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Monday, 27 April 2009

मेरा जहाँ


कौन कहता है दर पे उसके, देर है- अंधेर नही,
मुझे तो रोशनी की एक, झलक भी नही दिखती.
मिलना हो तो मिलता है,
ख़ुशियों का अथाह समुंदर भी,
पर चाहो जब तो उसकी,
एक छोटी सी लहर भी नही दिखती.
हज़ारों रंग के फूल हैं,
दुनिया के बगानों में,
मगर मेरे तो नन्हें दिल की
एक कली भी नही खिलती.
गुज़र गया वो वक़्त,
जब हिम्मत थी जहाँ को चलाने की,
अब तो मुझसे मेरे वक़्त की,
सुई भी नही हिलती.
कहाँ है वो जुनून,वो तमन्ना,
वो ख्वाईशें, वो जज़्बे?
कहीं इन जज़्बातों की ,
झलक भी नही दिखती.
सोचा था हम दिखाएँगे,
मोहब्बत से जीत कर जग को,
अब तो मुझे मेरी मंज़िल की ,
राह भी नही दिखती.
ओर किससे करें गिला,
समझाएं राहे वफ़ा किसको,
हमदम के दिल में ही जब
मोहब्बते वफ़ा नही दिखती.
चाहा हमने -जिसे जीजान से,
माना अपना खुदा जिसको,
उसके तो दिल के आईने में,
मेरी तस्वीर ही नही दिखती

2 comments:

  1. अच्छा है।

    हो सकता है दिल के आइने में तस्वीर दिखने के लिये कोई पासवर्ड लगता हो।

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  2. बहुत खूबसूरत नज़्म

    कहाँ है वो जुनून,वो तमन्ना, वो ख्वाईशें, वो जज़्बे?कहीं इन जज़्बातों की ,झलक भी नही दिखती.

    हमें तो तुम्हारे अंदर जूनून ही दिखता है

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