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Monday, 10 July 2017

सावन का वह सोमवार...

By On 16:55:00

लड़कियों का स्कूल हो तो सावन के पहले सोमवार पर पूरा नहीं तो आधा स्कूल तो व्रत में दिखता ही था. अपने स्कूल का भी यही हाल था. सावन के सोमवारों में गीले बाल और माथे पर टीका लगाए लडकियां गज़ब खूबसूरत लगती थीं. ऐसे में अपना व्रती न होना बड़ा कसकता था और फैशन में पीछे रह जाने जैसी ग्लानि होती थी वो अलग. 

आखिरकार एक बार हमने मम्मी से जिद्द करके एलान कर ही दिया कि हम भी सावन के ये सोमवार रखेंगे. आखिर भविष्य की जिंदगी का सवाल था. कहीं पता चला हमारे ही हिस्से कोई बचा खुचा आए. यूँ शिवजी से अपनी खासी बनती टाइप थी फिर भी कभी दिल पर ले लें वो और हो जाये अपना नुकसान. 

खैर मम्मी ने चेतावनी दी - सोच लो, रह लोगी? नमक नहीं खाते बिलकुल, मीठे पर रहना पड़ेगा. रात को भी सब्जी - वब्जी नहीं मिलेगी. बेसन के परांठे खाने पड़ेंगे चीनी पड़े दही के साथ. 
सुनकर एक बार को दिल धड़का, बोला - छोड़ न, ऐसा भी क्या है. बेकार का झमेला. फिर आत्मा ने कहा - अरे कुछ नहीं होगा. यूँ भी जन्माष्टमी, शिवरात्री के व्रत नहीं रखते क्या. और दो सही. हो जायेगा और आखिरकार हमें व्रत रखने की इजाजत मिल गई. 

मम्मी ने सुबह फल, दोपहर को घर की बनी नारियल, मींग की कतरी और रात से पहले दही चीनी के साथ बेसन के दो परांठे का मेन्यू सुना दिया. 

Image result for saawan ke somwar cartoonसोमवार आया, हम बड़े चाव से उस दिन खूब बाल गीले करके नहाये कि कहीं स्कूल जाते -जाते सूख न जाएँ. गीले बालों की ढीली ढीली चोटी बनाई, शिवजी को प्रणाम किया. कुछ फलों का नाश्ता किया, कुछ फल टिफिन में रखे और एक छोटा सा लाल टीका माथे पर लगा कर शान से, फैशन में शामिल होने का एहसास करते स्कूल आ गए. 

दोपहर को खाने की घंटी बजी तो झटाक से टिफिन खोला. उसमें केला, सेब और बर्फी देख याद आया कि ओह! आज तो व्रत है. याद तो नमकीन परांठे और अचार की भी आई पर उसे झटका और शांत भाव से किसी तरह एक केला गटका.

अब लंच के बाद की क्लासों में पेट गुड़ गुड़ करता रहा और हम उसे दिलासा देते रहे कि घर पहुँचते ही खाना मिलेगा. घर पहुँचते ही बस्ता फेंक, मम्मी को खाना लगाने को बोला। फटाक से हाथ धोकर प्लेट पर निगाह डाली. परांठा देखने में ठीक ठाक लग रहा था. पर एक कौर मीठे दही से खाते ही उबकाई आने लगी. हमने दही की कटोरी दूर खिसकाई और सिर्फ़ परांठा खाने की कोशिश की. परन्तु मुँह में जाने से पहले ही कौर बाहर आ गया और उसके साथ ही सुबह से खाए सारे फल भी. 
ये देख मम्मी का भाषण शुरू हो गया. कहा था नहीं रख पाओगी. स्कूल जाने वाले बच्चे ये सब करते हैं क्या ? जाओ अब मुँह धोकर आओ. 

हमारी समझ में आया कि हम बिना मीठे, बिना खट्टे , बिना कड़वे के पूरी जिंदगी रह सकते हैं पर बिना नमक के एक दिन भी नहीं रह सकते. भैया, जिंदगी और खाने - दोनों में नमक बेहद जरुरी है.
पर अब व्रत को पूरा न करने और भविष्य में खराब पति मिलने की चिंता सताने लगी. तभी मम्मी ने साक्षात् भगवान बनकर उबार लिया. उन्होंने तभी उद्द्यापन करा दिया और बोलीं - कोई बात नहीं बच्चों को सब माफ है. बस माफ़ी मांग लो शिवजी से. वे बड़े दयालु हैं. 
शिवजी ने भी सोचा होगा कि इस नकचढ़ी के हिसाब से कोई जुगाड़ना मुश्किल होगा, फिर गारंटी नहीं तो क्यों एक और व्रती का एहसान लिया जाए बेकार. सो उन्होंने किस्सा ही खत्म किया. 

हमने भी चैन की सांस ली. आखिर इनसब में हम मानते भी नहीं थे पर व्रत के बदले ऑफर अच्छा था तो इसलिए सोचा कि ट्राई करने में क्या बुरा है. पर ठीक है यार, जब जो होगा तब देखेंगे. 

खैर हमारी बाकी सहेलियां आगे तक के वर्षों में भी नियम से सावन के सोमवार रखती रहीं शायद उन्हें उनका फल भी मिला होगा पर तब से हमने बिना नमक के सोमवार करने से तौबा कर ली और साथ ही एक अच्छे पति की उम्मीद भी अपने मन से निकाल दी. 

यूँ भी सुना था पति नाम का जीव अच्छा या बुरा होता ही नहीं वह तो बस "पति" होता है. है न ? 
बेचारे शिवजी पर बेकार क्यों लोड डालना. 

Friday, 30 June 2017

नहीं मिलती...

By On 17:10:00
जाने किसने छिड़क दिया है तेज़ाब बादलों पर
कि बूंदों से अब तन को ठंडक नहीं मिलती. 

बरसने को तो बरसती है बरसात अब भी यूँही
पर मिट्टी को अब उससे तरुणाई नहीं मिलती.

खो गई है माहौल से सावन की वो नफासत,  
अब सीने में किसी के वो हिलोर नहीं मिलती.

अब न चाँद महकता हैन रात संवरती है
है कैसी यह सुबह जहाँ रौशनी नहीं मिलती. 

आशिक के दिल में भी अब कहाँ जज़्बात बसते हैं
सनम के आगोश में भी अब राहत नहीं मिलती. 

चलने लगी हैं जब से कीबोर्ड पर ये ऊँगलियाँ
शब्दों में भी अब वो सलाहियत नहीं मिलती.

खो गई है अदब से "शिखामोहब्बत इस कदर,
कि कागज़ पर भी अब वो स्याही नहीं मिलती.   
#हिन्दी_ब्लॉगिंग 

Wednesday, 28 June 2017

"प्रवासी पुत्र" एक संक्षिप्त टिप्पणी

By On 17:20:00
  
कुछ दिन पहले ही मुझे डाक से "प्रवासी पुत्र" (काव्य संग्रह) प्राप्त हुई है. कवर खोलते ही जो पन्ने पलटने शुरू किये तो एक के बाद एक कविता पढ़ती गई और एक ही बैठक में पूरी किताब पढ़ डाली. ऐसा नहीं कि किताब छोटी थी बल्कि उसकी कवितायें इतनी गहन और प्रभावी थीं कि पता ही नहीं चला कब एक के बाद दूसरी खुद को पढ़ा ले गई. 
यूँ यह काव्य संकलन पद्मेश जी की जीवनी सा लगता है. लगभग सारी ही कवितायें उनके व्यक्तित्व या उनके जीवन के खट्टे- मीठे,कड़वे अनुभवों की परतें खोलती सी लगती हैं और रही सही कसर इस किताब पर श्री अनिल शर्मा जी की लिखी भूमिका पूरी कर देती है. 
पद्मेश जी के व्यक्तित्व की संवेदनशीलताविनम्रता और बड़प्पन सभी इन कविताओं में सहज दृष्टिगोचर होता है. 
वर्ना हर कोई यह लिख सकता है भला -
"मुझे 
सीढ़ी बनाने वालो 
मैं उस धातु का बना हूँ 
जब तुम गिरोगे
बैसाखी हो जाऊंगा" (बैसाखी)

पिछले ही दिनों पद्मेश जी को भारत के राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी द्वारा 'पद्मभूषण डॉ मोटूरि सत्यनारायण पुरस्कार' प्राप्त हुआ और तभी प्रवासी पुत्र का प्रकाशन भी हुआ. न जाने कब से इसका प्रकाशन होना टल रहा होगा. क्योंकि पद्मेश जी वह इंसान हैं जो अपने गुणों का कभी ढिंढोरा पीटते नजर नहीं आते. वह चुपचाप अपना काम करते हैं और यदि अनुभव कड़वे होने लगते हैं तो चुपचाप खुद को उससे दूर कर लेते हैं. 
मुझे ब्रिटेन के हिन्दी तबके में घूमते करीब 5-6 साल हो गए परन्तु मैंने उनकी कवितायें मुश्किल से दो बार किसी आयोजन में सुनी और हैरान रह गई. कैसे हर पंक्ति इतनी गहरी हैकैसे इतनी सहजफिर भी इतनी प्रभावी. छोटी छोटी कवितायें हर पंक्ति पर वाह और आह की दरकार करतीं. परन्तु पद्मेश जी उन्हें ऐसे सुनाते जैसे पानी बहा जा रहा हो. 

"बर्लिन दिवार का टूटा हुआ पत्थर 
कल मुझसे बोला 
मुझे इतनी घृणा से मत देखो 
मेरे ज़ख्म 
इतिहास के घाव के मरहम हैं 
मैं तो तुम्हारी 
हर धार हर चुभन 
सहने को तैयार था 
तुम मुझे तराश कर ईसा भी बना सकते थे."(बर्लिन दिवार)

मेरी पद्मेश जी से पहली मुलाक़ात करीब छ: साल पहले लन्दन के नेहरु सेंटर में एक आयोजन के दौरान हुई थी. जहाँ मैं एक मित्र के साथ एक मेहमान के तौर पर गई थी जो कि वहाँ उस आयोजन में भाग लेने वाला था.उसने ही दूर से इशारा करते हुए बताया था कि वह पद्मेश जी हैं. हिन्दी समिति और पुरवाई के कर्ता- धर्ता. एक सरलशालीन सा व्यक्ति - जो बाकी लोगों के मिलने- मिलाने और फोटो शेषन से इतर आयोजन की व्यवस्थाओं में बड़ी तल्लीनता से लगा हुआ था. मैं स्वभाव से अंतर्मुखी हूँ खासकर सामने से जाकर परिचय करने में झिझकती हूँ अत: मैंने "अच्छा" कहा और बिना प्रत्यक्ष परिचय हुए बात खत्म हो गई. 
फिर दूसरे दिन उनका एक मेल मिलाजिसमें उन्होंने बड़े ही संयत शब्दों में मुझे उस आयोजन की बेहतरीन रिपोर्ट लिखने की बधाई दी. फिर आने वाले कुछ कार्यक्रमों में यूँ ही अभिवादन तक सिमित कुछ मुलाकातें और हुईं. 
फिर एक दिन अचानक उनका फोन आया और उन्होंने मुझे लन्दन में होने वाले हिन्दी सम्मेलन के एक सत्र के संचालन की बागडोर थमा दी. मुझे स्टेज पर चढ़े और कुछ बोले जमाना हो गया था और संचालन तो कभी स्कूल में भी नहीं किया था. परन्तु उन्होंने बड़े विश्वास से कहा...अरे कुछ नहीं करना होताआप कर लेंगी और फिर हम हैं न. एक एकदम नए नए साहित्य के रंगरूट पर इतना विश्वास कोई उन जैसा ही बड़े व्यक्तित्व वाला इंसान कर सकता था. और फिर उसी बड़प्पन से कार्यक्रम के बाद वे बोले - देखा मैंने कहा था न आप कर लेंगी और बढ़िया करेंगी. 
 कुछ समय बाद अचानक उनका किसी भी साहित्यिक गोष्ठी या आयोजन में दिखना बंद हो गया. फिर एक दिन उन्होंने हिन्दी समिति भी शिक्षिकाओं के हाथ सौंप दी. मैंने कारण पूछा तो बड़ी सहजता से मुस्कुराकर बोले…"बस बहुत कर लियाअब कुछ और करते हैंये आप लोग संभालो अब". मुझे समझ में आया कि क्यों लोग उन्हें एक कुशल वक्ता कहते हैं. उनके बारे में उनके दोस्त कहते हैं कि वह "भाड़ में जाओ" भी ऐसे बोलेंगे कि सामने वाला उत्सुक हो उठेगा भाड़ में जाने के लिए. 
खैर साहित्यिक आयोजन से विमुखता के बाद भी हिन्दी समिति की बच्चों की प्रतियोगिता में साल में दो बार उनसे मुलाकात होती रही.
फिर आखिरकार पिछले दिनों राष्ट्रपति से मिले सम्मान और उसके साथ में मिली लोगों की प्रतिक्रियाओं ने उन्हें फिर से साहित्य जगत में सक्रीय होने के लिए विवश कर दिया. 
हिन्दी का सच्चा भक्त एक बार फिर से अपनी सेवा देने के लिए तैयार हो गया है और इस प्रवासी पुत्र ने एक बार फिर अपनी जिम्मेदारियों को निभाने की ठान ली है. ब्रिटेन के हिन्दी समाज के लिए यह एक बेहद सुखद और उत्साहवर्धक सूचना है.
जैसा कि वह स्वयं एक कविता में कहते हैं -

"नहीं जानता मैं 
कौन से रास्ते पर जा रहा हूँ 
लेकिन 
तुम तक पहुँचूँगा ज़रूर 
क्योंकि 
निकल पड़ा हूँ मैं !" (संकल्प)
  


हिन्दी समिति द्वारा आयोजित बच्चों की एक प्रतियोगिता के दौरान मैं और पद्मेश जी.
       

Monday, 29 May 2017

नंबर रेस का औचित्य?

By On 17:29:00
10वीं 12वीं का रिजल्ट आया. किसी भी बच्चे के 90% से कम अंक सुनने में नहीं आये. पर इतने पर भी न बच्चा संतुष्ट है न उनके माता पिता। इसके साथ ही सुनने में आया पिछड़ी पीढ़ी का आलाप कि हमारे जमाने में तो इसके आधे भी आते थे तो लड्डू बांटते थे. 
यह मुझे कुछ ऐसा ही लगता है जैसे हमारे माता -पिता हमें जेब खर्च देते हुए कहा करते थे - " हमें पांच पैसे मिलते थे रोज स्कूल जाते समय, वे काफी होते थे और अब तुम लोगों को पांच रुपये में भी शिकायत है" 
तब बच्चों का जबाब यही हुआ करता था कि तब उन पांच पैसे में आपकी इच्छा पूर्ती हो जाती थी. आप जो चाहते थे वह उनसे पाया जा सकता था. परन्तु अब पांच रुपये में कुछ भी नहीं आता.
तो क्या यही स्थिति शिक्षा की हो गई है. मुद्रा की गिरावट की तरह ही शिक्षा का स्तर भी गिरा है. क्योंकि तब पास होने वाला बच्चा भी अपना मकसद पा जाता था. पहली श्रेणी में पास होने वाला अपनी पसंद का संस्थान और विषय पा जाता था. परन्तु अब 90% वाले को भी न तो इच्छित विषय मिलता न संस्थान और नौकरी की तो खैर बात ही छोड़ दो.
अब सवाल यह उठता है कि -
इन नंबरों की भरमार में क्या ज्ञान भी उतना ही है?
यह 90% उन 60% से कितने बेहतर हैं?
यदि बेहतर हैं तो फिर उन्हें वह क्यों नहीं मिलता जिसके वे लायक हैं ?
और यदि बेहतर नहीं हैं तो नंबरों की इस रेस का मतलब क्या है?
क्योंकि यह तो पक्का है कि अब के बच्चे पहले के बच्चों के मुकाबले मेहनत बहुत अधिक करते हैं. हड्डियां गलाकर थोक में नंबर लाते हैं. परन्तु फिर भी नतीजा कुछ नहीं निकलता। आखिर क्यों ?
बच्चों में बढ़ता तनाव, अवसाद, असंतोष और ये नंबरों की दौड़ से उत्पन्न आत्महत्या की प्रवर्ति इन सबकी जिम्मेदार है हमारी शिक्षा व्यवस्था.
हम ले दे कर माता पिता पर इसका सारा दोष मढ़ देते हैं कि वे बच्चों पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं. या वे अपने सपनो कि पूर्ती अपने बच्चों के माध्यम से चाहते हैं. पर क्या वाकई माता - पिता का इतना दोष है? क्या वे इस व्यवस्था के अनुसार चलने के लिए मजबूर नहीं हैं? आखिर किस माता - पिता को शौक होता है अपने बच्चों पर बोझा लादने का. हर इंसान अपने बच्चे का सुनहरा भविष्य चाहता है और उसके लिए उससे जो भी बन पड़ता है वह करता है. फिर कमी कहाँ हैं ? समस्या क्या है ? 
समस्या हमारी शिक्षा व्यवस्था की जड़ में ही है. नर्सरी में दाखिले से लेकर कॉलेज के दाखिले तक मची हुई भागम भाग की है. जरूरत इस गल चुकी शिक्षा व्यवस्था को जड़ से उखाड कर दूसरी रोपने की है. 
वर्ना अपने बेहतर समाज के लिए जिन संस्थानों से हम सुनहरे भविष्य के लिए सोना निकालना चाहते हैं वहाँ से सोने का पानी चढ़ा हुआ तांबा ही मिलेगा।  

Wednesday, 17 May 2017

"शौर्य गाथाएँ" (पुस्तक परिचय)

By On 11:27:00

शौर्य गाथाएँ - जैसा कि शीर्षक से ही अंदाजा हो जाता है कि यह संकलन वीरों के पराक्रम और त्याग की कहानियों से भरा होगा. यह संग्रह पिटारा है उन रणबांकुरों  के जीवन की सच्ची कहानियों काजो अपने घर - परिवारसुख - सुविधाओं और यहाँ तक कि अपनी जान की भी तिलांजलि देकर डटे रहते हैं सीमा और रणक्षेत्रों पर कि उनके देश परउनकी मातृ भूमि पर कोई आंच न आने पाए. 
शशि पाधा जी की यह पुस्तक उनके जीवन के संस्मरण ही नहीं हैं बल्कि इतिहास के जीवित दस्तावेज हैं जिनका साहित्यिक महत्व भले ही कम हो परन्तु सामाजिक महत्व अतुलनीय है. 
ये वे किस्से हैं जिन्हें देश के हर नागरिक को पढ़ना और भावी नागरिकों को पढाना चाहिए.
पुस्तक की लेखिका स्वयं एक सेनानी की पत्नीमाँ और बहू रही हैं. उन्होंने सैनिकों का जीवन बेहद करीब से देखा है. उन्होंने सैनिको को अपने परिवार से दूरउनके सुख दुःख में हँसते - रोते भी देखा है और सब कुछ भुलाकर अपना कर्तव्य निभाते भी देखा है. लेखिका जानती है कि वे सैनिक जिन्हें हम और आप एक सजग और जान पर खेल जाने वाले उत्साही जवान के रूप में देखते हैं वे भी एक इंसान हैं और एक आम जीवन के सुख - दुःख और खुशियों में वे भी ऐसे ही व्यवहार करते हैं जैसे कि कोई आम नागरिक करता है. लेखिका के खुद के ही शब्दों में -
"मैंने कई वर्षों तक वीर सेनानियों को हर परिस्थिति हर रूप में देखा है. शांतिकाल में पुष्प की तरह कोमल हृदय रखने वालेधर्म स्थल पर ईश भजन करने वालेसांस्कृतिक कार्यक्रमों में बड़े उत्साह के साथ हंसी दिल्लगी करने वाले ये सेनानी शत्रु की आहट पाते ही सजग और पराक्रमी प्रहरी का रूप धारण कर लेते हैं. उस समय देश की रक्षा उनका परम लक्ष्य होता है".
यही परिलक्षित होता है इस संकलन की पहली गाथा - संत सिपाही में - जहाँ एक कैप्टन अरुण जसरोटिया (अशोक चक्र )भारतीय सेना के सेनाध्यक्ष के चीफ सिक्युरिटी ऑफिसर जैसे महत्वपूर्ण पद मिलने के बाद भी कहते हैं कि वह अपने साथियों के साथ सीमा पर चल रहे अभियान में हिस्सा लेना चाहते हैं और वे विनती करते हैं कि सेनाध्यक्ष की सुरक्षा के लिए किसी और का नाम प्रेषित कर दिया जाए. दो साल की शांतिपूर्ण नौकरी को ठोकर मार कर कैप्टन अरुण सीमा पर जाकर अपने साथियों के साथ लड़ना चाहते हैं और मिसाल कायम करते हैं कि एक सैनिक के लिए देश रक्षा से बड़ा कोई कर्तव्य नहीं है और वे कर्तव्य परायणता निभाते हुए अपना सर्वस्व निछावर कर देते हैं.
लेखिका के ये संस्मरण सैनिकों के शौर्य और बलिदान की कहानी तो कहते ही हैं उनके अंदर के मानव और मानवीय संवेदनाओं को भी उजागर करते हैं. सैनिकों के परिवार अपने बेटेभाईपति को खो देते हैं उसका गहन दुःख या उनकी शारीरिकमानसिक क्षति में उनकी सेवा करते हुए अकेले पड़कर भी देश भक्ति की भावनाओं से भरे रहते हैं. वे दुखी होते हैंअकेले पड़ जाते हैं. उनके स्वजनों का बलिदान गुमनामी के अंधेरों में खो जाता है परन्तु फिर भी उनके देश के प्रति कर्तव्य और त्याग की भावना या उत्साह में कहीं कोई कमी नहीं आती. लेखिका ने बेहद मार्मिक और सटीक शब्दों में इन वाकयों और भावनाओं का वर्णन किया है. 
जब एक सैनिक युद्ध करता है तो वह अकेला संघर्ष नहीं करताउसके साथ उसका पूरा परिवार लड़ रहा होता है. युद्ध के बाद पूरे देश में शांति काल होता हैसब कुछ सामान्य होता है. परन्तु इन सैनिको का जीवन या उनके परिवार के लोगों का संघर्ष जारी रहता है. 
इन संस्मरणों के अधिकाँश नायकों और पात्रों को लेखिका व्यक्तिगत रूप से जानती थीं. उन्होंने इनके परिवारों से संपर्क कियाउनसे मिली बातचीत की और उनके दुःख में एक पारिवारिक सदस्य की तरह शरीक होकर उनके दर्द को एक -एक पन्ने में बेहद संवेदनशीलता से व्यक्त किया है. 
शौर्य गाथाएं - संग्रह में १७ अध्याय हैं जिनमें भारतीय सेना के वीरों के त्याग, बलिदानपराक्रम और वीरता की गाथाएं भरी पड़ी हैं. 
सांझा रिश्ता में लांस नायक रमेश खजुरिया (शौर्य चक्र) के बलिदान और शौर्य के साथ लेखिका ने उसके पारिवारिक अपनत्व का भी प्रभावी वर्णन किया है. स्पेशल फोर्सेस के कमान अधिकारी की सुरक्षा गार्ड टीम में नियुक्ति के कारण उनके परिवार से उसकी घनिष्टता हो गई थी फिर वह शहर को आतंवादियों से बचाने के अभियान में शामिल हो गया और अपने प्राणों की आहुति दे दी. लेखिका जब रमेश के परिवार से मिलने गई तो वीर सैनिक की माँ का दर्द कुछ इस तरह फूटता है और लेखिका की कलम से निकल पड़ता है.  
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"अचानक रमेश की माँ ने मेरे पास आकर धीमे से मेरा हाथ पकड़कर मुझसे पूछा, 'मेमसाबजीआखिरी बार आपने उसे कब देखा था?' मैंने कहा 'जब वह साहब के साथ गाड़ी में बैठने लगा था. अंतिम समय में हमारे साहब रमेश के पास ही थे'. वह कुछ देर मेरी ओर यूँ देखती रही मानो मेरी आँखों में अपने बेटे के अंतिम क्षण टटोल रही हो. जैसे ही मैं जाने को मुड़ीवह कसकर मेरे गले लग गई.बस इतना बोली "मेमसाबजीअज्ज मैं अपने बेटे कन्ने मिल ली'.... "
परम्परा - यह संस्मरण बेहद मार्मिक है बेहद अद्भुत. युद्ध में सिर्फ सैनिकों की जान ही नहीं जाती बल्कि बहुत से सैनिक घायल भी होते हैं. उनकी शारीरिक और फिर मानसिक क्षति को वे ही नहीं उनके परिवार वाले भी सहन करते हैं और उसी के साथ उन्हें अपना बाकी जीवन भी बिताना होता है. एक गंभीर रूप से घायल सैनिक - जगपाल सिंह (कीर्ति चक्र) की अवस्थामन:स्थिति और उसकी पत्नी की अवस्था का मार्मिक चित्रण है इस संस्मरण में - 
"वह बहुत शांत मुद्रा में खड़ी चुपचाप अपने पैरो के अँगूठे से फर्श पर कुछ कुरेद रही थी । शायद अपने मन की पीड़ा धरती की छाती पर उकेर रही थी" ।
लेखिका ने सैनिक की पत्नी की मौन पीड़ा को भावपूर्ण शब्दों में व्यक्त किया है.
जगपाल सिंह की दोनों टांगों में प्लास्टर बंधा था और उसकी आँखें पूर्णत: चली गईं थीइसके वावजूद भी उनकी पत्नी का लेखिका से कहना कि आप इन्हें हौसला दें मैं ठीक हूँये साथ हैं तो हम मिलकर जीवन जी लेंगे. सैनिकों के परिवार वालों के हौसलों और कर्तव्य निष्ठा की मिसाल दर्शाते हैं.
एक और अभिमन्यु (कैप्टन सुशील खजुरियाकीर्ति चक्र) - गाथा है उस जांबाज सैनिक कीजिसके परिवार में उसके बड़े भाई और पिता भी फ़ौज में थे और माता पिता के आग्रह के बावजूद उसने भी फ़ौज में जाने की ही जिद की. इस गाथा में एक परिवार के देश के प्रति समर्पण और बलिदान के साथ एक और प्रश्न उभर कर आता है कि देश ने उनके लिए क्या किया ?
जब लेखिका प्रश्न करती है कि क्या राज्य सरकार ने सैनिक की स्मृति में कुछ किया ? तो निराश पिता जबाब देते हैं कि चीफ मिनिस्टर का फोन तक नहीं आया. ऐसे में कभी कभी ये ख्याल आता है कि क्यों? किसके लिए ?” एक सैनिक परिवार में इस तरह का ख्याल आना उस देश और उसके नागरिकों के लिए सबसे अधिक शर्म और निराशा की बात हो सकती है परन्तु उस परिवार के लोगों में देश के प्रति कर्तव्य में कहीं कोई कोताही नहीं दिखाई पड़ती. भाई के बलिदान के बाद भी उनकी छोटी बेटी ने फ़ौज की ही नौकरी स्वीकार की और उनकी माँ अपने परिवार के लिए रोज शाम को गायत्री मन्त्र का जाप करती हैं.

अपनों से दूर जहाँ हमेशा प्राण संकट में हों, तब कहीं कोई श्रृद्धा, विश्वास, शक्ति ऐसी हो जहाँ से सैनिकों को सकारात्मक ऊर्जा मिलती रहे ऐसे में धर्म, प्रार्थना का सहारा और विश्वास भी शायद संबल होता है. कहानी अखंड ज्योति में भी लेखिका ने कुछ ऐसा ही वर्णन किया है जहाँ नायक सूरज भान की प्राण रक्षा हेतु उसके साथी मंदिर में अखंड ज्योति जलाते हैं, प्रार्थना करते हैं.
संग्रह में युद्ध क्षेत्र में वीरों के पराक्रम की कहानियां ही नहीं सैनिकों के युद्ध क्षेत्र से अलग व्यक्तिगत जीवन में व्यवहार और त्याग की कहानियाँ भी हैं. जिन रिश्तों और उनमें अपनत्व को लेखिका ने वर्षों तक देखा और जिया उनके पलों और वाकयों को शशि पाधा ने बहुत प्रभावी ढंग से बयाँ किया है.
शाश्वत गाथा के नायक मेजर सुधीर कुमार वालिया युद्ध क्षेत्र में नहीं बल्कि छुट्टी पर जाते हुए एक नागरिक को बचाने में बुरी तरह जख्मी हुए. लगभग पूरी तरह जल गए शरीर की पीड़ा उसमें भी साहस और सहन शक्ति का लेखिका ने बहुत मार्मिक वर्णन किया है. तब मेजर का ध्यान उनके परिवार की अनुपस्थिति में कैसे उनके साथी और उनका परिवार रखते हैं यह बताते हुए लेखिका फ़ौज के परिवार के अलावा एक और वृहद परिवार की भूमिका बताती हैं. शौर्य गाथाओं के साथ सैनिकों के परिवार पर उनके शहीद होने के बाद आने वाली कठिनाइयों और सामाजिक प्रथाओं का कैसे प्रभाव पड़ता है इसकी भी लेखिका ने बहुत सूक्ष्मता से पड़ताल की है.
प्रथा कुप्रथा नमक कहानी में एक सैनिक की विधवा को चादर डालने की प्रथा के तहत किसी और के साथ विवाह करने के लिए बाध्य किये जाने पर कैसे वह पत्नी उसका विरोध करती है और स्वालम्बी बनती है इसका वर्णन करते हुए लेखिका सामाजिक कुरीतियों के प्रति एक स्त्री की लड़ाई की व्याख्या भी करती है. सेना के सैनिक ही नहीं उनकी भार्या भी उतनी ही साहसी होती है और हर सामाजिक कुरीति से लड़ना जानती है.
अपना अपना युद्ध – में अपने स्वजनों को युद्ध क्षेत्र के लिए विदा करते हुए परिवार की मनस्थिति का वर्णन है. कैसे अपने मन को समझाने के लिए, सामान्य जीवन जीने के लिए और चिंता मुक्त रहने के लिए विभिन्न गतिविधियों द्वारा कोशिश की जाती है और कैसे एक सैनिक की पत्नी स्वयं को, अपने बच्चों को संभालने के लिए संघर्ष करती है, इस पर ध्यान आकर्षित करते हुए लेखिका कहती है  अगर सैनिक शूरवीर होते हैं तो उनकी पत्नियाँ किसी वीरांगना से कम नहींयुद्ध का सामना तो दोनों को करना पड़ता है| अंतर केवल इतना है कि दोनों का अपना -अपना युद्ध क्षेत्र होता है|”
विजय स्मारिका संस्मरण मेजर मोहित शर्मा, अशोक चक्र के बलिदान और उनकी पत्नी मेजर रिश्मा के साहस की वीर गाथा है. रिश्मा का समारोह में रखी ट्रोफी को स्पर्श करना किसी का भी मन भिगो सकता है.
शायद कभी’ एक बेहद मार्मिक संस्मरण है। 3 दिसम्बर, 1971 को लड़ाई शुरू हो गई। भीषण युद्ध के कारण कैप्टन मलिक अपनी पत्नी से भी नहीं मिल सके. वे चार दिसम्बर को ही शहीद हो गए। कमांडो यूनिट के साथ काम करने आए कैप्टन मलिक की नई-नई शादी हुई थी।

विदाई - में भी एक पत्नी के संघर्ष की कहानी है. सैनिकों के परिवार के जीवन और स्वजनों के प्राणों के संकट के बीच उनकी मनोदशा की और ध्यान कराती इस कहानी में जब लेखिका को एक सेनानी की पत्नी को उसके पति के न रहने की खबर देने जाना होता है उस दर्द और स्थिति का वर्णन करते हुए लेखिका कहती हैं-  “हमने कलश ऐसे गोद में संभाल कर पकडे हुए थे कि उन्हें कहीं चोट न लग जाए वहीँ मृत सैनिक की पत्नी जब वह कहती हैं कि प्रभा हरपाल को विदा करो तब एक पत्नी के दर्द को बयाँ करते हुए वह लिखती हैं प्रभा ने कलश के अंदर से कुछ रज मुट्ठी में भरी और अपने गुलाबी आँचल के छोर में बाँध ली कुछ कदम पीछे हट कर वो फिर से कलश के गले लग गई मानो हरपाल के गले लग रही हो
तोलालोंग के रणघोष मेजर अजय जसरोटिया के आतंकवादियों से संघर्ष में बलिदान की शौर्यगाथा है।
बलिदान – ऐसा संस्मरण है जो यह बताता है कि सेना में मनुष्य सैनिक ही नहीं एक बेजुबान मासूम मोती भी अपना कर्तव्य निभाता है और अपने साथियों की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे देता है.
अन्तिम संस्मरण एक नदी एक पुल में युद्ध की विभीषिका को देखते हुए भी उसकी आवश्यकता पर विचार किया गया है. सीमा पर सुरक्षा जरुरी है उसके लिए सेना की आवश्यकता है. परन्तु इन सबमें देश के आतंरिक अनुशासन की भी आवश्यकता है. आखिर कब तक युद्ध चलाये जा सकते हैं.
इस संग्रह में शौर्यगाथाएं तो हैं ही सेना के नियम, कानून और तरीकों पर भी लेखिका प्रकाश डालती चलती है.
इन गाथाओं में ऐसे अनगिनत क्षण आते हैं जब कभी पाठक की आँखें गीली होती हैं तो कभी रौंगटे खड़े हो जाते हैं. कभी मन उत्साह और जोश से उछलने लगता है तो कभी शहीदों के परिवार जन के बारे में सोच कर मन करुणा से भर जाता है. एक संस्मरण में मेजर सुधीर वालिया के पिता एक इंटरव्यू में कहते हैं – “ मैंने तो उसे ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाया था, पहाड़ियाँ चढना तो वह स्वयं ही सीख गया”. एक सैनिक को सैनिक बनाने में फ़ौज का ही नहीं उसके परिवार, अध्यापक और समाज का भी योगदान होता है. नागरिकों का प्यार और संवेदनशीलता उसकी शक्ति होती है. ऐसे में आवश्यक है कि हम एक नागरिक के तौर पर सैनिकों की भावनाओं और उनके परिवार का ध्यान रखें जो हमारी सुरक्षा की खातिर अपनी जान हथेली पर लिए घूमते हैं.
शशि पाधा के इस संग्रह के ये संस्मरण स्कूलों में पाठ्क्रम में पढाए जाने चाहिए. हमारे भावी नागरिकों को पता होना चाहिए कि जिन देश भक्ति के गीतों को वह बड़े जोश के साथ अपने स्कूलों में गाते हैं उन्हें सरहद पर कोई जीता भी है और उनका भी एक हम और आप जैसा एक परिवार होता है. 
पुस्तक लेखिका - पाधा शशि
शौर्य गाथाएँ
प्रभात प्रकाशन, दिल्ली. 2016



    

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