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Monday, 27 April 2009

तेरे संग रहूंगी


मैं तो हरदम तेरे संग ही रहूंगी
कभी उतर कर तेरे ख़यालों में
बन कविता तेरे शब्दों में उकरूँगी
या फिर बन स्याही तेरी कलम की
तेरे कोरे काग़ज़ पर बिखरुंगी
यूँ ही हरदम तेरे संग रहूंगी।

हो शामिल सूर्यकिरण में कभी
बन आभा तेरे चेहरे पर उभरूँगी
थक कर सुस्ताने बैठेगा जब तू
बन पवन तेरे बालों में फिरूंगी
जैसे भी हो बस तेरे संग रहूंगी.

या बन जाऊंगी बरखा की बूँदें
और  तेरे सीने से जा लगूंगी
या बन तेरे कमरे के दिए की लो
जलूँगी  पर अपलक तुझे तकुंगी
चाहे जो हो मैं तो तेरे संग रहूंगी

शरीर छूट जाना  है,
दुनिया छूट जानी  है
ये माटी की काया
इस माटी में मिल जानी है
ना कर सकी कुछ तो
बिखर तेरी राहों पे
मिट्टी बन तेरे पेरों से लिपटूँगी
पर जान ले हरदम तेरे संग रहूंगी.

(अमृता प्रीतम की एक कविता से प्रेरित.)

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