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Monday, 27 April 2009

उलझे धागे






































धागे जिंदगी के कभी कभी
उलझ जाते हैं इस तरह
की चाह कर फिर उन्हें
सुलझा नही पाते हैं हम.

कोशिश खोलने की गाँठे
जितनी भी हम कर लें मगर
उतने ही उसमें बार बार
फिर उलझते जाते हैं हम.

धागों को ज़ोर से खीचते भी
कुछ भय सा लगने लगता है
वो धागे ही टूट ना जाएँ कहीं
यूँ दिल ये धड़कने लगता है.

अभी तो सिर्फ़ उलझे हैं धागे
उम्मीद है सुलझ जाएँगे कभी
जो टूट गये वो धागे तो फिर
क्या वो जुड़ पाएँगे कभी?.

अरमान था इन धागों में
पिरो दूँगी अपने मोती सारे
बना दूँगी एक माला जिसमें
होंगे बस प्रेम के मोती-धागे

आलम ना जाने हुआ क्या
नाज़ुक पड़ गये मेरे धागे
पड़ गईं गाँठे धागों में
और बिखर गये मोती सारे

अब एक छण भी एकांत का
ना मैं गवायाँ करती हूँ
कभी समेटती हूँ मोती
कभी गिरह सुलझाया करती हूँ

काश गूँथ जाएँ फिर मोती उसमें
ये आस मेरी ना रहे अधूरी
बस बन जाए मेरी ये माला
बुझने से पहले नयनो की ज्योति.

6 comments:

  1. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 29 -12 - 2011 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज... अगले मोड तक साथ हमारा अभी बाकी है

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  2. बहुत प्यारी कविता..
    दिल को छू गयी..
    बधाई.

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  3. काश गूँथ जाए फिर मोती उसमें
    ये आस मेरी ना रहे अधूरी
    बस बन जाए मेरी ये माला
    बुझने से पहले नयनो की ज्योति.
    ..saarthak sakratman nek bhavana...
    jindagi mein sab muraaden puri ho jaya esi mein jewan ke sarthakta hai..
    bahut badiya rachna..
    navvarsh kee haardik shubhkamnayen!

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  4. दिल से लिखी गयी है

    आभार

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  5. अरे यह कहाँ उलझ गईं आप :)निराश न हो जी उम्मीद पर दुनिया कायम है। वक्त के साथ सुलझ ही जाया करते हैं कुछ धागे...

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  6. kuch uljhe dhaage hi aksar rishton ko bal de jaate hain..bahut hi sundar rachna

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