉग में कि इतना घटिया लिखने पर भी अनाम साहब/साहिबा बार बार आकर पढ़ते है... वैसे इनके लिए अंग्रेजी में एक शब्द का आविष्कार हुआ है.. जिसे हिंदी में 'इग्नोर' कहते है.. बस वही किया जाए तो बेहतर है..

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  20. न दिया करो बहने
    उन्हें कपोलों पे
    क्योंकि देख कर वो
    सीले कपोल और
    डबडबाई आँखे तुम्हारी
    भर आता है
    मेरी भी आँखों का सागर. ...

    दिल में उमड़ते शब्दों को भाव देना ...... उनको प्रवाह बना कर काग़ज़ पर उतारना आसान नही होता ......... बहुत ही लाजवाब और बेहतरीन तरीके से आपने मान के भाव को रखा है ..........

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  21. खूबसूरत बयान।

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  22. Anonymous said...

    kuchh kaayde ka bhi likho kabhi
    kab tak bakwas likhogi
    yahan to saale waah waah karne waale taiyaar baithe rahte हैं .

    साहब / साहिबा ,
    जो भी आप हैं.....आपकी नज़र है....

    कुंठित मन से
    निकलती हैं
    गालियाँ
    कभी तो खुद से
    बाहर निकल
    देखा करो..

    एक बात स्पष्ट कर दूँ...आपके ऐसा लिखने से किसी को भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा..वैसे आपने शिखा की
    अप्रत्यक्ष रूप से बहुत मदद की है... शिखा के ब्लॉग की T R P बढ़ गयी है . :)

    एक बात समझ नहीं आई कि जब ये सब आपको बकवास लगता है तो पढ़ने क्यों आते हैं? मुझे तो लग रहा है जलन इतनी है कि धुआं धुआं हुए जा रहे हैं....आपको कोई पढता नहीं क्या? वैसे मुझे आदत नहीं है बकवास पढ़ने की पर फिर भी आप अपने परिचय के साथ अपना लिखा कुछ भेजें....देखें की आप कितने पानी में हैं?

    शिखा ,
    आपके ब्लॉग पर ये सब लिखने के लिए क्षमा प्रार्थना है.

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  23. @ Anonymous.....

    भाई.... तुम जो कोई भी ...लगता है.... तुम्हे अपनी कोई फिक्र नहीं है.... अगर पसंद नहीं था भाई...तो किसने कहा था कूदने को.... जब नहीं था दिल में गूदा तो लंका में क्यूँ कूदा? एक बात और बता दूं.... कि भाई मैं तुम्हे पहचान गया हूँ.... तुम्हारा IP एड्रेस पता लगा लिया है..... और तुम हमारे लखनऊ से ही हो.... यह भी पता चल गया है.... और कहो तो कल तुम्हारे ऑफिस आ जाऊं? और लखनऊ से हो तो यह भी जानते होगे कि महफूज़ का मतलब क्या है ? फिलहाल इतना dose काफी है.... बाकी अपनी सेहत का ख्याल तुम खुद ही रखना जानते हो.... आइन्दा बेनामी टिप्पणी की तो बेनाम ही रह जाओगे..... वैसे कल एक चक्कर मैं तुम्हारे ऑफिस का लगाने वाला हूँ....

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  24. apnje saath bahaa kar le jaane me samarth

    umda kavita........

    -abhinandan shikhaa ji !

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  25. क्योंकि देख कर वो
    सीले कपोल और
    डबडबाई आँखे तुम्हारी
    भर आता है
    मेरी भी आँखों का सागर.
    बहुत सुन्दर भाव हैं जिनकी तह तक 'अनाम' लोगों का पहुँचना असम्भव है.
    उम्दा रचना

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  26. देख कर वो
    सीले कपोल और
    डबडबाई आँखे तुम्हारी
    भर आता है
    मेरी भी आँखों का सागर.

    बहुत खूब

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  27. ik sher zehan mein phir tair gaya:

    ashk girte hi kam nahin hote
    aankh kitni ameer hoti hai!!

    yun nakeen aur saonlee cheez bhi ek din fana ho jaati hai.

    bahut hi sahajta se aapne apni bat rakhi.

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  28. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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