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Sunday, 26 April 2009

सच्चा ख्वाब

आज़ तो लगता है जैसे जहाँ मिल गया,
ये ज़मीन मिल गई, आसमान मिल गया.
हों किसी के लिए, ना हों मायने इसके,
मुझे तो मेरा बस एक मुकाम मिल गया.

एक ख्वाब थी ये मंज़िल ,जब राह पर चले थे,
एक आस थी ये ख्वाइश जब, मोड़ पर मुड़े थे,
धीरे-धीरे ये एक मुश्किल इम्तहान हो गया,
पर आज़ ये हथेली पर आया पूरा चाँद हो गया.
हम कर गुज़रे जो हमारे बस में था,
वो जो बरसों से इस दिल में, इस जिगर में था,
सपना सुहाना वो साकार हो गया,
और सारा ज़माना यूँ गुलज़ार हो गया.

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