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Wednesday, 9 December 2009

अन्तर-जाली रिश्ते.

{New Observer Post Hindi Daily 28th nov.2009 (online edition )में प्रकाशित.}
एक जमाना था जब पत्रमित्रता जोरों पर थी.देश विदेश में मित्र बनाये जाते थे, उसे ज्ञान बाँटने का और पाने का एक जरिया तो समझा ही जाता था, बहुत से तथाकथित रिश्ते भी बन जाया करते थे।और कभी कभी ब्लेक मैलिंग का सामान भी .
आज यही काम इंटर नेट के जरिये हो रहा है॥
जिसे बाहरी दुनिया में जो न मिले आ जाये, यहाँ सब मौजूद है।
सपने देखने का शौक किसे नहीं होता अब बाहरी दुनिया में आपके सपनो को कोई घास न डाले तो चले आइये यहाँ ,आप अपनी मंजिल पा ही लेंगे, सपनो में ही सही ॥
बेटा ,बेटी से लेकर ,मासी ,बुआ और प्रेमी - प्रेमिका तक के रिश्ते मिल जायेंगे ।अब सही मिले तो मिले- खुश रहिये ।सोचिये आपकी किस्मत अच्छी थी, ।नहीं तो झेलिये दर्द और रोते रहिये जीवन भर अपनी बेबकूफी पर, उन्हें क्या.... वो तो कहीं और व्यस्त हैं दूसरी माँ,और भाई बनाने में .
बाहरी दुनिया के रिश्तों से आहात हैं? यहाँ आइये एक ढूढीयेगा हजार मिलेंगे. भड़ास निकालनी हो या कुंठाएं मिटानी हो .भावात्मक सहारा चाहिए हो या अहम् शांत करना हो , यहाँ सब होता है ..वो भी एक क्लिक से....मन भाए तो निभाइए वर्ना एक क्लिक से ही ख़तम कर डालिए. कौन क्या विगाड़ लेगा आपका
एक नहीं हजार प्रोफाइल बनाइये और जम कर इश्क लड़ाइए ,। खाते रहें बाहरी दुनिया के लोग भाव .....अपना मतलब तो यहाँ निकल ही रहा है न ,और सामने वाले का डर भी नहीं कि गले पड़ जायेगा/जाएगी.....जमा तो जमा नहीं तो बहुत बड़ा है ये अंतर्जाल कोई न कोई रिश्तों का सताया तो फंस ही जायेगा.
अब भाई हर फूल के साथ कांटे होते हैं तो यहाँ भी हैं ।अब बिना एतिहात के फूल चुनोगे तो काँटा तो हाथ में चुभ ही जायेगा न और दर्द भी करेगा. हो सकता है घाव ही बन जाये ..तो भलाई इसी में है कि रहिये सावधान इस जाल में , इसमें मोती भी हैं और मगरमच्छ भी .बस सावधानी से मोती चुनिए और मगरमच्छों से दूर ही रहिये .खुश रहेंगे आप ....

37 comments:

  1. अरे क्या बात कह दी १०००% सही....
    अरे इतनी दूरी से भी मेरी नेट सास मेरा जीना दूभर कर रही है और उ नेट ननद नाक में दम कर रखी है हाँ नहीं तो.....
    जब देखो तो पोस्ट लिख देती है.....
    लेकिन नेट बहिन बहुत दुलार करती हैं हमसे ....
    और नेट भाई लोग ...हर वक्त मोर्चा सम्हाले खड़े हैं....इहाँ इ कमेन्ट काहे दिया....उहाँ इ बात काहे कही.....???
    कौन कहता है कि हम विदेश में हम और 'सास' से बचे हुए हैं.....न जी न....ऐसा नहीं है...इ सब अंतर जाल कि कृपा है जो आप सब के इतने करीब आ गए हैं और सच पूछिए जो जीवन मेंबहुत सारे रंग आ गए हैं...
    ख़ुशी, उत्साह, मान, अपमान, सब कुछ.....
    और अब समझ भी गए हैं इसलिए होशियार भी हैं....आप लोग भी होशियारी से रिश्ते चुनेगे तो सब अच्छा रहेगा....
    शिखा बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने ..सही सटीक, और सार्थक....

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  2. बडा नाजुक विषय छू लिया,शिखा आज....यहाँ, हम सब इस अंतर-जाली रिश्ते से ही बंधे हैं...यह ममता,प्यार,दोस्ती, और दर्द सब उंडेलता है...पर आपको कितना और क्या लेना है..यह आपको तय करना है.... बहुत ही सावधानीपूर्वक कदम बढाने होते हैं...वरना ये रिश्ते तो आभासी होते हैं पर दर्द ख़ालिश दे सकते हैं

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  3. सावधानी तो ज़रूरी है रिश्ते बनाने में ........ क्योंकि रिश्ते ही दर्द देते हैं और ये रिश्ते दावा भी देते हैं ........ बस ज़रूरत है सही चुनाव की ....... आपकी मेल में सही लिखा है ..... सावधानी बरतनी चाहिएर ऐसे किसी भी रिश्ते को बनाने में .........

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  4. शिखा जी का लिखा हुआ यदा कदा पढते रहते है हमेशा बहुत बढिया ही लिखती है उनकी लिखी टिपणीय भी हमेशा बहुत बढिया होती है.

    यहा जो प्रश्न उन्होने उठाये है उनके उत्तर भी दिये है. अन्तरजाल की दुनिया का सबके लिये अपना महत्व है हा कुछ लोग यकीनन दिल के बहुत करीब लगते है और कुछ बिल्कुल ही अपने से. एक बात तो आप माने कि अन्तर्जाल ने अच्छे लोगो के लिये अच्छे काम और बुरे लोगो के लिये बुरे काम के लिये नये आयाम खोले है और यकीन करे अगर हम अनचाही आशाये नही बान्धे तो रिश्ते भी हमारे मन के किसी कोने की रिक्तता को भरते है. कुछ लोग बहुत जल्दी ही बहुत नज़दीकी के दावे करते है मुझे डर लगता है. मार्च २००० से अन्तरजाल पर सक्रिय हू और बहुत से लोग आये और गये लेकिन इतने लम्बे समय से जो लोग जुडे रहे वो सब एक तरह से परिवार या कहे दायरे का हिस्सा है और इतना लम्बा साथ आभासी से शुरु होकर बहुत हद तक असली का सा प्रभाव छोडता है. जिन भी दोस्तो ने आग्रह कर करके मुझसे बहुत कुछ लिखवा दिया है और बेहद अच्छा लिखा हुआ पढने का मौका दिया है उसे आभासी से शुरु होने के बाद भी अवास्तविक नही कह सकते. हा ये है कि कई बार बहुत प्यारे दोस्तो के गायब हो जाने से दुख भी होता है पर ये तो जिन्दगी मे भी होता है.
    कोई मिल जाता अनायास लगता प्राणो के बहुत पास
    फिर वही एक दिन खो जाता सुधियो को दे अग्यातवास
    स्वीकारे क्शन की अबधि अनागत सपनो के अनुमान ना हो
    जग जो चहे सो कहे बिम्ब आईने मे बदनाम ना हो
    ( प्रसिद्ध गीतकार श्री आत्म प्रकाश शुक्ल )

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  5. नाजुक मसले पर अपने बढ़िया चर्चा की . फोटो भी जोरदार लगे ....

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  6. गजब ! क्या करारी बात कही है !

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  7. अब क्या बोलूँ इतनी अच्छी पोस्ट के लिए...... इसके लिए मुझे डिटेल में लिखना पड़ेगा.....

    तो फिर आता हूँ मैं....... दोबारा.........

    मज़ा आ गया इस पोस्ट को पढ़ के......

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  8. आपकी वर्जना बहुत उपयोगी है!
    आभार!

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  9. अन्तर्जालीय रिश्ते हों या वास्तविक - सावधानी तो हर हाल में जरूरी है। अच्छी चर्चा।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  10. .
    .
    .
    अन्तर्जालीय रिश्ते हों या वास्तविक - सावधानी... और ईमानदारी भी... हर हाल में जरूरी है। बेहतरीन चर्चा...

    'ग्लोबल वार्मिंग' और 'क्लाइमेट चेन्ज' का सच, एक बहुत बड़ा धोखा है यह गरीब देशों के साथ...

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  11. ‘फूल के साथ कांटे होते हैं तो यहाँ भी हैं ’
    फूलों से प्यार है तो कांटों से भी यारी है....:)

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  12. सावधानी हटी,दुर्घटना घटी।

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  13. एक नहीं हजार प्रोफाइल बनाइये और जम कर इश्क लड़ाइए ,। खाते रहें बाहरी दुनिया के लोग भाव .....अपना मतलब तो यहाँ निकल ही रहा है न ,और सामने वाले का डर भी नहीं कि गले पड़ जायेगा/जाएगी.....जमा तो जमा नहीं तो बहुत बड़ा है ये अंतर्जाल कोई न कोई रिश्तों का सताया तो फंस ही जायेगा.

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  14. बहुत अच्छा लिखा है आपने । भाव, विचार और शिल्प का सुंदर समन्वय रचनात्मकता को प्रखर बना रहा है । मैने भी अपने ब्लाग पर एक कविता लिखी है। समय हो तो पढ़ें और कमेंट भी दें-
    http://drashokpriyaranjan.blogspot.com

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  15. यहाँ कल भी मैं आया था. जबलपुर के एक मित्र के ब्लॉग पर भी आपको पढ़ा! कल ही आपका हेडर ज़रा अटपटा-सा लगा.गर आप उसे सही कर लें तो अच्छा लगे! लेकिन साहीबा! आपकी ये पोस्ट निसंदेह मौजूं सवाल खड़े करती है.मौजूं क्या ये तो सतत है.जब से नर-नारी ने जन्म लिया धरा पर! लेकिन मैं उन्हें कायर समझता हूँ जो छद्म नाम की प्रोफाइल बनाकर इश्क की अठखेलियाँ खेलते हैं/खेलती हैं.सात्र और सिमोन के रिश्ते ढूंढते रह जायेंगे!!!!!!

    आपकी कवितायें गहरे जाकर उतरती हैं.हाँ ज़रा शिल्प कमज़ोर अवश्य है पर उम्मीद है निखार आ जाएगा.वैसे भी पत्रकार की कवितायें होती ही ऐसी हैं.मैं खुद इसका शिकार हूँ.लोग मना करते हैं.फितरत माने तब न!!

    अब बहुत हुआ, चलते हैं!!
    पढ़ते रहिये-लिखते रहिये!!
    यही दुआ है मित्रवत राय भी!

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  16. सही सचेत किया है...


    सावधानी बरतने की दरकार हर जगह है.

    स्व विवेक का इस्तेमाल तो करना ही होगा.


    बेहतरीन आलेख.

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  17. शिखा जी, बहुत ही सार्थक पोस्ट लिखा है आपने!

    किन्तु धोखाधड़ी कहाँ नहीं होती? अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले ही लोग अधिक मिलते हैं जीवन में। यह जरूर है कि इंटरनेट में ऐसे लोगों की संख्या और भी ज्यादा है। सावधान रहना बहुत जरूरी है।

    इसलिये "पानी पीना छान के, रिश्ते बनाना जान के"!

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  18. वाह , क्या विषय चुना है....मज़ा आ गया...एक एक शब्द तेज़ धार की तरह वार करता हुआ,
    सच है की रिश्ते चाहे अपनी निजी ज़िन्दगी के हों या अंतरजाल पर ख़ुशी और दर्द दोनों ही देते हैं...
    बस इस अंतरजाल के रिश्तों को एक क्लिक से छोड़ा जा सकता है...पर फिर भी कुछ देर के लिए तनाव इनसे भी
    झेलना पड़ जाता है....अच्छी राय दी है की सावधानी ज़रूरी है.....
    बहुत बढ़िया लेख.....बधाई

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  19. आपकी पोस्ट पढ कर मुनव्वर राना का एक शेर याद आ गया
    अमीरे शहर को रिश्ते में कोई कुछ नहीं लगता
    गरीबी चाँद को भी अपना मामा मान लेती है

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  20. बहुत अच्छा लिखा, अंतर्जाल के जाल में फंसने से बचा तो नहीं जा सकता लेकिन अंतरंगता उतनी ही सही है, जहाँ तक आपकी आसानी से पहुँच हो. अनदेखे और अनजाने रिश्तों से सतर्कता जरूरी है.

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  21. bahut sahi kaha Shikha ji

    magamachhon se sabdhan rehne ki jarurat hai
    hahahahaahahahahaa

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  22. bahut hi sarthak post..........iske siway kahne ko kuch nhi bacha sabne itna kah diya hai.

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  23. यह बात आपने बिलकुल सही कही है कि नेट कि दुनिया से बहुत संभल कर रहिये.... यहाँ मोती भी हैं और मगरमच्छ भी... मैं खुद यहाँ कई मगरमच्छों से घिर चुका हूँ.... पर अब संभल गया हूँ..... सब मगरमच्छों को पहचान गया हूँ.. पर नेट पर इश्क से बहुत दूर रहता हूँ. यहाँ मुझे रश्मि प्रभा जैसीं माँ भी मिली हैं... तो वाणी दीदी जैसी बहन भी, दीपक जैसा भाई भी मिला है तो शास्त्रीजी जैसे पिता भी मिले हैं तो आप जैसा दोस्त भी... हाँ! यह है कि यहाँ बहुत संभल के रहना बहुत ज़रूरी है.... बहुत अच्छा लगा आपका यह लेख...

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  24. mujhe lagta he har taknik aour suvidhao me sikke ke do pahlu ki tarah do paksh hote he, achha bhi buraa bhi..jisaki jesi mansikataa...\
    aapki post umda he.

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  25. shikha ji bahut badhiya article hai..such kaha aapne ki ehtiyaat ander aur baahar ki dono duniya me jaruri hai..ek similarity aur bhi hai dono duniya me ek hath de ek hath le wala rishta hai..yaha b cont.banaye rakho to chalta rehta hai varna sab khatam...haa.n aapne keh to diya ek click me sab chhod do parantu itna aasaa bhi nahi hai kuchh dino tak yeh bhi man-manthan karta rehta hai. baki to bhaiya sab soojh-boojh ki baat to hai hi.

    nice post.

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  26. Kuch bhi kaho, internet na hota to na aapke vichar hum tak pahunch paate na hamare comments aap tak.

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  27. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  28. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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  29. बहुत सच्ची बात लिखी है आपने----
    पूनम

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  30. शिखा जी,
    आपने बिल्कुल ठीक लिखा है----
    इसमें मोती भी हैं और मगरमच्छ भी .बस सावधानी से मोती चुनिए और मगरमच्छों से दूर ही रहिये .खुश रहेंगे आप ....
    नेट पर सावधानी तो रखनी ही पड़ेगी।
    हेमन्त कुमार

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  31. बहुत अच्छा लिखा आपने
    बहुत-२ आभार

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  32. achha alekh...
    sunder nasihat
    Dhanyavad.

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  33. बात तो सौ टके की एक है लेकिन भी अंतर के साथ जाल जो जुड़ गया । अब जाल में फंस कर आपको कैसा लगता है ? किसका जाल है ? कैसा जाल है आप उसमें फंस कर खुश हैं या नाखुश आपने ये समझ लिया तो समस्या कहां है । अब देखिए ना इसी जाल से हमें आप मिलीं, अजित गुप्ते जी वंदना गुप्ता जी ,निर्मल कपिला जी, रश्मि प्रभा जी संगीता जी , राकेश जी , शास्त्री जी, और हां अपनी उडन तश्तरी , प्रवीण पांडे . बाकली वाल जी सूची बहुत लंबी है( जिनका नाम नहीं लिख पायी वो प्लीज़ दिल पर ना लें )। इनका जाल तो सुखद है और पिछले नंबर से जबसे मैनें ब्लॉगिग शुरू की है मेरा एक नया परिवार बना है ब्ल़ॉग परिवार और इसके सदस्य जैसे जैसे बढ़ते हैं खुशी भी बढ़ती है सो है ना ये जाल अच्छा

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