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Monday, 27 April 2009

होरी खेलन चल दिए श्री मुसद्दी लाल


होरी खेलन चल दिए श्री मुसद्दी लाल
कुर्ता धोती श्वेत चका चक, भर जेब में अबीर गुलाल.
दबाये मूँह में पान, कि आज़ नही छोड़ेंगे
संतो भौजी को तो, आज़ रंग के ही लौटेंगे.

और फिर भोली छवि भौजी की, अंखियन में भर आई
बिन गुलाल लाल भए गाल, होटन पे मुस्की सी छाई.

आने लगी याद लड़कपन की वो होली,
वो टेसू के रंग वो हँसी ठिठोली

रसीली गुजिया का स्वाद जो आया जिव्हा पर,
पंख जैसे लग गए उनकी चाल ढाल पर.

तभी छपाक हुई आवाज़, उफ़ क्या आ लगा गालों पर
मूँह की गुलेरी निकल पड़ी बाहर, मुई एक दाढ़ में फँस कर.

हाय मरा, कह के मुसद्दी, वही सड़क पर पसर गये
हालत देख कोरे कुर्ते की, दो आँसू भी लुड़क गए.

तभी धर दबोचा भैया, पा मौका हुड़दंगी टोली ने
पकड़ा हाथ पैर से उनको, पटका कीचड़ की नाली में.

हाए ये क्या गत बनाई, काहे गये तुम घर से बाहर
देख दशा मुसद्दी लाल की, बीबी बोली कुछ झल्लाकर.

ये कैसी होरी है भैया ,है ये कैसा त्योहार
सोच रहे पड़े बिस्तर पर अब श्री मुसद्दी लाल…

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