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Thursday, 9 February 2017

अपना भविष्य अपने हाथ...

By On 17:34:00
“महिला लेखन की चुनौतियाँ और संभावना”
महिला लेखन की चुनौतियां - कहाँ से शुरू होती हैं और कहाँ खत्म होंगी कहना बेहद मुश्किल है. एक स्त्री जब लिखना शुरू करती है तब उसकी सबसे पहली लड़ाई अपने घर से शुरू होती है. उसके अपने परिवार के लोग उसकी सबसे पहली बाधा बनते हैं. और उसकी घरेलू जिम्मेदारियां और कंडीशनिंग उसकी कमजोरी।
क्या बेकार का काम करती रहती हो, क्या मिलता है / क्या मिलेगा इससे, समय खराब करती हो, आदि तानो से गुजर कर एक स्त्री लिखने बैठती है तो अपना सब कुछ अपने लेखन में झोंक देना चाहती है. तमाम भावनाओं और संघर्षों से भरा हुआ उसका लेखन ज़रा बाहर निकलता है तो सामना करता है "फूल पत्ती" लेखन का. उसपर अगम्भीर लेखन के ठप्पा लगाए जाने की साजिशें शुरू हो जाती हैं. आखिर औरत है,  क्या लिखेंगी, कविता, उसमें भी वही फूल पत्ती, प्रकृति या ज्यादा से ज्यादा प्रेम -विरह। यहाँ तक कि उनके हर लिखे हुए को उनके परिवार या व्यक्तिगत जीवन से जोड़ देना भी आम बात है. 
द गार्डियन में लेखिका जोआना वाल्श कहती हैं कि यह सच्चाई सार्वभौमिक है और VIDA (समकालीन साहित्यिक संस्कृति में समकालीन महिलाओं के लेखन और लैंगिक समानता के मुद्दों पर एक अनुसंधान संचालित संगठन) ने भी इसकी पुष्टि की है कि यद्यपि महिलायें पुरुषों से अधिक पढ़ती हैं और महिलाओं के लेखन को छापा भी जाता है फिर भी उन्हें बहुत आसानी से नजरअंदाज कर दिया जाता है. साहित्यिक पत्रिकाओं में उनके लेखन की समीक्षा हो या वे एक समीक्षक के रूप में या फिर एक अनुवादक के रूप में हों, उनकी उपस्थिति बहुत कम है. 
सवाल यह भी नहीं कि महिला लेखकों को कम छापा जाता है. सवाल यह है कि उन्हें किस तरह छापा जाता है. क्या वाकई पुरुष ऐसा अधिक लिखते हैं जिसे साहित्यिक क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण माना जाता है ? या यह सिर्फ एक धारणा है. 
इन सब साजिशों से गुजरते हुए वह अपना लेखन जारी रखती है. तब उसके आड़े आता है उसका औरत होना। उसकी तमाम प्रतिभा, अनुभव, और लेखन को "अरे महिला है न इसलिए" की परिधि में धकेल दिया जाता है. उस पर यदि वह थोड़ा बहुत देखने में ठीक है तो फिर उसकी सारी प्रतिभा और स्किल उसकी  सुंदरता में विलीन कर दिए जाते हैं. उसकी हर सफलता का कारण उसका औरत होना और उसपर खूबसूरत होना करार दिया जाने लगता है.
इस सारी बाधा दौड़ में कुछ खुशकिस्मत महिलायें ही होती हैं जो पूरे ज़ज़्बे और निश्चय के साथ बढ़ती रहती हैं और तमाम चुनौतियों के बावजूद जब वह लिखती हैं तो वह लेखन उनके अनुभवों से पका हुआ और भावप्रणव होता है. उस लेखन में उनके अपनी नहीं आस पास के परिवेश और समाज की समस्यायों और तकलीफों का संवेदनशील वर्णन होता है. वह आग होती है जिसमें वह स्वयं तप कर निकली है. एक गहरा अवलोकन होता है जो प्रभावशाली होता है. महिला लेखन में मौलिकता की सबसे अधिक संभावनाएं नजर आती हैं. इतनी मुश्किलों के बाद जब एक महिला लिखती है तो बिंदास, दिल खोलकर, निस्वार्थ लिखती है. उसकी अभिव्यक्ति पर फिर कोई पहरा नहीं काम करता, उसे किसी की तालियों एवं तानो की परवाह फिर नहीं होती। वह लिखती है, और बस लिखती है. अभिव्यक्त करती है खुद को. 
वह वही लिखती है जो उसने अनुभव किया होता है. जो उसने अपने आसपास होते देखा है. यह भी सच है कि घर गृहस्थी की परिधि में बंधी स्त्री वहीं की समस्यायों को ही लिखेगी। परन्तु यदि उसे अपने लेखन को पहचान दिलानी है तो उसे अपना दायरा बढ़ाना होगा। घर, सास, पति, बच्चों की समस्याओं से परे वृहद रूप में साहित्य रचना होगा तभी वह लेखन की दुनिया में अपना कोई मकाम बना पायेगी। वह अपनी ही बनाईं हुईं परिधि में कैद हैं, अपने आप को समाज की नजर से देखती है और सीमाओं में बंध जाती हैं. लेखन उनकी पहली प्राथमिकता नहीं बन पाता। घर, रिश्ते, परिवार से जब समय मिलता है तब वह उसके लेखन को मिल जाता है. 
उन्हें इस महिलावादी खोल से खुद ही निकलना होगा। पहले उन्हें कायदे से लिखना होगा तभी वह कोई मांग रख सकती हैं. स्त्री घर में बैठकर सोशल मीडिया में चयनात्मक नारीवादी विषयों पर लिखकर खुश है और वहीँ पुरुष लेखक, साहित्य लिखकर पुरस्कार जीतते हैं. लेखिकाओं को अपने ही कवच से निकलना होगा। एक्स्प्लोर करना होगा, लेखन को शौकिया गतिविधि और स्वांत सुखाय से हटा कर एक कैरियर की तरह लेना होगा। 
उसके सामने चुनौती है शोध की. अधिकांशत: शोध इंटरनेट तक सीमित है.कितनी लेखिकाएं हैं जो जमीनी तौर पर शोध करके लिखती हैं? कितनी लेखिकाएं हैं जो लिखने के लिए कुछ अधिक प्रयास करती हैं, कुछ एक्स्ट्रा माइल जाती हैं, अपने कम्फर्ट जोन से निकलती हैं, भ्रमण करती हैं, अकेले दुनिया देखने, समझने निकलती हैं?  कितनी महिलायें हैं जो अर्थशास्त्र, विज्ञान जैसे विषयों का चयन लेखन के लिए करती हैं. और फिर वे वह लिखती है जो पाठक पढ़ना चाहता है. जिसका सामाजिक और साहित्यिक महत्त्व है. 
हालात बदल रहे हैं. बहुत सी लेखिकाओं ने यह दायरा तोड़ा है और जम कर हर विषय पर लिख रही हैं. पर अभी बहुत कुछ बदलना बाकी है. यह दौर बदलाव का है. जैसे - जैसे समाज में महिलाओं की स्थिति बदलेगी वैसे वैसे महिलाओं के लेखन की सम्भावनाएं भी बनेंगीं। समाज में अभी महिलायें समान हक़ के लिए, समान सम्मान के लिए संघर्ष कर रही हैं.अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं. सोशल मीडिया ने महिलाओं के लिए लेखन के अवसरों के द्वार खोले हैं. सोशल मीडिया के आने से वे महिलायें भी लिख रही हैं जो लेखिका नहीं है । कोई मल्टीनेशनल में काम करती है, कोई गायिका है, कोई हाउस वाइफ है तो कोई कुछ और पर उनके पास कहने को बहुत कुछ है। वे कहना चाहती हैं इसलिए लिखती हैं. उनके पास ताजगी है, शिक्षा है, संसाधन है और कुछ करने की, आगे बढ़ने की सोच है. इससे महिला लेखन की संभावनाएं बढ़ती हैं। बहुत सा ऐसा लेखन सामने आता है जो अब तक नहीं आया। एक मौलिकता, एक तरह का ताजापन और विद्वता की संभावनाएं दिखाई पड़ती हैं।
एक महिला लेखिका का भविष्य खुद उसके अपने हाथों में निहित है.


    (* इस पुस्तक में प्रकाशित आलेख )

Sunday, 5 February 2017

एक पाती उस पार...

By On 23:57:00
पता है; पूरे 18 साल होने को आये. एक पूरी पीढ़ी जवान हो गई. लोग कहते हैं दुनिया बदल गई. पर आपको तो ऊपर से साफ़ नजर आता होगा न. लगता है कुछ बदला है ? हाँ कुछ सरकारें बदल गईं, कुछ हालात बदल गए. पर मानसिकता कहाँ बदली ? न सोच बदली

आप होते तो यह देखकर कितने खुश होते न कि लड़कियां आत्म निर्भर होने लगीं हैं पर अच्छा है जो आप नहीं हैं, क्योंकि फिर दुखी भी होते कि इसके वावजूद भी कितनी बेबस और मजबूर महसूस करती हैं. आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर तो हो गईं पर आज भी अपने फैसले कहाँ खुद ले पातीं हैं, दुहरी, तिहरी जिम्मेदारियों के अतिरिक्त बोझ और बंदिश के डर से विवाह करने में भी डरतीं हैं अब. 

मैं सोचती हूँ आजकल कई बार. आप आज किस खेमे में होते ? राष्ट्रवादी या प्रगतिशील ? क्योंकि आप तो
परम्पराओं के भी समर्थक थे और प्रगतिशीलता के भी. कितना मुश्किल होता न आपके लिए आज का यह माहौल? या नहीं शायद। आप तो कह देते कि 'क्या फ़ालतू सोचते रहते हो तुम लोग. अपना काम करो और बाकियों को अपना करने दो. बाकि सब ऊपर वाले पर छोड़ दो'. नेगिटिविटी आपके शब्दकोष में है ही नहीं न.  

हाँ टेक्नोलॉजी ने खूब तरक्की कर ली है. पता ही होगा कि अब दूर देश के किसी भी कोने में कॉल एकदम फ्री हो सकती है वह भी लाइव फोटो और विडियो के साथ. इस हिसाब से तो दुनिया कितनी छोटी और करीब हो गई है. एकदम एक परिवार की तरह. यह देखकर तो बड़ा मजा आता होगा आपको। परंतु इस दुनिया के लोगों की सोच संकुचित होती जा रही है. भौगोलिक सीमाओं पर पाबंदियां, लोगों में अलगाव। जैसे दूरियां कम ही नहीं होने देना चाहते। तकनीक का विकास और इंसान का गिराव। 

कभी कभी लगता है ये आभासी नजदीकियाँ अधिक सुखद हैं. लगता है कि आप आस पास ही हो कहीं. सब सुनते हो, सब देखते हो. कितनी ही बार आजमाया है मैंने। कितनी ही परेशानियां और तनाव, बस आपसे कह देने भर से ख़त्म हो जाते हैं. कितनी ही बार लगता है कि कहीं कोई है जो मुझे कुछ करने को प्रेरित कर रहा है या कुछ करने से रोक दे रहा है. जरूर आप ही ऊपर बैठे अपना मैनेजमेंट चलाते होंगे। लोग कहते हैं दुनिया में 'लीडर' ही नहीं बचे. कुछ करो यार पापा! भेजो किसी को या आ जाओ न आप ही.  

खैर छोड़ो! ये आज क्या ले बैठी मैं भी. आज आपका जन्मदिन है न. खूब हिचकियाँ आ रही होंगी। खूब मनपसंद पकवान मिल रहे होंगे। भारत में तो कब का दिन चढ़ चुका होगा। केक तो अबतक काट ही लिया होगा ? आपके यहाँ कौन सा टाइम जोन चलता है वैसे ?  

चलिए जो भी समय हो. ये लीजिये ब्रेड रोल्स बनाएं हैं आपके लिए. हाँ बाबा हाँ, देसी घी में ही तले हैं. नहीं आएगी ज़रा भी स्मेल रिफाइंड की. पता था मुझे। भगवान की भी ताक़त नहीं आपको सुधारने की. 


हैप्पी बर्थडे पापा  珞

Friday, 27 January 2017

नॉस्टाल्जिया...

By On 10:11:00
ऐ मुसाफिर सुनो, 
वोल्गा* के देश जा रहे हो 
मस्कवा* से भी मिलकर आना. 
आहिस्ता रखना पाँव 
बर्फ ओढ़ी होगी उसने 
देखना कहीं ठोकर से न रुलाना। 
और सुनो, लाल चौराहा* देख आना 
पर जरा बचकर जाना 
वहीँ पास की एक ईमारत में 
लेनिन सोया है 
उसे नींद से मत जगाना।
मत्र्योश्काओं* का शहर है वह 
एक बाबुश्का* को जरूर मनाना 
बेचती होगी किसी कोने में "परागा"* 
कुछ अधिक रूबल देकर ले आना.
गोर्की तो कुछ दूर है 
पुश्किन वहीँ है 
चाहो तो मिल आना 
चाय मिलेगी "स कन्फैतमी "*
कुछ कप साथ में पी आना.
और सुनो मुसाफिर!
लौटोगे न, तो छोड़ आना 
अपने देश की गर्माहट। 
ठंडा देश है वह 
तुम्हें सराहेगा। 
हाँ लौटते हुए वहां से लेते आना 
रूसियों की जीवटता. 
बोर्श* में पड़े एक चम्मच स्मिताने* सी 
लड़कियों की रंगत 
उनके सुनहरे बालों का सोना, 
और मासूम बालकों के गालों के टमाटर।
सुनो न, बाँध लाना अपनी पोटली में 
उनकी कहानियों के कुछ पल, 
छोड़ आना कुछ अपनी विरासत। 
और बस, इतना काफी होगा न,  
वोल्गा और गंगा के प्रेम स्पंदन के लिए. 
***
वोल्गा*, मस्कवा* = नदियाँ 
मात्रूशकाओं* = रूसी गुड़ियाएं 
बाबुश्का* = बूढी अम्मा 
परागा"* = एक तरह का केक 
स कनफैती"* = मीठी टॉफ़ी के साथ 
बोर्श*  = चुकंदर के साथ  बना एक तरह का रूसी सूप 
स्मिताने*= बांध हुआ दही ( सॉर क्रीम) 


Wednesday, 28 December 2016

ब्रिक्सिट का कैसा हो क्रिसमस.

By On 14:17:00

यूँ देखा जाए तो यह साल  पूरी दुनिया के लिए ही खासा उथल पुथल वाला साल रहा. वहाँ भारत में नोटबंदी हंगामा मचाये रहीउधर अमरीका में विचित्र परिस्थितियों में डोनाल्ड ट्रंप की जीत हो गई और इधर ब्रिटेन ने यूरोपीय संघ से किनारा कर लिया. 
हालाँकि रेफेरेंडम के नतीजे आने के तुरंत बाद ही इन्टरनेट पर उसे लेकर पछतावे की पोस्टें आने लगीं थीं. लोगों ने कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की नागरिकता के नियमों को खोजना शुरू कर दिया था और ब्रिक्सिट को एक नुकसान दायक फैसला कहा जाने लगा थाजिसके कालांतर में बेशक कुछ लाभ नजर आएँ पर वर्तमान में गंभीर हानि होने की संभावना जताई जा रही थी. 
अन्य देशों का तो पता नहीं पर ब्रिटेन की आर्थिक स्थिति का जायज़ा उस वर्ष विशेष में होने वाले क्रिसमस उत्सव से आसानी से लिया जा सकता है. देश के आर्थिक हालातों का सीधा असर इस त्यौहार परइसकी तैयारियों और खरीदारी पर पड़ता है. क्रिसमस के आसपास बाजार में होने वाली रौनक से तुरंत ही देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था का अंदाजा लगाया जा सकता है.
जैसे कुछ साल पहले रेसेशन के समयक्रिसमस पर बाजारों में भीड़ बेहद कम दिखाई दी थी. दुकाने खाली थीं और उस साल लोगों ने सिर्फ जरुरत भर की खरीदारी ही की थी. एक सर्वे के मुताबिक उस साल पोस्ट ऑफिस और कुरियर कंपनियों से बेहद कम उपहार भेजे गए थे. देश की आर्थिक मंदी का सीधा असर इस त्यौहार और उपहार लेने -देने के इसके रिवाज पर पड़ा था. वर्ना क्रिसमस की खरीदारी के लिए लगने वाली सालाना छूट पर ब्रिटेन के मॉल और बाजार इस कदर ठुसे-भरे होते हैं कि पाँव रखने की जगह भी मुश्किल से मिला करती है. क्रिसमस पर लोग नए घर से लेकर क्रिसमस ट्री तक खरीदते हैं और उनके लिए यह नए साल की नई शुरुआत की तरह होता है. 
ऐसा ही कुछ असर ब्रिक्सिट के बाद इस साल क्रिसमस आने पर देखा जा रहा है परन्तु यह मंदी के दौर से एकदम विपरीत है. लन्दन में प्रोपर्टी का गुब्बारा फटने को है. विश्लेषकों का कहना है कि क्रिसमस तक इसमें २०,००० पौंड्स तक की गिरावट आ सकती है. 
यूरोपीय संघ जनमत संग्रह के परिणामों की घोषणा के कुछ मिनटों के भीतर ही FEST 100 में 122 बिलियन पौंड्स मूल्य की गिरावट देखी गई. 1985 के बाद से पाउंड इतना कभी नहीं घटा।
लन्दन में मकानों की कीमत में 20% तक की कमी आई है ब्रिक्सिट अब अधिक लोगों को एक सस्ता घर खरीदने के लिए बढ़ावा दे सकता है हालाँकि बैंक्स अपनी ब्याज दर बड़ा कर एक बाधा खड़ी कर सकतीं हैं. 
लन्दन बेशक दुनिया के सबसे महंगे शहरों में एक माना जाता हो परन्तु डेलॉइट के शोध के अनुसारडिजाइनर और अन्य विलासिता के सामान डॉलर के संदर्भ में अब किसी भी और जगह से ब्रिटेन में सस्ते मिल रहे हैं. 
यह ब्रिक्सिट मतदान के बाद स्टर्लिंग में गिरावट की प्रवृत्ति से जुड़ा हुआ है, जो पर्यटकों की खर्च करने की क्षमता को बढ़ा रहा है।
जून के बाद से पाउंडडॉलर के मुकाबले 17% से अधिक गिर गया है।
बरहाल ब्रिक्सिट से ब्रिटेन को कितना फायदा होगा या कितना नुकसान यह तो आने वाला समय ही बताएगा परन्तु ब्रिक्सिट का यह क्रिसमस जरूर धमाकेदार होने वाला है. लोगों ने जमकर खरीदारी करनी शुरू कर दी है. शॉपिंग मॉल और सड़कों पर पर्यटकों और खरीदारों का रेला लगा हुआ है और ऑक्स्फोर्ड स्ट्रीट अपने शाही अंदाज में चमक रही है.
लन्दन के होटल, रेस्टोरेंट्स के दाम भी पिछले कुछ दशकों के मुकाबले पहली बार इस साल सबसे कम नजर आ रहे हैं और यह ब्रिक्सिट की ही मेहरबानी है कि अब हर कोई क्रिसमस और नए साल की पार्टी करने के लिए लन्दन का रुख कर रहा था. अमेरिका और एशिया के व्यापारियों ने शहर के महंगेशानदार बॉलरूम और पार्टी हॉल इस साल के लिए ही नहीं बल्कि अगले दिसंबर के लिए भी अभी से बुक कर लिए हैं.
तो तैयार हो जाइए ब्रिटेन के इस शानदार उत्सव में भाग लेने के लिए. उसकी भव्यता अनुभव करने के लिए आप आमंत्रित हैं. इस बार खास गोल्डन टूर्स लेकर आप शहर को इस खास सीजन के लिए सजता देख सकते हैं. चाहें तो थेम्स नदी के ऊपर होने वाली खास और शानदार आतिशबाजी का आनंद ले सकते हैं या बॉक्सिंग डे की सेल में जम कर खरीदारी कर सकते हैं. कहा जा रहा है कि लुइ बिट्टन का हैण्ड बैग इस साल लन्दन में सबसे सस्ता बिक रहा है तो चढ़ा लीजिए अपनी आस्तीन और हो जाइए तैयार अपने सपनों को कुछ रंग देने के लिए क्योंकि ब्रिक्सिट की कृपा से इस साल जैसा भव्य और धमाकेदार क्रिसमस सीजन होने वाला है शायद ब्रिटेन में पहले कभी नहीं हुआ. 

Thursday, 15 December 2016

यथार्थ के आकाश पर कल्पना की उड़ान... 'उडारी"

By On 10:21:00

अरुणा सब्बरवाल जी का नया कहानी संग्रह जब हाथ में आया तो सबसे पहले ध्यान आकर्षित किया उसके शीर्षक  उडारीने ।जैसे हाथ में आते ही पंख फैलाने को तैयार. लगा कि अवश्य ही यथार्थ के आकाश पर कल्पना की उड़ान लेती कहानियाँ होंगी और वाकई पहली ही कहानी ने मेरी सोच को सच साबित कर दिया ।

संग्रह के शीर्षक वाली पहली कहानी - उडारी- कठोर यथार्थ पर मानवीय संवेदना और प्रेम की कहानी है. जज़्बातों की उड़ान की कहानी है. अपनी भावनाओं और सामाजिक बंधनों में बंधी एक औरत की कहानी है जो अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना चाहती है और सामाजिक बंधनों को परे रख, अपने पंख पसार कर, खुशियों के आकाश में उड़ जाना चाहती है.  

इस संग्रह में कुल पन्द्रह कहानियाँ हैं और सभी कहानियां एक वृहद कैनवास पर जीवन के विभिन्न आयामों को अनेक रंगों में चित्रित करती हैं जिसमें प्रेम का रंग सबसे अहम् है. 
प्रत्येक कहानी जीवन से जुड़ी कहानी है जैसे हमारे ही आसपास की कोई घटना हो. कहानी पढते हुए उसके चरित्र अपने से ही लगने लगते हैं. कई बार लगता है कि जैसे उस व्यक्ति को हम पहचानते हैं या यह तो मेरी ही कहानी है और यह किसी भी कहानी की सफलता का मजबूत मापदंड है. सभी कहानियों का कथ्यचरित्र चित्रणऔर कथा विन्यास प्रभावशाली है.
अरुणा जी कि इन कहानियों की शैली अधिकांशत: संवादात्मक है. लेखिका कभी स्वयं से तो कभी उसके पात्र स्वयं से संवाद करते हुए कहानी को गति देते हैं. ये सम्वाद जितने सच्चे प्रतीत होते हैं उतने ही रोचक और सरल भी हैं अत: पाठक के मन पर तुरंत ही प्रभाव छोड़ते हैं. 

अरुणा जी ने भारत और यूके का जीवन समान रूप से देखा और जिया है अत: ज़ाहिर है कि दोनों देशों के सामाजिक परिवेश का संगम उनके लेखन में नजर आता है.

संग्रह की - मरीचिकापहली छुअनमी टूतुम और मैंसोल मेट आदि कहानियों मेंएक आम इंसान की ज़िंदगी के छोटे-छोटे अहसासअनुभूतियाँप्रेम और जीवन की आधारभूत आवश्यकताओं के बीच संघर्ष. इच्छाओंअरमान और समाज के यथार्थ के बीच पिसते इंसान और उसकी भावनाओं का एक मर्मस्पर्शी चित्रण है. 

कहानी - उसका सच और ठहरा पानीमानवीय संवेदना का चरम हैं. हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में भावनाओं का ठहराव और परिवेश का कठोर सत्य पात्रों के चरित्र और संवादों के माध्यम से प्रभावशाली तरीके से उभरता है. जब दाम्पत्य जीवन में शक का कीड़ा सिर उठाने लगे तो उसके परिणाम कितने दुखद हो सकते हैं इसका  बहुत मार्मिक रूप प्रस्तुत किया है -कहानी उसका सचमें ।
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वहीं "वह पहला दिनऔर बेनाम रिश्तेजैसी कहानियों में अपने देश से बाहर रहने की और देश में वापस लौटने की छटपटाहट और नोस्टाल्जिया लगातार झलकता है.  

इस संग्रह में एक बेहद खूबसूरत कहानी है - इंग्लिश रोज - यह भारतीय मानसिकता और संस्कृति की आड़ में उसकी कमियां बताती और पश्चिमी संस्कृति के प्रति उसके पूर्वाग्रह को ध्वस्त करती एक सशक्त और पठनीय कहानी है. एक भारतीय नारी अपने विवाहित जीवन के कटु अनुभव के बाद एक नया कदम उठाना चाहती है. उसका अतीत और समाज उसे डराता है. कहानी उसके मानसिक संघर्ष को चित्रित करती है और पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति के बारे में एक सकारात्मक दृष्टिकोण उपलब्ध कराती है.

मुझे संग्रह की सबसे खूबसूरत कहानियाँ लगीं - शीशे का ताजमहल और १६ जुलाई १०८०. 
दोनों ही कहानियाँ मानवीय ह्रदय की तह में जाकर उसकी संवेदना को पाठक के ह्रदय में कुछ इस तरह रोपित करती हैं कि पाठक स्वयं को उसी परिस्थिति और जगह पर महसूस करने लगता है. दोनों ही कहानियों का विषय लगभग एक जैसा है और दोनों कहानियाँ अपने पात्रों के माध्यम से अपने मोह और स्वार्थ से परे, समाज और उसके लोगों के भले के लिए अपना योगदान और त्याग देने के लिए प्रेरित करतीं हैं.
कहानी का कथानक और भावनाओं पर पकड़ इतनी मज़बूत है कि कहानी कहीं भी उबाऊ नहीं होती और अंत तक पाठक की उत्सुकता बनी रहती है.  

लेखिका की कथानकचरित्रोंभावों और प्रस्तुतीकरण पर पकड़ मज़बूत है. बस एक कमी बार बार पुस्तक पढते हुए खलती है- वह है लगभग हर पन्ने पर टाइपिंग या प्रूफ रीडिंग की गलतियां. हालाँकि ये गलतियां सूक्ष्म हैं और पूर्णत: प्रकाशन सम्बन्धी हैं फिर भी कहानियों के प्रवाह को क्षण भर के लिए रोकती सी लगती हैं. हालाँकि कथानक और उनका शिल्पभाव ऐसा है कि इसके बावजूद भी पूरी कहानी पढ़ा ले जाता है. 
आखिर में कहूँगी कि उडारी”, विविध विषयों से भरा हुआदो भिन्न समाज और परिवेश में आम जीवन को दर्शाता हुआ एक सशक्त कहानी संग्रह है. आशा है कि लेखिका अपनी कलम से ऐसे और भी सुन्दर उपहार पाठकों को देती रहेंगी.


      

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