Enter your keyword

Monday, 27 April 2009

आजकल के हालात

होली के सच्चे रंग नही अब
यहाँ खून की है बौछार 
दीवाली पर फूल अनार नही अब
मानव बम की गूँजे आवाज़

ईद पर गले मिलते नही क्यों
गले काटते हैं अब लोग
क्रिसमस पर अब पेड़ नही
लाशों का ढेर सजाते लोग.

हो लोडी,ओडम या तीज़,बैशाखी
अब बजते हैं बस द्वेश राग
सस्ती राज़नीति मैं बिक गये
हमारे कीमती सब त्यौहार।

मेलों बाजारों की रौनकें अब
हो गईं खौफ से तार तार.
मुनियों के देश की बागडोर आई जब
स्वार्थी नेताओं के हाथ .

No comments:

Post a Comment

पसंदीदा पोस्ट्स

ईमेल से जुड़ें

संपर्क

Name

Email *

Message *