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Monday, 27 April 2009

मेरी पनाह

तू समझे न समझे दीवानगी मेरी ,
तेरे आगोश में मेरे मर्ज़ की दवा रखी है।
दिल आजकल कुछ भारी- भारी सा लगता है
उसपर तेरी याद की परतें जो चढ़ा रखी हैं।
आखों से लुढ़कते आँसू भी पी जाते हैं हम कि
बह न जाये वो तस्वीर जो उनमें बसा रखी है।
नहीं धोया वर्षों से वो गुलाबी आँचल हमने
उसमें तेरी साँसों की खुशबू जो समा रखी है।
अपने मंदिर में माला मैं चढाऊँ केसे?
इश्वर की जगह तेरी मूरत जो लगा रखी है।
हम हथेलियाँ नहीं खोलते पूरी तरह से
इनमें तेरे प्यार की लकीर जो छुपा रखी है।
केसे छोड़ दूं मैं इस मिट्टी के शरीर को
अपनी रूह से तेरी रूह जो मिला रखी है.

1 comment:

  1. आखों से लुढ़कते आँसू भी पी जाते हैं हम,
    बह न जाये वो तस्वीर जो उनमें बसा रखी है।
    नहीं धोया वर्षों से वो गुलाबी आँचल
    हमने उसमें तेरी साँसों की खुशबू जो समां रखी है


    very nice ghazal...........congrats!

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