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Monday, 27 April 2009

पूरब पश्चिम

कहीं सुनहरी बदन सेकती,
कहीं किसी का बदन जलाती
चिलचिलाती धुप
कहीं रुपसी करती है डाइटिंग
कहीं जान से मारती है भूख.
कहीं फ़ैशन है कम कपड़ों का ,
कहीं एक ओड़नी को तरसता योवन
कहीं  बर्गर ,कोक में डूबा कोई,
कहीं कूड़े में वाड़ा पाँव ढूँढता बचपन.
वही है धरती अंबर वही है,
वही है सूरज, चाँद और तारे मगर.
किसी के लिए महकता आता है नया सवेरा,
किसी के लिए नया संघर्ष है हर नया दिन.
वही दिशाएं हैं वही हवाएं हैं
भगवान और इंसान का रिश्ता भी है एक.
फिर पूरब पश्चिम का क्यों है फ़र्क
एक कड़वा और निरीह सच.

1 comment:

  1. सच सही में बहुत कडुवा है।

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