Enter your keyword

Monday, 27 April 2009

भीड़


कहने को तो ये भीड़ है
सड़कों पर कदम मिलाते लोगों का रेला
पर इसी मैं छिपी है संपूर्ण जिंदगी
विविध रंगों का यह थैला।

किसी के लिए चलती तो
किसी के लिए थमती
किसी के लिए आगाज़ भर
तो किसी के अंजाम तक पहुँचती।

आज़ किसी के पैरों को लग गये हैं पंख
कि नौकरी का आज़ पहला दिन है
पर बोझिल हैं किसी के कदम क़ि
वो आज़ बे घर- बे दर है.

नव उमंग से भरा कोई
इठलाता बलखाता है
कोई आँचल से पसीना पोंछ
बस यूँ ही चला जाता है

कोई योजना बना रहा है
आज़ के रोचक भोजन की
कोई चिंता मैं डूबा है कि
क्या नसीब होगी सुखी रोटी भी

कहने को तो ये भीड़ है
बस कुछ लोगों का रेला
पर इसी मैं शामिल है
जीवन के हर पहलू का मेला.

2 comments:

  1. bhai waah, kaayal ho gaye ham to aapke...kya likhti ho....commendable!!!! hope to see you more like this

    ReplyDelete
  2. wah!! ek ek pankti aankhon ke saamne sajeev lag rahi thi.....badhaai

    ReplyDelete

पसंदीदा पोस्ट्स

ईमेल से जुड़ें

संपर्क

Name

Email *

Message *