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Wednesday, 20 May 2009

ये प्यार है


कुछ कोमल से अहसास हैं 
कुछ सोये हुए ज़ज्वात हैं 
है नहीं ये ज्वाला कोई 
सुलगी सुलगी सी आग है 
कुछ और नहीं ये प्यार है। 

धड़कन बन जो धड़क रही 
ज्योति बन जो चमक रही 
साँसों में बसी सुगंध सी 
महकी महकी सी बयार है 
कुछ और नहीं ये प्यार है। 

हो कोई रागिनी छिड़ी जैसे 
रिमझिम पड़ती बूंदे वैसे  
है झंकृत मन का तार तार 
लिए प्रीत का पावन संसार है 
कुछ और नहीं ये प्यार है।

6 comments:

  1. वाह............प्यार को परिभाषित करने का ये अंदाज पसंद आया..............
    खूबसूरत लिखा है...........सचमुच प्यार ही प्यार है.........

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  2. bahut hi bhaavpoorn kavita hai.

    seedhe dil ko dastak deti hai.

    kya yah aapki hi kavita hai ??

    agar han to waakayi kamaal kee kavita hai


    meri shubhkamnayen

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  3. Ji han Prakash Govind ji...is blog par jitni bhi rachnayen hain 100% meri hi hain...or unka copy right bhi hai mre pass.thanks for your comment.

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  4. namaskar mitr,

    aapki saari posts padhi , aapki kavitao me jo bhaav abhivyakt hote hai ..wo bahut gahre hote hai .. aapko dil se badhai ..

    is kavita ne to dil me ek ahsaas ko janam de diya hai ..

    dhanyawad.....

    meri nayi kavita " tera chale jaana " aapke pyaar aur aashirwad ki raah dekh rahi hai .. aapse nivedan hai ki padhkar mera hausala badhayen..

    http://poemsofvijay.blogspot.com/2009/05/blog-post_18.html

    aapka

    Vijay

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  5. बहुत ही खूबसूरत अल्फाजों में प्यार की बयानगी...
    दिल को छू गयी ये नज़्म.....

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